कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 734, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६८० : मुद्गलोपनिषद् : ऋतु इन्धन और शरद् ऋतु हविष्य ( चरु-पुरोडाशादि विशेष हविष्य ) हुए । अर्थात् देवताओने इनमें यह भावना की । [ इस मन्त्रमें सृष्टिरूप यज्ञका वर्णन है और आगे आठ मन्त्रोंतक वही है । ] ॥ ६ ॥ ॐ तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ ७ ॥ सबसे प्रथम उत्पन्न उस पुरुषको ही यज्ञमे देवताओं, साध्यों और ऋषियोंने ( पशु मानकर ) कुशके द्वारा प्रोक्षण करके ( मानसिक ) यज्ञ सम्पूर्ण किया । [ इस मन्त्रमें सृष्टि- यज्ञके साथ मोक्षका वर्णन भी किया गया है । ] ॥ ७ ॥ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशून् ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान् ग्राम्याश्च ये ॥ ८ ॥ उस ऐसे यज्ञसे जिसमें सब कुछ हवन कर दिया गया था, प्रशस्त घृतादि ( दूध, दधि प्रभृति ) उत्पन्न हुए । इस उस यज्ञरूप पुरुषने ही वायुमे रहनेवाले, ग्राममें रहनेवाले, वनमें रहनेवाले तथा दूसरे पशुओंको उत्पन्न किया । ( तात्पर्य यह कि उस यज्ञसे नभ, भूमि एव जलमे रहनेवाले समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई और उन प्राणियोंसे देवताओंके योग्य हवनीय प्राप्त हुआ । ) ॥ ८ ॥ ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ ९ ॥ जिसमें सब कुछ हवन क्रिया गया था, उस यज्ञपुरुषसे ऋग्वेद और सामवेद प्रकट हुए । उसीसे गायत्री आदि छन्द प्रकट हुए । उसीसे यजुर्वेदकी भी उत्पत्ति हुई ॥ ९ ॥
- उपनिषदके अनुसार श्रुतिने मोक्षका प्रतिपादन भी किया है । 'परोक्षवादो वेदोऽयम्'–श्रुतियोंमें अध्यात्मवाद परोक्ष- रूपसे निरूपित है । अत मोक्षप्रतिपादनके लिये इस श्रुतिका अर्थ इस प्रकार होगा— उस आत्म-शोधनरूप यज्ञमें देवताओं-दिव्यवृत्तियोंने पुरुष- शरीराभिमानीको, जो शरीरमें अहङ्कार करके पशु हो गया था, कुशोंके—साधनोंके द्वारा प्रोक्षित—विशुद्ध किया । इस प्रकार प्रोक्षित होनेपर वह अग्रजन्मा ब्राह्मण—ब्रह्मज्ञानसम्पन्न हुआ । इसी प्रकार इन्द्रादि देवताओंने, साध्य देवताओंने और ऋषियोंने भी यजन किया । सबने इसी रीतिसे शरीराभिमानीका आत्मशोधन करके मोक्ष प्राप्त किया । ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ॥ १० ॥ उस यज्ञपुरुषमें घोड़े उत्पन्न हुए । उनके अतिरिक्त नीचे-ऊपर दोनो ओर दाँतोंवाले ( गर्दभादि ) भी उत्पन्न हुए । उसीसे गौएँ उत्पन्न हुईं और उसीसे बकरियों और मेढ़ें भी उत्पन्न हुईं ॥ १० ॥ ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते ॥ ११ ॥ देवताओंने जिस यज्ञपुरुषका विधान ( सङ्कल्प ) किया, उसको कितने प्रकारसे ( किन अवयवोंके रूपमें ) कल्पित किया, इसका मुख क्या था, बाहुएँ क्या थीं, जघाएँ क्या थीं और पैर कौन थे—यह बताया जाता है ॥ ११ ॥ ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत ॥ १२ ॥ ब्राह्मण इसका मुख था । ( मुखसे ब्राह्मण उत्पन्न हुए । ) क्षत्रिय दोनों भुजाएँ बना । ( दोनो भुजाओंसे क्षत्रिय उत्पन्न हुए । ) इस पुरुषकी जो दोनों जङ्घाएँ थीं, वही वैश्य हुईं अर्थात् उनमे वैश्य उत्पन्न हुए, और पैरोंसे शूद्र-वर्ण प्रकट हुआ ॥ १२ ॥ ॐ चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद् वायुरजायत ॥ १३ ॥ उस यज्ञपुरुषके मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए । नेत्रोसे सूर्य प्रकट हुए । मुखसे इन्द्र और अग्नि तथा प्राणसे वायुकी उत्पत्ति हुई ॥ १३ ॥ ॐ नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन् ॥ १४ ॥ यज्ञपुरुषकी नाभिसे अन्तरिक्षलोक उत्पन्न हुआ । मस्तक- से स्वर्ग प्रकट हुआ । पैरोंसे पृथिवी, कानोंसे दिशाएँ हुईं । इस प्रकार समस्त लोक उस पुरुषमें ही कल्पित हुए ॥ १४ ॥ ॐ सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥ १५ ॥ देवताओंने जब यज्ञ करते समय ( संकल्पसे ) पुरुषरूप पशुका बन्धन किया, तब सात समुद्र इसकी परिधि ( मेखलाएँ ) थे । इक्कीस प्रकारके छन्दोंकी ( गायत्री, अतिजगती और कृतिमैसे प्रत्येकके सात-सात प्रकारसे ) समिधा बनी ॥ १५ ॥ [ इस मन्त्रमे सृष्टि-यज्ञकी समिधाका वर्णन है । ]