भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 744, कुल 832 में से

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पृष्ठ 744

६९० * चाक्षुषोपनिषद् * अन्धा नहीं होता। आठ ब्राह्मणोंको इस विद्याका दान ॐ षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न भगवान् आदित्यको करनेपर—इसका ग्रहण करा देनेपर इस विद्याकी सिद्धि नमस्कार है। उनकी प्रभा दिनका भार वहन करनेवाली है, होती है।८ दिनका भार वहन करनेवाली है। हम उन भगवान्‌के लिये जो सच्चिदानन्दस्वरूप हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका रूप है, उत्तम आहुति देते हैं। जिन्हें मेधा अत्यन्त प्रिय है, वे जो किरणोंसे सुशोभित एवं जातवेदा (भूत आदि तीनों ऋषिगण उत्तम पत्तोंवाले पक्षीके रूपमें भगवान् सूर्यके पास कालोंकी बातको जाननेवाले) हैं, जो ज्योतिःस्वरूप, हिरण्मय गये और इस प्रकार प्रार्थना करने लगे—'भगवन् ! इस (सुवर्णके समान कान्तिमान्) पुरुषके रूपमें तप रहे हैं; इस अन्धकारको छिपा दीजिये, हमारे नेत्रोंको प्रकाशसे पूर्ण सम्पूर्ण विश्वके जो एकमात्र उत्पत्तिस्थान हैं, उन प्रचण्ड कीजिये तथा तमोमय बन्धनमें बँधे हुए से हम सब प्राणियोंको प्रतापवाले भगवान् सूर्यको हम नमस्कार करते हैं। ये सूर्यदेव अपना दिव्य प्रकाश देकर मुक्त कीजिये। पुण्डरीकाक्षको समस्त प्रजाओ (प्राणियों) के समक्ष उदित हो रहे हैं। नमस्कार है। पुष्करेक्षणको नमस्कार है। निर्मल नेत्रोंवाले— ॐ नमो भगवते आदित्याय अहोवाहिनी अहोवाहिनी अमलेक्षणको नमस्कार है। कमलेक्षणको नमस्कार है। विश्व- स्वाहा। रूपको नमस्कार है। महाविष्णुको नमस्कार है।' ॥ कृष्णयजुर्वेदीय चाक्षुषोपनिषद् समाप्त ॥ ❖ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ❖ ॐ चाक्षुषी (नेत्र)-उपनिषद्की शीघ्र फल देनेवाली विधि— (लेखक—पं० श्रीमुकुन्दवल्लभजी मिश्र, ज्योतिषाचार्य) नेत्ररोगसे पीड़ित श्रद्धालु साधकको चाहिये कि प्रतिदिन प्रातःकाल हरिद्रा (हल्दी) से अनारकी शाखाकी कलमके द्वारा काँसेके पात्रमें निम्नलिखित बत्तीसे यन्त्रको लिखे— +------+------+------+------+ फिर उसी यन्त्रपर ताँबेकी कटोरीमें चतुर्मुख (चारों ओर चार बत्तियोंका) घीका दीपक | ८ | १५ | २ | ७ | जलाकर रख दे। तदनन्तर गन्ध-पुष्पादिसे यन्त्रका पूजन करे। फिर पूर्वकी ओर मुख करके बैठे और +------+------+------+------+ हरिद्रा (हल्दी) की मालासे ॐ ह्रीं हंस' इस बीजमन्त्रकी ६ मालाएँ जपकर नेत्रोपनिषद्के | ६ | ३ | १२ | ११ | कम-से-कम बारह पाठ करे। पाठके पश्चात् फिर उपर्युक्त बीजमन्त्रकी ५ मालाएँ जपे। तदनन्तर +------+------+------+------+ सूर्यभगवान्‌को श्रद्धापूर्वक अर्घ्य देकर प्रणाम करे और मनमें यह निश्चय करे कि मेरा नेत्ररोग शीघ्र ही | १४ | ९ | ८ | १ | नष्ट हो जायगा। +------+------+------+------+ ऐसा करते रहनेसे इस उपनिषद्का नेत्ररोगनाशक अद्भुत प्रभाव बहुत शीघ्र देखनेमें | ४ | ५ | १० | १३ | आता है। +------+------+------+------+ 'मम चक्षूरोगान् शमय शमय' १. 'पुण्डरीकाक्ष', 'पुष्करेक्षण' और 'कमलेक्षण'—इन तीनों नामोंका एक ही अर्थ है—कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् ।