कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 745, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रा णो नि द् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् नारायणकी सर्वकारणता एवं सर्वरूपता, अष्टाक्षर नारायण-मन्त्रका स्वरूप और महिमा
ॐ इस परमात्माके नामका स्मरण करके अत्र नारायणोप- निषद् आरम्भ किया जाता है । निश्चय ही, भगवान् नारायण सबके शरीरोंमें शयन करनेवाले अन्तर्यामी आत्मा हैं । उन्होंने संकल्प किया—'मैं जीवोंकी सृष्टि करूँ ।' अतः उन्हींसे सबकी उत्पत्ति हुई है । नारायणसे ही समष्टिगत प्राण उत्पन्न होता है, उन्हींसे मन और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ प्रकट होती हैं। आकाश, वायु, तेज, जल तथा सम्पूर्ण विश्वको धारण करनेवाली पृथ्वी—इन सबकी नारायणसे ही उत्पत्ति होती है। नारायणसे ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं। नारायणसे शिवजी प्रकट होते हैं। नारायणसे इन्द्रका जन्म होता है। नारायणसे प्रजापति उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही बारह आदित्य प्रकट हुए हैं। ग्यारह रुद्र, आठ वसु और सम्पूर्ण छन्द (वेद) नारायणसे ही उत्पन्न होते हैं, नारायणसे ही प्रेरित होकर अपने-अपने कार्यमें प्रवृत्त होते हैं और नारायणमें ही लीन हो जाते हैं। यह ऋग्वेदीय उपनिषद्का कथन है ॥ १ ॥ भगवान् नारायण नित्य हैं । ब्रह्मा नारायण हैं । शिव भी नारायण हैं। इन्द्र भी नारायण हैं । काल भी नारायण हैं । दिशाएँ भी नारायण हैं । विदिशाएँ (दिशाओंके बीचके कोण) भी नारायण हैं । ऊपर भी नारायण हैं। नीचे भी नारायण हैं । भीतर और बाहर भी नारायण हैं । जो कुछ हो चुका है तथा जो कुछ हो रहा है और होनेवाला है, यह सब भगवान् नारायण ही हैं । एकमात्र नारायण ही निष्कलङ्क, निरञ्जन, निर्विकल्प, अनिर्वचनीय एव विशुद्ध देव हैं; उनके सिवा दूसरा कोई नहीं है । जो इस प्रकार जानता है, वह विष्णु ही हो जाता है, वह विष्णु ही हो जाता है । यह यजुर्वेदीय उपनिषद्का प्रतिपादन है ॥ २ ॥ सबसे पहले 'ॐ' इस अक्षरका उच्चारण करे, इसके बाद 'नम ' पदका, फिर अन्तमें 'नारायणाय' इस पदका उच्चारण करे । 'ॐ' यह एक अक्षर है । 'नमः' ये दो अक्षर हैं । 'नारायणाय' ये पाँच अक्षर हैं। यह 'ॐ नमो नारायणाय' पद भगवान् नारायणका अष्टाक्षरमन्त्र है । निश्चय ही, जो मनुष्य भगवान् नारायणके इस अष्टाक्षरमन्त्रका जप करता है, वह उत्तम कीर्तिसे युक्त हो पूरी आयुतक जीवित रहता है । जीवोंका आधिपत्य, धनकी वृद्धि, गौ आदि पशुओंका स्वामित्व—ये सब भी उसे प्राप्त होते हैं । तदनन्तर वह अमृतत्वको प्राप्त होता है, अमृतत्वको प्राप्त होता है (अर्थात् भगवान् नारायणके अमृतमय परमधाममें जाकर परमानन्दका अनुभव करता है)। यह सामवेदीय उपनिषद्का कथन है॥ ३ ॥ आन्तरिक आनन्दमय ब्रह्मपुरुष प्रणवस्वरूप है, 'अ' 'उ' 'म्'—ये उसकी मात्राएँ हैं। ये अनेक हैं, इनका ही सम्मिलित रूप 'ॐ' इस प्रकार हुआ है । इस प्रणवका जप करके योगी जन्म-मृत्युरूप संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है । 'ॐ नमो नारायणाय' इस मन्त्रकी उपासना करनेवाला साधक वैकुण्ठधाममें जायगा । वह यह वैकुण्ठधाम विज्ञानघन