भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 749, कुल 832 में से

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पृष्ठ 749

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय श्रीरामोपनि षद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड श्रीरामका स्वरूप, उनके अङ्ग, राम-मन्त्रका माहात्म्य एक समय सनकादि योगीन्द्रों तथा अन्य ऋषियों और प्रह्लादादि भगवान् विष्णुके भक्तों ने हनुमान्जी से यह पूछा— हे महाबाहु महाबलवान् वायुपुत्र ! आप यह बतलायें कि अठारहों पुराणों, अठारहों स्मृतियों, चारों वेदों, सम्पूर्ण शास्त्रों एव समस्त अध्यात्मविद्याओं में ब्रह्मवादियों के लिये कौन-सा तत्त्व उपदिष्ट हुआ है ? विष्णुके समस्त नामों में से तथा गणेश, सूर्य, शिव और शक्ति—इनमें से वह तत्त्व कौन- सा है ? ॥ १-३ ॥ श्रीहनुमान्जीने उत्तर दिया—योगीन्द्रवृन्द, ऋषिगण तथा विष्णुभक्तजन ! आप संसार के बन्धनको नाश करने- वाली मेरी बात सुनें । इन सब (वेदादिकों) में परम तत्त्व ब्रह्मस्वरूप तारक ही है । राम ही परम ब्रह्म हैं । राम ही परम तपःस्वरूप हैं । राम ही परम तत्त्व हैं । वे श्रीराम ही तारकब्रह्म हैं ॥ ४-५ ॥ श्रीपवनपुत्रके यह उपदेश देनेपर योगीन्द्रों, ऋषियों और विष्णुभक्तोंने फिर हनुमान्जी से पूछा—हनुमान्जी ! आप हमें श्रीरामके अङ्गोंका उपदेश करें । तब उन पवनकुमार- ने कहा—'गणेश, सरस्वती, दुर्गा, क्षेत्रपाल, सूर्य, चन्द्र, नारायण, नरसिंह, वासुदेव, वाराह तथा और भी दूसरे सभी देवताओंके मन्त्रोंको, श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी, हनुमान्, शत्रुघ्न, विभीषण, सुग्रीव, अङ्गद, जाम्बवान् और भरतजी—इन सबको श्रीरामका अङ्ग जानना चाहिये । अङ्गोंकी पूजाके बिना राम- मन्त्रका जप विघ्नकारक होता है' ॥ ६ ॥ इस प्रकार हनुमान्जीके कहनेपर उन सब योगीन्द्रादिने पुनः उनसे पूछा—महाबलवान् अञ्जनीकुमार ! जो गृहस्थ ब्राह्मण (ब्रह्मवादी) हैं, उनको प्रणवका अधिकार कैसे हो सकता है ? श्रीहनुमान्जी बोले—एक बार श्रीअयोध्याजीमें रत्न- सिंहासनासीन भगवान् श्रीरामसे मैंने इसी प्रकार पूछा था— 'योगियोंके चित्तरूपी मानसरोवरमें विहार करनेवाले हंसके समान सीतानाथ ! गृहस्थ ब्राह्मणोंको प्रणवमें किस प्रकार अधिकार प्राप्त हो ?' भगवान् श्रीरामने बताया—'जिनको इस छः अक्षरके मेरे मन्त्रका अधिकार प्राप्त है, उन्हींको प्रणव-जप- का अधिकार है, दूसरोंको नहीं । जो प्रणवको केवल अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रासहित जपकर पुनः 'रामचन्द्र' मन्त्रका जप करता है, मैं उसका कल्याण करता हूँ । इसलिये प्रणवके अकार, उकार, मकार एवं अर्ध- मात्राके ऋषि, छन्द, देवताका न्यास करके, इसी प्रकार वर्ण,