कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 756, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ सामवेदीय जाबालदर्शनोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड योगके आठ अङ्ग और दस यमोंका वर्णन सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और पालन करनेवाले चतु- र्भुज भगवान् महाविष्णु महायोगी दत्तात्रेयके रूपमें अवतीर्ण हुए। दत्तात्रेयजी योग साम्राज्य (के अधिपति पद) पर दीक्षित हैं—वे योगमार्गके सम्राट् हैं। उनके शिष्य मुनिवर्य साङ्कृति नामसे प्रसिद्ध थे । वे गुरुके बड़े ही भक्त थे । एक दिन एकान्तमें गुरुजीकी सेवामें उपस्थित हो उन्होंने हाथ जोड़- कर विनयपूर्वक पूछा—'भगवन् ! आठ अङ्गोंसहित योगका मेरे लिये विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये, जिसके जान लेनेमात्रसे मैं जीवन्मुक्त हो जाऊँ' ॥ १-३ ॥ भगवान् दत्तात्रेयने कहा—'साङ्कृते ! सुनो, मै तुम्हें आठ अङ्गोंसहित योगदर्शनका उपदेश करता हूँ । ब्रह्मन् ! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—ये योगके आठ अङ्ग हैं । इनमेंसे यमके दस भेद हैं—अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, दया, आर्जव (सरलता), क्षमा, धृति, परिमित आहार और बाहर भीतरकी पवित्रता ॥ ४-६ ॥ 'तपोधन ! वेदमें बतायी हुई विधिके अतिरिक्त जो मन, वाणी और शरीरद्वारा किसीको किसी प्रकारका कष्ट दिया जाता या उसका प्राणोंसे वियोग कराया जाता है, वही वास्तविक हिंसा है, इसके सिवा दूसरी कोई हिंसा नहीं है (इस हिंसा- का सर्वथा त्याग ही अहिंसा है ) । मुने ! आत्मा सर्वत्र व्याप्त है, उसका शस्त्र आदिके द्वारा छेदन नहीं हो सकता । हाथों या इन्द्रियोंके द्वारा उसका ग्रहण होना भी सम्भव नहीं है—इस प्रकारकी जो बुद्धि है, उसे ही वेदान्तवेत्ता महात्माओंने श्रेष्ठ अहिंसा बताया है। मुनीश्वर ! नेत्र आदि इन्द्रियोंके द्वारा जो जिस रूपमें देखा, सुना, सूँघा और समझा हुआ विषय है, उसको उसी रूपमें वाणीद्वारा (अथवा सकेत आदिके द्वारा ) प्रकट करना सत्य है। ब्रह्मन् ! इसके सिवा सत्यका और कोई प्रकार नहीं है। अथवा सब कुछ सत्य स्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है, परमात्माके सिवा दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं—इस प्रकारका जो निश्चय है, उसीको वेदान्तज्ञानके पारगामी विद्वानोंने सबसे श्रेष्ठ सत्य कहा है। दूसरेके रत्न, सुवर्ण अथवा मुक्तामणिसे लेकर एक तृणके लिये भी मन न चलाना—दूसरोंकी छोटी या बड़ी किसी भी वस्तुके लिये मनमे कभी लोभ न लाना ही अस्तेय है । विद्वान् महापुरुषोंने इसीको अस्तेय (चोरी न करना) माना है। इसके अतिरिक्त महामुने ! जगत्के समस्त व्यवहारोंमे अनात्मबुद्धि रखकर उन्हें आत्मासे दूर रखने- का जो भाव है, उसीको आत्मज्ञ महात्माओंने अस्तेय कहा है । मन, वाणी और शरीरके द्वारा स्त्रियोंके सहवासका परित्याग तथा ऋतुकालमें (धर्मबुद्धिसे) केवल अपनी ही पत्नीसे सम्बन्ध—यही ब्रह्मचर्य कहा गया है । अथवा काम क्रोधादि शत्रुओंको सताप देनेवाले मुनीश्वर ! मनको परब्रह्म परमात्मा- के चिन्तनमें संचरित करना—लगाये रखना ही सर्वोत्तम