कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
पृष्ठ 737, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 737
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८३ सावित्रीका यह तीसरा पाद है 'स्वः—धियो यो नः प्रचोदयात्।' स्त्री और पुरुष दोनों प्रजोत्पादन करते हुए (गृहस्थाश्रम- का पालन करते हुए) जो इस सावित्रीदेवीको इस प्रकार जानते हैं, वे पुनः मृत्युको नहीं प्राप्त होते। अर्थात् सविता देवताके उपासक मृत्युको जीत लेते हैं और अमरत्वको प्राप्त करते हैं। बला-अतिबला विद्याओंके विराट् पुरुष ऋषि हैं; गायत्री छन्द है और गायत्री देवता हैं। अकार बीज है, उकार शक्ति है और मकार कीलक है। क्षुधा आदिके निवारणके निमित्त इसका विनियोग है। क्लींके द्वारा षडङ्गन्यास करे। 'ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ॐ क्लीं शिरसे स्वाहा, ॐ क्लीं शिखायै वषट्, ॐ क्लीं कवचाय हुम्, ॐ क्लीं नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं अस्त्राय फट्।' अब ध्यानका वर्णन करते हैं। अमृतसे जिनके करतल आर्द्र हो रहे हैं, सब प्रकारकी सञ्जीवनी शक्तियोंसे जो सम्पन्न हैं, पापोंका नाश करनेमेंजो सुदक्ष हैं तथा जो वेदोंके सारस्वरूप, किरणात्मक, प्रणवरूप विकारवाले एव सूर्यनारायणके सदृश सुदीप्त शरीरवाले हैं, उन वला और अतिबला विद्याओंके अधिष्ठातृ-देवताओंको मैं निरन्तर अनुभव करता हूँ। वला-अतिबला विद्याओंके अधिष्ठातृ-देवताका मन्त्र है— ॐ ह्रीं वले महादेवि ह्रीं महाबले क्लीं चतुर्विधपुरुषार्थ- सिद्धिप्रदे तत्सवितुर्वरेदात्मिके ह्रीं वरेण्यं भर्गो देवस्य वरदात्मिके अतिबले सर्वदयामूर्ते बले सर्वक्षुद्रमोपनाशिनि धीमहि धियो यो नो जाते प्रचुर्य. या प्रचोदयादात्मिके प्रणवशिरस्कात्मिके हु फट् स्वाहा। इस प्रकार जाननेवाला कृतकृत्य हो जाता है। वह सावित्रीदेवीके ही लोकको प्राप्त होता है। यह उपनिषद् है। ॥ सामवेदीय सावित्र्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! ब्रह्मको ढूँढ़ना चाहिये अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तरा- काशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद्वाव विजिज्ञासितव्यमिति । (छान्दोग्य ८।१।१) अब इस ब्रह्मपुर (शरीर) के भीतर जो सूक्ष्म र स्थान है, इसमें जो सूक्ष्म आकाश है और उसके भीतर जो (ब्रह्म) है, उसको ढूँढ़ना चाहिये और उसीकी विशेष जानकारी प्राप्त करनी चाहिये।