कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 758, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७०२ '•:- जाबालदर्शनोपनिषद् :• [ खण्ड ४ है। इसी प्रकार मानसिक जप भी मनन और ध्यानके भेद- किया गया जप सब लोगोंको यथावत् फल देनेवाला होता से दो प्रकारका है। उच्चस्वरसे किये जानेवाले जपकी अपेक्षा है, परंतु यदि उस मन्त्रको नीच पुरुषोंने अपने कानोंसे उपांशु जप (अत्यन्त मन्दस्वरसे किया गया जप) हजार- सुन लिया तो वह निष्फल हो जाता है (शास्त्रीय पर्वोपर गुना उत्तम बताया गया है। इसी प्रकार उपांशुकी अपेक्षा उपवासादि करना तथा किसी प्रकारका नियम ग्रहण करना मानसिक जप सहस्रगुना श्रेष्ठ कहा गया है। उच्चस्वरसे व्रत कहलाता है)' ॥ ८-१६ ॥ ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड नौ प्रकारके यौगिक आसनोंका वर्णन 'मुनिश्रेष्ठ ! आसन नौ प्रकारके हैं—स्वस्तिकासन, गोमुखासन, अग्रभागपर दृष्टि जमाये रक्खे। यह योगियोंद्वारा सदा पद्मासन, वीरासन, सिंहासन, भद्रासन, मुक्तासन, मयूरासन सम्मानित होनेवाला सिंहासन कहा गया है।) दोनों टखनों- और सुखासन। घुटनों और जाँघोंके बीचमे अपने दोनों को अण्डकोषके नीचे सीवनीके दोनों पार्श्वभागोंमें (इस पैरोंको भलीभाँति रखकर ग्रीवा, मस्तक और शरीरको प्रकार) लगाकर रक्खे (कि पैरोंका अग्रभाग पीछेकी ओर समभावसे धारण किये रहना स्वस्तिकासन कहलाता है; मुड़ा रहे) और दोनों हाथोंसे पार्श्वभाग और पैरोंको दृढता- इसका नित्य अभ्यास करना चाहिये। दाहिने पैरके गुल्फ पूर्वक बाँधकर स्थिरभावसे बैठ जाय—यह भद्रासन है, जो विष- (टखने) को बायीं ओरके पृष्ठभागतक और बायें पैरके जनित रोगका नाश करनेवाला है। सीवनीकी सूक्ष्म रेखाको गुल्फ (टखने) को दाहिनी ओरके पृष्ठभागतक ले जाय, बायें टखनेसे दबाकर उस बायें टखनेको फिर दायें इसीको गोमुखासन कहते हैं। विप्रवर ! दोनों पैरोंको दोनों टखनेसे दबा दे तो यह मुक्तासन होता है। मुने ! लिङ्गके जाँघोंपर (व्युत्क्रमसे अर्थात् बायें पैरको दाहिनी जाँघपर ऊपरी भागमे बायें टखनेको रखकर फिर उसके ऊपर दाहिने और दाहिने पैरको बायीं जाँघपर) रखकर उनके अँगूठोंको टखनेको रख दे तो यह भी मुक्तासन कहलाता है। मुनिश्रेष्ठ ! दोनों हाथोंसे पीठके पीछेसे पकड़ ले। यही पद्मासन अपनी दोनो हथेलियोंको पृथ्वीपर टिकाकर, कोहनियोंके है। यह सम्पूर्ण रोगोंका भय दूर करनेवाला है। अग्रभागको नाभिके दोनों पाश्र्वोमे लगाये। फिर एकाग्रचित्त हो बायें पैरको दाहिनी जाँघपर रखने और शरीरको सिर और पैरको ऊँचा करके आकाशमें दण्डकी भाँति (पृथ्वी- सीधा रखकर बैठे, इसको वीरासन कहा गया है। (दोनों के समानान्तरमें) स्थित हो जाय। यह मयूरासन है, जो टखनोंको अण्डकोषके नीचे सीवनीके दोनों पाश्र्वोमे ले सब पापोंका नाश करनेवाला है। जिस किसी प्रकार बैठनेसे जाय और उन्हें इस प्रकार रक्खे कि बायें टखनेसे सीवनीका सुख और धैर्य बना रहे, वह सुखासन कहा गया है। दाहिना पार्श्व और दायें टखनेसे सीवनीका बायाँ पार्श्व असमर्थ साधक इसी आसनका आश्रय ले। जिसने आसन लगा रहे। फिर दोनों हाथोंको घुटनोंपर रखकर सब अँगुलियों- जीत लिया, उसने मानो तीनों लोक जीत लिये। सांकृते ! को फैला दे। मुँहको खोलकर एकाग्रचित्त हो नासिकाके इसी विधिसे योगयुक्त होकर तुम सदा प्राणायाम किया करो' ॥ १-१३ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ चतुर्थ खण्ड नाड़ी-परिचय तथा आत्मतीर्थ और आत्मज्ञानकी महिमा 'सांकृते ! मनुष्यका शरीर अपने हाथके मानसे ९६ अगुलका जो स्थान है, उसे ही मनुष्योंके शरीरका मध्यभाग समझो। होता है। इम शरीरका जो मध्यभाग है, उसमें अग्निका स्थान है। वही मूलाधार है। मुनिश्रेष्ठ ! वहाँसे नौ अगुल ऊपर कन्द- उसका रग तपाये हुए सोनेके समान माना गया है। उसकी स्थान है। उसकी लबाई चौड़ाई चार-चार अगुलकी है और आकृति त्रिकोण है। यह मैने तुमसे सत्य बात बतायी है। आकृति मुर्गीके अंडेके समान है । वह ऊपरसे चमड़े गुदासे दो अगुल ऊपर और लिङ्गसे दो अगुल नीचेका आदिके द्वारा विभूषित है। मुनिपुङ्गव ! उस कन्दस्थानके