कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 759, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७०३ मध्यभागमे नाभि है, यों योगवेत्ता महात्माओंने कहा है। कन्दके मध्यभागमें जो नाड़ी है, उसका सुषुम्नाके नामसे वर्णन हुआ है। उसके चारों ओर ७२ हजार नाड़ियाँ हैं। उनमें चौदह प्रधान हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—सुषुम्ना, पिङ्गला, इडा, सरस्वती, पूषा, वरुणा, हस्ति- जिह्वा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू, विश्वोदरा, पयस्विनी, शङ्खिनी और गान्धारा। ये ही चौदह नाड़ियाँ प्रधान मानी गयी हैं। इन चौदहमें भी प्रथम तीन ही सबसे प्रधान हैं। इनमें भी एक ही नाड़ी—सुषुम्ना सर्वश्रेष्ठ है। मुने ! वेदान्त- शास्त्रके ज्ञाता विद्वानोंने इसे ब्रह्मनाडी कहा है। पीठके मध्यभागमें जो वीणादण्ड (मेरुदण्ड) नामसे प्रसिद्ध हड्डियोंका समुदाय है, उसमे होकर सुषुम्नानाड़ी मस्तक तक पहुँची हुई है। मुने ! नाभि कन्दसे दो अंगुल नीचे कुण्डलिनी- का स्थान है। वह अष्टप्रकृतिरूपा मानी गयी है। वह वायुकी यथावत् चेष्टा और जलतथा अन्न आदिको रोक करके ही सदा नाभि-कन्दके दोनों पार्श्वोंको घेरकर स्थित रहती है तथा ब्रह्मरन्ध्रके मुखको अपने मुखसे सदा आवेष्टित किये रहती है। सुषुम्नाके वाम-भागमे इडा और दक्षिण भागमें पिङ्गला स्थित है। सरस्वती और कुहू—ये दोनों सुषुम्नाके उभय पार्श्वोमे स्थित हैं। गान्धारा और हस्तिजिह्वा—ये क्रमशः इडाके पृष्ठ और पूर्व भागोंमें स्थित हैं। पूषा और यशस्विनी क्रमशः पिङ्गलाके पृष्ठ और पूर्व भागोंमें स्थित हैं। कुहू और हस्तिजिह्वाके बीचमे विश्वोदरा नाड़ी है। यशस्विनी और कुहूके मध्य भागमें वारुणा नाड़ी प्रतिष्ठित है। पूषा और सरस्वतीके मध्यमे पयस्विनी नाड़ीकी स्थिति बतायी गयी है। गान्धारा और सरस्वतीके बीचमें शङ्खिनीका स्थान है। अलम्बुषा नाभिकन्दके मध्यभागसे होती हुई गुदातक फैली हुई है। सुषुम्नाका दूसरा नाम राका है। उसके पूर्वभागमे कुहू नामकी नाड़ी है। यह नाड़ी ऊपर और नीचे स्थित है। इसकी स्थिति दक्षिण नासिकातक मानी गयी है। इडा नामकी नाड़ी बायीं नासिकातक स्थित है। यशस्विनी नाड़ी दायें पैरके अंगूठे तक फैली हुई है। पूषा पिङ्गलाके पृष्ठभागसे होती हुई दायें नेत्रतक फैली हुई है और पयस्विनी नाड़ी विद्वानोंद्वारा दाहिने कानतक फैली हुई बतायी जाती है। सरस्वती नाड़ी ऊपरकी ओर जिह्वा तक फैली हुई है। हस्तिजिह्वा नाड़ी बायें पैरके अँगूठे तक स्थित है। शङ्खिनी १ पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहङ्कार—ये आठ प्रकृतियाँ हैं। नामकी जो नाड़ी बतायी गयी है, वह बायें कानतक फैली हुई है। गान्धाराकी स्थिति वेदान्तज्ञोंद्वारा बायें नेत्रतक बतायी गयी है। विश्वोदरा नामकी नाड़ी नाभिकन्दके मध्यमें स्थित है॥ १–२२॥ 'प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान, नाग, कूर्म, कृकर (कृकल), देवदत्त और धनञ्जय—ये दस प्राणवायु सब नाड़ियोंमें सञ्चरण करते हैं। इन दसोंमें प्राण आदि पाँच ही मुख्य हैं। सुव्रत ! इन पाँचोंमें भी प्राण और अपान ही श्रेष्ठ एव आदरणीय माने गये हैं। इनमेंसे प्राण नामक वायु मुख और नासिकाके मध्यभागमें, नाभिके मध्यभागमे तथा हृदयमें नित्य निवास करता है। अपान वायु गुदा, लिङ्ग, जाँघो, घुटनों, सम्पूर्ण उदर, कटि, नाभि तथा पिण्डलियोंमें भी सदा वर्तमान रहता है। व्यान वायु दोनों कानों, दोनों नेत्रों, दोनों कंधों, दोनों टखनों, प्राणके स्थानों और कण्ठमें भी व्याप्त रहता है। उदान वायुकी स्थिति दोनों हाथों और पैरोंमे जाननी चाहिये। समान वायु निःसन्देह सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर रहता है। नाग आदि पाँचों वायु चमड़ी और हड्डी आदिमें रहते हैं ॥ २३—२९॥ 'साधुते ! उच्छ्वास और निःश्वास (श्वासको भीतर ले जाना और बाहर निकालना) और खाँसना—ये प्राणवायुके कार्य हैं। मल-मूत्रादिका त्याग अपान वायुका कार्य है। मुनिपुङ्गव ! समान वायु सब शरीरको सम अवस्थामें रखता है। उदान वायु ही ऊपरकी ओर गमन करता है। वेदान्ततत्त्वके ज्ञाता विद्वानोका कहना है कि व्यानवायु ध्वनिका व्यञ्जक है। महामुने ! डकार, वमन आदि नाग वायुका कार्य है। शरीरमे शोभा आदिका सम्पादन धनञ्जय वायुका कार्य बताया गया है। आँखोंका खोलना, मीचना आदि कूर्म नामक वायुकी प्रेरणासे होता है। कृकर (कुकल) नामकी वायु भूख-प्यास- का कारण है। तन्द्रा और आलस्य देवदत्त वायुका कार्य बताया गया है ॥ ३०–३४ ॥ 'मुने ! सुषुम्ना नाड़ीके देवता शिव और इडाके देवता भगवान् विष्णु हैं। पिङ्गला नाड़ीके ब्रह्माजी और सरस्वती नाड़ीके विराट् देवता हैं। पूषाके देवता पूषा नामक आदित्य हैं। वारुणा नाड़ीके देवता वायु हैं। हस्तिजिह्वा नामक नाड़ीके वरुण देवता हैं। मुनिश्रेष्ठ ! यशस्विनी नाड़ीके देवता भगवान् भास्कर हैं। जलस्वरूप वरुण ही अलम्बुसा नाड़ीके देवता माने गये हैं। कुहूकी अधिष्ठात्री देवी क्षुधा हैं। गान्धारीके चन्द्रमा देवता हैं। इसी प्रकार शङ्खिनीके देवता भी चन्द्रमा