भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 764, कुल 832 में से

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पृष्ठ 764

७०८ जाबालदर्शनोपनिषद् * [ खण्ड ९ स्थापित करे, तदनन्तर अपानवायुके स्थानसे उस वायुको तकके स्थानोमे पूर्ण कर दे । दोनो पैरोंमें, मूलाधारमे, नाभि- हटाकर कटिके दोनों भागोंमे ले जाय और वहाँसे जाँघोंके कन्दमे, हृदयके मध्यभागमे, कण्ठके मूलभागमे, तालुमे, भौंहों- मध्यभागमे ले जाय । जाँघोंमे दोनों घुटनोंमे, घुटनोंमे के मध्यभागमे, ललाटमे तथा मस्तकमे वायुको धारण करे । पिंडलियोंमे और पिंडलियोंसे पैरके अँगूठेमे ले जाकर उस यह वायु धारणात्मक प्रत्याहार है ॥ १०--१२ ॥ वायुको रोके । प्रत्याहार परायण महात्माओंने प्राचीन कालसे 'विद्वान् पुरुष एकाग्रचित्त हो देहसे आत्मबुद्धिको हटाकर इसीको प्रत्याहार कहा है ॥ १-९ ॥ उसे स्वय ही निर्द्वन्द्व एव निर्विकल्पस्वरूप अपने आत्मामे 'इस प्रकार प्रत्याहारके अभ्यासमे लगे हुए महात्मा पुरुषके स्थापित करे । वेदान्ततत्त्वके जाननेवाले महात्माओने इसीको सब पाप तथा जन्म मरणरूप व्याधि नष्ट हो जाती है। स्वस्तिकासन- दान्ल्पनिक प्रत्याहार बताया है । इस प्रकार प्रत्याहारका का आश्रय ले विद्वान् पुरुष स्थिरभावसे बैठे और नासिकाके अभ्यास करनेवाल पुरुषके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं दोनो छिद्रोमे वायुको भीतर खींचकर उसे पैरसे लेकर मस्तक- है ॥ १३-१४ ॥ ॥ सप्तम खण्ड समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम खण्ड धारणाके दो प्रकार 'सुव्रत ! अब मै पञ्च धारणाओका वर्णन करूँगा। अपने वायुके अगमे ईश्वरका तथा आकाशके अगमे सदाशिवका ध्यान शरीरके भीतर जो आकाश है, उसमें बाह्य आकाशकी धारणा करे* ॥१-६॥ करे । इसी प्रकार प्राणमें बाहरी वायुकी, जठरानलमे बाह्य 'अथवा मुनिश्रेष्ठ ! तुमसे एक दूसरी धारणाका वर्णन अग्निकी, शरीरगत जलके अगमें ही बाह्य जल-तत्त्वकी तथा करता हूँ । बुद्धिमान् पुरुष अन्तर्यामी पुरुष (आत्मा) मे शरीरके पार्थिव भागमे ही समस्त पृथ्वीकी धारणा करे और सबपर शासन करनेवाले बोधमय, आनन्दमय एव कल्याण- प्रत्येक तत्त्वकी धारणाके समय क्रमशः ह, य, र, व, ल- स्वरूप परमात्माकी प्रतिदिन धारणा करे । इससे सब पापोंकी इन बीज मन्त्रोका उच्चारण करे । यह धारणा सर्वश्रेष्ठ बतायी शुद्धि हो जाती है । कार्यस्वरूप ब्रह्मा आदिका अपने अपने गयी है, यह सब पापोका नाश करनेवाली है। पैरसे लेकर कारणमे लय करके सबके परम कारण, अनिर्वचनीय तथा घुटनेतकका भाग पृथिवीका अग माना गया है। घुटनेसे लेकर बुद्धिसे परे जो अव्यक्त परमात्मा हे, उनकी अपने आत्मामे गुदातकका भाग जलका अश बताया जाता है। गुदासे ऊपर धारणा करे-अर्थात् ये साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा ही अन्तर्यामी हृदयतकका भाग अग्निका अश है । हृदयसे ऊपर भौहोंके आत्माके रूपमे विराजमान है, ऐसा निश्चय करे तथा इस मध्यभागतक वायुका अग है तथा मस्तकका भाग आकाश- प्रकार आत्मधारणा करते समय अपने मनको सम्पूर्ण कलाओं- का अश बताया गया है । हे महाप्राज्ञ ! पृथिवीके भागमे ब्रह्माका, से युक्त प्रणवस्वरूप परमात्मामे ही स्थापित करे । साथ ही जलके अगमें भगवान् विष्णुका, अग्निके अगमे महादेवजीका, मनके द्वारा समस्त इन्द्रियोंको भी अपने अपने विषयोंसे हटाकर आत्मामे सयुक्त करे' ॥ ७--९ ॥ ॥ अष्टम खण्ड समाप्त ॥ ८ ॥ नवम खण्ड दो प्रकारके ध्यान तथा उनका फल 'अब मै ससार बन्धनका नाश करनेवाले ध्यानका प्रकार यह निश्चय करे कि वह परब्रह्म परमात्मा मै ही बतलाता हूँ । जो समस्त ससाररूपी रोगके एकमात्र औषध, हूँ ॥ १-२॥ ऊर्ध्वरेता, भयङ्कर नेत्रोंवाले, योगीश्वरोंके भी ईश्वर, विश्वरूप 'अथवा ध्यानका दूसरा प्रकार यो है--जो सत्यस्वरूप, सबका तथा महेश्वररूप हैं, उन ऋत एव सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका ईश्वर, ज्ञानरूप, आनन्दमय, अद्वितीय, अत्यन्त निर्मल, अपने आत्मरूपसे आदरपूर्वक चिन्तन करे । अपनी बुद्धिमें नित्य तथा आदि, मध्य एव अन्तसे रहित है, स्थूल प्रपञ्चसे

  • यह पञ्चभूतोंकी धारणा 'रामतापनीयोपनिषद्' पृष्ठ १३८ की टिप्पणीमें भूत-शुद्धिके नामसे दी गयी है, उसको पढ़ने- से भूतधारणाका स्वरूप स्पष्ट हो जायगा ।