भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 760

७०४ - जाबालदर्शनोपनिषद् % [ खण्ड ४

[वाम स्तम्भ] ही हैं। पयस्विनीके देवता प्रजापति हैं। विश्वोदरा नाड़ीके अधिदेवता भगवान् अग्निदेव है ॥ ३५-३८॥ 'वेदवेत्ताओंमे श्रेष्ठ मुनीश्वर ! इड़ा नामकी नाड़ीमे नित्य ही चन्द्रमा सञ्चार करते हैं और पिङ्गला नाडीमे सूर्यदेव सञ्चरण करते है । पिङ्गला नाडीसे इड़ा नाडीमे जो संवत्सरा- त्मक प्राणमय सूर्यका सङ्क्रमण होता है, उसे वेदान्ततत्त्वके ज्ञाता महर्षियोंने उत्तरायण कहा है। इसी प्रकार इड़ासे पिङ्गलामें जो प्राणात्मक सूर्यका सङ्क्रमण होता है, वह दक्षिणायन कहा गया है। जब प्राण इड़ा और पिङ्गलाकी संधिमे आता है, उस समय, हे पुरुषश्रेष्ठ ! इस शरीरके भीतर अमावस्या कही जाती है। जब प्राण मूलाधारमे प्रवेश करता है, उस समय हे तापसोमे श्रेष्ठ विद्वद्वर ! तपस्वियोंने आद्य विषुव नामक योगका उदय कहा है। मुनिश्रेष्ठ ! जब प्राणवायु मूर्द्धा (सहस्रार) मे प्रवेश करता है, उस समय तत्त्वका विचार करनेवाले महर्षियोंने अन्तिम विषुव योगकी स्थिति बतायी है। समस्त उच्छ्वास और निःश्वास मास सङ्क्रान्ति माने गये हैं। इड़ा नाड़ीद्वारा जब प्राण कुण्डलिनीके स्थानपर आ जाता है, तब हे तत्त्वज्ञशिरोमणि ! चन्द्रग्रहण काल कहा जाता है। इसी प्रकार जब प्राण पिङ्गला नाड़ीके द्वारा कुण्डलिनीके स्थानपर आता है, तब हे मुनिवर ! सूर्यग्रहणकी वेला होती है॥३९-४७॥ 'अपने शरीरमे मस्तकके स्थानपर श्रीशैल नामक तीर्थ है। ललाटमें केदारतीर्थ है। हे महाप्राज्ञ ! नासिका और दोनो भौंहोंके मध्यमे काशीपुरी है। दोनों स्तनोंकी जगहपर कुरुक्षेत्र है। हृदयकमलमे तीर्थराज प्रयाग है। हृदयके मध्यभागमें चिदम्बरतीर्थ है। मूलाधार स्थानमें कमलालथ तीर्थ है। जो इस आत्मतीर्थ (अपने भीतर रहनेवाले) का परित्याग करके बाहरके तीर्थोमें भटकता रहता है, वह हाथमे रक्खे हुए बहुमूल्य रत्नको त्यागकर काँच खोजता फिरता है। भावनामय तीर्थ ही सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है। भाव ही सम्पूर्ण कर्मोंमे प्रमाणभूत है। पत्नी और पुत्री दोनोंका आलिङ्गन किया जाता है, किंतु दोनोंमें भावका बहुत अन्तर होता है, पत्नीका आलिङ्गन दूसरे भावसे और पुत्रीका आलिङ्गन दूसरे भावसे किया जाता है। योगी पुरुष अपने आत्मतीर्थमे अधिक विश्वास और श्रद्धा रखनेके कारण जलमे भरे तीर्थों और काष्ठ आदिसे निर्मित देवप्रतिमाओंकी [दक्षिण स्तम्भ] शरण नहीं लेते । महामुने ! बाह्यतीर्थसे श्रेष्ठ आन्तरिक तीर्थ ही है । आत्मतीर्थ ही महातीर्थ है, उसके सामने दूसरे तीर्थ निरर्थक हैं। शरीरके भीतर रहनेवाला दूषित चित्त बाह्य- तीर्थामें गोते लगानेमात्रसे शुद्ध नहीं होता, जैसे मदिरासे भरा हुआ घड़ा ऊपरसे सैकड़ों बार जलमे धो लिया जाय तो भी वह अपवित्र ही रहता है। अपने भीतर होनेवाले जो विषुव-योग, उत्तरायण दक्षिणायन काल और सूर्य-चन्द्रमाके ग्रहण हैं, उनमें नासिका और भौंहोंके मध्यमे स्थित वाराणसी आदि तीर्थामे भावनाद्वारा स्नान करके मनुष्य शुद्ध हो सक्ता है। मुनिश्रेष्ठ ! ज्ञानयोगमे तत्पर रहनेवाले महात्माओंका चरणोदक अज्ञानी मनुष्योंके अन्तःकरणको शुद्ध करनेके लिये उत्तम तीर्थ है ॥ ४८-५६ ॥ 'शिवस्वरूप परमात्मा इस शरीरमे ही प्रतिष्ठित है, इनको न जाननेवाला मूढ़ मनुष्य तीर्थ, दान, जप, यज्ञ, काठ और पत्थर- मे ही सर्वदा शिवको ढूँढ़ा करता है। साङ्कृते ! जो अपने भीतर नित्य निरन्तर स्थित रहनेवाले मुझ परमात्माकी उपेक्षा करके केवल बाहरकी स्थूल प्रतिमाका ही सेवन करता है, वह हाथ- में रक्खे हुए अन्नके ग्रासको फेंककर केवल अपनी कोहनी चाटता है। योगी पुरुष अपने आत्मामें ही शिवका दर्शन करते हैं, प्रतिमाओंमें नहीं। अज्ञानी मनुष्योंके हृदयोमे भगवान्के प्रति भावना जाग्रत् करनेके लिये ही प्रतिमाओकी कल्पना की गयी है ॥ ५७-५९ ॥ 'जिसमे भिन्न न कोई पूर्व है न पर (न कारण है, न कार्य), जो सत्य, अद्वितीय और प्रज्ञानघनरूप है, उस आनन्दमय ब्रह्मको जो अपने आत्माके रूपमे देखता है, वही यथार्थ देखता है। महामुने ! यह मनुष्यका शरीर नाड़ियोंका समुदायमात्र है, जो सदा सारहीन है। इसके प्रति आत्मभाव- का परित्याग करके बुद्धिके द्वारा यह निश्चय करो कि 'मैं' ही परमात्मा हूँ। जो इस शरीरमे रहकर भी इससे सदा भिन्न है, महान् है, व्यापक है और सबका ईश्वर है, उस आनन्दस्वरूप अविनाशी परमात्माको जानकर धीर पुरुष कभी शोक नहीं करता ॥ ६०-६२ ॥ 'मुने ! ज्ञानके बलसे भेदजनक अज्ञानका नाश हो जानेपर कौन आत्मा और ब्रह्ममे मिथ्या भेदका आरोप करेगा' ॥ ६३ ॥ ॥ चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥ ४ ॥