भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 761

खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७०५ पञ्चम खण्ड नाड़ी-शोधन एवं आत्मशोधनकी विधियाँ

माङ्कृतिने पूछा—'ब्रह्मन् ! नाडीकी शुद्धि कैसे होती है, यह मुझे ठीक ठीक और संक्षेपमे बताइये जिससे कि नाड़ी- शुद्धिपूर्वक सदा परमात्माका चिन्तन करते हुए मे जीवन्मुक्त हो जाऊँ' ॥ १ ॥ भगवान् दत्तात्रेयने कहा—'साङ्कृते ! सुनो; म संक्षेप- ने नाड़ी शुद्धिका वर्णन करता हूँ । शास्त्रोंके विधिवाक्यो- द्वारा जो कर्म बतलाये गये हैं, उनमें कर्तव्यबुद्धिमे मलग्र रहे। कामना और फलप्राप्तिके सङ्कल्पको त्याग दे । योगके यम आदि आठों अङ्गोंका सेवन करते हुए शान्त एव सत्यपरायण रहे। अपने आत्माके चिन्तनमे ही स्थित रहे और ज्ञानी महापुरुषोंकी सेवामें उपस्थित हो उनसे भलीभाँति शिक्षा ले। तत्पश्चात् पर्वतशिखर, नदी तट, बिल्व वृक्षके समीप, एकान्त वन अथवा और किसी पवित्र एव मनोरम प्रदेशमे आश्रम बनाकर एकाग्रचित्तसे वहाँ रहे । फिर वहाँ पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके किसी आसनसे बैठे । ग्रीवा, मस्तक और शरीरको समान भावमे रखकर मुख बद किये हुए भलीभाँति स्थिर हो जाय । नासिकाने अग्रभागपर चन्द्र मण्डलकी भावना करे और वहाँ प्रणवके बिन्दुमे तुरीयस्वरूप परमात्माको अमृतका स्रोत बहाते हुए नेत्रोंद्वारा प्रत्यक्ष देखे। उस समय चित्तको पूर्णतः एकाग्र रक्खे । फिर इडा नाड़ीके द्वारा ( अर्थात् नासिकाके बायें छिद्रसे ) प्राणवायुको खींच कर उदरमें भर ले और देहके मध्यमें स्थित जो अग्नि है, उसका ध्यान करे माना उस वायुका सम्पर्क पाकर अग्निदेव ज्वालाओंके साथ प्रज्वलित हो उठे हों । फिर प्रणवके बिन्दु और नादसे सयुक्त अग्नि बीज ( र ) का चिन्तन करे । तदनन्तर बुद्धिमान् साधक पिङ्गला नाडी ( अर्थात् नासिकाके दाहिने छिद्रद्वारा ) प्राणवायुको विधिपूर्वक शनैः- शनै बाहर निकाले । फिर पिङ्गला नाड़ीद्वारा पूर्ववत् प्राणवायुको खींचकर अपने भीतर भर ले और अग्निबीजका चिन्तन करे । उसकेबाद इडा नाड़ीद्वारा फिर उसे धीरे-धीरे बाहर निकाल दे । इस प्रकार एकान्तमें लगातार तीन चार दिनोतक अथवा प्रतिदिन तीनों मध्याओंमे तीन चार या छः वार यह क्रिया करे । उससे उसकी नाड़ी शुद्ध हो जाती है । फिर इम नाड़ीशुद्धिके पृथक् चिह्न भी उपलब्धित होते हैं । शरीर हल्का हो जाता है, जठराग्नि उद्दीत हो जाती है और अनाहतनादकी अभिव्यक्ति होने लगती है । यह चिह्न सिद्धि- का सूचक है । जबतक यह चिह्न दिखायी न दे, तबतक इसी प्रकार अभ्यास करता रहे ॥ २-१२ ॥ 'अथवा यह सब छोड़कर आत्मशुद्धिका अनुष्ठान करे । यह आत्मा सदा शुद्ध, नित्य, सुखस्वरूप तथा स्वयम्प्रकाश है । अज्ञानवश ही यह मलिन प्रतीत होता है । ज्ञान होनेपर यह सदा विशुद्धरूपमे ही प्रकाशित होता है । जो ज्ञानरूपी जलसे अज्ञानरूपी मल और कीचड़को धो डालता है, वही सर्वदा शुद्ध है, दूसरा नहीं । क्योंकि वह दूसरा मनुष्य ज्ञानकी अवहेलना करके लौकिक कर्मोंमें आसक्त है ॥ १३ १४ ॥

॥ पञ्चम खण्ड समाप्त ॥ ५ ॥ ━•━•━•━•━ षष्ठ खण्ड प्राणायामकी विधि, उसके प्रकार, फल तथा विनियोग

'सांकृते ! अब मे प्राणायामका क्रम बतलाता हूँ, इसे श्रद्धापूर्वक सुनो । पूरक, कुम्भक और रेचक—इन तीनोमे जो प्राण-सयम सम्पन्न होता है, उसे प्राणायाम कहा गया है । ॐकारके जो तीन वर्ण अकार, उकार और मकार हैं, वे क्रमश पूरक, कुम्भक और रेचकसे सम्बन्ध रखनेवाले बताये गये हैं। इन तीनों वर्णोंका समूह ही प्रणव कहा गया है । अतः प्राणायाम भी प्रणवमय ही है। इडा नाड़ीके द्वारा वायुको धीरे धीरे भीतर खींचकर उसे उदरमे भरे और वहाँ स्थित षोडशमात्राविशिष्ट अकारका चिन्तन करे । तत्पश्चात् उस उदरमें भरी हुई वायुको कुछ कालतक धारण किये रहे और उस समय चौसठ मात्रासे विशिष्ट उकारके स्वरूपका चिन्तन करते हुए प्रणवका जप करता रहे । जबतक सम्भव हो, जपमे सलग्न रहकर वायुको धारण किये रहे । तदनन्तर विद्वान् पुरुष बत्तीस मात्राओसे विशिष्ट मकारका चिन्तन करते हुए पिङ्गला नाड़ीके द्वारा धीरे-धीरे उस भरी हुई वायुको बाहर निकाले । यह एक प्राणायाम है । इसी प्रकार अभ्यास करता रहे ॥ १-६ ॥ 'पुनः पिङ्गला नाड़ीके द्वारा वायुको धीरे-धीरे भीतर