कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 732, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें६७८ * मुद्गलोपनिषद् * [ खण्ड ४ प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। प्रिय होना, उत्पन्न होना, बढ़ना, बदलना, घटना और नाश होना—ये 'छः भावविकार' हैं। भूख, प्यास, शोक, मोह, वृद्धावस्था और मृत्यु—ये छः ऊर्मियों हैं। कुल, गोत्र, जाति, वर्ण, आश्रम और रूप—ये 'छः भ्रम होते हैं। इन सबके योगसे परम पुरुष ही जीव होता है, दूसरा नहीं ॥ १-९ ॥ जो इस उपनिषद्का नित्य अध्ययन करता है वह अग्नि- पूत होता है। वह वायूपूत होता है। वह आदित्यपूत होता है। वह रोगहीन हो जाता है। श्रीसम्पन्न हो जाता है। पुत्र-पौत्रादिनी समृद्धिसे युक्त हो जाता है। विद्वान् हो जाता है। महापापोंसे पवित्र हो जाता है। × × × काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्यादिसे बाधित नहीं होता। सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसी जन्ममें वह पुरुष (परमात्मरूप) हो जाता है ॥ १० ॥ इसलिये इस पुरुषसूक्तका अर्थ अत्यन्त रहस्ययुक्त है। यह राजगुह्य देवगुह्य एव गोपनीयोंसे भी अधिक गोपनीय है। जो दीक्षित न हो, उसे इसका उपदेश न करे; जो विद्वान् होनेपर भी जिज्ञासुभावसे प्रश्न न करता हो, उसे भी इसका उपदेश न करे। जो यज्ञ न करता हो, उसे भी उपदेश न करे, अवैष्णवको न करे, अयोगीको न करे, बहुभाषीको न करे, अप्रियभाषीको न करे, जो वर्षभरमें एक बार वेदोंका स्वाध्याय न कर ले, उसे भी न करे, असंतोषीको न करे और जिसने वेदोंका अध्ययन न किया हो, उसे भी इसका उपदेश न करे। इसको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् गुरु भी पवित्र देशमें, पुण्य नक्षत्रमे, प्राणायाम करके, परमपुरुषका ध्यान करता हुआ, विनीतभावसे शरणमे आये हुए शिष्यको ही उसके दाहिने कानमे इस पुरुषसूक्तके अर्थका उपदेश करे। बहुत न बोले। नहीं तो वह उपदेश यातयामत्वरूप दोषसे दूषित हो जाता है (उसका सार चल जाता है, अतः वह उपदेश सफल नहीं हो पाता)। बार-बार कानमे उपदेश दे। ऐसा करनेवाला अध्येता (शिष्य) और अध्यापक (गुरु) दोनो इसी जन्ममें पुरुष—ब्रह्मरूप हो जाते हैं ॥ ११ ॥
॥ ऋग्वेदीय मुद्गलोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
नारायणपरो ज्योतिरात्मा नारायणः परः। नारायणपरं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायणपरो ध्याता ध्यानं नारायणः परः॥ (नारायणोप०) नारायण परमज्योति हैं, नारायण परमात्मा हैं, नारायण परब्रह्म हैं, नारायण परमतत्त्व हैं, नारायण परम ध्याता हैं और नारायण ही परम ध्यान हैं।