कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 752, कुल 832 में से
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६९६ * श्रीकृष्णोपनिषद् * बाँसुरी बना रक्खा है, उनकी मायाको साधारण जगत् कैसे जान सकता है ? निश्चय ही देवताओंका बल ज्ञान है। परन्तु भगवान्की मायाने उसे भी क्षणभरमें हर लिया। श्रीशेषनाग श्रीबलराम बने, और सनातन ब्रह्म ही श्रीकृष्ण बने। सोलह हजार एक सौ आठ—रुक्मिणी आदि भगवान्की रानियाँ वेदकी ऋचाएँ तथा उपनिषद् हैं। इनके सिवा जो वेदोंकी ब्रह्मरूपा ऋचाएँ हैं, वे गोपियोंके रूपमें अवतीर्ण हुई है। द्वेष चाणूर मल्ल है, मत्सर दुर्जय मुष्टिक है, दर्प ही कुवलया- पीड हाथी है। गर्व ही आकाशचारी बकासुर राक्षस है। रोहिणी माताके रूपमें दयाका अवतार हुआ है, पृथ्वी माता ही सत्यभामा बनी हैं। महाव्याधि ही अघासुर है और साक्षात् कलि राजा कस बना है। श्रीकृष्णके मित्र सुदामा शम है, अक्रूर सत्य हैं और उद्धव दम है। जो शङ्ख है, वह स्वयं विष्णु है तथा लक्ष्मीका भाई होनेसे लक्ष्मीरूप भी है; वह क्षीरसमुद्रसे उत्पन्न हुआ है, मेघके समान उसका गम्भीर घोष है। दूध दहीके भडारमें जो भगवान्ने मटके फोड़े और उनसे जो दूध दहीका प्रवाह हुआ, उसके रूपमे उन्होंने साक्षात् क्षीरसागरको ही प्रकट किया है और उस महासागरमे वे बालक बने हुए पूर्ववत् क्रीड़ा कर रहे है। शत्रुओंके सहार तथा साधुजनोंकी रक्षामें वे सम्यक्रूपसे स्थित हैं। समस्त प्राणियोंपर अहैतुकी कृपा करनेके लिये तथा अपने आत्मजरूप धर्मकी रक्षा करनेके लिये श्रीकृष्ण प्रकट हुए हैं, यों जानना चाहिये। भगवान् शिवने श्रीहरिको अर्पित करनेके लिये जिस चक्रको प्रकट किया था, भगवान्के हाथमें सुशोभित वह चक्र ब्रह्मस्वरूप ही है ॥ १०–१९ ॥
धर्मने चँवरका रूप ग्रहण किया है, वायुदेव ही वैजयन्ती मालाके रूपमें प्रकट हुए हैं, महेश्वरने अग्निके समान चमचमाते हुए खड्गका रूप धारण किया है। कश्यप मुनि नन्दजीके घरमे ऊखल बने हैं और माता अदिति रज्जुके रूपमे अवतरित हुई हैं। जैसे सब वर्णोंके ऊपर अनुस्वार शोभा पाता है, उसी प्रकार जो सबके ऊपर सुशोभित आकाश है, उसे ही भगवान्का छत्र जानो। व्यास वाल्मीकि आदि शनी महात्मा देवताओंके जितने स्वरूप बतलाते हैं तथा जिन-जिनको लोग देवरूप समझकर नमस्कार करते हैं, वे सभी देवता भगवान् श्रीकृष्णके ही आश्रित हैं। भगवान्के हाथकी गदा सारे शत्रुओंका नाश करनेवाली साक्षात् कालिका है। शार्ङ्गधनुषका रूप स्वय वैष्णवी मायाने धारण किया है और प्राणसंहारक काल ही उनका वाण है। जगत्के बीजरूप कमलको भगवान्ने हाथमे लीलापूर्वक धारण किया है। गरुडने भाण्डीरवटका रूप ग्रहण किया है, और नारद मुनि सुदामा नामके सखा बने हैं। भक्तिने वृन्दाका रूप धारण किया है। सब जीवोको प्रकाश देनेवाली जो बुद्धि है, वही भगवान्की क्रिया-शक्ति है। अत: ये गोप-गोपी आदि सभी भगवान्से भिन्न नहीं हे और विभु—परमात्मा श्रीकृष्ण भी इनसे भिन्न नहीं है। उन्होंने (श्रीकृष्णने) स्वर्गवासियों- को तथा सारे वैकुण्ठधामको भूतलपर उतार लिया है ॥ २०–२५ ॥ जो इस प्रकार जानता है, वह सब तीर्थोंका फल पाता है और देहके बन्धनसे मुक्त हो जाता है—यह उपनिषद् है।
॥ अथर्ववेदीय श्रीकृष्णोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!