कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 746, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६९२ * नारायणोपनिषद् * पुण्डरीक (कमल) है, अतः इसका स्वरूप विद्युत्के समान परम प्रकाशमय है। देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मण्य (ब्राह्मणप्रिय) हैं। भगवान् मधुसूदन ब्रह्मण्य हैं। पुण्डरीक (कमल) के सदृश नेत्रोंवाले भगवान् विष्णु ब्रह्मण्य हैं। अच्युत विष्णु ब्रह्मण्य हैं। सम्पूर्ण भूतोंमें स्थित एक ही नारायण- देव कारणपुरुष हैं। वे ही कारणरहित परब्रह्म हैं। ॐ यह अथर्ववेदीय उपनिषद्का प्रतिपादन है ॥ ४ ॥ प्रातःकाल इस उपनिषद्का पाठ करनेवाला पुरुष रात्रिमें किये हुए पापका नाश कर डालता है। सायंकालमे इसका पाठ करनेवाला मनुष्य दिनमें किये हुए पापका नाश कर डालता है। सायंकाल और प्रातःकाल दोनों समय पाठ करने- वाला साधक पहलेका पापी हो तो भी निष्पाप हो जाता है। दोपहरके समय भगवान् सूर्यकी ओर मुख करके पाठ करने- वाला मानव पाँच महापातकों और उपपातकोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। सम्पूर्ण वेदोंके पाठका पुण्य लाभ करता है। और अन्तमें भगवान् श्रीमन्नारायणका सायुज्य प्राप्त कर लेता है; जो इस प्रकार जानता है, वह भी श्रीमन्नारायणका सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ५॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय नारायणोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीनारायणके ध्यानसे मुक्ति अथ यदिदं ब्रह्मपुरं पुण्डरीकं तस्मात्त- डिदामभामात्रं दीपवत्प्रकाशम् । ब्रह्मण्यो देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो मधुसूदनः । ब्रह्मण्यः पुण्डरीकाक्षो ब्रह्मण्यो विष्णुरच्युतः ॥ सर्वभूतस्थमेकं नारायणं कारणपुरुषमकारणं परं ब्रह्मों । शोकमोहविनिर्मुक्तो विष्णुं ध्यायन्न सीदति ॥ (आत्मप्रबोध०) 'अब जो यह ब्रह्मपुर-कमल है, उसमें विद्युत्की आभामात्र दीपकके समान प्रकाशरूप, ब्राह्मणोंके प्रिय अथवा ब्राह्मण जिनको प्रिय हैं, ऐसे देवकीनन्दन, ब्रह्मण्य मधुसूदन, ब्रह्मण्य कमलनयन अच्युत विष्णु भगवान् हैं। (उन) सर्वभूतोंमें स्थित एकमात्र कारणपुरुष कारणरहित परब्रह्म नारायण विष्णुका जो ध्यान करता है, वह शोक-मोहसे छूट जाता है और कोई कष्ट नहीं पाता।'