कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८५ प्रसिद्ध वे आदित्यदेव हमारे नेत्रोंको दृष्टिशक्ति प्रदान करके धारण करें। '(श्रीसूर्यगायत्री) 'हम भगवान् आदित्यको जानते हैं— पूजते हैं; हम सहस्र (अनन्त) किरणोंसे मण्डित भगवान् सूर्य- नारायणका ध्यान करते हैं; वे सूर्यदेव हमें प्रेरणा प्रदान करें।'* पीछे सविता देवता हैं, आगे सविता देवता हैं, उत्तर-मार्गमें भी सविता देवता हैं, और दक्षिण मार्गमें भी (तथा ऊपर-नीचे भी) सविता देवता हैं। सविता देवता हमारे लिये सब कुछ प्रसव करें (सभी अभीष्ट वस्तुएँ दें)। सविता देवता हमें दीर्घ आयु प्रदान करें। 'ॐ' यह एकाक्षर मन्त्र ब्रह्म है। 'घृणि.' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है, 'सूर्य' यह दो अक्षरोंका मन्त्र है। 'आदित्य' इस मन्त्रमें तीन अक्षर हैं। इन सबको मिलाकर सूर्यनारायणका अष्टाक्षर महामन्त्र—'ॐ घृणि. सूर्य आदित्योम्' बनता है। यही अथर्वाङ्गिरस सूर्यमन्त्र है। इस मन्त्रका जो प्रतिदिन जप करता है, वही ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) होता है, वही ब्राह्मण होता है। सूर्यनारायणकी ओर मुख करके जपनेसे महाव्याधिके भयसे मुक्त हो जाता है। उसका दारिद्रय नष्ट हो जाता है। सारे दोषों—पापोंसे वह मुक्त हो जाता है। मध्याह्न- में सूर्यकी ओर मुख करके इसका जप करे। यों करनेसे मनुष्य सद्यःउत्पन्न पञ्च महापातकोंसे छूट जाता है। यह सावित्री विद्या है, इसकी कहीं कुछ भी प्रशंसा न करे। जो महाभाग इसका प्रातः पाठ करता है, वह भाग्यवान् हो जाता है, उसे गौ आदि पशु प्राप्त होते हैं, वेदार्थ-ज्ञानकी प्राप्ति होती है। तीनों काल इसका जप करनेसे सैकड़ों यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो सूर्यदेवताके हस्त नक्षत्रपर रहते समय (अर्थात् आश्विन मासमे) इसका जप करता है, वह महामृत्यु- से तर जाता है, जो इस प्रकारसे जानता है, वह भी महामृत्यु- से तर जाता है। ॥ अथर्ववेदीय सूर्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! जगतकी दुःखमयता और आनन्दमयता अज्ञस्य दुःखौघमयं ज्ञस्यानन्दमयं जगत् । अन्धं भुवनमन्धस्य प्रकाशं तु सुचक्षुषाम् ॥ (वराहोपनिषद् २२) जैसे अन्धेके लिये जगत् अन्धकारमय है और अच्छी आँखोंवालेके लिये प्रकाशमय है, वैसे ही अज्ञानी (जगत्को भगवान्से रहित विषयमय देखनेवाले) के लिये जगत् दुःखोंका समूहमय है और ज्ञानी (समस्त जगत्में भगवान्से पूर्ण देखनेवाले) के लिये आनन्दमय है।
- 'आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि। तन्न सूर्य प्रचोदयात्।'
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अक्ष्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड नेत्ररोगहरी विद्या कथा है कि एक समय भगवान् सांकृति आदित्यलोकको पधारे । वहाँ सूर्यनारायणको प्रणाम करके उन्होंने चाक्षुष्मती विद्याके द्वारा उनकी स्तुति की । ॐ चक्षु-इन्द्रियके प्रकाशक भगवान् श्रीसूर्यनारायणको नमस्कार है । ॐ आकाशमें विचरण करनेवाले सूर्यनारायणको नमस्कार है। ॐ महासेन ( सहस्रों किरणोंकी भारी सेना साथ रखनेवाले ) श्रीसूर्य- नारायणको नमस्कार है। ॐ तमोगुणरूपमें भगवान् सूर्य- नारायणको नमस्कार है । ॐ रजोगुणरूपमें भगवान् सूर्य- नारायणको नमस्कार है । ॐ सत्त्वगुणके रूपमें भगवान् श्रीसूर्यनारायणको नमस्कार है। ॐ हे भगवन् ! मुझे असत्से सत्की ओर ले चलिये, मुझे अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले चलिये, मुझे मृत्युसे अमृतकी ओर ले चलिये । भगवान् सूर्य शुचिरूप हैं, और वे अप्रतिरूप भी हैं—उनके रूपकी कहीं भी तुलना नहीं है। जो अखिल रूपोंको धारण कर रहे हैं तथा रश्मिमालाओंसे मण्डित हैं, उन जातवेदा (सर्वज्ञ) स्वर्णसदृश प्रकाशवाले ज्योतिःस्वरूप और तपनेवाले भगवान् भास्करको हम स्मरण करते हैं। ये सहस्रों किरणोंवाले और शत शत प्रकारसे वर्तमान भगवान् सूर्यनारायण समस्त प्राणियोंके समक्ष उदित हो रहे हैं। जो हमारे नेत्रोंके प्रकाश हैं, उन अदिति- नन्दन भगवान् श्रीसूर्यको नमस्कार है। दिनका भार वहन करनेवाले विश्ववाहक सूर्यदेवके प्रति हमारा सब कुछ सादर समर्पित है। इस प्रकार चाक्षुष्मती विद्याके द्वारा स्तुति किये जानेपर भगवान् सूर्यनारायण अत्यन्त प्रसन्न हुए और बोले—'जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्याका नित्य पाठ करता है, उसको आँख- का रोग नहीं होता, उसके कुलमें अन्धे नहीं होते । आठ ब्राह्मणों- को इसका ग्रहण करा देनेपर इस विद्याकी सिद्धि होती है। जो इस प्रकार जानता है, वह महान् हो जाता है ॥ १ ॥ द्वितीय खण्ड ब्रह्मविद्याका उपदेश तदनन्तर सांकृति मुनिने सूर्यनारायणसे कहा, 'भगवन् ! मेरे लिये ब्रह्मविद्याका उपदेश कीजिये ।' उनसे भगवान् आदित्य बोले—'सांकृति ! सुनो, तुमसे अत्यन्त दुर्लभ तत्त्व ज्ञानका वर्णन करता हूँ, जिसके विज्ञानमात्रसे तुम जीवन्मुक्त हो जाओगे । सबको एक, अज, शान्त, अनन्त, ध्रुव, अन्यय तथा तत्त्वत चैतन्यरूप देखते हुए तुम शान्ति और सुखसे रहो । असवेदन अर्थात् आत्मा अथवा परमात्माके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुका भान न हो—ऐसी स्थितिको ही योग मानते हैं; यही वास्तविक चित्तक्षय है । अतएव योगस्थ होकर कर्मोंको करो; नीरस अर्थात् विरक्त होकर कर्म मत करो । अब असवेदनरूपी योगकी प्रथम भूमिका बतलाते हैं— योगमें प्रवृत्त होनेपर अन्त:करण प्रतिदिन वासनाओंसे विरक्त होता जाता है और नित्यप्रति उदार कर्मोंमें संलग्न होता और उन्हींमें प्रसन्नताका अनुभव करता है । मूर्ख मनुष्योंकी ग्राम्य-चेष्टाओं ( अश्लील विषयभोगकी प्रवृत्तियों ) से वह सदा घृणा करता है। किसीकी छिपी हुई मार्मिक बातोंको
खण्ड २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८७
दूसरोंपर प्रकट नहीं करता । परंतु सदा पुण्यकर्मोंका ही सेवन करता रहता है और जिनके द्वारा किसी प्राणीको उद्वेग न हो, ऐसे मृदु ( दया और उदारतासे पूर्ण ) सौम्य कर्मोंका सेवन करता है। निरन्तर पापसे डरता है और भोगकी आकाङ्क्षा नहीं करता। वह ऐसे वचन बोलता है, जिनमें स्नेह और प्रेम भरा हो, मृदुल और उचित हों तथा देश-कालके अनुकूल हों । मन, वचन और कर्मसे वह सज्जन पुरुषोंका सङ्ग करता है और जहाँ कहींसे भी सग्रह करके नित्य सत्-शास्त्रोंका अनुशीलन करता है। ऐसी स्थिति आनेपर वह प्रथम भूमिका- को प्राप्त होता है। संसार-सागरको पार करनेके लिये जो इस प्रकारके विचारोंमें संलग्न रहता है, वह भूमिकावान् कहलाता है और दूसरे 'आर्य' कहलाते हैं। जो योगकी विचार नाम- की दूसरी भूमिकाको प्राप्त होता है, उसके लक्षण ये हैं—॥ १-१० ॥ वह ऐसे श्रेष्ठ विद्वानोंका आश्रय लेता है जो श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा और ध्यानकी उत्तम व्याख्या करनेके कारण अधिक विख्यात हों। वह पद और पदार्थोंके विभागको ठीक ठीक जानता है और श्रवण करनेयोग्य शास्त्रोंका ज्ञान प्राप्त कर लेनेके कारण कर्तव्य-अकर्तव्यके निर्णयको ठीक उसी प्रकार जानता है, जैसे घरका स्वामी घरके पदार्थोंको जानता है। मद, अभिमान, मत्सरता (डाह), लोभ और मोहकी अधिकता उसके मनमें रहती नहीं, किंतु बाह्य आचरणमे भी जो थोड़ी-बहुत इन दोषोंकी स्थिति देखी जाती है, उसको भी वह उसी भाँति त्याग देता है, जैसे साँप केंचुलको। ऐसी बुद्धिवाला साधक शास्त्र, गुरु और संतजनोंकी सेवाके द्वारा रहस्यपूर्वक सारी बातोंको यथावत् जान लेता है॥११-१४॥ इसके बाद वह असंसर्गा नामकी तीसरी योगभूमिकामें प्रवेश करता है—ठीक वैसे ही, जैसे एक सुन्दर पुरुष स्वच्छ पुष्प-शय्यापर आरूढ होता है। शास्त्रोंके वाक्य जिस अर्थको प्रकट करते हैं, उसमे विधिपूर्वक अपनी निश्चल बुद्धिको लगाकर (शास्त्रोके वचनोंपर पूर्ण श्रद्धा रखकर), तपस्वियोंके आश्रममें रहकर तथा अध्यात्मशास्त्रकी चर्चा करते हुए वह पत्थरकी शय्यापर आसीन होकर अपनी विस्तृत आयु व्यतीत करता है । वह नीतिज्ञ पुरुष चित्तको शान्ति प्रदान करनेके कारण अधिक भानेवाले वनभूमि-विहार ( वनके स्थानोंमें भ्रमण ) द्वारा विषयोंमें अनासक्त हो स्वाभाविक सुख-सौख्यका उपभोग करता हुआ अपना समय विताता है। सत्-शास्त्रोंके अभ्याससे तथा पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जीवकी यह यथार्थ वस्तुदृष्टि निर्मल होती है। इस तृतीय भूमिकाको प्राप्त करके वह स्वयं बुद्ध (ज्ञानी) होकर अनुभव करता है ॥ १५-१९ ॥ असंसर्ग दो प्रकारका होता है, उसके इस भेदको सुनो। यह असंसर्ग सामान्य और श्रेष्ठ—दो प्रकारका है। मै न तो कर्ता हूँ न भोक्ता हूँ, न बाध्य हूँ और न बाधक ही हूँ— इस प्रकार विषयोंमें आसक्त न होनेका भाव ही सामान्य असंसर्ग कहलाता है। सब कुछ पूर्वजन्ममें किये हुए कर्मोंके फल-रूपमें उपस्थित है, अथवा सब कुछ ईश्वराधीन है, अतएव सुख हो या दुःख, इसमे मेरा कर्तृत्व ही क्या है। भोगोंका विस्तार (अधिक संग्रह) महारोग है; सब प्रकारकी सम्पदाएँ परम आपदाएँ हैं। सारे संयोग एक दिन वियोगके लिये ही हैं, आधियाँ (मानसिक चिन्ताएँ) अज्ञानियोंके लिये व्याधिरूप हैं। समस्त पदार्थोंको काल निरन्तर अपना ग्रास बनानेमे लगा है, अतएव सारे पदार्थ अस्थायी है,—इस प्रकार शास्त्रोंके वचनोंको समझनेसे सर्वत्र अनास्था हो जानेके कारण जो मनमें उनके अभावकी भावना होती है, उसे सामान्य असंसर्ग कहते हैं। इस प्रकार क्रमशः महात्माओके सत्सङ्गसे 'मै कर्ता नहीं हूँ, ईश्वर कर्ता है अथवा-मेरे पुराकृत कर्म ही कर्ता हैं' ऐसा निश्चय करके सब प्रकारकी चिन्ताओं तथा शब्द-अर्थकी भावनाको भी अत्यन्त दूर कर देनेके पश्चात् जो मौन (मन इन्द्रियोंका पूर्ण सयम), आसन (आन्तरिक स्थिति) और शान्तभाव (बाह्य भावोका विस्मरण) हो जाता है—वह श्रेष्ठ असंसर्ग कहलाता है ॥ २०-२६ ॥ सतोष और आनन्दमयी होनेसे मधुर प्रतीत होनेवाली पहली भूमिका इस प्रकार उदय होती है, मानो वह अन्त.करण की भूमिमे उगा हुआ अमृतका छोटा-सा अङ्कुर हो। इस भूमिकाके उदित होनेके पश्चात् अन्तःकरणमे अन्य भूमिकाओके प्रकट होनेके लिये एक भूमि (क्षेत्र) हो जाती है। उसके बाद साधक क्रमशः द्वितीय और तृतीय भूमिकाओंको भी प्राप्त कर लेता है। इनमे यह तीसरी भूमिका ही सर्वश्रेष्ठ होती है, क्योकि इसमे पुरुष सम्पूर्ण सङ्कल्पात्मक वृत्तियोंना त्याग कर देता है। इन तीनों भूमिकाओके अभ्याससे अज्ञानके क्षीण होनेपर चतुर्थी भूमिकाको प्राप्त हुए साधक सर्वत्र समभावसे देखते हैं। उस समय अद्वैतभाव दृढ होकर द्वैतभावकी शान्ति हो जाती है, इससे चौथी भूमिकामर पहुँचे हुए साधक इस लोकको स्वप्नवत् देखते हैं । पहली तीनो भूमिकाएँ जाग्रत्-स्वरूपा हैं तथा यह चौथी भूमिका स्वप्न कहलाती है ॥ २७-३२ ॥
६८८ * अक्ष्युपनिषद् * [ खण्ड २ पाँचवीं भूमिकाको प्राप्त होनेपर साधकका चित्त शरत्- विदेहमुक्तिकी अवस्था ही सातवीं भूमिका बतायी गयी है। कालके मेघखण्डोंके समान आकाशमे विलीन हो जाता है, यह भूमिका परम शान्त एव वाणीके द्वारा अगम्य है। यही और केवल सत्तामात्र अवशिष्ट रहता है। इसमे चित्तके विलीन सब भूमिकाओंकी अन्तिम सीमा है, यहाँ योगकी सारी भूमिकाएँ हो जानेके कारण सासारिक विकल्पोंका उदय ही नहीं होता। समाप्त हो जाती हे। लोकाचारका अनुगमन करना छोड़कर, सुषुप्तपद नामकी इस पाँचवीं भूमिकाके प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण देहाचारका अनुमरण छोड़कर तथा शास्त्रानुगमनको त्यागकर विशेषाश (भेद) शान्त हो जाते हैं, और साधक केवल अपने अध्यासको दूर करो। विश्व, प्राज्ञ और तैजस आदि- (निर्विशेष) अद्वैत स्थितिमें आ जाता है। द्वैतका आभास रूप समस्त जगत् 'ॐकार' मात्र है, क्योंकि वाच्य और नष्ट हो जाता है और आत्मज्ञानसे सम्पन्न प्रसन्न साधक पाँचवीं वाचकमे भेद नहीं होता (ॐकार वाचक है और परमात्मरूप भूमिकामें पहुँचकर सुषुप्तघन (आनन्दमयी) स्थितिमें ही सम्पूर्ण विश्व वाच्य है)। भेदमे इसकी उपलब्धि नहीं होती। रहता है। वह बाहरके व्यवहार करता हुआ भी सदा अन्तर्मुख प्रणवकी पहली मात्रा अकार ही 'विश्व' है, उकार 'तैजस' ही रहता है और सदा परिश्रान्त होकर निद्रा लेनेवालेके है और मकार 'प्राज्ञ' स्वरूप है--ऐसा क्रमशः अनुभव समान दिखलायी देता है। इस भूमिकामें अभ्यास करता हुआ करे। समाधिकालसे पूर्व ही अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक चिन्तन वह वासना रहित होकर क्रमशः तुर्या नामकी छठी भूमिशामे करके स्थूल और सूक्ष्मके क्रमसे सबको चिदात्मामें विलीन कर पदार्पण करता है। जहाँ न सत् है न असत् है, न अहङ्कार है दे। चिदात्माको अपना स्वरूप समझे। मैं नित्य, शुद्ध, बुद्ध, न अनहङ्कार है, उस विशुद्ध अद्वैतावस्थामे वह अत्यन्त निर्भय मुक्त, सत्तामात्र, अद्वय परमानन्द-सन्दोहमय एव वासुदेव- होकर मननात्मक वृत्तिसे रहित हो जाता है। उसके हृदयकी स्वरूप ॐकार हूँ-ऐसी दृढ भावना करे। क्योंकि यह सारा ग्रन्थियाँ नष्ट हो जाती हैं, संदेह शान्त हो जाते हैं, वह प्रपञ्च आदि, मध्य और अन्तमें केवल दुःखमय ही है, जीवन्मुक्त होकर भावाशून्य हो जाता है और निर्वाणको न अतएव हे अनघ ! सबको छोड़कर तत्त्वनिष्ठ बनो। मैं प्राप्त होनेपर भी निर्वाणको प्राप्त हुआ-सा हो जाता है। उस अविद्यारूपी अन्धकारसे परे, सब प्रकारके आभाससे रहित, समय वह चित्रलिखित दीपककी भाँति निश्चेष्ट रहता है। इस आनन्दस्वरूप, निर्मल, शुद्ध, मन और वाणीकी पहुँचके परे, छठी भूमिकामें स्थित होनेके पश्चात् वह सातवीं भूमिकाको प्रज्ञानघन और आनन्दस्वरूप ब्रह्म हूँ-इस प्रकारकी भावना प्राप्त होता है ॥ ३३-४० ॥ करनी चाहिये। यह उपनिषद् है ॥ ४१-४९ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय अक्ष्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! परमात्माका चिन्तन करो निद्राया लोकवार्त्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः । क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥ (अध्यात्मोपनिषद् ५) नींद, लोकचर्चा, इन्द्रियोंके शब्दादि विषय और आत्मविस्मृति (परमात्माका स्मरण न करना) इन (चारों) को कहीं तनिक-सा भी अवसर न देकर मनसे निरन्तर आत्मा (परमात्मा) का चिन्तन करो।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
अब नेत्र-रोगका हरण करनेवाली पाठमात्रसे सिद्ध ॐ (भगवान्का नाम लेकर कहे )। हे चक्षुके अभिमानी होनेवाली चाक्षुषी विद्याकी व्याख्या करते हैं, जिससे समस्त सूर्यदेव ! आप चक्षुमे चक्षुके तेजरूपसे स्थिर हो जायें । मेरी नेत्ररोगोंका सम्पूर्णतया नाश हो जाता है और नेत्र तेजयुक्त हो रक्षा करें ! रक्षा करें ! मेरे आँखके रोगोंका शीघ्र शमन करें, जाते हैं । उस चाक्षुषी विद्याके ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री शमन करें । मुझे अपना सुवर्ण-जैसा तेज दिखला दें, दिखला छन्द है, सूर्यभगवान् देवता हैं, नेत्ररोगकी निवृत्तिके लिये दें । जिससे में अंधा न होऊँ (कृपया) वैसे ही उपाय करें, इसका जप होता है—यह विनियोग है *। उपाय करें । मेरा कल्याण करें, कल्याण करें । दर्शन-शक्तिका चाक्षुषी विद्या अवरोध करनेवाले मेरे पूर्वजन्मार्जित जितने भी पाप हैं, सबको ॐ चक्षु चक्षुः चक्षु. तेजः स्थिरो भव । मा पाहि जड़से उखाड़ दे, जड़से उखाड़ दें । ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) पाहि । त्वरितं चक्षूरोगान् शमय शमय । मम जातेरूपं नेत्रोंको तेज प्रदान करनेवाले दिव्यस्वरूप भगवान् भास्करको तेजो दर्शय दर्शय । यथाहम् अन्धो न स्या तथा कल्पय नमस्कार है । ॐ करुणाकर अमृतस्वरूपको नमस्कार है । कल्पय । कल्याणं कुरु कुरु । यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानि ॐ सूर्यभगवान्को नमस्कार है । ॐ नेत्रोंके प्रकाश भगवान् चक्षुःप्रतिरोधकदुष्कृतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय । सूर्यदेवको नमस्कार है । ॐ आकाशविहारीको नमस्कार है । ॐ नम चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय । ॐ नम परम श्रेष्ठस्वरूपको नमस्कार है । ॐ ( सबमें क्रिया-शक्ति करुणाकरायामृताय । ॐ नम. सूर्याय । ॐ नमो भगवते उत्पन्न करनेवाले ) रजोगुणरूप सूर्यभगवान्को नमस्कार है । सूर्यायाक्षितेजसे नम. । खेचराय नम. । महते नम. । रजसे ( अन्धकारको सर्वथा अपने अदर समा लेनेवाले ) तमोगुणके नम.। तमसे नम.। असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। आश्रयभूत भगवान् सूर्यको नमस्कार है । हे भगवन् ! मुझको मृत्योर्मा अमृत गमय। उष्णो भगवान्छुचिरूपः। हंसो भगवान् असत्से सत्की ओर ले चलिये । अन्धकारसे प्रकाशकी ओर ले शुचिरप्रतिरूप । य इमा चाक्षुष्मतीविद्या ब्राह्मणो नित्यमधीते चलिये । मृत्युसे अमृतकी ओर ले चलिये । उष्णस्वरूप भगवान् न तस्याक्षिरोगो भवति । न तस्य कुले अन्धो भवति । सूर्य शुचिरूप हैं । हंसरूप भगवान् सूर्य शुचि तथा अप्रतिरूप अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति ॥ हैं—उनके तेजोमय स्वरूपकी समता करनेवाला कोई नहीं है । जो ब्राह्मण इस चाक्षुष्मती विद्याका नित्य पाठ करता है, उसको नेत्रसम्बन्धी कोई रोग नहीं होता । उसके कुलमे कोई
- तस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषि, गायत्री छन्द , सूर्यो देवता, चक्षूरोगनिवृत्तये विनियोग । उ० अं० ८१-
६९० * चाक्षुषोपनिषद् * अन्धा नहीं होता। आठ ब्राह्मणोंको इस विद्याका दान ॐ षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न भगवान् आदित्यको करनेपर—इसका ग्रहण करा देनेपर इस विद्याकी सिद्धि नमस्कार है। उनकी प्रभा दिनका भार वहन करनेवाली है, होती है।८ दिनका भार वहन करनेवाली है। हम उन भगवान्के लिये जो सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेधा अत्यन्त प्रिय है, वे जो किरणोंसे सुशोभित एवं जातवेदा (भूत आदि तीनों ऋषिगण उत्तम पत्तोंवाले पक्षीके रूपमें भगवान् सूर्यके पास कालोंकी बातको जाननेवाले) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे—'भगवन् ! इस (सुवर्णके समान कान्तिमान्) पुरुषके रूपमें तप रहे हैं; इस अन्धकारको छिपा दीजिये, हमारे नेत्रोंको प्रकाशसे पूर्ण सम्पूर्ण विश्वके जो एकमात्र उत्पत्तिस्थान हैं, उन प्रचण्ड कीजिये तथा तमोमय बन्धनमें बँधे हुए से हम सब प्राणियोंको प्रतापवाले भगवान् सूर्यको हम नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्षको समस्त प्रजाओ (प्राणियों) के समक्ष उदित हो रहे हैं। नमस्कार है। पुष्करेक्षणको नमस्कार है। निर्मल नेत्रोंवाले— ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी अमलेक्षणको नमस्कार है। कमलेक्षणको नमस्कार है। विश्व- स्वाहा। रूपको नमस्कार है। महाविष्णुको नमस्कार है।' ॥ कृष्णयजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद् समाप्त ॥ ❖ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ❖ ॐ चाक्षुषी (नेत्र)-उपनिषद्की शीघ्र फल देनेवाली विधि— (लेखक—पं० श्रीमुकुन्दवल्लभजी मिश्र, ज्योतिषाचार्य) नेत्ररोगसे पीड़ित श्रद्धालु साधकको चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी) से अनारकी शाखाकी कलमके द्वारा काँसेके पात्रमें निम्नलिखित बत्तीसे यन्त्रको लिखे— +------+------+------+------+ फिर उसी यन्त्रपर ताँबेकी कटोरीमें चतुर्मुख (चारों ओर चार बत्तियोंका) घीका दीपक | ८ | १५ | २ | ७ | जलाकर रख दे। तदनन्तर गन्ध-पुष्पादिसे यन्त्रका पूजन करे। फिर पूर्वकी ओर मुख करके बैठे और +------+------+------+------+ हरिद्रा (हल्दी) की मालासे ॐ ह्रीं हंस' इस बीजमन्त्रकी ६ मालाएँ जपकर नेत्रोपनिषद्के | ६ | ३ | १२ | ११ | कम-से-कम बारह पाठ करे। पाठके पश्चात् फिर उपर्युक्त बीजमन्त्रकी ५ मालाएँ जपे। तदनन्तर +------+------+------+------+ सूर्यभगवान्को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर प्रणाम करे और मनमें यह निश्चय करे कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही | १४ | ९ | ८ | १ | नष्ट हो जायगा। +------+------+------+------+ ऐसा करते रहनेसे इस उपनिषद्का नेत्ररोगनाशक अद्भुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखनेमें | ४ | ५ | १० | १३ | आता है। +------+------+------+------+ 'मम चक्षूरोगान् शमय शमय' १. 'पुण्डरीकाक्ष', 'पुष्करेक्षण' और 'कमलेक्षण'—इन तीनों नामोंका एक ही अर्थ है—कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रा णो नि द् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् नारायणकी सर्वकारणता एवं सर्वरूपता, अष्टाक्षर नारायण-मन्त्रका स्वरूप और महिमा
ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके अत्र नारायणोप- निषद् आरम्भ किया जाता है । निश्चय ही, भगवान् नारायण सबके शरीरोंमें शयन करनेवाले अन्तर्यामी आत्मा हैं । उन्होंने संकल्प किया—'मैं जीवोंकी सृष्टि करूँ ।' अतः उन्हींसे सबकी उत्पत्ति हुई है । नारायणसे ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न होता है, उन्हींसे मन और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ प्रकट होती हैं। आकाश, वायु, तेज, जल तथा सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वी—इन सबकी नारायणसे ही उत्पत्ति होती है। नारायणसे ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं। नारायणसे शिवजी प्रकट होते हैं। नारायणसे इन्द्रका जन्म होता है। नारायणसे प्रजापति उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही बारह आदित्य प्रकट हुए हैं। ग्यारह रुद्र, आठ वसु और सम्पूर्ण छन्द (वेद) नारायणसे ही उत्पन्न होते हैं, नारायणसे ही प्रेरित होकर अपने-अपने कार्यमें प्रवृत्त होते हैं और नारायणमें ही लीन हो जाते हैं। यह ऋग्वेदीय उपनिषद्का कथन है ॥ १ ॥ भगवान् नारायण नित्य हैं । ब्रह्मा नारायण हैं । शिव भी नारायण हैं। इन्द्र भी नारायण हैं । काल भी नारायण हैं । दिशाएँ भी नारायण हैं । विदिशाएँ (दिशाओंके बीचके कोण) भी नारायण हैं । ऊपर भी नारायण हैं। नीचे भी नारायण हैं । भीतर और बाहर भी नारायण हैं । जो कुछ हो चुका है तथा जो कुछ हो रहा है और होनेवाला है, यह सब भगवान् नारायण ही हैं । एकमात्र नारायण ही निष्कलङ्क, निरञ्जन, निर्विकल्प, अनिर्वचनीय एव विशुद्ध देव हैं; उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है । जो इस प्रकार जानता है, वह विष्णु ही हो जाता है, वह विष्णु ही हो जाता है । यह यजुर्वेदीय उपनिषद्का प्रतिपादन है ॥ २ ॥ सबसे पहले 'ॐ' इस अक्षरका उच्चारण करे, इसके बाद 'नम ' पदका, फिर अन्तमें 'नारायणाय' इस पदका उच्चारण करे । 'ॐ' यह एक अक्षर है । 'नमः' ये दो अक्षर हैं । 'नारायणाय' ये पाँच अक्षर हैं। यह 'ॐ नमो नारायणाय' पद भगवान् नारायणका अष्टाक्षरमन्त्र है । निश्चय ही, जो मनुष्य भगवान् नारायणके इस अष्टाक्षरमन्त्रका जप करता है, वह उत्तम कीर्तिसे युक्त हो पूरी आयुतक जीवित रहता है । जीवोंका आधिपत्य, धनकी वृद्धि, गौ आदि पशुओंका स्वामित्व—ये सब भी उसे प्राप्त होते हैं । तदनन्तर वह अमृतत्वको प्राप्त होता है, अमृतत्वको प्राप्त होता है (अर्थात् भगवान् नारायणके अमृतमय परमधाममें जाकर परमानन्दका अनुभव करता है)। यह सामवेदीय उपनिषद्का कथन है॥ ३ ॥ आन्तरिक आनन्दमय ब्रह्मपुरुष प्रणवस्वरूप है, 'अ' 'उ' 'म्'—ये उसकी मात्राएँ हैं। ये अनेक हैं, इनका ही सम्मिलित रूप 'ॐ' इस प्रकार हुआ है । इस प्रणवका जप करके योगी जन्म-मृत्युरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रकी उपासना करनेवाला साधक वैकुण्ठधाममें जायगा । वह यह वैकुण्ठधाम विज्ञानघन
(ब्राह्मणप्रिय) हैं। भगवान् मधुसूदन ब्रह्मण्य हैं। पुण्डरीक
६९२ * नारायणोपनिषद् * पुण्डरीक (कमल) है, अतः इसका स्वरूप विद्युत्के समान परम प्रकाशमय है। देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मण्य (ब्राह्मणप्रिय) हैं। भगवान् मधुसूदन ब्रह्मण्य हैं। पुण्डरीक (कमल) के सदृश नेत्रोंवाले भगवान् विष्णु ब्रह्मण्य हैं। अच्युत विष्णु ब्रह्मण्य हैं। सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित एक ही नारायण- देव कारणपुरुष हैं। वे ही कारणरहित परब्रह्म हैं। ॐ यह अथर्ववेदीय उपनिषद्का प्रतिपादन है ॥ ४ ॥ प्रातःकाल इस उपनिषद्का पाठ करनेवाला पुरुष रात्रिमें किये हुए पापका नाश कर डालता है। सायंकालमे इसका पाठ करनेवाला मनुष्य दिनमें किये हुए पापका नाश कर डालता है। सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय पाठ करने- वाला साधक पहलेका पापी हो तो भी निष्पाप हो जाता है। दोपहरके समय भगवान् सूर्यकी ओर मुख करके पाठ करने- वाला मानव पाँच महापातकों और उपपातकोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। सम्पूर्ण वेदोंके पाठका पुण्य लाभ करता है। और अन्तमें भगवान् श्रीमन्नारायणका सायुज्य प्राप्त कर लेता है; जो इस प्रकार जानता है, वह भी श्रीमन्नारायणका सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ५॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय नारायणोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीनारायणके ध्यानसे मुक्ति अथ यदिदं ब्रह्मपुरं पुण्डरीकं तस्मात्त- डिदामभामात्रं दीपवत्प्रकाशम् । ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः । ब्रह्मण्यः पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरच्युतः ॥ सर्वभूतस्थमेकं नारायणं कारणपुरुषमकारणं परं ब्रह्मों । शोकमोहविनिर्मुक्तो विष्णुं ध्यायन्न सीदति ॥ (आत्मप्रबोध०) 'अब जो यह ब्रह्मपुर-कमल है, उसमें विद्युत्की आभामात्र दीपकके समान प्रकाशरूप, ब्राह्मणोंके प्रिय अथवा ब्राह्मण जिनको प्रिय हैं, ऐसे देवकीनन्दन, ब्रह्मण्य मधुसूदन, ब्रह्मण्य कमलनयन अच्युत विष्णु भगवान् हैं। (उन) सर्वभूतोंमें स्थित एकमात्र कारणपुरुष कारणरहित परब्रह्म नारायण विष्णुका जो ध्यान करता है, वह शोक-मोहसे छूट जाता है और कोई कष्ट नहीं पाता।'
कल्याण श्रीगणपति एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्कुशधारिणम् । अभयं वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम् ॥ रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥ (गणपत्युपनिषद्)
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॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोपनि षद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड श्रीरामका स्वरूप, उनके अङ्ग, राम-मन्त्रका माहात्म्य एक समय सनकादि योगीन्द्रों तथा अन्य ऋषियों और प्रह्लादादि भगवान् विष्णुके भक्तों ने हनुमान्जी से यह पूछा— हे महाबाहु महाबलवान् वायुपुत्र ! आप यह बतलायें कि अठारहों पुराणों, अठारहों स्मृतियों, चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों एव समस्त अध्यात्मविद्याओं में ब्रह्मवादियों के लिये कौन-सा तत्त्व उपदिष्ट हुआ है ? विष्णुके समस्त नामों में से तथा गणेश, सूर्य, शिव और शक्ति—इनमें से वह तत्त्व कौन- सा है ? ॥ १-३ ॥ श्रीहनुमान्जीने उत्तर दिया—योगीन्द्रवृन्द, ऋषिगण तथा विष्णुभक्तजन ! आप संसार के बन्धनको नाश करने- वाली मेरी बात सुनें । इन सब (वेदादिकों) में परम तत्त्व ब्रह्मस्वरूप तारक ही है । राम ही परम ब्रह्म हैं । राम ही परम तपःस्वरूप हैं । राम ही परम तत्त्व हैं । वे श्रीराम ही तारकब्रह्म हैं ॥ ४-५ ॥ श्रीपवनपुत्रके यह उपदेश देनेपर योगीन्द्रों, ऋषियों और विष्णुभक्तोंने फिर हनुमान्जी से पूछा—हनुमान्जी ! आप हमें श्रीरामके अङ्गोंका उपदेश करें । तब उन पवनकुमार- ने कहा—'गणेश, सरस्वती, दुर्गा, क्षेत्रपाल, सूर्य, चन्द्र, नारायण, नरसिंह, वासुदेव, वाराह तथा और भी दूसरे सभी देवताओंके मन्त्रोंको, श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी, हनुमान्, शत्रुघ्न, विभीषण, सुग्रीव, अङ्गद, जाम्बवान् और भरतजी—इन सबको श्रीरामका अङ्ग जानना चाहिये । अङ्गोंकी पूजाके बिना राम- मन्त्रका जप विघ्नकारक होता है' ॥ ६ ॥ इस प्रकार हनुमान्जीके कहनेपर उन सब योगीन्द्रादिने पुनः उनसे पूछा—महाबलवान् अञ्जनीकुमार ! जो गृहस्थ ब्राह्मण (ब्रह्मवादी) हैं, उनको प्रणवका अधिकार कैसे हो सकता है ? श्रीहनुमान्जी बोले—एक बार श्रीअयोध्याजीमें रत्न- सिंहासनासीन भगवान् श्रीरामसे मैंने इसी प्रकार पूछा था— 'योगियोंके चित्तरूपी मानसरोवरमें विहार करनेवाले हंसके समान सीतानाथ ! गृहस्थ ब्राह्मणोंको प्रणवमें किस प्रकार अधिकार प्राप्त हो ?' भगवान् श्रीरामने बताया—'जिनको इस छः अक्षरके मेरे मन्त्रका अधिकार प्राप्त है, उन्हींको प्रणव-जप- का अधिकार है, दूसरोंको नहीं । जो प्रणवको केवल अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रासहित जपकर पुनः 'रामचन्द्र' मन्त्रका जप करता है, मैं उसका कल्याण करता हूँ । इसलिये प्रणवके अकार, उकार, मकार एवं अर्ध- मात्राके ऋषि, छन्द, देवताका न्यास करके, इसी प्रकार वर्ण,
६९४ - श्रीरामोपनिषद् - [ खण्ड २
चतुर्विध स्वर, वेद, अग्नि गुण आदिका उच्चारण करके, उनका न्यास करके प्रणव मन्त्रोंको दुगुना जप करके पश्चात् राम-मन्त्रके आगे एवं पीछे प्रणव लगाकर जो जप करता है वह श्रीरामका स्वरूप ही हो जाता है। तात्पर्य यह कि पहले प्रणवके तीनो अक्षरोंके ऋषि, देवता, छन्दको जानकर उनका न्यास करना चाहिये। फिर प्रणवकल्पमें कहे गये षडक्षरमन्त्रोंका उनके आदि-अन्तमे प्रणव लगाकर जप करना चाहिये। यह प्रणव-कल्पमे कहा गया। षडक्षरमन्त्र श्रीराम- षडक्षरमन्त्र ही है।
हनुमान्जीने कहा कि 'मुझसे भगवान् श्रीरामने यह बतलाया है। इसलिये प्रणव श्रीरामका अङ्ग बतलाया गया है।' इस प्रकार पवनपुत्रके कहनेपर उन ऋषियोंने पुनः श्रीहनुमान्- जीसे पूछा और उनके उत्तरमें हनुमान्जीने बताया—"श्रीराम- के भक्त श्रीविभीषणजीकी बनायी हुई 'श्रीरामपरिचर्या'में सात सहस्र मंस्कृत वाक्य, सात सहस्र गद्य, पाँच सौ आर्याछन्द, आठ सहस्र श्लोक, चौबीस सहस्र पद्य, दस सहस्र दण्डक हैं। इन मन्त्रोंके क्रमको जानकर जीव कृतकृत्य हो जाता है ॥ ७-१० ॥
द्वितीय खण्ड श्रीरामकी प्राप्तिके साधन
श्रीहनुमान्जीने कहा—एक समयकी बात है, विभीषण- ने सिंहासनासीन रावणातन्तक भगवान् श्रीरामको पृथ्वीपर लेटकर दण्डवन् प्रणाम करके उनसे प्रार्थना की—"हे महाबाहु श्रीरघुनाथजी ! मैंने अपनी 'श्रीरामपरिचर्या'में कैवल्य- स्वरूपका वर्णन किया है। वह सबके लिये सुलभ नहीं। अतः अल्पजनोंकी सुलभताके लिये आप अपने सूक्ष्म स्वरूपका उपदेश करें" ॥ ११ ॥ यह सुनकर भगवान् श्रीरामने कहा—'तुम्हारे ग्रन्थमें जो पाँच दण्डक है, वे घोर-से-घोर पापात्माओंको भी पवित्र करनेवाले हैं। इनके अतिरिक्त जो मेरे छियानवे करोड़ नामो (राम) का जप करता है, वह भी उन सभी पापोंसे छूट जाता है। इतना ही नहीं, वह स्वत सच्चिदानन्दस्वरूप हो जाता है' ॥ १२ ॥ विभीषणजीने पुन प्रार्थना की—'जो पाँच दण्डक या
नौ करोड़ राम-नाम जपनेमे असमर्थ हों, वे क्या करें ?' भगवान् श्रीरामने बतलाया—'आदि-अन्तमे प्रणवसे सम्पुटित करके मेरे मन्त्रका पचास लाख जप, इसी प्रकार मेरे मन्त्रसे दुगुने प्रणवका जप जो करता है, वह निःसन्देह मेरा स्वरूप ही हो जाता है।' विभीषणजीने पुनः प्रार्थना की कि 'जो इतना करनेमें भी असमर्थ हों, वे क्या करें ?' भगवान् श्रीराम- ने कहा—'वे तीन पद्यों (गायत्री)का पुरश्चरण करें और जो इसमे भी असमर्थ हों, वे मेरी गीता (रामगीता); मेरे सहस्रनाम- का जप, जो मेरे विश्वरूपका परिचायक है, करें अथवा जो मेरे एक सौ आठ नामोंका जप अथवा देवर्षि नारदद्वारा कहे श्रीरामस्तवराजका पाठ अथवा हनुमान्जीद्वारा कहे गये मन्त्र- राजात्मक स्तोत्र तथा सीतास्तोत्र या श्रीरामरक्षा आदि इन स्तोत्रोंसे नित्य मेरी स्तुति करते हैं, वे भी मेरे समान हो जाते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं।'
॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ अथर्ववेदीय श्री ष्णोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीकृष्णके परिवारोंके रूपमें विभिन्न देवी-देवताओंका अवतरण, श्रीकृष्णके साथ उनकी एकरूपता
श्रीकृष्णावतारसे पूर्व जब देवताओसे भगवान्ने उन्हे पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके लिये कहा, तब वे ( जन्मभीरु ) समस्त देवता उन सनातन भगवान्से बोले—'भगवन् ! हम देवता होकर पृथ्वीपर जन्म लें, यह हमारे लिये बड़ी निन्दाकी बात है। हमारे द्वारा स्वेच्छासे तो भूतलपर जन्म ग्रहण करना सम्भव नहीं है, परतु आपकी आज्ञा है, इसलिये हमें वहाँ जन्म लेना ही पड़ेगा। फिर भी इतनी प्रार्थना अवश्य है कि हमें गोप ( गँवार मनुष्य ) और स्त्रीके रूपमें वहाँ उत्पन्न न करें। जिसे आपके अङ्ग-स्पर्शसे वञ्चित रहना पड़ता हो ऐसा आपके सान्निध्यसे दूर रहनेवाला मनुष्य बन- कर हममेंसे कोई भी शरीर धारण नहीं करेगा, हमें सदा अपने अङ्गोके स्पर्शका अवसर दें, तभी हम अवतार ग्रहण करेंगे।' रुद्र आदि देवताओंका यह स्नेहपूर्ण वचन सुनकर स्वयं भगवान्ने कहा—'देवताओ ! मै तुम्हे अङ्ग-स्पर्शका अवसर दूँगा; तुम्हारे वचनोंको अवश्य पूर्ण करूँगा' ॥ १-२ ॥ भगवान्का यह आश्वासन पाकर वे सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—'अब हम कृतार्थ हो गये।' फिर सब देवता भगवान्की सेवाके लिये प्रकट हुए। भगवान्का परमानन्दमय अङ्ग ही नन्दरायजीके रूपमें प्रकट हुआ। नन्दरानी यशोदाके रूपमें साक्षात् मुक्तिदेवी अवतीर्ण हुईं। सुप्रसिद्ध माया सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यों तीन प्रकारकी बतायी गयी है। भगवान्के भक्त श्रीरुद्रदेवमें सात्त्विकी
माया है, ब्रह्माजीमे राजसी माया है और दैत्यवर्गमें तामसी मायाका प्रादुर्भाव हुआ है। इस प्रकार यह तीन प्रकारकी माया बतायी गयी। इससे भिन्न जो वैष्णवी माया है, जिसको जीतना किसीके लिये भी सम्भव नहीं है, जिसे पूर्वकालमें ब्रह्माजी भी पराजित न कर सके तथा देवता भी जिसकी स्तुति करते हैं, वह ब्रह्मविद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी- रूपमे प्रकट हुई। निगम ( वेद ) ही वसुदेव हैं, जो सदा मुझ नारायणके स्वरूपका स्तवन करते हैं। वेदोंका तात्पर्य- भूत ब्रह्म ही श्रीबलराम और श्रीकृष्णके रूपमें इस महीतलपर अवतीर्ण हुआ। वह मूर्त्तिमान् वेदार्थ ही वृन्दावनमें गोप- गोपियोंके साथ क्रीडा करता है। ऋचाएँ उस श्रीकृष्णकी गाएँ और गोपियाँ हैं। ब्रह्मा लकुटीरूप धारण किये हुए है और रुद्र वश अर्थात् वंशी बने हैं। देवराज इन्द्र सींगा बने हैं। गोकुल नामक वनके रूपमें साक्षात् वैकुण्ठ है। वहाँ द्रुमोंके रूपमें तपस्वी महात्मा है। लोभ-क्रोधादिने दैत्योंका रूप धारण किया है, जो कलियुगमें केवल भगवान्का नाम लेनेमात्रसे तिरस्कृत ( नष्ट ) हो जाते हैं ॥ ३-९ ॥ गोपरूपमे साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही लीला विग्रह धारण किये हुए हैं। यह जगत् मायासे मोहित है, अतः उसके लिये भगवान्की लीलाका रहस्य समझना बहुत कठिन है। वह माया समस्त देवताओंके लिये भी दुर्जय है। जिनकी मायाके प्रभाव- से ब्रह्माजी लकुटी बने हुए हैं और जिन्होने भगवान् शिवको
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक पाठ (transcription) दिया गया है:
६९६ * श्रीकृष्णोपनिषद् * बाँसुरी बना रक्खा है, उनकी मायाको साधारण जगत् कैसे जान सकता है ? निश्चय ही देवताओंका बल ज्ञान है। परन्तु भगवान्की मायाने उसे भी क्षणभरमें हर लिया। श्रीशेषनाग श्रीबलराम बने, और सनातन ब्रह्म ही श्रीकृष्ण बने। सोलह हजार एक सौ आठ—रुक्मिणी आदि भगवान्की रानियाँ वेदकी ऋचाएँ तथा उपनिषद् हैं। इनके सिवा जो वेदोंकी ब्रह्मरूपा ऋचाएँ हैं, वे गोपियोंके रूपमें अवतीर्ण हुई है। द्वेष चाणूर मल्ल है, मत्सर दुर्जय मुष्टिक है, दर्प ही कुवलया- पीड हाथी है। गर्व ही आकाशचारी बकासुर राक्षस है। रोहिणी माताके रूपमें दयाका अवतार हुआ है, पृथ्वी माता ही सत्यभामा बनी हैं। महाव्याधि ही अघासुर है और साक्षात् कलि राजा कस बना है। श्रीकृष्णके मित्र सुदामा शम है, अक्रूर सत्य हैं और उद्धव दम है। जो शङ्ख है, वह स्वयं विष्णु है तथा लक्ष्मीका भाई होनेसे लक्ष्मीरूप भी है; वह क्षीरसमुद्रसे उत्पन्न हुआ है, मेघके समान उसका गम्भीर घोष है। दूध दहीके भडारमें जो भगवान्ने मटके फोड़े और उनसे जो दूध दहीका प्रवाह हुआ, उसके रूपमे उन्होंने साक्षात् क्षीरसागरको ही प्रकट किया है और उस महासागरमे वे बालक बने हुए पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे है। शत्रुओंके सहार तथा साधुजनोंकी रक्षामें वे सम्यक्रूपसे स्थित हैं। समस्त प्राणियोंपर अहैतुकी कृपा करनेके लिये तथा अपने आत्मजरूप धर्मकी रक्षा करनेके लिये श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, यों जानना चाहिये। भगवान् शिवने श्रीहरिको अर्पित करनेके लिये जिस चक्रको प्रकट किया था, भगवान्के हाथमें सुशोभित वह चक्र ब्रह्मस्वरूप ही है ॥ १०–१९ ॥
धर्मने चँवरका रूप ग्रहण किया है, वायुदेव ही वैजयन्ती मालाके रूपमें प्रकट हुए हैं, महेश्वरने अग्निके समान चमचमाते हुए खड्गका रूप धारण किया है। कश्यप मुनि नन्दजीके घरमे ऊखल बने हैं और माता अदिति रज्जुके रूपमे अवतरित हुई हैं। जैसे सब वर्णोंके ऊपर अनुस्वार शोभा पाता है, उसी प्रकार जो सबके ऊपर सुशोभित आकाश है, उसे ही भगवान्का छत्र जानो। व्यास वाल्मीकि आदि शनी महात्मा देवताओंके जितने स्वरूप बतलाते हैं तथा जिन-जिनको लोग देवरूप समझकर नमस्कार करते हैं, वे सभी देवता भगवान् श्रीकृष्णके ही आश्रित हैं। भगवान्के हाथकी गदा सारे शत्रुओंका नाश करनेवाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्गधनुषका रूप स्वय वैष्णवी मायाने धारण किया है और प्राणसंहारक काल ही उनका वाण है। जगत्के बीजरूप कमलको भगवान्ने हाथमे लीलापूर्वक धारण किया है। गरुडने भाण्डीरवटका रूप ग्रहण किया है, और नारद मुनि सुदामा नामके सखा बने हैं। भक्तिने वृन्दाका रूप धारण किया है। सब जीवोको प्रकाश देनेवाली जो बुद्धि है, वही भगवान्की क्रिया-शक्ति है। अत: ये गोप-गोपी आदि सभी भगवान्से भिन्न नहीं हे और विभु—परमात्मा श्रीकृष्ण भी इनसे भिन्न नहीं है। उन्होंने (श्रीकृष्णने) स्वर्गवासियों- को तथा सारे वैकुण्ठधामको भूतलपर उतार लिया है ॥ २०–२५ ॥ जो इस प्रकार जानता है, वह सब तीर्थोंका फल पाता है और देहके बन्धनसे मुक्त हो जाता है—यह उपनिषद् है।
॥ अथर्ववेदीय श्रीकृष्णोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कलि ˙ रणोप ˙ ष ˎ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! 'हरे राम' आदि सोलह नामोंके मन्त्रका अद्भुत माहात्म्य हरि ॐ । द्वापरके अन्तमें नारदजी ब्रह्माजीके पास गये, और बोले—'भगवन् ! मैं भूलोकमें पर्यटन करता हुआ किस प्रकार कलिसे त्राण पा सकता हूँ ?' ब्रह्माजी बोले—'वत्स ! तुमने मुझसे आज बहुत अच्छी बात पूछी है। समस्त श्रुतियोंका जो गोपनीय रहस्य है, उसे सुनो—जिससे कलियुगमें भवसागरको पार कर लोगे। भगवान् आदि- पुरुष नारायणके नामोच्चारणमात्रसे मनुष्य कलिके दोषोंका नाश कर डालता है।' नारदजीने फिर पूछा—'वह कौन-सा नाम है ?' हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीने कहा— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ ये सोलह नाम कलिके पापोंका नाश करनेवाले हैं। इससे श्रेष्ठ कोई दूसरा उपाय सारे वेदोंमें भी नहीं देखनेमें आता। इसके द्वारा षोडश कलाओंसे आवृत्त जीवके आवरण नष्ट हो जाते हैं। तत्पश्चात् जैसे मेघके विलीन होनेपर सूर्यकी किरणें प्रकाशित हो उठती हैं, उसी प्रकार परब्रह्मका स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। फिर नारदजीने पूछा—'भगवन् ! इसके जपकी क्या विधि है ?' ब्रह्माजीने उनसे कहा—'इसकी कोई विधि नहीं है। पवित्र हो या अपवित्र, इस मन्त्रका निरन्तर जप करनेवाला सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य— चारों प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करता है। जब साधक इस सोलह नामोंवाले मन्त्रका साढे तीन करोड़ जप कर लेता है, तब ब्रह्महत्याके दोषको पार कर जाता है। वह वीरहत्याके पापसे तर जाता है। स्वर्णकी चोरीके पापसे छूट जाता है। पितर, देवता और मनुष्योंके अपकारके दोषसे भी छूट जाता है। सब धर्मोंके परित्यागके पापसे तत्काल ही पवित्र हो जाता है। शीघ्र ही मुक्त हो जाता है, शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। यह उपनिषद् है । ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कलिसंतरणोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्ति. !! शान्तिः !!! उ० अ० ८८—८९—
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय गणपत्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् गणनायककी स्तुति, उनके बीजमन्त्र, महामन्त्र तथा गायत्री, उपनिषद्के पाठका तथा गणपति पूजनका माहात्म्य हरि ॐ। भगवान् गणपतिको नमस्कार है। तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो। तुम्हीं केवल कर्ता हो, तुम्हीं केवल धर्ता हो, तुम्हीं केवल हर्ता हो। निश्चयपूर्वक तुम्हीं इन सब रूपोंमें विराजमान ब्रह्म हो। तुम साक्षात् नित्य आत्मस्वरूप हो। मैं ऋत- न्याययुक्त बात कहता हूँ, सत्य कहता हूँ। तुम मेरी (मुझ शिष्यकी) रक्षा करो; वक्ता (आचार्य) की रक्षा करो। श्रोताकी रक्षा करो। दाताकी रक्षा करो, धाताकी रक्षा करो। व्याख्या करनेवाले आचार्यकी रक्षा करो, शिष्यकी रक्षा करो। पश्चिमसे रक्षा करो, पूर्वसे रक्षा करो, उत्तरसे रक्षा करो, दक्षिणसे रक्षा करो, ऊपरसे रक्षा करो, नीचेसे रक्षा करो, सब ओरसे मेरी रक्षा करो, चारों ओरसे मेरी रक्षा करो। तुम वाङ्मय हो, तुम चिन्मय हो, तुम आनन्दमय हो, तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द, अद्वितीय हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, तुम ज्ञानमय, विज्ञानमय हो। यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे ठहरा हुआ है। यह सारा जगत् तुममें लयको प्राप्त होगा। इस सारे जगत्की तुममें प्रतीति हो रही है। तुम भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। परा, पश्यन्ती, वैखरी और मध्यमा-वाणीके ये चार विभाग तुम्हीं हो । तुम सत्त्व, रज और तम-तीनों गुणोंसे परे हो। तुम भूत, भविष्य और वर्तमान-तीनों कालोंसे परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण-तीनों शरीरोंसे परे हो। तुम मूलाधार चक्रमे नित्य स्थित रहते हो। इच्छा, क्रिया और ज्ञान-तीन प्रकारकी शक्तियाँ तुम्हीं हो। तुम्हारा योगिजन नित्य ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, तुम ब्रह्म हो, भू, भुवः, स्वः- ये तीनों लोक तथा ॐकारवाच्य परब्रह्म भी तुम हो। गणके आदि अर्थात् ग् का पहले उच्चारण करके उसके बाद वर्णोंके आदि अर्थात् अ का उच्चारण करे, उसके बाद अनुस्वार उच्चारित होता है । इस प्रकार अर्धचन्द्रसे सुशोभित 'ग' ॐकारसे अवरुद्ध होनेपर तुम्हारे बीज- मन्त्रका स्वरूप (ॐ ग् ) है। गकार इसका पूर्वरूप है, अकार मध्यम रूप है, अनुस्वार अन्त्य रूप है, बिन्दु उत्तर रूप है। नाद सन्धान है। सहिता सन्धि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस महामन्त्रके गणक ऋषि हैं, निचृद्गायत्री छन्द है, श्रीमद्महागणपति देवता हैं। वह महामन्त्र है- ॐ गं गणपतये नम । एकदन्तको हम जानते हैं। वक्रतुण्डका
यहाँ पृष्ठ का यथावत देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६९९
[बायाँ स्तम्भ] हम ध्यान करते हैं, वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करे*। (वह गणेश गायत्री है) एकदन्त, चतुर्भुज, चारों हाथोंमें पाश, अङ्कुश, अभय और वरदानकी मुद्रा धारण किये तथा मूषक-चिह्न- की ध्वजा लिये हुए, रक्तवर्ण, लम्बे उदरवाले, सूप-जैसे बड़े-बड़े कानोंवाले, रक्तवस्त्रधारी, शरीरपर रक्तचन्दनका लेप किये हुए, रक्तपुष्पोंसे भलीभाँति पूजित, भक्तके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले देवता, जगत्के कारण, अच्युत, सृष्टिके आदिमें आविर्भूत, प्रकृति और पुरुषसे परे श्रीगणेशजीका जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियोंमें श्रेष्ठ है। व्रात (देवसमूह) के नायकको नमस्कार, गणपतिको नमस्कार, प्रमथपति ( शिवजीके गणोंके अधिनायक ) के लिये नमस्कार, लम्बोदरको, एकदन्तको, विघ्नविनाशकको, शिवजीके पुत्रको तथा श्रीवरदमूर्तिको नमस्कार, नमस्कार ।† यह अथर्वाङ्गिरस् ( अथर्ववेदकी उपनिषद् ) है । इसका जो पाठ करता है, वह ब्रह्मत्वको प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है । सब प्रकारके विघ्न उसके लिये बाधक नहीं होते । वह सब जगह सुख पाता है । वह पाँचों प्रकारके महान् पातकों तथा उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है । सायंकाल पाठ करनेवाला दिनके पापोंका नाश करता है । प्रातःपाठ करनेवाला रात्रिके पापोंका नाश करता है । जो प्रातः-साय दोनों समय इस पाठका प्रयोग करता है, वह निष्पाप हो जाता है । धर्म,
[दायाँ स्तम्भ] अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करता है । इस अथर्वशीर्षको, जो शिष्य न हो, उसे नहीं देना चाहिये । जो मोहके कारण देता है, वह पातकी हो जाता है । सहस्र बार पाठ करनेसे जिन जिन कामनाओंका उच्चारण करता है, उन उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है । इसके द्वारा जो गणपतिको स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है । जो चतुर्थी तिथिको उपवास करके जपता है, वह विद्यावान् हो जाता है । यह अथर्वण-वाक्य है । जो इस मन्त्रके द्वारा तपश्चरण करना जानता है, वह कदापि भयको नहीं प्राप्त होता । जो दूर्वाङ्कुरोंके द्वारा भगवान् गणपतिकायजन करता है, वह कुबेरके समान हो जाता है । जो लाजोंके द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावी होता है । जो सहस्र लड्डुओं ( मोदकों ) के द्वारा यजन करता है, वह वाञ्छित फलको प्राप्त करता है । जो घृतके सहित समिधासे यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है । आठ ब्राह्मणोंको सम्यक् रीतिसे ग्रहण करानेपर सूर्यके समान तेजस्वी होता है । सूर्यग्रहणमें महानदीमें या प्रतिमाके समीप जपनेसे मन्त्रसिद्धि होती है । वह महाविघ्नसे मुक्त हो जाता है, महापातकसे मुक्त हो जाता है, महान् दोषसे मुक्त हो जाता है । जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है, सर्वज्ञ हो जाता है ।
॥ अथर्ववेदीय गणपत्युपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाऽसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
[पाद-टिप्पणी / Footnotes]
- 'एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।' † नमो व्रातपतये नमो गणपतये नम प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नम ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ सामवेदीय जाबालदर्शनोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड योगके आठ अङ्ग और दस यमोंका वर्णन सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले चतु- र्भुज भगवान् महाविष्णु महायोगी दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हुए। दत्तात्रेयजी योग साम्राज्य (के अधिपति पद) पर दीक्षित हैं—वे योगमार्गके सम्राट् हैं। उनके शिष्य मुनिवर्य साङ्कृति नामसे प्रसिद्ध थे । वे गुरुके बड़े ही भक्त थे । एक दिन एकान्तमें गुरुजीकी सेवामें उपस्थित हो उन्होंने हाथ जोड़- कर विनयपूर्वक पूछा—'भगवन् ! आठ अङ्गोंसहित योगका मेरे लिये विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिसके जान लेनेमात्रसे मैं जीवन्मुक्त हो जाऊँ' ॥ १-३ ॥ भगवान् दत्तात्रेयने कहा—'साङ्कृते ! सुनो, मै तुम्हें आठ अङ्गोंसहित योगदर्शनका उपदेश करता हूँ । ब्रह्मन् ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये योगके आठ अङ्ग हैं । इनमेंसे यमके दस भेद हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव (सरलता), क्षमा, धृति, परिमित आहार और बाहर भीतरकी पवित्रता ॥ ४-६ ॥ 'तपोधन ! वेदमें बतायी हुई विधिके अतिरिक्त जो मन, वाणी और शरीरद्वारा किसीको किसी प्रकारका कष्ट दिया जाता या उसका प्राणोंसे वियोग कराया जाता है, वही वास्तविक हिंसा है, इसके सिवा दूसरी कोई हिंसा नहीं है (इस हिंसा- का सर्वथा त्याग ही अहिंसा है ) । मुने ! आत्मा सर्वत्र व्याप्त है, उसका शस्त्र आदिके द्वारा छेदन नहीं हो सकता । हाथों या इन्द्रियोंके द्वारा उसका ग्रहण होना भी सम्भव नहीं है—इस प्रकारकी जो बुद्धि है, उसे ही वेदान्तवेत्ता महात्माओंने श्रेष्ठ अहिंसा बताया है। मुनीश्वर ! नेत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा जो जिस रूपमें देखा, सुना, सूँघा और समझा हुआ विषय है, उसको उसी रूपमें वाणीद्वारा (अथवा सकेत आदिके द्वारा ) प्रकट करना सत्य है। ब्रह्मन् ! इसके सिवा सत्यका और कोई प्रकार नहीं है। अथवा सब कुछ सत्य स्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है, परमात्माके सिवा दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं—इस प्रकारका जो निश्चय है, उसीको वेदान्तज्ञानके पारगामी विद्वानोंने सबसे श्रेष्ठ सत्य कहा है। दूसरेके रत्न, सुवर्ण अथवा मुक्तामणिसे लेकर एक तृणके लिये भी मन न चलाना—दूसरोंकी छोटी या बड़ी किसी भी वस्तुके लिये मनमे कभी लोभ न लाना ही अस्तेय है । विद्वान् महापुरुषोंने इसीको अस्तेय (चोरी न करना) माना है। इसके अतिरिक्त महामुने ! जगत्के समस्त व्यवहारोंमे अनात्मबुद्धि रखकर उन्हें आत्मासे दूर रखने- का जो भाव है, उसीको आत्मज्ञ महात्माओंने अस्तेय कहा है । मन, वाणी और शरीरके द्वारा स्त्रियोंके सहवासका परित्याग तथा ऋतुकालमें (धर्मबुद्धिसे) केवल अपनी ही पत्नीसे सम्बन्ध—यही ब्रह्मचर्य कहा गया है । अथवा काम क्रोधादि शत्रुओंको सताप देनेवाले मुनीश्वर ! मनको परब्रह्म परमात्मा- के चिन्तनमें संचरित करना—लगाये रखना ही सर्वोत्तम
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७०२ '•:- जाबालदर्शनोपनिषद् :• [ खण्ड ४ है। इसी प्रकार मानसिक जप भी मनन और ध्यानके भेद- किया गया जप सब लोगोंको यथावत् फल देनेवाला होता से दो प्रकारका है। उच्चस्वरसे किये जानेवाले जपकी अपेक्षा है, परंतु यदि उस मन्त्रको नीच पुरुषोंने अपने कानोंसे उपांशु जप (अत्यन्त मन्दस्वरसे किया गया जप) हजार- सुन लिया तो वह निष्फल हो जाता है (शास्त्रीय पर्वोपर गुना उत्तम बताया गया है। इसी प्रकार उपांशुकी अपेक्षा उपवासादि करना तथा किसी प्रकारका नियम ग्रहण करना मानसिक जप सहस्रगुना श्रेष्ठ कहा गया है। उच्चस्वरसे व्रत कहलाता है)' ॥ ८-१६ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड नौ प्रकारके यौगिक आसनोंका वर्णन 'मुनिश्रेष्ठ ! आसन नौ प्रकारके हैं—स्वस्तिकासन, गोमुखासन, अग्रभागपर दृष्टि जमाये रक्खे। यह योगियोंद्वारा सदा पद्मासन, वीरासन, सिंहासन, भद्रासन, मुक्तासन, मयूरासन सम्मानित होनेवाला सिंहासन कहा गया है।) दोनों टखनों- और सुखासन। घुटनों और जाँघोंके बीचमे अपने दोनों को अण्डकोषके नीचे सीवनीके दोनों पार्श्वभागोंमें (इस पैरोंको भलीभाँति रखकर ग्रीवा, मस्तक और शरीरको प्रकार) लगाकर रक्खे (कि पैरोंका अग्रभाग पीछेकी ओर समभावसे धारण किये रहना स्वस्तिकासन कहलाता है; मुड़ा रहे) और दोनों हाथोंसे पार्श्वभाग और पैरोंको दृढता- इसका नित्य अभ्यास करना चाहिये। दाहिने पैरके गुल्फ पूर्वक बाँधकर स्थिरभावसे बैठ जाय—यह भद्रासन है, जो विष- (टखने) को बायीं ओरके पृष्ठभागतक और बायें पैरके जनित रोगका नाश करनेवाला है। सीवनीकी सूक्ष्म रेखाको गुल्फ (टखने) को दाहिनी ओरके पृष्ठभागतक ले जाय, बायें टखनेसे दबाकर उस बायें टखनेको फिर दायें इसीको गोमुखासन कहते हैं। विप्रवर ! दोनों पैरोंको दोनों टखनेसे दबा दे तो यह मुक्तासन होता है। मुने ! लिङ्गके जाँघोंपर (व्युत्क्रमसे अर्थात् बायें पैरको दाहिनी जाँघपर ऊपरी भागमे बायें टखनेको रखकर फिर उसके ऊपर दाहिने और दाहिने पैरको बायीं जाँघपर) रखकर उनके अँगूठोंको टखनेको रख दे तो यह भी मुक्तासन कहलाता है। मुनिश्रेष्ठ ! दोनों हाथोंसे पीठके पीछेसे पकड़ ले। यही पद्मासन अपनी दोनो हथेलियोंको पृथ्वीपर टिकाकर, कोहनियोंके है। यह सम्पूर्ण रोगोंका भय दूर करनेवाला है। अग्रभागको नाभिके दोनों पाश्र्वोमे लगाये। फिर एकाग्रचित्त हो बायें पैरको दाहिनी जाँघपर रखने और शरीरको सिर और पैरको ऊँचा करके आकाशमें दण्डकी भाँति (पृथ्वी- सीधा रखकर बैठे, इसको वीरासन कहा गया है। (दोनों के समानान्तरमें) स्थित हो जाय। यह मयूरासन है, जो टखनोंको अण्डकोषके नीचे सीवनीके दोनों पाश्र्वोमे ले सब पापोंका नाश करनेवाला है। जिस किसी प्रकार बैठनेसे जाय और उन्हें इस प्रकार रक्खे कि बायें टखनेसे सीवनीका सुख और धैर्य बना रहे, वह सुखासन कहा गया है। दाहिना पार्श्व और दायें टखनेसे सीवनीका बायाँ पार्श्व असमर्थ साधक इसी आसनका आश्रय ले। जिसने आसन लगा रहे। फिर दोनों हाथोंको घुटनोंपर रखकर सब अँगुलियों- जीत लिया, उसने मानो तीनों लोक जीत लिये। सांकृते ! को फैला दे। मुँहको खोलकर एकाग्रचित्त हो नासिकाके इसी विधिसे योगयुक्त होकर तुम सदा प्राणायाम किया करो' ॥ १-१३ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ खण्ड नाड़ी-परिचय तथा आत्मतीर्थ और आत्मज्ञानकी महिमा 'सांकृते ! मनुष्यका शरीर अपने हाथके मानसे ९६ अगुलका जो स्थान है, उसे ही मनुष्योंके शरीरका मध्यभाग समझो। होता है। इम शरीरका जो मध्यभाग है, उसमें अग्निका स्थान है। वही मूलाधार है। मुनिश्रेष्ठ ! वहाँसे नौ अगुल ऊपर कन्द- उसका रग तपाये हुए सोनेके समान माना गया है। उसकी स्थान है। उसकी लबाई चौड़ाई चार-चार अगुलकी है और आकृति त्रिकोण है। यह मैने तुमसे सत्य बात बतायी है। आकृति मुर्गीके अंडेके समान है । वह ऊपरसे चमड़े गुदासे दो अगुल ऊपर और लिङ्गसे दो अगुल नीचेका आदिके द्वारा विभूषित है। मुनिपुङ्गव ! उस कन्दस्थानके