भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 731

खण्ड ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६७७

अविषय होनेके कारण (अपने ब्रह्मस्वरूपसे) सांसारिक प्राणियोंके लिये दुर्ज्ञेय है। अतः संसारी जीवोके लिये अपने इस दुर्ज्ञेयविषयत्व (स्वरूप) को छोड़कर श्वेतादिसे युक्त देवादि (सत्त्वगुणविशिष्ट जीवों) के उद्धारकी इच्छासे उन्होंने सहस्र (अनन्त) कलाओंवाले अवयवोंसे युक्त ऐसे कल्याण- स्वरूप वेषको धारण किया, जो दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। उसी वेष (रूप) से भूमि आदि लोकोंमें व्याप्त होकर वे अनन्त योजनोंतक स्थित हुए। सृष्टिके पूर्व पुरुषस्वरूप नारायण ही भूत, वर्तमान एव भविष्य—तीनों कालोंके रूपमें अवस्थित थे। वे ही इन सब (जीवो) को मोक्ष देनेवाले हैं। वे सम्पूर्ण महत्त्वशालियोंसे श्रेष्ठ हैं। उनसे अधिक श्रेष्ठ और कोई भी नहीं है ॥ २-३ ॥

उक्त महापुरुष (परमात्मा) ने अपनेको चार अंशों (चतुर्व्यूहों) मे प्रकट किया। उनमेंसे तीन अंगों (त्रिपादविभूति अथवा वासुदेव, प्रद्युम्न और सङ्कर्षणरूप) से वे परमव्योम (अपने परमधाम वैकुण्ठ) में निवास करते हैं तथा इनसे भिन्न अवशिष्ट चतुर्थ अंश—चतुर्थ व्यूहरूप अनिरुद्ध नामक प्रसिद्ध नारायणके द्वारा सम्पूर्ण विश्वकी रचना (अभिव्यक्ति) हुई॥४॥

उस अनिरुद्धरूप चतुर्थपादात्मक नारायणने जगत्की सृष्टिके लिये प्रकृति (ब्रह्मा) को उत्पन्न किया। वे ब्रह्माजी शरीर प्राप्त करके भी सृष्टिकर्मको न जान सके। तब उन अनिरुद्धस्वरूप नारायणने ब्रह्माजीको सृष्टिका उपदेश किया। भगवान् नारायणने कहा—'ब्रह्माजी ! तुम अपनी इन्द्रियोंका यज्ञकर्ताओंके रूपमे ध्यान करो, कमलकोशसे उत्पन्न सुदृढ ग्रन्थिरूप (बलवान्) अपने शरीरको हवि समझो, मुझे अग्नि मानो, वसन्तकालमें घृतकी धारणा करो, ग्रीष्म ऋतुमें समिधाका भाव करो, शरद् ऋतुको रसरूप समझो। इस प्रकार अग्निमें हवन करनेपर तुम्हारा शरीर इतना सुदृढ हो जायगा कि उसके स्पर्शसे वज्र भी कुण्ठित हो जायगा। तब अपने कार्यरूप (कारणरूपमें विलीन होनेकी अवस्थासे कार्यरूपमें) सब प्राणी—पशु प्रभृति जीव प्रादुर्भूत होंगे। फिर सम्पूर्ण स्थावर- जङ्गम जगत् हो जायगा। इस प्रकार जीव एव आत्माके योगद्वारा मोक्षका प्रकार भी वर्णन किया गया, यह समझना -चाहिये। जो इस सृष्टि-यज्ञ तथा मोक्षप्रकारको भी जानता है, वह पूर्णायुको प्राप्त होता है ॥ ५-७ ॥

तृतीय खण्ड उपासकोंद्वारा अनेक रूपमें देखे गये महापुरुषमें आत्मत्वकी भावनासे उनके स्वरूपकी प्राप्ति

एक ही देव बहुत प्रकारसे प्रविष्ट होकर स्वय अजन्मा रहते हुए भी बहुत प्रकारसे प्रकट होता है। (तात्पर्य यह कि वही एक देव नानात्वमें व्याप्त है। वह स्वयं अजन्मा है, किंतु नानात्वकी सृष्टि भी उसीके द्वारा होती है। नानात्वके रूपमें भी वही है) ॥ १ ॥

अध्वर्युगण उसीकी उपासना इस अग्निके रूपमें करते हैं। यजुर्वेदीय उसीको 'यह यजुः है' इस बुद्धिसे सर्वयज्ञिय कर्मोमे योजित करते हैं। सामगान करनेवाले उसे 'साम' समझते हैं। इसी नारायणरूपमें निश्चय यह सब (दृश्य-जगत्) प्रतिष्ठित है। (तात्पर्य यह कि वही परमतत्त्व यज्ञमें अग्नि, मन्त्र तथा साम है। इससे भी आगे वह समस्त जगत्का आधार है।) सर्प उसे विष मानकर अपनाते हैं। सर्पवेत्ता (योगी) इसे सर्प—प्राणरूपसे ग्रहण करते हैं। देवता इसे अमृतरूपमे अपनाते हैं और मनुष्य इसे धन मानकर जीवन-निर्वाह करते हैं। असुर माया समझते हैं, पितर स्वधा (पितृभोजन) मानते हैं, देवजनवेत्ता (देवोपासक) देवता मानते हैं, गन्धर्व रूप समझते हैं और अप्सराएँ गन्धर्व समझती हैं। इसकी जो जिस भावसे उपासना करता है, यह परमतत्त्व उसके लिये उसी रूपका हो जाता है। इसलिये ब्रह्मज्ञानीको 'पुरुषरूप परब्रह्म मैं ही हूँ' यह भावना करनी चाहिये। ऐसी भावनासे वह उसी स्वरूपको प्राप्त हो जाता है और जो इस रहस्यको इस प्रकार जानता है, वह भी तद्रूप हो जाता है ॥ २-३ ॥

चतुर्थ खण्ड ब्रह्मका स्वरूप तथा उपनिषद्के अध्ययनका माहात्म्य, सूक्तके अनधिकारी तथा उसके उपदेशकी विधि

वह ब्रह्म तीनों तापोंसे रहित, छः कोशोंसे शून्य, षड्- ऊर्मियोंसे वर्जित, पञ्चकोशोंसे अतीत, षड्भावविकारोंसे रहित—इस प्रकार सबसे विलक्षण है। आध्यात्मिक, आधि- भौतिक और आधिदैविक—ये 'तीन ताप' हैं जो कर्ता- कर्म-कार्य, ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय और भोक्ता भोग भोग्य—इस प्रकार एक-एक त्रिविध हैं। चर्म, मास, रक्त, अस्थि, नसें और मज्जा—ये 'छः कोश (धातु)' हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य—ये 'छः शत्रुवर्ग' हैं। 'पञ्च कोश' हैं—अन्नमय,