भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 738, कुल 832 में से

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पृष्ठ 738

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

अथर्ववेदीय सूर्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आदित्यकी सर्वव्यापकता, सूर्यमन्त्रके जपका माहात्म्य

हरिः ॐ । अब सूर्यदेवतासम्बन्धी अथर्ववेदीय मन्त्रोंकी व्याख्या करेंगे । इस सूर्यदेवसम्बन्धी अथर्वाङ्गिरस मन्त्रके ब्रह्मा ऋषि हैं। गायत्री छन्द है। आदित्य देवता हैं। 'हंसः' 'सोऽहं' अग्नि नारायणयुक्त बीज है। हृल्लेखा शक्ति है। वियत् आदि सृष्टिसे संयुक्त कीलक है । और चारों प्रकारके पुरुषार्थों- की सिद्धिमें इस मन्त्रका विनियोग किया जाता है। छः स्वरोंपर आरूढ बीजके साथ, छः अङ्गोंवाले, लालकमलपर स्थित, सात घोड़ोंवाले रथपर सवार, हिरण्यवर्ण, चतुर्भुज तथा चारो हाथोंमें क्रमशः दो कमल तथा वर और अभय मुद्रा धारण किये, कालचक्रके प्रणेता सूर्यनारायणको जो इस प्रकार जानता है, निश्चयपूर्वक वही ब्राह्मण (ब्रह्मवेत्ता) है। 'जो प्रणवके अर्थभूत सच्चिदानन्दमय तथा भूः, भुवः और स्वःरूपसे त्रिभुवनमय हैं, सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि करनेवाले उन भगवान् सूर्यदेवके सर्वश्रेष्ठ तेजका हम ध्यान करते हैं, जो हमारी बुद्धियोंको प्रेरणा देते रहते हैं।' भगवान् सूर्यनारायण सम्पूर्ण जङ्गम तथा स्थावर जगत्के आत्मा हैं; निश्चयपूर्वक सूर्यनारायणसे ही ये भूत उत्पन्न होते हैं। सूर्यसे यज्ञ, मेघ, अन्न (बल-वीर्य) और आत्मा (चेतना) का आविर्भाव होता है। हे आदित्य ! तुम- को हमारा नमस्कार है। तुम्हीं प्रत्यक्ष कर्म-कर्ता हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष ब्रह्म हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष विष्णु हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष रुद्र हो। तुम्हीं प्रत्यक्ष ऋग्वेद हो। तुम्हीं प्रत्यक्ष यजुर्वेद हो, तुम्हीं प्रत्यक्ष सामवेद हो। तुम्हीं प्रत्यक्ष अथर्ववेद हो। तुम्हीं ┈┈ छन्दःस्वरूप हो। आदित्यसे वायु उत्पन्न होता है। आदित्यसे भूमि उत्पन्न होती है, आदित्यसे जल उत्पन्न होता है। आदित्यसे ज्योति (अग्नि) उत्पन्न होती है। आदित्यसे आकाश और दिशाएँ उत्पन्न होती हैं। आदित्यसे देवता उत्पन्न होते हैं। आदित्यसे वेद उत्पन्न होते हैं। निश्चय ही ये आदित्य देवता ही इस ब्रह्माण्ड मण्डलको तपाते (गर्मी देते) हैं। वे आदित्य ब्रह्म हैं। आदित्य ही अन्तःकरण अर्थात् मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्काररूप हैं। आदित्य ही प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान—इन पाँचों प्राणोंके रूपमे विराजते हैं। आदित्य ही श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण—इन पाँच इन्द्रियोंके रूपमें कार्य कर रहे हैं। आदित्य ही वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ—ये पाँचों कर्मेन्द्रिय भी हैं। आदित्य ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये ज्ञानेन्द्रियोंके पाँच विषय हैं। आदित्य ही वचन, आदान, गमन, मल त्याग और आनन्द—ये कर्मेन्द्रियोंके पाँच विषय बन रहे हैं। आनन्द- मय, ज्ञानमय और विज्ञानमय आदित्य ही हैं। मित्रदेवता तथा सूर्यदेवको नमस्कार । प्रभो ! मृत्युसे मेरी रक्षा करो। दीप्तिमान् तथा विश्वके कारणरूप सूर्यनारायणको नमस्कार है। सूर्यसे सम्पूर्ण चराचर जीव उत्पन्न होते हैं, सूर्यके द्वारा ही उनका पालन होता है, और फिर सूर्यमें ही वे लयको प्राप्त होते हैं। जो सूर्यनारायण हैं, वह मैं ही हूँ। सविता देवता हमारे नेत्र हैं तथा पर्वके द्वारा पुण्यकालका आख्यान करनेके कारण जो पर्वतनामसे प्रसिद्ध हैं, वे सूर्य ही हमारे चक्षु हैं। सबको धारण करनेवाले धाता नामसे