कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 735
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६८१ ॐ वेदाहमेतं पुरुषं महान्त- मादित्यवर्णं तमसस्तु पारे। सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते* ॥ १६ ॥ पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिनकी स्तुति की थी, इन्द्रने चारों दिशाओंमें जिसे (व्याप्त) जाना था, उस परम पुरुषको जो इस प्रकार (सर्वस्वरूप) जानता है, वह यहीं अमृतपद (मोक्ष) प्राप्त कर लेता है। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग निज-निवास (स्वस्वरूप या भगवद्धाम)-की प्राप्तिका नहीं है ॥ १७ ॥ ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा- स्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमान सचन्त यत्र पूर्वे साध्या सन्ति देवा ‡ ॥ १८ ॥ देवताओने (पूर्वोक्त रूपसे) यज्ञके द्वारा यज्ञस्वरूप परम- पुरुषका यजन (आराधन) किया। इस यज्ञसे सर्वप्रथम सब धर्म उत्पन्न हुए। उन धर्मोंके आचरणसे वे देवता महान् महिमावाले होकर उस स्वर्गलोकका सेवन करते हैं, जहाँ प्राचीन साध्य देवता निवास करते हैं ॥ १८ ॥ [इस मन्त्रमें सृष्टि-यज्ञ एवं मोक्षके वर्णनका उपसंहार है।] तमस् (अविद्यारूप अन्धकार) से परे आदित्यके समान प्रकाशस्वरूप उस महान् पुरुषको मैं जानता हूँ। सबकी बुद्धिमें रमण करनेवाला वह परमेश्वर सृष्टिके आरम्भमें समस्त रूपोंकी रचना करके उनके नाम रखता है, और उन्हीं नामोंसे व्यवहार करता हुआ सर्वत्र विराजमान होता है ॥ १६ ॥ [इस मन्त्रमें और इसके आगेके मन्त्रमें भी श्रीहरिके वैभवका वर्णन है।] ॐ धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान् प्रदिशश्चतस्रः। तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था विद्यते अयनाय† ॥ १७ ॥ ॥ पुरुषसूक्त सम्पूर्ण ॥ परमपद यत्र न सूर्यस्तपति यत्र न वायुर्वाति यत्र न चन्द्रमा भाति यत्र न नक्षत्राणि भान्ति यत्र नाग्निर्दहति यत्र न मृत्युः प्रविशति यत्र न दुःखानि प्रविशन्ति सदानन्दं परमानन्दं शान्तं शाश्वतं सदाशिवं ब्रह्मादिवन्दितं योगिध्येयं परं पदं यत्र गत्वा न निवर्तन्ते योगिनः। (बृहज्जाबाल०) जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहता, जहाँ चन्द्रमा नहीं प्रकाशित होता, जहाँ तारे नहीं चमकते, जहाँ अग्नि नहीं जलता, जहाँ मृत्यु प्रवेश नहीं करता, जहाँ दुःख नहीं आ सकते, जो सदानन्द, परमानन्द, शान्त, सनातन, सदा कल्याणमय, ब्रह्मादिसे वन्दित है, वही योगियोंका ध्येय परमपद है, जिसको प्राप्त होकर योगी लौटते नहीं। *-† ये दोनों मन्त्र ऋग्वेदकी प्रचलित प्रतियोंके पुरुषसूक्तमें नहीं मिलते, परन्तु पुरुषसूक्तके पृथक् प्रकाशित कई संस्करणोंमें मिलते हैं। मूल उपनिषद्में भी इनका सकेत है। ये मन्त्र 'पारमात्मिकोपनिषद्,' 'महावाक्योपनिषद्' तथा 'चित्युपनिषद्' में आये हैं। १७ वाँ मन्त्र 'तैत्तिरीय आरण्यक' में भी है। ‡ उपनिषद् इस मन्त्रमें मोक्ष-निरूपणका उपसंहार भी निरूपित—निर्दिष्ट करता है। अत मोक्ष-निरूपणके लिये श्रुतिका अर्थ इस प्रकार होना चाहिये। सम्पूर्ण कर्म, जो भगवदर्पण-बुद्धिसे भगवान्के लिये किये जाते हैं, यज्ञ हैं। उस कर्मरूप यज्ञके द्वारा सात्त्विक वृत्तियोंने उन यज्ञस्वरूप भगवान्का यजन—पूजन किया। इसी भगवदर्पणबुद्धिसे किये गये यज्ञरूप कर्मोंके द्वारा ही सर्वप्रथम धर्म उत्पन्न हुए—धर्माचरणकी उत्पत्ति भगवदर्पणबुद्धिसे किये गये कर्मोंसे हुई । इस प्रकार भगवदर्पणबुद्धिसे अपने समस्त कर्मोंके द्वारा जो भगवान्का यजन- रूप कर्मका आचरण करते हैं, वे उस भगवान्के दिव्यधामको जाते हैं, जहाँ उनके साध्य—आराध्य आदिदेव भगवान् विराजमान हैं। उ० अं० ८६-