भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 751, कुल 832 में से

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पृष्ठ 751

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ अथर्ववेदीय श्री ष्णोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! श्रीकृष्णके परिवारोंके रूपमें विभिन्न देवी-देवताओंका अवतरण, श्रीकृष्णके साथ उनकी एकरूपता

श्रीकृष्णावतारसे पूर्व जब देवताओसे भगवान्ने उन्हे पृथ्वीपर अवतीर्ण होनेके लिये कहा, तब वे ( जन्मभीरु ) समस्त देवता उन सनातन भगवान्से बोले—'भगवन् ! हम देवता होकर पृथ्वीपर जन्म लें, यह हमारे लिये बड़ी निन्दाकी बात है। हमारे द्वारा स्वेच्छासे तो भूतलपर जन्म ग्रहण करना सम्भव नहीं है, परतु आपकी आज्ञा है, इसलिये हमें वहाँ जन्म लेना ही पड़ेगा। फिर भी इतनी प्रार्थना अवश्य है कि हमें गोप ( गँवार मनुष्य ) और स्त्रीके रूपमें वहाँ उत्पन्न न करें। जिसे आपके अङ्ग-स्पर्शसे वञ्चित रहना पड़ता हो ऐसा आपके सान्निध्यसे दूर रहनेवाला मनुष्य बन- कर हममेंसे कोई भी शरीर धारण नहीं करेगा, हमें सदा अपने अङ्गोके स्पर्शका अवसर दें, तभी हम अवतार ग्रहण करेंगे।' रुद्र आदि देवताओंका यह स्नेहपूर्ण वचन सुनकर स्वयं भगवान्ने कहा—'देवताओ ! मै तुम्हे अङ्ग-स्पर्शका अवसर दूँगा; तुम्हारे वचनोंको अवश्य पूर्ण करूँगा' ॥ १-२ ॥ भगवान्का यह आश्वासन पाकर वे सब देवता बड़े प्रसन्न हुए और बोले—'अब हम कृतार्थ हो गये।' फिर सब देवता भगवान्की सेवाके लिये प्रकट हुए। भगवान्का परमानन्दमय अङ्ग ही नन्दरायजीके रूपमें प्रकट हुआ। नन्दरानी यशोदाके रूपमें साक्षात् मुक्तिदेवी अवतीर्ण हुईं। सुप्रसिद्ध माया सात्त्विकी, राजसी और तामसी—यों तीन प्रकारकी बतायी गयी है। भगवान्के भक्त श्रीरुद्रदेवमें सात्त्विकी

माया है, ब्रह्माजीमे राजसी माया है और दैत्यवर्गमें तामसी मायाका प्रादुर्भाव हुआ है। इस प्रकार यह तीन प्रकारकी माया बतायी गयी। इससे भिन्न जो वैष्णवी माया है, जिसको जीतना किसीके लिये भी सम्भव नहीं है, जिसे पूर्वकालमें ब्रह्माजी भी पराजित न कर सके तथा देवता भी जिसकी स्तुति करते हैं, वह ब्रह्मविद्यामयी वैष्णवी माया ही देवकी- रूपमे प्रकट हुई। निगम ( वेद ) ही वसुदेव हैं, जो सदा मुझ नारायणके स्वरूपका स्तवन करते हैं। वेदोंका तात्पर्य- भूत ब्रह्म ही श्रीबलराम और श्रीकृष्णके रूपमें इस महीतलपर अवतीर्ण हुआ। वह मूर्त्तिमान् वेदार्थ ही वृन्दावनमें गोप- गोपियोंके साथ क्रीडा करता है। ऋचाएँ उस श्रीकृष्णकी गाएँ और गोपियाँ हैं। ब्रह्मा लकुटीरूप धारण किये हुए है और रुद्र वश अर्थात् वंशी बने हैं। देवराज इन्द्र सींगा बने हैं। गोकुल नामक वनके रूपमें साक्षात् वैकुण्ठ है। वहाँ द्रुमोंके रूपमें तपस्वी महात्मा है। लोभ-क्रोधादिने दैत्योंका रूप धारण किया है, जो कलियुगमें केवल भगवान्का नाम लेनेमात्रसे तिरस्कृत ( नष्ट ) हो जाते हैं ॥ ३-९ ॥ गोपरूपमे साक्षात् भगवान् श्रीहरि ही लीला विग्रह धारण किये हुए हैं। यह जगत् मायासे मोहित है, अतः उसके लिये भगवान्की लीलाका रहस्य समझना बहुत कठिन है। वह माया समस्त देवताओंके लिये भी दुर्जय है। जिनकी मायाके प्रभाव- से ब्रह्माजी लकुटी बने हुए हैं और जिन्होने भगवान् शिवको

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