कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 755, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ का यथावत देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६९९
[बायाँ स्तम्भ] हम ध्यान करते हैं, वह दन्ती (गजानन) हमें प्रेरणा प्रदान करे*। (वह गणेश गायत्री है) एकदन्त, चतुर्भुज, चारों हाथोंमें पाश, अङ्कुश, अभय और वरदानकी मुद्रा धारण किये तथा मूषक-चिह्न- की ध्वजा लिये हुए, रक्तवर्ण, लम्बे उदरवाले, सूप-जैसे बड़े-बड़े कानोंवाले, रक्तवस्त्रधारी, शरीरपर रक्तचन्दनका लेप किये हुए, रक्तपुष्पोंसे भलीभाँति पूजित, भक्तके ऊपर अनुकम्पा करनेवाले देवता, जगत्के कारण, अच्युत, सृष्टिके आदिमें आविर्भूत, प्रकृति और पुरुषसे परे श्रीगणेशजीका जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सब योगियोंमें श्रेष्ठ है। व्रात (देवसमूह) के नायकको नमस्कार, गणपतिको नमस्कार, प्रमथपति ( शिवजीके गणोंके अधिनायक ) के लिये नमस्कार, लम्बोदरको, एकदन्तको, विघ्नविनाशकको, शिवजीके पुत्रको तथा श्रीवरदमूर्तिको नमस्कार, नमस्कार ।† यह अथर्वाङ्गिरस् ( अथर्ववेदकी उपनिषद् ) है । इसका जो पाठ करता है, वह ब्रह्मत्वको प्राप्त करनेका अधिकारी हो जाता है । सब प्रकारके विघ्न उसके लिये बाधक नहीं होते । वह सब जगह सुख पाता है । वह पाँचों प्रकारके महान् पातकों तथा उपपातकोंसे मुक्त हो जाता है । सायंकाल पाठ करनेवाला दिनके पापोंका नाश करता है । प्रातःपाठ करनेवाला रात्रिके पापोंका नाश करता है । जो प्रातः-साय दोनों समय इस पाठका प्रयोग करता है, वह निष्पाप हो जाता है । धर्म,
[दायाँ स्तम्भ] अर्थ, काम और मोक्षको प्राप्त करता है । इस अथर्वशीर्षको, जो शिष्य न हो, उसे नहीं देना चाहिये । जो मोहके कारण देता है, वह पातकी हो जाता है । सहस्र बार पाठ करनेसे जिन जिन कामनाओंका उच्चारण करता है, उन उनकी सिद्धि इसके द्वारा ही मनुष्य कर सकता है । इसके द्वारा जो गणपतिको स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है । जो चतुर्थी तिथिको उपवास करके जपता है, वह विद्यावान् हो जाता है । यह अथर्वण-वाक्य है । जो इस मन्त्रके द्वारा तपश्चरण करना जानता है, वह कदापि भयको नहीं प्राप्त होता । जो दूर्वाङ्कुरोंके द्वारा भगवान् गणपतिकायजन करता है, वह कुबेरके समान हो जाता है । जो लाजोंके द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावी होता है । जो सहस्र लड्डुओं ( मोदकों ) के द्वारा यजन करता है, वह वाञ्छित फलको प्राप्त करता है । जो घृतके सहित समिधासे यजन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है । आठ ब्राह्मणोंको सम्यक् रीतिसे ग्रहण करानेपर सूर्यके समान तेजस्वी होता है । सूर्यग्रहणमें महानदीमें या प्रतिमाके समीप जपनेसे मन्त्रसिद्धि होती है । वह महाविघ्नसे मुक्त हो जाता है, महापातकसे मुक्त हो जाता है, महान् दोषसे मुक्त हो जाता है । जो इस प्रकार जानता है, वह सर्वज्ञ हो जाता है, सर्वज्ञ हो जाता है ।
॥ अथर्ववेदीय गणपत्युपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाऽसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
[पाद-टिप्पणी / Footnotes]
- 'एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ।' † नमो व्रातपतये नमो गणपतये नम प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्नविनाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमो नम ।