कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 753, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कलि ˙ रणोप ˙ ष ˎ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! 'हरे राम' आदि सोलह नामोंके मन्त्रका अद्भुत माहात्म्य हरि ॐ । द्वापरके अन्तमें नारदजी ब्रह्माजीके पास गये, और बोले—'भगवन् ! मैं भूलोकमें पर्यटन करता हुआ किस प्रकार कलिसे त्राण पा सकता हूँ ?' ब्रह्माजी बोले—'वत्स ! तुमने मुझसे आज बहुत अच्छी बात पूछी है। समस्त श्रुतियोंका जो गोपनीय रहस्य है, उसे सुनो—जिससे कलियुगमें भवसागरको पार कर लोगे। भगवान् आदि- पुरुष नारायणके नामोच्चारणमात्रसे मनुष्य कलिके दोषोंका नाश कर डालता है।' नारदजीने फिर पूछा—'वह कौन-सा नाम है ?' हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीने कहा— हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥ ये सोलह नाम कलिके पापोंका नाश करनेवाले हैं। इससे श्रेष्ठ कोई दूसरा उपाय सारे वेदोंमें भी नहीं देखनेमें आता। इसके द्वारा षोडश कलाओंसे आवृत्त जीवके आवरण नष्ट हो जाते हैं। तत्पश्चात् जैसे मेघके विलीन होनेपर सूर्यकी किरणें प्रकाशित हो उठती हैं, उसी प्रकार परब्रह्मका स्वरूप प्रकाशित हो जाता है। फिर नारदजीने पूछा—'भगवन् ! इसके जपकी क्या विधि है ?' ब्रह्माजीने उनसे कहा—'इसकी कोई विधि नहीं है। पवित्र हो या अपवित्र, इस मन्त्रका निरन्तर जप करनेवाला सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य— चारों प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करता है। जब साधक इस सोलह नामोंवाले मन्त्रका साढे तीन करोड़ जप कर लेता है, तब ब्रह्महत्याके दोषको पार कर जाता है। वह वीरहत्याके पापसे तर जाता है। स्वर्णकी चोरीके पापसे छूट जाता है। पितर, देवता और मनुष्योंके अपकारके दोषसे भी छूट जाता है। सब धर्मोंके परित्यागके पापसे तत्काल ही पवित्र हो जाता है। शीघ्र ही मुक्त हो जाता है, शीघ्र ही मुक्त हो जाता है। यह उपनिषद् है । ॥ कृष्णयजुर्वेदीय कलिसंतरणोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्ति. !! शान्तिः !!! उ० अ० ८८—८९—