भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 750

६९४ - श्रीरामोपनिषद् - [ खण्ड २

चतुर्विध स्वर, वेद, अग्नि गुण आदिका उच्चारण करके, उनका न्यास करके प्रणव मन्त्रोंको दुगुना जप करके पश्चात् राम-मन्त्रके आगे एवं पीछे प्रणव लगाकर जो जप करता है वह श्रीरामका स्वरूप ही हो जाता है। तात्पर्य यह कि पहले प्रणवके तीनो अक्षरोंके ऋषि, देवता, छन्दको जानकर उनका न्यास करना चाहिये। फिर प्रणवकल्पमें कहे गये षडक्षरमन्त्रोंका उनके आदि-अन्तमे प्रणव लगाकर जप करना चाहिये। यह प्रणव-कल्पमे कहा गया। षडक्षरमन्त्र श्रीराम- षडक्षरमन्त्र ही है।

हनुमान्‌जीने कहा कि 'मुझसे भगवान् श्रीरामने यह बतलाया है। इसलिये प्रणव श्रीरामका अङ्ग बतलाया गया है।' इस प्रकार पवनपुत्रके कहनेपर उन ऋषियोंने पुनः श्रीहनुमान्- जीसे पूछा और उनके उत्तरमें हनुमान्जीने बताया—"श्रीराम- के भक्त श्रीविभीषणजीकी बनायी हुई 'श्रीरामपरिचर्या'में सात सहस्र मंस्कृत वाक्य, सात सहस्र गद्य, पाँच सौ आर्याछन्द, आठ सहस्र श्लोक, चौबीस सहस्र पद्य, दस सहस्र दण्डक हैं। इन मन्त्रोंके क्रमको जानकर जीव कृतकृत्य हो जाता है ॥ ७-१० ॥

द्वितीय खण्ड श्रीरामकी प्राप्तिके साधन

श्रीहनुमान्जीने कहा—एक समयकी बात है, विभीषण- ने सिंहासनासीन रावणातन्तक भगवान् श्रीरामको पृथ्वीपर लेटकर दण्डवन् प्रणाम करके उनसे प्रार्थना की—"हे महाबाहु श्रीरघुनाथजी ! मैंने अपनी 'श्रीरामपरिचर्या'में कैवल्य- स्वरूपका वर्णन किया है। वह सबके लिये सुलभ नहीं। अतः अल्पजनोंकी सुलभताके लिये आप अपने सूक्ष्म स्वरूपका उपदेश करें" ॥ ११ ॥ यह सुनकर भगवान् श्रीरामने कहा—'तुम्हारे ग्रन्थमें जो पाँच दण्डक है, वे घोर-से-घोर पापात्माओंको भी पवित्र करनेवाले हैं। इनके अतिरिक्त जो मेरे छियानवे करोड़ नामो (राम) का जप करता है, वह भी उन सभी पापोंसे छूट जाता है। इतना ही नहीं, वह स्वत सच्चिदानन्दस्वरूप हो जाता है' ॥ १२ ॥ विभीषणजीने पुन प्रार्थना की—'जो पाँच दण्डक या

नौ करोड़ राम-नाम जपनेमे असमर्थ हों, वे क्या करें ?' भगवान् श्रीरामने बतलाया—'आदि-अन्तमे प्रणवसे सम्पुटित करके मेरे मन्त्रका पचास लाख जप, इसी प्रकार मेरे मन्त्रसे दुगुने प्रणवका जप जो करता है, वह निःसन्देह मेरा स्वरूप ही हो जाता है।' विभीषणजीने पुनः प्रार्थना की कि 'जो इतना करनेमें भी असमर्थ हों, वे क्या करें ?' भगवान् श्रीराम- ने कहा—'वे तीन पद्यों (गायत्री)का पुरश्चरण करें और जो इसमे भी असमर्थ हों, वे मेरी गीता (रामगीता); मेरे सहस्रनाम- का जप, जो मेरे विश्वरूपका परिचायक है, करें अथवा जो मेरे एक सौ आठ नामोंका जप अथवा देवर्षि नारदद्वारा कहे श्रीरामस्तवराजका पाठ अथवा हनुमान्जीद्वारा कहे गये मन्त्र- राजात्मक स्तोत्र तथा सीतास्तोत्र या श्रीरामरक्षा आदि इन स्तोत्रोंसे नित्य मेरी स्तुति करते हैं, वे भी मेरे समान हो जाते हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं।'

॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!