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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

७०८ जाबालदर्शनोपनिषद् * [ खण्ड ९ स्थापित करे, तदनन्तर अपानवायुके स्थानसे उस वायुको तकके स्थानोमे पूर्ण कर दे । दोनो पैरोंमें, मूलाधारमे, नाभि- हटाकर कटिके दोनों भागोंमे ले जाय और वहाँसे जाँघोंके कन्दमे, हृदयके मध्यभागमे, कण्ठके मूलभागमे, तालुमे, भौंहों- मध्यभागमे ले जाय । जाँघोंमे दोनों घुटनोंमे, घुटनोंमे के मध्यभागमे, ललाटमे तथा मस्तकमे वायुको धारण करे । पिंडलियोंमे और पिंडलियोंसे पैरके अँगूठेमे ले जाकर उस यह वायु धारणात्मक प्रत्याहार है ॥ १०--१२ ॥ वायुको रोके । प्रत्याहार परायण महात्माओंने प्राचीन कालसे 'विद्वान् पुरुष एकाग्रचित्त हो देहसे आत्मबुद्धिको हटाकर इसीको प्रत्याहार कहा है ॥ १-९ ॥ उसे स्वय ही निर्द्वन्द्व एव निर्विकल्पस्वरूप अपने आत्मामे 'इस प्रकार प्रत्याहारके अभ्यासमे लगे हुए महात्मा पुरुषके स्थापित करे । वेदान्ततत्त्वके जाननेवाले महात्माओने इसीको सब पाप तथा जन्म मरणरूप व्याधि नष्ट हो जाती है। स्वस्तिकासन- दान्ल्पनिक प्रत्याहार बताया है । इस प्रकार प्रत्याहारका का आश्रय ले विद्वान् पुरुष स्थिरभावसे बैठे और नासिकाके अभ्यास करनेवाल पुरुषके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं दोनो छिद्रोमे वायुको भीतर खींचकर उसे पैरसे लेकर मस्तक- है ॥ १३-१४ ॥ ॥ सप्तम खण्ड समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम खण्ड धारणाके दो प्रकार 'सुव्रत ! अब मै पञ्च धारणाओका वर्णन करूँगा। अपने वायुके अगमे ईश्वरका तथा आकाशके अगमे सदाशिवका ध्यान शरीरके भीतर जो आकाश है, उसमें बाह्य आकाशकी धारणा करे* ॥१-६॥ करे । इसी प्रकार प्राणमें बाहरी वायुकी, जठरानलमे बाह्य 'अथवा मुनिश्रेष्ठ ! तुमसे एक दूसरी धारणाका वर्णन अग्निकी, शरीरगत जलके अगमें ही बाह्य जल-तत्त्वकी तथा करता हूँ । बुद्धिमान् पुरुष अन्तर्यामी पुरुष (आत्मा) मे शरीरके पार्थिव भागमे ही समस्त पृथ्वीकी धारणा करे और सबपर शासन करनेवाले बोधमय, आनन्दमय एव कल्याण- प्रत्येक तत्त्वकी धारणाके समय क्रमशः ह, य, र, व, ल- स्वरूप परमात्माकी प्रतिदिन धारणा करे । इससे सब पापोंकी इन बीज मन्त्रोका उच्चारण करे । यह धारणा सर्वश्रेष्ठ बतायी शुद्धि हो जाती है । कार्यस्वरूप ब्रह्मा आदिका अपने अपने गयी है, यह सब पापोका नाश करनेवाली है। पैरसे लेकर कारणमे लय करके सबके परम कारण, अनिर्वचनीय तथा घुटनेतकका भाग पृथिवीका अग माना गया है। घुटनेसे लेकर बुद्धिसे परे जो अव्यक्त परमात्मा हे, उनकी अपने आत्मामे गुदातकका भाग जलका अश बताया जाता है। गुदासे ऊपर धारणा करे-अर्थात् ये साक्षात् पूर्णब्रह्म परमात्मा ही अन्तर्यामी हृदयतकका भाग अग्निका अश है । हृदयसे ऊपर भौहोंके आत्माके रूपमे विराजमान है, ऐसा निश्चय करे तथा इस मध्यभागतक वायुका अग है तथा मस्तकका भाग आकाश- प्रकार आत्मधारणा करते समय अपने मनको सम्पूर्ण कलाओं- का अश बताया गया है । हे महाप्राज्ञ ! पृथिवीके भागमे ब्रह्माका, से युक्त प्रणवस्वरूप परमात्मामे ही स्थापित करे । साथ ही जलके अगमें भगवान् विष्णुका, अग्निके अगमे महादेवजीका, मनके द्वारा समस्त इन्द्रियोंको भी अपने अपने विषयोंसे हटाकर आत्मामे सयुक्त करे' ॥ ७--९ ॥ ॥ अष्टम खण्ड समाप्त ॥ ८ ॥ नवम खण्ड दो प्रकारके ध्यान तथा उनका फल 'अब मै ससार बन्धनका नाश करनेवाले ध्यानका प्रकार यह निश्चय करे कि वह परब्रह्म परमात्मा मै ही बतलाता हूँ । जो समस्त ससाररूपी रोगके एकमात्र औषध, हूँ ॥ १-२॥ ऊर्ध्वरेता, भयङ्कर नेत्रोंवाले, योगीश्वरोंके भी ईश्वर, विश्वरूप 'अथवा ध्यानका दूसरा प्रकार यो है--जो सत्यस्वरूप, सबका तथा महेश्वररूप हैं, उन ऋत एव सत्यस्वरूप परब्रह्म परमात्माका ईश्वर, ज्ञानरूप, आनन्दमय, अद्वितीय, अत्यन्त निर्मल, अपने आत्मरूपसे आदरपूर्वक चिन्तन करे । अपनी बुद्धिमें नित्य तथा आदि, मध्य एव अन्तसे रहित है, स्थूल प्रपञ्चसे

  • यह पञ्चभूतोंकी धारणा 'रामतापनीयोपनिषद्' पृष्ठ १३८ की टिप्पणीमें भूत-शुद्धिके नामसे दी गयी है, उसको पढ़ने- से भूतधारणाका स्वरूप स्पष्ट हो जायगा ।

खण्ड १०] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७०९ सर्वथा परे है, आकाशसे भिन्न है, स्पर्शमें आने योग्य वायुसे भी विलक्षण है, नेत्रोंसे दीख पड़नेवाले अग्नितत्त्वसे भी सर्वथा भिन्न है, रसस्वरूप जल और गन्धस्वरूप पृथिवीसे भी सर्वथा विलक्षण है, जिसे प्रत्यक्षादि प्रमाणोंद्वारा नहीं जाना जा सकता, जो अनुपम है, देहसे अतीत है, उस सच्चिदानन्द- स्वरूप एव अन्तररहित परब्रह्मका अपने आत्माके रूपमें ध्यान करे, बुद्धिके द्वारा यह निश्चय करे कि वह परब्रह्म परमात्मा मैं ही हूँ। इस प्रकार किया हुआ निर्विशेषका ध्यान मोक्षका साधक होता है ॥ ३-५ ॥ 'इस तरह ध्यानके अभ्यासमें लगे हुए महात्मा पुरुषको क्रमशः वेदान्तवर्णित ब्रह्मतत्त्वका विशेष ज्ञान हो जाता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है' ॥ ६ ॥ ॥ नवम खण्ड समाप्त ॥ ९ ॥ दशम खण्ड समाधि एवं उसका फल 'अब मैं संसार-बन्धनका नाश करनेवाली समाधिका वर्णन करूँगा। परमात्मा और जीवात्माकी एकताके विषयमें निश्चयात्मक बुद्धिका उदय होना ही समाधि है। यह आत्मा नित्य, सर्व- व्यापी, कूटस्थ—एकरस एव सब प्रकारके दोषोंसे रहित है। यह एक होते हुए भी मायाजनित भ्रमके कारण भिन्न भिन्न प्रतीत होता है, स्वरूपतः उसमें कोई भेद नहीं है। अतः केवल अद्वैत ही सत्य है। प्रपञ्च या संसार नामकी कोई वस्तु नहीं है। जैसे आकाश ही घटाकाश और मठाकाशके नामसे पुकारा जाता है, उसी प्रकार अज्ञानी पुरुषोंने एक ही परमात्माको जीव और ईश्वर—इन दो रूपोंमें कल्पित कर लिया है। मैं न देह हूँ, न प्राण हूँ न इन्द्रियसमुदाय हूँ और न मन ही हूँ, सदा साक्षीरूपमें स्थित होनेके कारण मैं एकमात्र शिवस्वरूप परमात्मा हूँ—मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकारकी जो निश्चयात्मिका बुद्धि है, वही यहाँ समाधि कहलाती है ॥ १-५ ॥ 'मैं वह परमात्मा ही हूँ, संसार-बन्धनमें बँधा हुआ जीव नहीं हूँ, इसलिये मुझसे भिन्न किसी भी वस्तुकी किसी भी कालमे सत्ता नहीं है। जैसे फेन और तरङ्ग आदि समुद्रसे ही उठते हैं और पुनः समुद्रमे ही लीन हो जाते हैं, उसी प्रकार यह जगत् मुझमें ही उत्पन्न और विलीन होता रहता है। अतः सृष्टिका कारणभूत समष्टि मन भी मुझसे पृथक् नहीं है। यह जगत् और माया भी मुझसे अलग कोई अस्तित्व नहीं रखते। इस प्रकार जिस पुरुषको ये परमात्मा अपने आत्मा- रूपसे अनुभव होने लगते हैं, वह परम पुरुषार्थस्वरूप साक्षात् परमामृतमय परमात्मभावको प्राप्त हो जाता है। जब योगीके मनमें सर्वत्र व्यापक आत्मचैतन्यका अपरोक्ष अनुभव होने लगता है, तब वह स्वयं परमात्मस्वरूपमे प्रतिष्ठित हो जाता है। जब ज्ञानी महात्मा सब भूतोंको अपनेमें ही देखता है और अपनेको ही सम्पूर्ण भूतोंमें प्रतिष्ठित देखता है, तब वह साक्षात् ब्रह्म हो जाता है। जब समाधिमे स्थित पुरुष परमात्मासे एकीभूत होकर अपनेसे भिन्न किसी भी भूतको नहीं देखता, तब वह केवल परमात्म- स्वरूपसे प्रतिष्ठित होता है। जब मनुष्य केवल अपने आत्मा- को ही परमार्थ—सत्यस्वरूप देखता है और सम्पूर्ण जगत्‌को मायाका विलासमात्र मानता है, तब उसे परमानन्दकी प्राप्ति हो जाती है।' महामुनि भगवान् दत्तात्रेयजी इस प्रकार उपदेश देकर मौन हो गये तथा मुनिवर सांकृति उस उपदेशको हृदयङ्गम करके अपने यथार्थ स्वरूपसे स्थित हो अत्यन्त निर्भय स्थितिमे पहुँचकर सुखसे रहने लगे ॥ ६-१३ ॥ ॥ दशम खण्ड समाप्त ॥ १० ॥ ॥ सामवेदीय जाबालदर्शनोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः .!! शान्तिः. !!! प्रथम खण्ड भगवान् शंकरका शुकदेवजीको उपदेश 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके षडङ्गन्यास

अब हम रहस्योपनिषद्की व्याख्या करते हैं। एक समय देवर्षिगणोंने पितामह ब्रह्माजीकी पूजा की और प्रणाम करके उनसे पूछा-‘भगवन् ! हमें गूढ उपनिषत्तत्त्व बतलायें।' तब ब्रह्माजीने कहा—पहले एक समय महातेजस्वी, समस्त वेदोंके ज्ञाता तपोनिधि वेदव्यासने पार्वतीके साथ भगवान् शङ्करको दण्डवत् प्रणाम करके, हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना की थी—॥ १॥ श्रीवेदव्यासजीने कहा—‘देव-देव, महाप्राज्ञ, जीवके बन्धनको काटनेका दृढ व्रत धारण करनेवाले प्रभो ! मेरे पुत्र शुकदेवके वेदाध्ययनके लिये किये जानेवाले उपनयन-संस्कार- कर्ममें यह प्रणव एवं गायत्री-मन्त्रके उपदेशका समय आ गया है। अतः हे जगद्गुरो ! आप उन्हें ब्रह्म-प्रणव एवं परमात्म-तत्त्वका उपदेश करें' ॥ २-३ ॥ भगवान् शङ्करने कहा—'मेरे द्वारा कैवल्यस्वरूप साक्षात् सनातन परब्रह्मका उपदेश दिये जानेपर तुम्हारा पुत्र वैराग्य- पूर्वक सब कुछ छोड़कर स्वतः प्रकाशस्वरूपको प्राप्त कर लेगा। तात्पर्य यह कि मेरे द्वारा पुत्रको ब्रह्मज्ञानका उपदेश करानेका आग्रह करोगे तो पुत्र विरक्त हो जायगा' ॥ ४ ॥ श्रीवेदव्यासजीने प्रार्थना की—'महेश्वर ! मेरे पुत्रका जो भी होना हो, सो हो किंतु इस उपनयन-कर्मके समय आपकी कृपासे, आपके द्वारा ब्रह्मज्ञानका उपदेश पाकर मेरा पुत्र शीघ्र ही सर्वज्ञ हो जाय । आपकी कृपासे वह चारो प्रकारके ( सायुज्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सालोक्य ) मोक्षोंको प्राप्त करे' ॥ ५-६ ॥

श्रीवेदव्यासजीकी ऐसी प्रार्थना सुनकर भगवान् शङ्कर प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवर्षियोंकी सभामें उपदेश देनेके लिये भगवती पार्वतीके साथ दिव्य आसनपर विराजमान हुए । तब कृत कृत्य ( सफलमनोरथ ) श्रीशुकदेवजीने आकर अत्यन्त भक्तिपूर्वक उन ( भगवान् शिव ) से प्रणवकी दीक्षा ग्रहण की और फिर उन भगवान् शङ्करसे यह प्रार्थना की— ‘देवाधिदेव, सर्वज्ञ, सच्चिदानन्दस्वरूप, उमारमण, भूत- नाथ, दयानिधे ! आप प्रसन्न हों। आपने मुझे प्रणवके अन्तर्गत ( प्रत्यगात्मारूप ) एवं उससे परे स्थित परम ब्रह्मका उपदेश तो कर दिया अब मैं विशेषतः 'तत्त्वमसि', 'प्रज्ञानं ब्रह्म' प्रभृति चारो महावाक्योंका षडङ्गन्यास क्रमपूर्वक सुनना चाहता हूँ। सदाशिव प्रभो ! अब कृपा करके आप उनका रहस्य बतलायें' ॥ ७-१६ ॥ भगवान् सदाशिव बोले—'हे ज्ञाननिधि शुकदेवजी ! मुने ! तुम अत्यन्त बुद्धिमान् हो। तुम्हें अनेको साधुवाद । तुमने वेदोंमें छिपे हुए, पूछने योग्य रहस्यको ही पूछा है; अतः रहस्योपनिषद् नामसे प्रसिद्ध इस गूढ रहस्यमय उपदेशका षडङ्गन्यास सहित वर्णन किया जाता है, जिसके भली प्रकार जान लेने मात्रसे साक्षात् मोक्ष प्राप्त होता है, इसमें सन्देह नहीं। फिर ( नियम यह है कि ) गुरु अङ्गहीन वाक्योंका उपदेश न करे । सभी महावाक्योंका उपदेश उनके षडङ्गके साथ ही करे। जैसे चारों वेदोंमें उपनिषद्भाग (ज्ञानकाण्ड) शिरःस्थानीय ( सर्वोत्तम ) है, वैसे ही समस्त उपनिषदोंमें यह रहस्यो-

खण्ड २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७११


पनिषद् शिरःस्थानीय ( सर्वोत्तम ) है। जिस विचारवान्ने रहस्योपनिषद्में उपदिष्ट ब्रह्मका ध्यान किया है, उसे पुण्यके हेतुभूत तीर्थ-स्नान, मन्त्रजप, वेद-पाठ तथा जपादिसे क्या प्रयोजन है। महावाक्योंके अर्थको सौ वर्षोंतक विचार करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह उनके ऋष्यादि-स्मरण तथा ध्यानपूर्वक एक बारके जपसे ही प्राप्त हो जाता है ॥ १२-१७॥

[ ऋष्यादि षडङ्गका पाठ करके पुनः उनका मस्तकादिमे न्यास करना चाहिये। वह इस प्रकार है — ]

ॐ अस्य श्रीमहावाक्यमहामन्त्रस्य हस ऋषि । अव्यक्तगायत्री छन्दः। परमहंसो देवता । हं बीजम् । स शक्तिः । सोऽह कीलकम्। मम परमहंसप्रीत्यर्थे महावाक्यजपे विनियोग ।

[ निम्न प्रकारसे दोनों हाथोंकी निर्दिष्ट अंगुलियोंका स्पर्श करते हुए न्यास करना चाहिये—]

‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ अङ्गुष्ठाभ्या नम । ‘नित्यानन्दो ब्रह्म’ तर्जनीभ्या स्वाहा। ‘नित्यानन्दमय ब्रह्म’ मध्यमाभ्या वषट् । ‘यो वै भूमा’ अनामिकाभ्या हुम् । ‘यो वै भूमाधिपतिः’ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म’ करतलकरपृष्ठाभ्या फट् ।

[ फिर नीचेकी रीतिसे हृदयादिको स्पर्श करते हुए न्यास करना चाहिये । ]

‘सत्य ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ हृदयाय नम । ‘नित्यानन्दो ब्रह्म’ शिरसे स्वाहा। ‘नित्यानन्दमय ब्रह्म’ शिखायै वषट् । ‘यो वै भूमा’ कवचाय हुम् । ‘यो वै भूमाधिपति.’ नेत्रत्रयाय वौषट् । ‘एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म’ अस्त्राय फट् । ‘भूर्भुव सुवरोम्’ इस मन्त्रसे दिगवन्ध करना चाहिये।

ध्यान नित्यानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् । एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरु तं नमामि ॥*

॥ प्रथम खण्ड समाप्त ॥ १ ॥


द्वितीय खण्ड

‘तत्त्वमसि’ महावाक्यके प्रत्येक पदके पृथक्-पृथक् षडङ्गन्यास

महावाक्य चार हैं— १—‘ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म’ । २—‘ॐ अहं ब्रह्मास्मि’ । ३-‘ॐ तत्त्वमसि’ और ४-‘ॐ अयमात्मा ब्रह्म’। इनमेंसे ‘तत्त्वमसि’ इस अभेदवाचक (जीवब्रह्मके अभेदके प्रतिपादक) महावाक्यका जो लोग जप करते हैं, वे भगवान् शङ्करकी सायुज्यमुक्तिके अधिकारी होते हैं।

[‘तत्त्वमसि’ महावाक्यके ‘तत्’ पदरूप महामन्त्रके ऋषि आदिका स्मरण निम्नरूपसे करके उनका यथास्थान न्यास करना चाहिये---]

तत्पदमहामन्त्रस्य परमहस ऋषि । अव्यक्तगायत्री छन्द । परमहसो देवता । ह बीजम् । स शक्ति । सोऽहं कीलकम् । मम सायुज्यमुक्त्यर्थे जपे विनियोग ।

[ करन्यास ] ‘तत्पुरुषाय’ अङ्गुष्ठाभ्या नमः। ‘ईशानाय’ तर्जनीभ्या स्वाहा। ‘अघोराय’ मध्यमाभ्या वषट् । ‘सद्योजाताय’ अनामिकाभ्या हुम् । ‘वामदेवाय’ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ‘तत्पुरुषेशानाघोरसद्योजातवामदेवेभ्यो नम’ करतलकरपृष्ठाभ्या फट् ।

इन्हीं करन्यासके मन्त्रोंसे हृदयादिन्यास करके ‘भूर्भुव. सुवरोम्’ इस मन्त्रसे दिग्वन्ध करना चाहिये।

ध्यान ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यादतीतं शुद्ध बुद्धं मुक्तमप्यव्ययं च। सत्यं ज्ञानं सच्चिदानन्दरूपं ध्यायद्वेदं तन्महो भ्राजमानम् ॥†


* नित्यानन्दरूप, परमसुखदायी, कैवल्यरूप, ज्ञानमूर्ति, द्वन्द्वोंसे परे, आकाशके समान व्यापक एव निर्लेप, ‘तत्त्वमसि’ आदि महावाक्योंके लक्ष्य, एक, नित्य, निर्मल, स्थिर, सम्पूर्ण बुद्धियोंके साक्षिरूपमें अवस्थित, षड्भावविकारोंसे अतीत, त्रिगुणोंसे रहित, उन परमब्रह्मस्वरूप सद्गुरुदेवको हम नमस्कार करते हैं। † ज्ञानके साधन एव ज्ञानके विषय, तथा साथ ही ज्ञानकी गम्यतासे परे, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, अव्यय, सत्यस्वरूप, ज्ञान-स्वरूप एव सच्चिदानन्दस्वरूप प्रकाशमय रूपमें उस दिव्य प्रकाशका ध्यान करे ।

७१२ * शुकरहस्योपनिषद् * [ खण्ड ३ [ उसी 'तत्त्वमसि' महावाक्यके 'त्वम्' पदके ऋषि [ अन्तमें महावाक्यके अन्तिम तीसरे 'असि' पदके ऋषि आदिका जप निम्न प्रकारसे करके उसका न्यास करना चाहिये ।] आदिका एव न्यास-मन्त्रोंका उल्लेख किया जाता है ।] त्वंपदमहामन्त्रस्य विष्णुर्ऋषि । गायत्री छन्द । 'असि'पदमहामन्त्रस्य मन ऋषि' । गायत्री छन्द. । परमात्मा देवता । ऐं बीजम् । क्लीं शक्ति । सौ. कीलकम् । अर्धनारीश्वरो देवता । अव्यक्तादिर्बीजम् । नृसिंह. शक्तिः । मम मुक्त्यर्थे जपे विनियोग. । परमात्मा कीलकम् । जीवब्रह्मैक्यार्थे जपे विनियोगः । 'वासुदेवाय' अङ्गुष्ठाभ्या नम. । 'पृथ्विद्व्यणुकाय' अङ्गुष्ठाभ्या नम. । 'सङ्कर्षणाय' तर्जनीभ्या स्वाहा । 'अब्द् व्यणुकाय' तर्जनीभ्या स्वाहा । 'प्रद्युम्नाय' मध्यमाभ्या वषट् । 'तेजोद्व्यणुकाय' मध्यमाभ्या वषट् । 'अनिरुद्धाय' अनामिकाभ्या हुम् । 'वायुद्व्यणुकाय' अनामिकाभ्या हुम् । 'वासुदेवाय' कनिष्ठिकाभ्या वौषट् । 'आकाशद्व्यणुकाय' कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । 'वासुदेवसकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धेभ्य ' करतलकर- 'पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशद्व्यणुकेभ्य.' पृष्ठाभ्या फट् । करतलकरपृष्ठाभ्या फट् । [ यह करन्यास करके ] इसी मन्त्रसे हृदयादिन्यास [ इस मन्त्रसे करन्यास करके इसी प्रकार हृदयादि- करना चाहिये । 'भूर्भुव सुवरोम्' इस मन्त्रसे दिग्वन्ध करना न्यास करे । ] 'भूर्भुव. सुवरोम्' इस मन्त्रसे दिग्रन्ध कर ले । चाहिये । ध्यान ध्यान जीवो ब्रह्मेति वाक्यार्थं यावदस्ति मन.स्थिति । जीवत्त्व सर्वभूताना सर्वत्राखण्डविग्रहम् । ऐक्यं तत्त्वं लये कुर्वन्ध्यायेदसिपदं सदा ॥† चित्ताहङ्कारयन्तार जीवाख्य त्वपद भजे ॥* इस प्रकार महावाक्यके पडङ्ग (-न्यास ) बतलाये गये । , ॥ द्वितीय खण्ड समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय खण्ड चारों महावाक्योंकी पदविन्यासपूर्वक व्याख्या अब रहस्योपनिषद्के विभागके अनुसार वाक्योंका अर्थ देहमे परिपूर्ण परमात्मा बुद्धिके साक्षिरूपसे अवस्थित होकर बतलानेवाले श्लोक कहे जाते हैं । [ वाक्यार्थ श्लोकोंमे है, स्फुरित होनेपर 'अह' कहे जाते हे । स्वतः पूर्ण परात्मा यहाँ और श्लोकोंका भाव इस प्रकार है-] जिसके द्वारा ( प्राणी ) 'ब्रह्म' शब्दसे वर्णित है, तथा 'अस्मि' ( मैं हूँ ) यह पद उनके देखता है, इस जगत्के विषयोंको सुनता है, सूँघता है, वाणी- साथ अपनी एकताका बोध कराता है, अतः मे ब्रह्मस्वरूप द्वारा कहता है और स्वादिष्ट या अस्वादिष्टको पहचानता है ही हूँ ॥ ३-४ ॥ ( रसज्ञान करता है ), उसे 'प्रज्ञान' कहा गया है । चतुर्मुख [ 'तत्त्वमसि' वाक्यमे ] सृष्टिके पूर्व एकमात्र द्वैतकी सत्ता- ब्रह्माजी, देवराज इन्द्र, देवगण, मनुष्य एव घोड़े, गाय प्रभृति से रहित, नाम-रूपहीन सत्ता थी और अब भी वह सत्ता वैसी पशुओंमे एक ही चेतनतत्त्व ब्रह्म है । वही प्रज्ञान ( ज्ञानरूप ) ही है- 'तत्' पदसे यह प्रतिपादित होता है । उपदेश श्रवण ब्रह्म मुझमें भी है ॥ १-२ ॥ करनेवाले शिष्यका जो देह और इन्द्रियोंसे अतीतस्वरूप है, ब्रह्मादिचारो प्राप्त करनेके अधिकारी इस ( मानव ) वही यहाँ महावाक्यके 'त्व' पदसे वर्णित है तथा महावाक्यके

  • जो सम्पूर्ण प्राणियोंके जीव-तत्त्वका बोधक है, जिसकी मूर्ति सर्वत्र अखण्डित है और जो चित्त तथा अहङ्कारका नियन्त्रणकर्ता है, उस 'त्वम्' पदके द्वारा बोध्य जीव-नामक परमेश्वरका हम स्मरण करते हैं। † जबतक मनकी स्थिति है ( जबतक मनोनाश नहीं हो जाता ), तबतक 'जीव ब्रह्म ही ह', इस वाक्यार्थके रूपमें 'असि' पदका चिन्तन करे, अर्थात् 'असि' पद जीव और ब्रह्मकी एकता बतला रहा है- इस भावका मनन करता रहे । फिर यों करते-करते जब मनका लय हो जाय, तब जीव और ब्रह्म दोनोंकी एकतारूप तत्त्वका अनुभव करते हुए 'असि' पदके तात्पर्यको सदा ध्यानके द्वारा प्रत्यक्ष करता रहे ।

खण्ड ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७१३ 'असि' पदके द्वारा उन 'तत्' एव 'त्वम्' पदोंके बोध्य ब्रह्म और जीवकी एकताका ग्रहण कराया गया है । उस एकत्वका अनुभव करो । [ 'अयमात्मा ब्रह्म' इस महावाक्यमें ] 'अयम्' पदके द्वारा स्वतःप्रकाश अपरोक्ष—नित्य प्रत्यक्ष स्वरूपका वर्णन हुआ है । अहंकारसे लेकर शरीरपर्यन्तको प्रत्यगात्मा बताया गया है । दिखायी पड़नेवाले सम्पूर्ण जगत्में जो व्यापक तत्त्व है, वही 'ब्रह्म' शब्दसे वर्णित है । वह ब्रह्म स्वतःप्रकाश, आत्मस्वरूप है ॥ ५-८ ॥ "अनात्मामें आत्मदृष्टि करनेसे मैं अज्ञानकी निद्रामें पड़कर 'मैं' और 'मेरे' की प्रतीति करानेवाली स्वप्नावस्थामें आ पहुँचा था। श्रीगुरुदेवके द्वारा महावाक्यके पदोंका स्पष्ट उपदेश दिये जानेपर स्वरूपरूपी सूर्यके उदित होनेसे मैं जग गया हूँ । [ऐसा अनुभव करके शुकदेवजी मनन आरम्भ करते हैं—] महावाक्यके अर्थको समझनेके लिये वाच्य और लक्ष्य—इन दोनों ही अर्थोंकी प्रणालीका अनुसरण करना चाहिये । वाच्य-सरणीके अनुसार भौतिक इन्द्रिय आदि भी 'त्वं' पदके वाच्य होते हैं, किंतु लक्ष्यार्थ वही है, जो इन्द्रियादिसे अतीत विशुद्ध चेतन है। इसी प्रकार 'तत्' पदका वाच्य तो ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व आदि गुणोंसे विशिष्ट परमात्मा है, किंतु लक्ष्यार्थ है—केवल सच्चिदानन्दमय ब्रह्म । अतः यहाँ भाग-त्याग लक्षणासे 'असि' पदके द्वारा उक्त दोनों पदोंके लक्ष्यार्थको ही लेकर जीव और ब्रह्मकी एकता बतायी जाती है। 'त्वं' और 'तत्'—ये कार्य (शरीर) तथा कारण (माया) रूप उपाधिके द्वारा ही दो हैं । उपाधि न रहनेपर दोनों ही एकमात्र सच्चिदानन्दस्वरूप हैं । जगत्में भी 'यह वही देवदत्त है (जो अमुक स्थानपर अमुक समयमें मिला था )—इस वाक्यमें 'यह' और 'वह' इन दोनों वचनोंके हेतुभूत देश और कालका अन्तर छोड़ देनेपर देवदत्त एक ही निश्चित होता है । यह जीव कार्य ( शरीर ) की उपाधिसे युक्त है और ईश्वर कारण ( माया ) की उपाधिसहित है । कार्य एव कारणरूपको छोड़ देनेपर पूर्ण ज्ञानस्वरूप बच रहता है ॥९-१२॥ पहले गुरुके द्वारा श्रवण करे । अनन्तर मनन किया जाय । फिर निदिध्यासन करे । यह पूर्णबोधका कारण होता है। दूसरी विद्याओंका सम्यक् ज्ञान भी निश्चय ही नश्वर है, किंतु ब्रह्मविद्याका सम्यक् ज्ञान स्थिर ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है । भगवान् ब्रह्माजीकी आज्ञा है कि गुरु 'षडङ्ग' सहित महावाक्योंका उपदेश करे । केवल महावाक्योंका उपदेश न करे ॥ १३-१५ ॥ भगवान् शङ्कर बोले—'मुनिश्रेष्ठ शुकदेव ! तुम्हारे ब्रह्मवेत्ता पिता व्यासजीकी प्रार्थनासे प्रसन्न होकर मैंने तुम्हें इस रहस्योपनिषद्का उपदेश किया है । इसमें सच्चिदानन्द- स्वरूप ब्रह्मका उपदेश है। तुम उसका नित्य ध्यान करते हुए जीवन्मुक्त होकर विचरण करोगे । जो स्वर ( प्रणव ) वेदके प्रारम्भमें उच्चारण किया जाता है और जो वेदान्तमें ( ज्ञानकाण्डमें ) प्रतिष्ठित है, उसकी प्रकृति ( त्रिमात्रा ) में लीन होनेपर जो उससे परे ( अर्धमात्रास्वरूप ) अवस्थित है, वही महेश्वर ( परब्रह्मका स्वरूप ) है' ॥ १६-१८ ॥ भगवान् शङ्करके द्वारा इस प्रकार उपदेश दिये जानेपर शुकदेवजी सम्पूर्ण जगत्के साथ तन्मयताकाको प्राप्त हो गये । फिर उठकर भगवान् शङ्करको प्रणाम करके सम्पूर्ण परिग्रहको छोड़कर वे मानो परब्रह्मके समुद्रमे तैर रहे हों—इस प्रकार आनन्दमग्न होकर वहाँसे चल पड़े । पुत्रको जाते देखकर महामुनि कृष्णद्वैपायन व्यासजीने उनके पीछे चलते हुए पुत्र-वियोगसे कातर होकर उन्हें पुकारा । उस समय जगत्के समस्त जड-चेतन पदार्थोंने ( व्यासजीकी पुकारका ) प्रत्युत्तर दिया । सत्यवतीनन्दन भगवान् व्यासने उस उत्तरको सुनकर पुत्रको सकल—जगदात्माकार देखकर अपने पुत्र शुकदेवजीके साथ ( समान ) परमानन्द प्राप्त किया ( उन्हें परम प्रसन्नता हुई ) ॥ १९-२२ ॥ जो गुरुकी कृपासे इस रहस्योपनिषद्का अध्ययन करता है—इसे समझ लेता है, वह सभी पापोंसे छूटकर साक्षात् कैवल्यपदका उपभोग करता है, साक्षात् कैवल्यपदका उपभोग करता है ॥ २३ ॥ ॥ तृतीय खण्ड समाप्त ॥ ३ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय शुकरहस्योपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय त्रिपाद्विभूतिमहा नारायणोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्यो॑ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! पूर्वकाण्ड प्रथम अध्याय पाद-चतुष्टयके स्वरूपका निर्णय परमतत्त्वके रहस्यको जाननेकी इच्छासे श्रीब्रह्माजीने देवताओंके वर्षोसे सहस्र वर्षांतक तपस्या की । सहस्र देववर्ष व्यतीत होनेपर ब्रह्माजीकी अत्यन्त उग्र एव तीव्र तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् महाविष्णु प्रकट हुए । ब्रह्माजीने उनसे कहा—'भगवन् ! मुझे परमतत्त्वका रहस्य बतलाइये, क्योंकि परमतत्त्वके रहस्यको बतलानेवाले एकमात्र आप ही हैं, दूसरा कोई नहीं है। यह किस प्रकार ? ( यदि आप यह पूछें तो ) वही बतलाता हूँ । आप ही सर्वज्ञ हैं। आप ही सर्वशक्तिमान् हैं। आप ही सबके आधार हैं। आप ही सब कुछ बने हुए हैं। आप ही सबके स्वामी हैं। आप ही समस्त कार्योंके प्रवर्तक हैं। आप ही सबके पालनकर्ता हैं। आप ही सबके निवर्तक (विनाशक) हैं। आप ही सत् एव असत्स्वरूप हैं। आप ही सत् एव असत्से विलक्षण हैं। आप ही भीतर और बाहर—सर्वत्र व्यापक हैं। आप ही अत्यन्त सूक्ष्मतर हैं। आप ही महान्‌से भी अत्यन्त महान् हैं। आप ही सबकी मूल-अविद्याके विनाशक हैं। आप ही अविद्यामें विहार करनेवाले भी हैं। आप ही अविद्या- को धारण करनेवाले अधिष्ठान हैं। आप ही विद्या (ज्ञान) द्वारा जाने जाते हैं। आप ही विद्यास्वरूप हैं। आप ही विद्यासे परे भी हैं। आप ही समस्त कारणोंके कारण हैं। आप ही समस्त कारणोंकी समष्टि (समुदाय) हैं। आप ही समस्त कारणोंकी व्यष्टि (पृथक्-पृथक् कारण) हैं। आप ही अखण्ड आनन्द- रूप हैं। आप ही पूर्णानन्द हैं। आप ही निरतिशय आनन्द- स्वरूप हैं। आप ही तुरीय-तुरीय (तुरीयावस्थाके तुरीय) हैं। आप ही तुरीयातीत हैं। अनन्त उपनिषदोंद्वारा आप ही अन्वेषणीय हैं। निखिल शास्त्रोंके द्वारा आप ही ढूँढने योग्य हैं। आप ही ब्रह्मा (मै), शङ्करजी, इन्द्र आदि सब देवताओं तथा समस्त तन्त्रशास्त्रोंद्वारा अन्वेषण करने योग्य हैं। सभी मुमुक्षुओंद्धारा आप ही ढूँढे जाने योग्य हैं। सभी अमृतमय (मुक्त) पुरुषोंद्वारा आप ही खोजने योग्य हैं। आप ही अमृतमय हैं, आप ही अमृतमय हैं, आप ही अमृतमय हैं। आप ही सर्वरूप हैं, आप ही सर्वरूप हैं, आप ही सर्वरूप हैं। आप ही मोक्षस्वरूप है, आप ही मोक्षदाता हैं तथा मोक्षके सम्पूर्ण साधनस्वरूप भी आप ही हैं। आपके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। आपके अतिरिक्त जो कुछ भी प्रतीत होता है, वह सब (बुद्धिद्वारा ) बाधित (अतत्त्व—मिथ्या) है—यह निश्चित है। इसलिये आप ही वक्ता हैं, आप ही गुरु हैं, आप ही पिता हैं, आप ही सबके नियन्ता हैं, आप ही सर्वस्वरूप हैं और आप ही सदा ध्यान करने योग्य हैं'—यह सुनिश्चित है' ॥ १ ॥ परमतत्त्वरूप भगवान् महाविष्णु 'साधु-साधु' कहकर प्रशंसा

अध्याय १ ] \

अध्याय १ ]
* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *
७१५


[बायाँ स्तम्भ]

करते हुए (साधुवाद देते हुए) अत्यन्त प्रसन्न होकर ब्रह्माजीसे बोले—"सम्पूर्ण परमतत्त्वका रहस्य तुम्हें बतलाता हूँ। सावधान होकर सुनो। ब्रह्माजी ! अथर्ववेदकी देवदर्शी नामक शाखामें परमतत्त्वरहस्य नामक अथर्ववेदीय महानारायणोपनिषद्में प्राचीन कालसे गुरु-शिष्य-संवाद अत्यन्त सुप्रसिद्ध होनेसे सर्वज्ञात है। पहले (अतीत कल्पमें) उसके स्वरूपको जाननेसे सभी महत्तम पुरुष ब्रह्मभावको प्राप्त हुए हैं। जिसके सुननेसे सभी बन्धन समूल नष्ट हो जाते हैं, जिसके जानने सभी रहस्य ज्ञात हो जाते हैं, उसका स्वरूप कैसा है, यह बतलाते हैं—॥ २-३ ॥

"शान्त, अप्रमत्त, अत्यन्त विरक्त, अत्यन्त पवित्र, गुरु- भक्त, तपस्वी शिष्यने ब्रह्मनिष्ठ गुरुको प्राप्तकर, उनकी प्रदक्षिणा की, भूमिपर लेटकर उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया और दोनों हाथोंकी अञ्जलि बाँधकर, विनयपूर्वक समीप जाकर कहा—'भगवन् ! गुरुदेव ! मुझे परमतत्त्वके रहस्यको खोलकर बतलाइये।' अत्यन्त आदरपूर्वक हर्षसे शिष्यकी बहुत प्रशंसा करके गुरु बोले—'परमतत्त्व-रहस्योपनिषद्‌का क्रम बतला रहा हूँ, सावधानीसे सुनो—

'ब्रह्म कैसा है ? (भूत, भविष्य, वर्तमान) तीनों कालोंसे जो अबाधित है—किसी भी कालमें जिसका अभाव नहीं होता, वह ब्रह्म है। समस्त कालोंसे अबाधित (अनवच्छिन्न) तत्त्व ब्रह्म है। ब्रह्म सगुण एवं निर्गुण दोनों है। ब्रह्म आदि, मध्य एवं अन्तसे रहित है। यह सब (दृश्यादृश्य जगत्) ब्रह्म है। ब्रह्म मायातीत है और गुणातीत है। ब्रह्म अनन्त, प्रमाणोंसे अज्ञेय, अखण्ड और परिपूर्ण है। अद्वितीयरूप, परमानन्द, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्यस्वरूप, व्यापक, भेदहीन एव अपरिच्छिन्न है। ब्रह्म सच्चिदानन्दस्वरूप एव स्वतःप्रकाश है। ब्रह्म मन-वाणीसे अतीत है। ब्रह्म सम्पूर्ण प्रमाणोंसे परे है। अगणित वेदान्तों (उपनिषदों) द्वारा ब्रह्म ही जानने योग्य है। देशसे, कालसे तथा वस्तुसे ब्रह्म परिच्छेदहीन (असीमित) है। ब्रह्म सब प्रकार परिपूर्ण है। ब्रह्म तुरीयस्वरूप, निराकार एवं अद्वितीय है। ब्रह्म द्वैतके साथ अवर्णनीय है। ब्रह्म प्रणवस्वरूप है। ब्रह्म प्रणवात्मारूपसे कहा गया है। प्रणवप्रभृति समस्त मन्त्रोंका स्वरूपभूत ब्रह्म है। ब्रह्मके चार पाद हैं ॥ ४-५ ॥

'ब्रह्मके वे चार पाद कौन-कौन हैं?—अविद्यापाद, सुविद्या- पाद, आनन्दपाद और तुरीयपाद—ये ही वे चार पाद हैं। तुरीयपाद तुरीयावस्थाका भी तुरीय तथा तुरीयातीत है। इन


[दायाँ स्तम्भ]

चारों पादोंमें भेद क्या है? अविद्यापाद प्रथम पाद है, विद्यापाद दूसरा है, आनन्दपाद तीसरा है और तुरीयपाद चौथा है। मूल-अविद्या प्रथम पादमे ही है, दूसरोंमें नहीं। विद्या, आनन्द एव तुरीयके अंश सभी पादोंमें व्याप्त होकर रहते हैं। यदि ऐसी बात है तो विद्यादि पादोंमें भेद किस प्रकार है?—उन विद्यादिकी प्रधानताके कारण उनके द्वारा नामोंका निर्देश होता है। वस्तुतः तो अभेद ही है। उन चार पादोंमें एक नीचेका पाद ही अविद्यामिश्रित होता है। ऊपरके तीनों पाद शुद्ध ज्ञान एव आनन्दस्वरूप तथा अमृत (शाश्वत) रहते हैं। वे तीनों पाद अलौकिक परमानन्दस्वरूप अखण्ड अमित तेजोराशि- के रूपमें प्रकाशित रहते हैं। और वे अनिर्वचनीय, अनिर्देश्य, अखण्ड आनन्दैकरूपात्मक हैं। उनमेसे मध्यम अर्थात् आनन्द- पादके मध्यप्रदेशमें अमित तेजके प्रवाहरूपमें नित्य वैकुण्ठसे विराजमान है और वह निरतिशय आनन्द एव अखण्ड ब्रह्मा- नन्दस्वरूप अपनी मूर्तिसे प्रकाशित है। जैसे अनन्त मण्डल दिखायी पड़ते हैं, उसी प्रकार अखण्ड आनन्दमय भगवान् विष्णुकी अमित दिव्य तेजोराशिके अन्तर्गत सुशोभित श्रीमहान् विष्णुका श्रेष्ठ स्थान विराजमान है। भगवान् विष्णुका यह परमधाम क्षीरसमुद्रके मध्यमें स्थित अविनाशी अमृतके कलशके समान दिखायी पड़ता है। सुदर्शनचक्रके दिव्य तेजके मध्यमें जैसे सुदर्शनके अभिमानी देवपुरुष रहते हैं, जैसे सूर्यमण्डलमें सूर्यनारायण हैं, वैसे ही अमित, अपरिच्छिन्न, अद्वैत परमानन्दरूप तेजोराशिमे आदिनारायण दिखलायी पड़ते हैं।

'वेही (आदिनारायण) तुरीय ब्रह्म हैं। वे ही तुरीयातीत हैं। वे ही विष्णु (व्यापक) हैं। वे ही समस्त ब्रह्मवाचक शब्दोंके वाच्य हैं। वे ही परम ज्योति हैं। वे ही मायातीत हैं। वे ही गुणातीत हैं। वे ही कालातीत हैं। वे ही समस्त कर्मों- से परे हैं। वे ही सत्य एव उपाधिरहित हैं। वे ही परमेश्वर (सर्वसंचालक) हैं। वे ही पुराणपुरुष हैं। प्रणवादि समस्त मन्त्ररूप वाचकोंके वाच्य, आदि-अन्तरहित, आदि-देश काल- वस्तु तथा तुरीय सजावाले (इन सबके वाच्य) एवं नित्य परिपूर्ण, सब प्रकारसे पूर्ण, सत्यसङ्कल्प, आत्माराम, तीनों कालोंसे अबाधित स्वरूपवाले, स्वयञ्ज्योति, स्वयंप्रकाशमय, अपने समान वस्तुसे रहित अर्थात् सर्वथा अद्वितीय, जिनके समान भी कोई नहीं है, फिर अधिककी तो बात ही क्या, जिनमें दिन-रात्रिके विभाग नहीं हैं, जिनमें संवत्सरादि काल- विभाग नहीं हैं, निजानन्दमय अनन्त-अचिन्त्य ऐश्वर्यवाले, आत्माके भी अन्तरात्मा, परमात्मा, ज्ञानात्मा, तुरीयात्मा आदि

७१६ त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय २

७१६ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय २

शब्दोंके वाच्य, अद्वैत परमानन्दरूप, विभु (सर्वव्यापक), प्रकार जानता है, वह पुरुष उन (श्रीनारायणभगवान्) की नित्य, निष्कलङ्क, निर्विकल्प, निरञ्जन, संङ्गारहित, शुद्ध उपासनासे उनके सायुज्यको प्राप्त करता है—यह संशयरहित देवता एकमात्र नारायण ही हैं; दूसरा कोई नहीं है। जो इस बात है' ॥ ६-११ ॥ ॥ प्रथम अध्याय समाप्त ॥ १ ॥

द्वितीय अध्याय
साकार-निराकार परब्रह्मके स्वरूपका निरूपण
तत्र (प्रथमाध्यायके उपदेशको सुनकर) शिष्यने अपने और मुक्तसाकार। नित्यसाकार तो आदि-अन्तहीन सनातन
भगवत्स्वरूप गुरुदेवसे कहा—'भगवन् ! वैकुण्ठ एवं (शाश्वत) है। जो उपासनाद्वारा मुक्तिपदको प्राप्त हुए हैं,
श्रीमन्नारायणको भी आपने नित्य बतलाया है। वे ही उनका साकार देह मुक्तसाकार है। उस (मुक्त पुरुषके आकार)
(वैकुण्ठ एवं श्रीनारायण) तुरीयतत्त्व हैं, यह भी कहा ही का आविर्भाव अखण्ड ज्ञानसे होता है। अर्थात् भगवद्धाममें
है। श्रीवैकुण्ठधाम साकार है और श्रीमन्नारायण भी साकार स्थित मुक्तात्माओंका शरीर ज्ञानघन है। वह (मुक्तात्माओं-
हैं; किंतु तुरीयतत्त्व निराकार है। साकारतत्त्व अवयवयुक्त का साकार शरीर) भी शाश्वत होता है; परंतु वह मुक्त-
होता है और निराकार अवयवरहित। अतः श्रुति यह कहती साकार ऐच्छिक (इच्छाधीन) होता है। दूसरे कहते हैं
है कि साकार अनित्य होता है और निराकार नित्य होता है। (ऐसी स्थितिमें) उसका शाश्वतपना (नित्यत्व) कैसे होगा ?
जो-जो (पदार्थ) अवयववाले हैं, वे सब अनित्य हैं—अनुमान- (इसपर कहते हैं—) ॥ २-७ ॥
प्रमाणसे यही सिद्ध होता है तथा प्रत्यक्ष भी देखा जाता है। अतः “अद्वैत, अखण्ड, परिपूर्ण, निरतिशय परमानन्दरूप, शुद्ध,
उन दोनों (वैकुण्ठ एव नारायण) की अनित्यता बतलाना ही ज्ञानस्वरूप, मुक्त, सत्यस्वरूप ब्रह्मकी चैतन्यरूप साकारता होनेसे
उचित है। आपने उनका नित्यत्व किस प्रकार बतलाया है ? उपाधिहीन साकारका नित्यत्व सिद्ध ही है। इसीलिये
तुरीयतत्त्व अक्षर (अविनाशी) है—यह श्रुति कहती है; अतः निरुपाधिक साकारके निरवयव होनेके कारण उससे कोई
तुरीयतत्त्वका नित्यत्व प्रसिद्ध है। नित्य एव अनित्य—ये परस्पर- अधिक (महान्) होगा, ऐसी शङ्का दूरसे ही निवृत्त हो
विरोधी धर्म हैं। इन दोनों विरोधी धर्मोंका एक ही ब्रह्ममें जाती है। सभी उपनिषदोंमें, समस्त शास्त्र सिद्धान्तोंमें 'ब्रह्म
होना अत्यन्त विरोधी (असंगत) है। इसलिये श्रीवैकुण्ठ- निरवयव चैतन्य है' यही सुना जाता है। और विद्या, आनन्द
धाम एव श्रीमन्नारायणकी भी अनित्यता ही बतलाना उचित तथा तुरीयका सर्वत्र अभेद ही सुना जाता है।'
है।' (शिष्य यह शङ्का करता है।) ॥ १ ॥ '(तब) विद्या आदि साकारका भेद किस प्रकार है ?'
गुरु शङ्काका निवारण करते हुए कहते हैं—' (तुम जो शिष्यकी इस शङ्काका समाधान करते हुए गुरु कहते हैं—
कहते हो, वह) ठीक ही है; (किंतु) साकार-तत्त्व दो प्रकारका '(तुमने) सत्य कहा है—विद्याकी प्रधानतासे विद्यासाकार,
होता है—उपाधिसहित तथा उपाधिरहित। इनमें उपाधि- आनन्दकी प्रधानतासे आनन्दमाकार तथा (विद्या, आनन्द)
सहित साकार किस प्रकारका है ? अविद्यासे उत्पन्न समस्त दोनोंकी प्रधानतासे उभयात्मक साकार कहे जाते हैं। यहाँ
कार्य एव कारण अविद्यापादमें ही हैं, और कहीं नहीं। प्रधानताको लेकर ही भेद है, वह भेद वस्तुतः अभेद
इसलिये समस्त अविद्योपाधिसे युक्त साकार-तत्त्व (पदार्थ) ही है' ॥ ८-१० ॥
अवयवयुक्त ही है। अवयवयुक्त होनेसे (वे) अवश्य 'भगवन् ! अखण्ड अद्वैत परमानन्दस्वरूप ब्रह्मके लिये साकार
अनित्य होंगे ही। (इस प्रकार) उपाधियुक्त साकारका और निराकार—ये दो विरोधी धर्म प्रतीत होते हैं। दो विरोधी
वर्णन हो चुका। धर्म उनमें किस प्रकार रह सकते हैं ?' इस शङ्काका निवारण
"तब उपाधिहीन साकार किस प्रकारका है ? निरुपाधिक करते हुए गुरु कहते हैं—'यह ठीक है। जैसे सर्वव्यापी निराकार
साकार तीन प्रकारका है—ब्रह्मविद्यासाकार, आनन्दसाकार महावायुका और उसीके स्वरूपभूत त्वक्-इन्द्रियके अधिष्ठाता-
तथा उभयात्मक (ब्रह्मविद्यानन्दात्मक) साकार। (यह) रूपमें प्रसिद्ध साकार महावायु-देवताका अभेद ही सब कहीं सुना
त्रिविध साकार भी फिर दो प्रकारका होता है—नित्यसाकार जाता है, जैसे पृथिवी आदि व्यापक शरीरवाले देवविशेषोंके

अध्याय २ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७१७

अध्याय २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७१७ उनके उस व्यापक रूपसे विलक्षण किंतु उस (व्यापक रूप) से अभिन्न, तथा अपरिच्छिन्न होते हुए भी अपनी मूर्तिके आकारके, देवता सर्वत्र सुने जाते हैं—अर्थात् जैसे पृथिवी आदिके अधिष्ठाता देवता अपने पृथिवीरूपी भौतिक शरीर एव देव- शरीर दोनोंसे युक्त हैं, वैसे ही सर्वात्मक परब्रह्ममें साकार एवं निराकारका भेद होनेपर भी विरोध नहीं है। विविध प्रकारकी अनन्त विचित्र शक्तियोंसे सम्पन्न परब्रह्मके स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर विरोध नहीं रह जाता। अर्थात् जब जान लिया जाता है कि परब्रह्ममें विविध प्रकारकी अनन्त विचित्र शक्तियाँ हैं, तब विरोधी धर्मोंका विरोध असङ्गत नहीं लगता। इस (ज्ञान) के अभावमें ही अनन्त विरोध प्रतीत होते हैं ॥ ११-१२ ॥ 'और जब श्रीराम-श्रीकृष्णादि अवतारस्वरूपोंमें अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्मके परमतत्त्व एव परमेश्वरत्वकी स्मृति सर्वत्र स्वाभाविक रूपसे ही विद्यमान सुनी जाती है, तब अद्वैत परमानन्दस्वरूप, सब प्रकारसे परिपूर्ण परब्रह्मके विषयमें क्या कहा जाय। अन्यथा यदि सर्वपरिपूर्ण परब्रह्मका साकार- रहित केवल निराकार स्वरूप ही वास्तवमें अभिप्रेत हो, तब तो केवल निराकार आकाशके समान परब्रह्ममें भी जड़ता आ जायगी । इसलिये परमार्थतः परब्रह्मके साकार एव निराकार दोनों रूप स्वभावतः सिद्ध हैं ॥ १३ ॥ 'इस प्रकारके अद्वैत परमानन्दस्वरूप आदिनारायणके पलक उठाने और गिरानेसे मूल अविद्याकी उत्पत्ति, स्थिति एव लय हुआ करते हैं। आत्माराम, अखिल-परिपूर्ण आदि- नारायणकी अपनी इच्छासे जब कभी उनका उन्मेष होता है (पलक उठते हैं), तब उस (उन्मेष) से परब्रह्मके निचले पादमें, जो सब (अभिव्यक्तियों) का कारण है, मूलकारणरूप अव्यक्त (प्रकृति) का आविर्भाव होता है। अव्यक्तसे मूल (संस्कार) का एव मूल-अविद्याका आविर्भाव होता है। उसी (अव्यक्त) से 'सत्'-शब्दसे वाच्य अविद्यामिश्रित ब्रह्म (जीव) व्यक्त होता है। उस (अव्यक्त-प्रकृति) से महत्तत्त्व, महत्से अहङ्कार, अहङ्कारसे (शब्दादि) पाँचों तन्मात्राएँ, पाँचों तन्मात्राओंसे (आकाशादि) पञ्चमहाभूत और पाँचों महाभूतोंसे ब्रह्मके एक पादसे व्याप्त एक अविद्यात्मक अण्ड उत्पन्न होता है ॥ १४ ॥ 'उस (अविद्याण्ड) में तत्त्वतः गुणातीत, शुद्ध सत्त्वमय तथा लीला (क्रीड़ा) के लिये निरतिशय आनन्दरूप धारण किये मायोपाधियुक्त नारायण होते हैं। तात्पर्य यह कि अविद्याण्ड गुणातीत शुद्ध सत्त्वमय नारायणका ही लीलाके लिये धारण किया हुआ निरतिशय आनन्दरूप मायोपाधिक स्वरूप ही है। ये वही नित्य परिपूर्ण पादविभूतिस्वरूप वैकुण्ठवासी नारायण हैं। वे अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति, स्थिति, प्रलयादि समस्त कार्य एव कारणसमूहोंके (प्रकृतिरूप) परम कारणके भी कारणरूप महामायातीत तुरीयरूप परमेश्वर विराजित हैं। उनसे स्थूल विराट्स्वरूप उत्पन्न होता है। वही विराट्-स्वरूप समस्त कारणोंका मूल है। वह (विराट्) अनन्त मस्तकों तथा अनन्त नेत्रों, हाथों और पैरोंसे युक्त पुरुष है। वह अनन्त कानोंवाला सबको घेरकर (व्याप्त करके) स्थित है। वह सर्वव्यापक है। वह सगुण एव निर्गुणस्वरूप है। वह ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, शक्ति तथा तेजःस्वरूप है। नाना प्रकारके अनन्त विचित्र जगत्‌के आकारमें वही स्थित है। वही निरतिशय आनन्दमय अनन्त परमविभूतिके समुदायसे सम्पन्न विश्वरूप परमात्मा है। वह निरतिशय निरङ्कुशता (परम- स्वतन्त्रता) सर्वज्ञता, सर्वशक्तिमत्ता सर्व-नियन्तृत्व आदि अनन्त कल्याणकारी गुणोंका आकर है। वह अवर्णनीय अनन्त दिव्य तेजोराशिके रूपमें स्थित है। वह अविद्याके पूरे अण्डमें व्यापक है। वह महामायाके अनन्त विलासोंका अधिष्ठानविशेष एव निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्मका विलास- विग्रह है ॥ १५ ॥ 'इस (विराट्-पुरुष) के एक-एक रोमकूप-छिद्रमें अनन्त- कोटि ब्रह्माण्ड और (उनके) स्थावर भी उत्पन्न होते हैं। उन सब अण्डोंमेंसे प्रत्येकमें नारायणका एक-एक अवतार होता है। उन्हीं नारायणसे हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा) उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही उस अण्डका विराट्स्वरूप उत्पन्न होता है, नारायणसे ही सब लोकोंके स्रष्टा प्रजापति उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही एकादश रुद्र भी उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही अखिल लोक उत्पन्न होते है। नारायणसे इन्द्र उत्पन्न होते हैं। नारायणसे समस्त देवता उत्पन्न होते हैं। नारायणसे बारह आदित्य उत्पन्न होते हैं। सब (आठों) वसुनामक देवता, सभी ऋषि, सम्पूर्ण प्राणी तथा समस्त छन्द नारायणसे ही उत्पन्न होते हैं। नारायणसे ही प्रवृत्त होते (क्रियाशील बनते) हैं। नारायणमें ही सब लीन हो जाते हैं। अतः (ये ही) नित्य, अविनाशी, सर्वश्रेष्ठ एव स्वयंप्रकाश हैं। नारायण ही ब्रह्मा हैं। नारायण ही शिव हैं। नारायण ही इन्द्र हैं। नारायण ही दिशाएँ हैं। नारायण ही विदिशारूप (कोण) हैं। नारायण ही काल हैं। नारायण ही समस्त कर्म हैं। नारायण ही मूर्त एव अमूर्तरूप हैं। नारायण ही समस्त कारणरूप तथा सम्पूर्ण कार्यस्वरूप हैं। इन दोनों (कारण तथा

७१८ - त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय

७१८ - त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय कार्य) से विलक्षण भी नारायण ही हैं। परमज्योति, स्वयं- प्रकाशमय, ब्रह्मानन्दमय, नित्य, निर्विकल्प, निरञ्जन, अवर्ण- नीय, शुद्ध एकमात्र देवता नारायण ही हैं; दूसरा कोई नहीं है। न वे (किसीके) समान हैं और न (किसीसे) अधिक हैं (उनके सिवा कोई दूसरा है ही नहीं)। 'संशयरहित होकर परमार्थतः जो इस प्रकार जानता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंको छेदन करके, मृत्युको पार करके मुक्त हो जाता है, मुक्त हो जाता है। जो इस प्रकार जानकर सर्वदा उन (श्रीनारायण) की उपासना करता है, वह पुरुष नारायण- स्वरूप हो जाता है; वह नारायणस्वरूप हो जाता है' ॥ १६ ॥ ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय अध्याय मूलाविद्या और प्रलयके स्वरूपका निरूपण शिष्यने 'ठीक है' कहकर फिर पूछा- 'भगवन् ! परम- तत्त्वज्ञ गुरुदेव ! आपने विलासके सहित महाभूत- अविद्याके उदयक्रमका वर्णन किया। उस (मूलाविद्या) से प्रपञ्चकी उत्पत्तिका क्रम किस प्रकार है, इसे विशेषतः वर्णन करें। मैं उसका तत्त्व जानना चाहता हूँ' ॥ १ ॥ 'ऐसा ही हो' यह कहकर गुरु बोले- 'यह अनादि प्रपञ्च जैसा दिखायी पड़ता है, वह नित्य है या अनित्य-इस प्रकारका संशय उत्पन्न होता है। प्रपञ्च भी दो प्रकारका है-विद्या- प्रपञ्च और अविद्या प्रपञ्च । विद्या प्रपञ्चकी नित्यता तो इसीसे सिद्ध है कि वह नित्यानन्दमय चैतन्यांश विलास तथा शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्य एवं आनन्दस्वरूप है। अविद्याप्रपञ्च नित्य है या अनित्य ? - कुछ लोग प्रवाहरूपसे उसकी नित्यता बतलाते हैं। शास्त्रोंमें प्रलयादिका वर्णन सुना जाता है, इस कारणसे दूसरे उसकी अनित्यता बतलाते हैं। वस्तुत दोनों ही (बातें) नहीं है। फिर है किस प्रकार ? समस्त अविद्या-प्रपञ्च महामायाका सङ्कोच एवं विकासरूप विलास ही है। क्षण- क्षणमें शून्य (तिरोहित) होनेवाला अनादि मूल-अविद्याका विगम होनेके कारण परमार्थत कुछ भी नहीं है। अर्थात् समस्त अविद्याप्रपञ्च प्रतिक्षण विलीन होनेवाला है, अतः उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है। वह किस प्रकार ? एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही है। यहाँ नाना (अनेक) नामकी वस्तु कुछ भी नहीं है (-ऐसी श्रुति है)। अतएव ब्रह्मसे भिन्न सब बाधित (प्रतीतिमात्र, सत्ताहीन) ही है। सत्य ही परब्रह्म है। ब्रह्म सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप एवं अन्तहीन हैं' ॥ २॥ 'तब विलास (अभिव्यक्ति) सहित मूल-अविद्याके उपसंहारका क्रम किस प्रकार है ?' (यों शिष्यके पूछनेपर) अत्यन्त आदरपूर्वक बड़ी प्रसन्नतासे गुरु उपदेश करते हैं- 'सहस्र चतुर्युगोंका ब्रह्माजीका एक दिवस होता है। इतने ही समयकी फिर उनकी रात्रि होती है। रात और दिवस दोनोंका सम्मिलित रूप एक दिन होता है। उस एक दिनमें सत्यलोकतकके समस्त लोकोंकी उत्पत्ति, स्थिति एवं लय हो जाते हैं। (ऐसे) पंद्रह दिनोंका (ब्रह्माजीका) पक्ष (पखवाड़ा) होता है। दो पक्षोंका महीना होता है। दो महीनोंका ऋतु होता है। तीन ऋतुओंका अयन होता है। दो अयनोंका वर्ष होता है। ब्रह्माके वर्षोंके प्रमाणसे सौ वर्षकी ब्रह्माजीकी परमायु (पूर्ण आयु) होती है। इतने समयतक उन (ब्रह्माजी) की स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमे अण्डगत विराट्पुरुष अपने अशी हिरण्यगर्भको प्राप्त होते (उनमें लीन हो जाते) हैं। हिरण्यगर्भके कारण परमात्मा अण्डपरिपालक नारायणको वे हिरण्यगर्भ प्राप्त होते हैं। फिर सौ वर्षोंतक उनकी प्रलय होती है। उस समय सब जीव प्रकृतिमें लीन हो जाते हैं। प्रलयके समय सब शून्य (अभावरूप) हो जाता है ॥ ३-४ ॥ 'उन ब्रह्माजीकी स्थिति एवं प्रलय आदि-नारायणके अंशसे अवतीर्ण इन अण्ड-परिपालक महाविष्णुके दिवस एवं रात्रि कहे जाते हैं। इन दिवस एव रात्रिका (अर्थात् ब्रह्माके सौ वर्षोंके जीवन एव सौ वर्षोंकी प्रलयका) महाविष्णुका एक दिन होता है। इसी प्रमाणसे दिन, पक्ष, मास, सवत्सर आदि भेदसे उनके सौ करोड़ (एक अरब) वर्षोंतक उनकी स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमें (वे) अपने कारण महा- विराट् पुरुषको प्राप्त होते (उनमें लीन हो जाते) हैं। तब आवरणके साथ ब्रह्माण्ड विनष्ट हो जाता है। ब्रह्माण्डका आवरण विनष्ट होता है, वही (आवरण) विष्णुका स्वरूप है। उनकी (श्रीमहाविष्णुकी) उतनी ही (उनके एक अरब वर्षकी) प्रलय होती है। प्रलयके समय सब शून्य हो जाता है ॥ ५ ॥ 'अण्डपरिपालक महाविष्णुकी स्थिति एव प्रलय (उनके दो अरब वर्ष) आदिविराट् पुरुषके दिवस-रात्रि कहे जाते हैं। उन-

अध्याय ४] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७१९

अध्याय ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७१९ दिवस-रात्रिका एक दिन होता है। इसी प्रकार दिन, पक्ष, मास, सम्वत्सर आदि भेदसे उनके कालमानके सौ करोड़ (एक अरब) वर्षपर्यन्त उनकी स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमें आदिविराट् पुरुष अपने अशी मायोपाधिक नारायणको प्राप्त होता है, अर्थात् उनमें लीन हो जाता है। उस विराट्- पुरुषका जितना स्थितिकाल हैं, उतना ही प्रलयकाल भी होता है। प्रलयके समय सब शून्य हो जाता है ॥ ६ ॥ 'विराट्की स्थिति एव प्रलय मूल-अविद्याण्ड परिपालक आदि नारायणके दिवस-रात्रि कहे जाते हैं। उन दिवस-रात्रि- का एक दिन होता है। इसी प्रकार दिन, पक्ष, मास, सवत्सर आदि भेदसे उनके कालमानके सौ करोड़ बगके समयतक उनकी स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमे त्रिपाद्विभूति- नारायणकी इच्छासे उनका निमेष होता है (उनकी पलकें गिरती हैं)। इस निमेषसे मूल-अविद्याण्डका उसके आवरणके साथ प्रलय हो जाता है। तब मूल-अविद्या, जो सत्-असत्से विलक्षण, अनिर्वचनीय, लक्षणरहित, आविर्भाव- तिरोभावरूप, अनादि अखिलकारणोंकी कारणरूप एवं अनन्त महामायाविशेषणोंसे युक्त है, अपने बिलासके साथ तथा सम्पूर्ण कार्यरूप उपाधिके सहित परमसूक्ष्म मूल कारण—अव्यक्तमें प्रवेश कर जाती है । अव्यक्त फिर ब्रह्ममें प्रवेश कर जाता है, उस समय ईधनके जल जानेपर जैसे अग्नि अपने वास्तविक स्वरूपको प्राप्त कर लेता है, वैसे ही मायोपाधिक आदिनारायण मायारूप उपाधिके नष्ट हो जानेपर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं। समस्त जीव अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं। जैसे जपा (जवा) पुष्पके सान्निध्य (समीपता) से स्फटिकमे ललाईकी प्रतीति होती है और उस (पुष्प) के अभावमें शुद्ध स्फटिक प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्ममे भी मायारूप उपाधिसे ही सगुणत्व, परिच्छिन्नत्व आदिकी प्रतीति होती है। उपाधिका नाश हो जानेपर निर्गुणत्व, निरवयवत्व आदिकी प्रतीति होती है' ॥ ७॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ * चतुर्थ अध्याय महामायातीत अखण्ड अद्वैत परमानन्दमय परतत्त्व-स्वरूपका निरूपण ॐ । उपाधिका नाश हो जानेके कारण ब्रह्मका निर्विशेष रूप अत्यन्त निर्मल होता है। वह अविद्यासे परे, अतः अत्यन्त शुद्ध है। शुद्ध बोधानन्दमय कैवल्यस्वरूप है । ब्रह्मके चारो पाद निर्विशेष हैं। वह अखण्डस्वरूप, सर्वत. परिपूर्ण, स्वयंप्रकाश सच्चिदानन्द है । अद्वितीय तथा ईश्वररहित है—अर्थात् उसका कोई स्वामी, नियन्ता नहीं है। वह ब्रह्म समस्त कार्य-कारण- स्वरूप, अखण्ड चिद्घनानन्दरूप, अतिदिव्य मङ्गलाकार, निरतिशय आनन्दरूप तेजोरशिनिशेष, सर्वपरिपूर्ण, अनन्त चिद्विलाससय विभूतिका समष्टिरूप, अद्भुत आनन्दमय आश्चर्य- पूर्ण विभूतिविशेषस्वरूप, अनन्त चिन्मय स्तम्भाकार, शुद्ध ज्ञान-आनन्दविशेषस्वरूप, अनन्त परिपूर्णानन्दमय दिव्य विद्यु- न्मालास्वरूप है। इस प्रकार ब्रह्मका अद्वितीय अखण्डानन्दमय स्वरूप वर्णित हुआ ॥ १ ॥ फिर शिष्य कहता है—'भगवन् ! ब्रह्मके पादभेदादि कैसे सम्भव हैं और यदि हैं तो वह अद्वैतस्वरूप है—यह किस प्रकार कहा गया ?' ॥ २ ॥ गुरु शङ्काका समाधान करते हैं—'इसमें विरोध नहीं है। ब्रह्म अद्वैत है, यही सत्य है। और यही कहा गया है। ब्रह्ममें भेद नहीं बताया गया है, (क्योंकि) ब्रह्मके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। पादभेदादिका वर्णन तो ब्रह्मके स्वरूपका ही वर्णन है। वही कहा जा रहा है। ब्रह्म चार पादवाला (चतुःपादात्मक) है। इन (चारों पादों) में एक अविद्यापाद है और तीन पाद अमृत (नित्य) है। (दूसरी शाखाओंके) उपनिषदोंमे वर्णित स्वरूपका ही यहाँ वर्णन किया गया है। (गान्तान्तरीय उपनिषदोंमें इस प्रकारके वचन मिलते हैं—) 'त्रिपादस्वरूप ब्रह्म अविद्यारूप अन्धकारसे परे, ज्योतिर्मय, परमानन्दस्वरूप एव सनातन परम कैवल्यरूप है। मैं इस आदित्यके समान प्रकाशमय, तमस्‌के परे स्थित महान् पुरुषको जानता हूँ। उसको इस प्रकार (तमस्‌से परे तेजोमयरूपमें) जाननेवाला यहाँ (ससारमे) अमृतस्वरूप (मुक्त) हो जाता है। मोक्षप्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। सम्पूर्ण ज्योतियोंकी ज्योति तमस्‌से परे कही गयी है। सबकी आधार- भूत, अचिन्त्यस्वरूप, आदित्यवर्ण (प्रकाशस्वरूप) परम ज्योति तमस्‌से ऊपर (परे) प्रकाशित है। जो एक, अव्यक्त, अनन्तस्वरूप, विश्वरूप पुरातन तत्त्व तमस्‌से परे अवस्थित है, वही शृत (समस्त काम्य कर्मोंका फल—स्वर्गादि) है। उसीको सत्य (निष्कामभावका प्राप्य) कहा गया है। वही सत्य (नित्यसत्ता) है। वही परम विशुद्ध ब्रह्म है'

७२० * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ ४ तमस् शब्दके द्वारा अविद्या कही जाती है ॥ ३-८॥ भेद भी दिखायी देने लगता है। यह जीव कार्यरूप उपाधिसे 'समस्त भूत इन (ब्रह्म) का एक पाद (भाग) हैं। युक्त है और ईश्वर कारणरूप उपाधिसे युक्त हैं। ईश्वरकी इनके शेष तीन पाद अमृतरूप (नित्य) हैं, जो परम महामाया उन्हींकी आज्ञाके अधीन रहती हैं। वे (महामाया) व्योममें प्रतिष्ठित हैं। तीन पादोंवाला पुरुष सबसे ऊपर प्रकाशित उन (ईश्वर) के सङ्कल्पके अनुसार कार्य करनेवाली, विविध है और इसका अवशिष्ट एक पाद सम्पूर्ण जीवोंके रूपमे प्रकारकी अनन्त महामायाशक्तियोंसे भली प्रकार सेवित, अनन्त इस जगत्में प्रकट हुआ। इसके बाद वह जड-चेतनात्मक महामायाजालकी उत्पत्तिका स्थान, महाविष्णुकी लीला-शरीर- विश्वमें चारों ओर व्याप्त हो गया। विद्या, आनन्द एव तुरीय रूपिणी तथा ब्रह्मादिके लिये भी अगोचर हैं। जो भगवान् नामक तीन पाद शाश्वत हैं। शेष चौथा पाद अविद्याके विष्णुका ही भजन करते हैं, वे इन महामायाको अवश्य पार आश्रित है' ॥ ९-१० ॥ कर जाते हैं। दूसरे लोग (जो भगवान् विष्णुका भजन नहीं [शिष्य पूछता है-] 'आत्माराम श्रीआदिनारायणके करते) अनेक उपायोंका अवलम्बन करके भी कभी नहीं उन्मेष निमेष (नेत्रोन्मीलन-निमीलन) कैसे होते हैं? उनका तरते। अविद्याके कार्यरूप अन्तःकरणोंका आश्रय लेकर वे अनन्तकालतक जन्मते रहते हैं; क्योंकि उन (अन्तःकरणों) स्वरूप क्या है?' ॥ ११ ॥ में ब्रह्मचैतन्य प्रतिबिम्बित होता है। प्रतिबिम्ब ही जीव कहलाते गुरु बतलाते हैं- 'बाह्य-दृष्टि उन्मेष (पलक खोलना) हैं। सभी जीव अन्तःकरणकी उपाधिसे युक्त हैं, यों (कुछ है और आन्तरिक-दृष्टि निमेष (पलक बंद करना) है। लोग) कहते हैं। समस्त जीव महाभूतोंसे उत्पन्न सूक्ष्मशरीररूप अन्तर्दृष्टिसे अपने स्वरूपका चिन्तन करना ही निमेष (पलक उपाधिसे युक्त हैं, इस प्रकार दूसरे लोग कहते हैं। बुद्धिमें बंद करना) है। बाह्य-दृष्टिसे अपने स्वरूपका चिन्तन करना प्रतिबिम्बित चैतन्य ही जीव है, ऐसा दूसरोंका मत है। इन ही उन्मेष (पलक खोलना) है। जितने परिमाणका उन्मेषकाल सब (जीवों) में उपाधिको लेकर ही भेद है, अत्यन्त भेद होता है, उतने ही परिमाणका निमेषकाल भी होता है। उन्मेष- नहीं है। सर्वतः परिपूर्ण श्रीनारायण तो अपनी इस इच्छाशक्तिसे कालमें अविद्याकी स्थिति होती है। निमेषकालमें उस (अविद्या) सदा लीला किया करते हैं। इसी प्रकार सब जीव अज्ञानवश का लय होता है। जैसे उन्मेष होता है, वैसे ही चिरंतन उन तुच्छ विषयोंमे, जिनमें सुख नहीं है, सुखप्राप्तिकी आशासे अत्यन्त सूक्ष्म वासनाके प्रभावसे फिर अविद्याका उदय हो असार संसारचक्रमें दौड़ते रहते हैं। इस प्रकार अनादि सत्तार- जाता है। पहलेकी भाँति ही अविद्याके कार्य उत्पन्न हो जाते हैं। वासनास्वरूप विपरीत-भ्रमके कारण ही जीवोंकी संसार-चक्रमें फिर कार्य तथा कारणरूप उपाधिके भेदसे जीव एव ईश्वरका घूमनेकी अनादि-परम्परा चलती रहती है' ॥ १२-१४ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥ ॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥

अध्याय ५ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७२१

अध्याय ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२१

उत्तरकाण्ड पञ्चम अध्याय संसारसे तरनेका उपाय और मोक्षमार्गका निरूपण

श्रीगुरुभगवान्‌को नमस्कार करके फिर शिष्य पूछता है— ‘भगवन् ! सम्पूर्णतः नष्ट हुई अविद्याका फिर उदय कैसे होता है ?’ ॥ १ ॥ ‘यह सत्य है’ यों कहकर गुरु बोले—‘वर्षा ऋतुके प्रारम्भमें जैसे मेढक आदिका फिरसे प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार पूर्णतः नष्ट हुई अविद्याका उन्मेषकालमे (भगवान्‌के पलक खोलनेपर ) फिर उदय हो जाता है ॥ २ ॥ ( शिष्यने फिर पूछा— ) ‘भगवन् ! जीवोंका अनादि ससाररूप भ्रम किस प्रकार है ? और उसकी निवृत्ति कैसे होती है ? मोक्षके मार्गका स्वरूप कैसा है? मोक्षका साधन कैसा है ? अथवा मोक्षका उपाय क्या है ? मोक्षका स्वरूप कैसा है ? सायुज्य मुक्ति क्या है ? यह सब तत्त्वत. वर्णन करें।’ ॥ ३ ॥ अत्यन्त आदरपूर्वक, बड़े हर्षसे शिष्यकी बहुत प्रशंसा करके गुरु कहते हैं—‘सावधान होकर सुनो ! निन्दनीय, अनन्त जन्मोंमें बार-बार किये हुए अत्यन्त पुष्ट अनेक प्रकारके विचित्र अनन्त दुष्कर्मोंकि वासनासमुहोंके कारण (जीव) को शरीर एव आत्माके पृथक्त्वका ज्ञान नहीं होता । इसीसे ‘देह ही आत्मा है’ ऐसा अत्यन्त दृढ़ भ्रम हुआ रहता है। ‘म अज्ञानी हूँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, मैं जीव हूँ, मैं अनन्त दुःखोंका निवास हूँ, मैं अनादि कालसे जन्म-मरणरूप ससारमे पड़ा हुआ हूँ’ इस प्रकारके भ्रममयी वासनाके कारण ससारमें ही प्रवृत्ति (चेष्टा) होती है । इस (प्रवृत्ति) की निवृत्तिका उपाय कदापि नहीं होता । मिथ्यास्वरूप, स्वप्नके समान विषयभोगोंका अनुभव करके, अनेक प्रकारके असख्य अत्यन्त दुर्लभ मनोरथोंकी निरन्तर आझा करता हुआ अतृप्त (जीव) सदा दौड़ा करता है । अनेक प्रकारके विचित्र स्थूल-सूक्ष्म, उत्तम-अधम अनन्त शरीरोंको धारण करके उन-उन शरीरोंमें विहित (प्राप्त होने योग्य ) विविध विचित्र, अनेक शुभ अशुभ प्रारब्धकमोंका भोग करके, उन-उन कर्मोके फलकी वासनासे वासित (लिप्त) अन्तःकरणवालोंकी बार-बार उन-उन कर्मोंके फलरूप विषयोंमें ही प्रवृत्ति होती है । ससारकी निवृत्तिके मार्गमें प्रवृत्ति (रुचि) भी नहीं उत्पन्न होती । इसलिये (उनको) अनिष्ट ही इष्ट (मङ्गलकारी) की भाँति जान पड़ता है । ससार-वासनावश विपरीत भ्रमसे इष्ट (मङ्गलस्वरूप मोक्षमार्ग) अनिष्ट (अमङ्गलकारी) की भाँति जान पड़ता है । इसलिये सभी जीवोंकी दृष्टविषयम सुखबुद्धि है तथा (उसके न मिलनेमें) दुःखबुद्धि है। वास्तवमें अवाञ्छित ब्रह्मसुखके लिये तो प्रवृत्ति ही उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि उसके स्वरूपका ज्ञान जीवोंको है नहीं। वह (ब्रह्मसुख) क्या है, यह जीव नहीं जानते, क्योंकि बन्धन कैसे होता है और मोक्ष कैसे होता है, इस विचारका ही (उनमें) अभाव हैं । यह (जीवोंकी अवस्था) कैसे है ? अज्ञानकी प्रबलतासे । अज्ञानकी प्रबलता किस कारणसे है ?—भक्ति, ज्ञान, वैराग्यकी वासना न होनेसे । इस प्रकारकी वासनाका अभाव क्यों है ? —अन्तःकरणकी अत्यन्त मलिनताके कारण ॥ ४ ॥ ‘अतः (ऐसी दशामें) संसारसे पार होनेका उपाय क्या है ?’ गुरु यही बतलाते हैं—‘अनेक जन्मोंके किये हुए, अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्योंके फलोदयसे सम्पूर्ण वेद-शास्त्रके सिद्धान्तोंका रहस्यरूप सत्पुरुषोंका संग प्राप्त होता है । उस (सत्सङ्ग) से विधि तथा निषेधका ज्ञान होता है । तत्र सदाचारमें प्रवृत्ति होती हैं। सदाचारसे सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है। पापनाशसे अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल हो जाता है ५-६ ‘तब (निर्मल होनेपर) अन्तःकरण सद्गुरुका कटाक्ष (दयादृष्टि) चाहता है । सद्गुरुके (कृपा-) कटाक्षके लेशमे ही सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । सब बन्धन पूर्णतः नष्ट हो जाते ह । श्रेयके सभी विघ्न विनष्ट हो जाते हैं । सभी श्रेय (कल्याणकारी गुण) स्वतः आ जाते हैं । जैसे जन्मान्धको रूपका ज्ञान नहीं होता, उसी प्रकार गुरुके उपदेश बिना करोड़ों कल्पोंमे भी तत्त्वज्ञान नहीं होता । इसलिये सद्गुरुके (कृपा-) कटाक्षके लेशसे अविलम्ब ही तत्त्वज्ञान हो जाता है ॥ ७ ॥ ‘जब सद्गुरुका कृपा-कटाक्ष होता है, तब भगवान्‌की कथा सुनने एव ध्यानादि करनेमें श्रद्धा उत्पन्न होती है । उस (ध्यानादि) से हृदयमें स्थित दुर्वासनाकी अनादि ग्रन्थिका विनाश हो जाता है । तत्र हृदयमे स्थित सम्पूर्ण कामनाएँ विनष्ट हो जाती हैं । इससे हृदय-कमलकी कर्णिकामे परमात्मा आविर्भूत होते हैं । ‘इससे भगवान् विष्णुमें अत्यन्त दृढ भक्ति उत्पन्न होती है । तब (विषयोंके प्रति) वैराग्य उदय होता है । वैराग्यमे बुद्धिमे विज्ञान (तत्त्वज्ञान) का प्राकट्य होता है । अभ्यासके द्वारा वह ज्ञान क्रमशः परिपक्व होता है ॥ ८-९ ॥ ‘परिपक्व विज्ञानसे (पुरुष) जीवन्मुक्त हो जाता है । सभी शुभ एव अशुभ कर्म वासनाओंके साथ नष्ट हो जाते हैं । तब अत्यन्त दृढ शुद्ध सात्त्विक वासनाद्वारा अतिशय भक्ति होती है । अतिशय भक्तिसे सर्वमय नारायण सभी

उ० अ० ९१—

७२२ त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय ५

७२२ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय ५

अवस्थाओंमें प्रकाशित होते हैं। समस्त संसार नारायणमय प्रतीत होता है। नारायणसे भिन्न कुछ नहीं है, इस बुद्धिसे उपासक सर्वत्र विहार करता है॥ १० ॥ '(इस प्रकार) निरन्तर (भाव-) समाधिकी परम्परासे सब कहीं, सभी अवस्थाओमे जगदीश्वरका रूप ही प्रतीत होता है। ऐसे महापुरुषको कभी कभी ईश्वर साक्षात्कार भी होता है॥११॥ 'इस (महापुरुष) को जब शरीर छोड़नेकी इच्छा होती है, तब भगवान् विष्णुके सब पार्षद उसके पास आते हैं। तब भगवान्का ध्यान करता हुआ हृदय-कमलमे स्थित आत्म- तत्त्वका अपने अन्तरात्माके रूपमें चिन्तन करके भली प्रकार (मानसिक) उपचारोसे (उसकी) अर्चा करता है। फिर हस मन्त्र 'सोऽहम्' का उच्चारण करता हुआ, सभी (इन्द्रिय-) द्वारोंका सयम करके, मनका भली प्रकार निरोध करता है और प्रणव (के उच्चारण) से प्रणव (के अर्थ) का अनुसन्धान (विचार) करता हुआ ऊपरकी ओर गमन करनेवाले वायु (प्राण) के साथ धीरे-धीरे ब्रह्मरन्ध्रमे बाहर चला जाता है। वहाँ 'सोऽहम्' इस मन्त्रसे बारह (दस इन्द्रियाँ और मन तथा बुद्धि) के अन्तमें (उनके आधाररूपसे) स्थित परमात्मा (चेतनतत्त्व) को एकत्र करके (अर्थात् इन्द्रियों, मन एव बुद्धिसे चेतना आकर्षित करके) पञ्चोपचार (जल, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) से (मानसिक रूपमे उस चेतन-तत्त्वका) पूजन करता है। फिर 'सोऽहम्' इस मन्त्रसे षोडश तत्त्वोंमें स्थित ज्ञानात्माको एकत्र करके भली प्रकार उपचारोंसे उसकी पूजा करता है। इस प्रकार पहलेके प्राकृत शरीरका त्याग करके फिर कल्पनामय, मन्त्रमय, शुद्ध ब्रह्म तेजोमय, निरतिशय आनन्दमय महाविष्णुके स्वरूपके समान स्वरूपवाले शरीरको धारण करता है और सूर्यमण्डलमें स्थित भगवान् अनन्तके दिव्य चरणारविन्दके अङ्गुष्ठसे निकले हुए निरतिशय आनन्दमय देवनदी गङ्गाजीके प्रवाहका आकर्षण करके भावनाके द्वारा इस (देवगङ्गा-प्रवाह) में स्नान करता है। तत्पश्चात् वस्त्र-आभरणादि सामग्रियोंसे अपनी पूजा (अलङ्कृति) करके, साक्षात् नारायण- स्वरूप होकर फिर गुरुको नमस्कार करके प्रणवस्वरूप गरुड़ का ध्यान करता है और ध्यानके द्वारा प्रकट महाप्रणवरूप गरुड़की पञ्चोपचारसे अर्चा करता है। इसके बाद वह गुरुकी आज्ञासे प्रदक्षिणा एव नमस्कार करके प्रणवरूप गरुड़पर सवार होता है और महाविष्णुके समस्त असाधारण चिह्नोसे चिह्नित होकर तथा उन्हींके समस्त असाधारण दिव्य आभूषणोंसे भूषित होकर, सुदर्शन पुरुष (पुरुष विग्रहधारी सुदर्शनचक्र) को आगे करके, विपक्षसेनेनसे रक्षित, भगवान्के पार्षदोंसे घिरा हुआ आकाशमार्गमे प्रवेश करता है। मार्गके दोनों पार्श्वोंमें स्थित अनेक पुण्यलोकों को पार करके, वहाँ रहनेवाले पुण्य-पुरुषोंसे पूजित होकर, सत्यलोकमे प्रवेश करके ब्रह्माजीकी पूजा करता है और ब्रह्मा तथा सत्यलोकके सभी वासियोंद्वारा भली प्रकार पूजित होकर, भगवान् शङ्करके ईशान कैवल्य (दिव्य कैलास) में जा पहुँचता है। वहाँ भगवान् शङ्करका ध्यान करके, शिवजी- की पूजा करके, सभी शिवगणों एव शङ्करजीद्वारा भी पूजित होकर ग्रहमण्डल तथा सप्तर्षिमण्डलको पार करके सूर्यमण्डल एव चन्द्रमण्डलका भेदन करता है और त्रिलोकनारायणका ध्यान करके, ध्रुवमण्डलका दर्शन करके, भगवान् ध्रुवकी पूजा करता है। फिर शिशमार-चक्रका भेदन करके, शिशुमार प्रजापतिकी भली प्रकार अर्चा करता है और चक्र (शिशुमारचक्र) के मध्यमे स्थित सर्वाधार सनातन महाविष्णुकी आराधना करके, उनके द्वारा पूजित होकर तत्र ऊपर जाकर परमानन्दको प्राप्त होता है ॥१२॥ 'तब सब वैकुण्ठनिवासी उसके पास आते हैं। उन सबकी पूजा करके, उन सबसे पूजित होकर तथा और ऊपर जाकर विरजा नदीको प्राप्त करता है। वहाँ स्नान करके भगवान्का ध्यान करते हुए फिर उसमे डुबकी लगाकर, वहाँ अपञ्चीकृत (मूलरूप, अमिश्रित) पञ्च महाभूतोंसे बने सूक्ष्म अङ्गवाले भोगके साधनरूप सूक्ष्मशरीरको छोड़ देता है तथा मन्त्रमय, दिव्य तेजोमय, निरतिशय आनन्दमय महाविष्णुके स्वरूपके समान शरीर धारण करके, फिर जलसे बाहर निकल आता है। वहाँ अपनी पूजा करके, प्रदक्षिणा एव नमस्कार करते हुए ब्रह्ममय वैकुण्ठमे प्रवेश करके, वहाँके निवासियोंकी भली प्रकार पूजा करके (देखता है कि) उस दिव्यधामके मध्यमें ब्रह्मा- नन्दमय अनन्त परकोटे, भवन, फाटक, विमान एव उपवन- समूहोसे तथा देदीप्यमान शिखरोंसे उपलक्षित निरुपम, नित्य, निर्दोष, निरतिशय, असीम ब्रह्मानन्दनामक पर्वत सुशोभित है १३ 'उस (पर्वत) के ऊपर निरतिशयानन्दमय दिव्य तेजोरानि प्रज्वलित है। उस (तेजोराशि) के मध्यमें शुद्ध ज्ञानमय आनन्दस्वरूप प्रकाशित है। उसके मध्यमे चिन्मय वेदी है। यह (वेदी) आनन्दमय एव आनन्दवनसे भूषित है। उसके मध्यमें उसके ऊपर अमित तेजोरानि प्रज्वलित है। (उस तेजोरानिमें) परममङ्गलमय आसन सुशोभित है। उस (मद्रासनपद्म) की कर्णिकापर शुद्ध शेषभगवान्का भोगासन सुशोभित है। उसके ऊपर भली प्रकार विराजमान आनन्द- परिपालक आदि-नारायणका ध्यान करके, उन सर्वेश्वरका विविध उपचारोंसे पूजन करता है। फिर प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके, उनकी आज्ञा लेकर और ऊपर-ऊपर जाकर पाँचों वैकुण्ठों- को पार करता है तथा अण्डविराट्के कैवल्यपदको प्राप्त करके, उनकी आराधना करके उपासक परमानन्द प्राप्त करता है' १४

॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥

अध्याय ६ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७२३

अध्याय ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२३ षष्ठ अध्याय मोक्षमार्गके स्वरूपका निरूपण

'तब परमानन्दकी प्राप्ति होनेपर उपासक आवरणसहित ब्रह्माण्डका भेदन करके, चारों ओर देखकर ब्रह्माण्डके स्वरूप- का निरीक्षण करता है तथा परमार्थतः उनके स्वरूपको ब्रह्मज्ञान के द्वारा जानकर ( समझ जाता है कि) समस्त वेद, शास्त्र, इतिहास, पुराण, समस्त विद्या-समूह, ब्रह्मादि सब देवता और सभी परमर्षि भी ब्रह्माण्डके भीतर स्थित प्रपञ्चके एक देश (एक अङ्ग) का ही वर्णन करते हैं। (वे सब) ब्रह्माण्डके स्वरूपको नहीं जानते। ब्रह्माण्डसे बाहर स्थित प्रपञ्चके रहस्यको तो जानते ही नहीं। फिर ब्रह्माण्डके भीतर एव बाहरके प्रपञ्च- ज्ञानसे दूर मोक्षप्रपञ्च (स्वरूप) ज्ञान तथा अविद्या प्रपञ्च- ज्ञानको तो जान ही कैसे सकते हैं? ॥ १ ॥ 'ब्रह्माण्डका स्वरूप कैसा है?' ॥ २ ॥ 'वह सूर्यके अण्डेके समान आवरण महत्तत्त्वादि-समष्टि मय ब्रह्माण्ड तेजोमय, तपे हुए स्वर्णके समान प्रभावाला, उदय होते हुए करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाला, चारों प्रकारकी (उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज, जरायुज) सृष्टिमे उपलक्षित पाँचों (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाशरूप) महाभूतोंसे ढका हुआ, तथा महत्तत्त्व, अहङ्कार, तम और मूलप्रकृतिसे घिरा हुआ है ॥ ३ ॥ 'अण्डकी भित्ति सत्तर करोड़ योजन विशाल है। प्रत्येक आवरण उसी प्रमाणका (उतना ही विशाल) है ॥ ४ ॥ 'चारों ओरसे ब्रह्माण्डका प्रमाण दो रत्न योजन है। महामण्डूक आदि अनन्त शक्तियोंसे वह अधिष्ठित (धारण किया हुआ) है। श्रीनारायणके खेलनेकी गेंदके समान वह है। परमाणुके समान विष्णुप्रेङ्कमें चिपका है। किसीके द्वारा न देखी, न सुनी अनेक प्रकारकी अनन्त विचित्रताओंकी विशेषतासे युक्त है ॥ ५ ॥ 'इस ब्रह्माण्डके चारों ओर ऐसे ही दूसरे अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड अपने आवरणोंके साथ प्रकाशित होते हुए अवस्थित हैं ॥ ६ ॥ '(वे ब्रह्माण्ड) चार मुखोंके, पाँच मुखोंके, छः मुखोंवाले, सात मुखोंके, आठ मुखोंके—इस प्रकार संख्याक्रमसे सहस्र मुखोंतकके, श्रीनारायणके अंशरूप, रजोगुणप्रधान एक-एक सृष्टिकर्त्ता (ब्रह्मा) द्वारा अधिष्ठित हैं। विष्णु, महेश्वर नाम- वाले, श्रीनारायणके अंशरूप, सत्त्व तथा तमोगुणप्रधान एक-

एक स्थिति तथा संहारकर्त्तामें भी अधिष्ठित हैं। (वे सब ब्रह्माण्ड) विशाल जलप्रवाहमें मत्स्य तथा बुलबुलोंके अनन्त समूहोंकी भाँति घूमते रहते हैं ॥ ७ ॥ 'क्रीड़ामें लगे बालककी हथेलीमे आँवलोंके समूहकी भाँति महाविष्णुकी हथेलीमे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड शोभित हो रहे हैं ॥ ८ ॥ 'जल्यन्त्र (रहँट) में लगे घड़ोंकी मालाके समूहकी भाँति महाविष्णुके एक-एक रोमकूपके छिद्रोंमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड अपने आवरणोंके साथ घूमते रहते हैं ॥ ९ ॥ '(उपर्युक्त गति प्राप्त उपासक) समस्त ब्रह्माण्डोंके भीतर एव बाहरके प्रापञ्चिक रहस्यको ब्रह्मज्ञानके द्वारा जानकर तथा नाना प्रकारकी विचित्र-अनन्त परमेश्वर्यकी समष्टिरूप विशेषोंको भली प्रकार देखकर अत्यन्त आश्चर्यमय अमृतसागरमें गोता लगाता है और निरतिशय आनन्द समुद्ररूप होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसमुद्रोंको पार कर जाता है। इसी प्रकार अमित, अपरिच्छिन्न तमःसागरको पार करके, मूल अविद्यापुरको देखकर, विविध विचित्र अनन्त महामायाविशेषोंसे घिरी हुई, अनन्त महामायाशक्तियोंकी समष्टिरूपा, अनन्त दिव्य तेजोमय ज्वालामालाओंसे सुशोभित, अनन्त महामायाविलासोंकी परम अधिष्ठानस्वरूपा, निरन्तर अमित आनन्द पर्वतपर विहार करनेवाली, मूल प्रकृतिकी जननी अविद्यालक्ष्मीका इस प्रकार (वर्णित रूपसे) ध्यान करता है। फिर विविध उपचारोंसे उनकी आराधना करके, समस्त ब्रह्माण्ड समष्टिकी जननी भगवान् विष्णुकी महामायाको नमस्कार करके उनसे आज्ञा लेकर और ऊपर-से ऊपर जाकर महाविराट् पदको पाता है' ॥ १० ॥ 'महाविराट् स्वरूप कैसा है?' 'समस्त अविद्यापाद विराट् है । सब ओर आँखोंवाला, सब ओर मुखोंवाला, सब ओर हाथोंवाला तथा सब ओर पैरोंवाला है। हाथोंके द्वारा (हाथवालोंको) तथा पंखोंके द्वारा उड़नेवालोंको युक्त करता है। यह देवता अकेला ही स्वर्ग तथा पृथिवीको उत्पन्न करता है। इसका रूप दृष्टिमं नहीं ठहरता। इसे कोई नेत्रोंसे नहीं देखता। हृदयसे, बुद्धिसे तथ मनसे इसका ध्यान किया जाता है। जो इसको जानते हैं, वे अमृतरूप (मुक्त) हो जाते हैं ॥ ११-१४ ॥ '(ऐसे) मन तथा वाणीसे अगोचर विराट्स्वरूपका ध्यान करके नाना प्रकारके उपचारोंसे उनकी आराधना करता

७२४ त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय ६

७२४ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय ६

है तथा उनकी आज्ञा लेकर और ऊपर जाकर विविध विचित्र अनन्त मूल-अविद्याके विलासोंको देखकर उपासक परम आश्चर्यान्वित होता है ॥ १५ ॥ 'वहाँ अखण्ड परिपूर्ण परमानन्दस्वरूप परब्रह्मके समस्त स्वरूपोंमें विरोध प्रदर्शित करनेवाली (सब प्रकारसे विरुद्ध धर्मोंवाली), अपरिच्छिन्न यवनिका (पर्दे) के आकारवाली, भगवान् विष्णुकी महायोगमाया मूर्तिमान् अनन्त महामाया- स्वरूपोंसे भली प्रकार सेवित है। उनका नगर अत्यन्त कौतुकोंसे पूर्ण, अत्यन्त आश्चर्यसागर, आनन्दस्वरूप, शाश्वत है। अविद्यासागरमे प्रतिबिम्बित नित्य वैकुण्ठके प्रतिबिंबस्वरूप दूसरे वैकुण्ठकी भाँति (वह) प्रकाशित है ॥ १६ ॥ 'उस पुरमे पहुँचकर, उपासक योगलक्ष्मी अङ्गमहामायाका ध्यान करके अनेक प्रकारके उपचारोसे उनकी आराधना करता है तथा उनके द्वारा पूजित होकर और उनकी आज्ञा प्राप्त करके और ऊपर जाता है। वहाँ मायाके अनन्त विलासोंको देखकर वह परम आश्चर्यमें डूब जाता है ॥ १७ ॥ 'उससे ऊपर पादविभूति नामक वैकुण्ठ-नगर शोभित है। अत्यन्त आश्चर्यमय अनन्त ऐश्वर्यका समष्टिरूप, आनन्द- रसके प्रवाहोंसे भूषित, चारों ओर अमृत नदीके प्रवाहसे अत्यन्त मङ्गलस्वरूप, ब्रह्मतेजोविशेषस्वरूप अनन्त ब्रह्मवनोंसे चारों ओर घिरा हुआ, अनन्त नित्य-मुक्तोंसे चारो ओर व्याप्त, अनन्त चिन्मय भवनसमूहोंसे भरा हुआ अनादि पादविभूति नामक वैकुण्ठ इस प्रकार सुशोभित है। और उसके मध्यमें चिदानन्द- पर्वत शोभित है। उस (पर्वत) के ऊपर निरतिशय आनन्द- स्वरूप दिव्य तेजोरराशि प्रज्वलित है। उसके मध्यमें परमानन्द- रूप विमान प्रकाशित है। उसके भीतर मध्यस्थानमे चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसनरूप) पद्मकी कर्णिकापर निरतिशय दिव्य तेजोरराशिके मध्य समासीन आदि-नारायणका ध्यान करके विविध उपचारोंसे उनकी आराधना करता है, तथा उनसे पूजित होकर, उनकी आज्ञा लेकर और ऊपर जाता है। आवरणसहित अविद्या-अण्डका भेदन करके, अविद्या- पादको पारकर विद्या-अविद्याकी संधि (मध्यस्थान) में जो विष्वक्सेन-वैकुण्ठ नामक नगर शोभित है (साधक वहाँ पहुँचता है) ॥ १८-१९॥ 'अनन्त दिव्य तेजकी ज्वालामालाओंसे चारों ओर निरन्तर प्रज्वलित, अनन्त ज्ञान एव आनन्दके मूर्तिमान् स्वरूपोंद्वारा चारों ओर घिरा हुआ, शुद्ध ज्ञानरूप विमानावलियोंसे विराजित वह नगर अनन्त आनन्दरूप पर्वतोंसे परम कौतुकमय प्रतीत होता है। उस (पुर) के मध्यमे कल्याणपर्वतके ऊपर शुद्ध आनन्द- रूप विमान शोभित हे। उसके भीतर दिव्य मङ्गलमय आसन विराजमान है। उस (आसनरूप) पद्मकी कर्णिकापर ब्रह्म- तेजोरराशिके मध्यमे समासीन भगवान्‌के अनन्त ऐश्वर्यस्वरूप, विधि निषेधके परिपालक, समस्त प्रवृत्तियों एव सम्पूर्ण कारणोंके कारणस्वरूप, निरतिशय आनन्दलक्षण, महाविष्णुस्वरूप, समस्त मोक्षोंके परिपालक, अमितपराक्रमी—इस प्रकारके श्रीविष्वक्सेनजीका ध्यान करके, प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करता है। फिर विविध उपचारोंसे (उनकी) पूजा करके, उनकी आज्ञा लेकर, और ऊपर जाकर उपासक विद्याविभूतिको प्राप्त करता है तथा विद्यामय, चारो ओर स्थित ब्रह्मतेजोमय अनन्त वैकुण्ठोको देखकर परमानन्द प्राप्त करता है॥ २०॥ '(वहाँसे आगे) विद्यामय अनन्त समुद्रोंको पार करके ब्रह्मविद्या नदीको पाकर (उसके पार पहुँचकर) वहाँ स्नान करके, भगवान्‌का ध्यान करते हुए उपासक पुनः गोता लगाता है और मन्त्रमय शरीरको छोड़कर, विद्यानन्दमय अमृत दिव्य शरीर ग्रहण करता है। इस प्रकार नारायणकी सरूपता (उनके जैसा विग्रह) प्राप्त करके, आत्माकी पूजा करता है, फिर नित्यमुक्त सभी वैकुण्ठस्वामियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर, आनन्द-रससे भरपूर ब्रह्मविद्या प्रवाहोंसे, अनन्त क्रीडानन्द नामक पर्वतोंसे चारो ओर व्याप्त, ब्रह्म विद्यामय सहस्रो प्राचीरोंसे तथा आनन्दामृतसे पूर्ण स्वाभाविक दिव्य गन्धसे युक्त चिन्मय अनन्त ब्रह्मवनोंसे अत्यन्त शोभित—इस प्रकारके ब्रह्मविद्या-वैकुण्ठमें उपासक प्रवेश करता है। उसके भीतर अवस्थित अत्यन्त उन्नत बोधानन्द- मय भवनके अग्र (सम्मुख) भागमें स्थित प्रणवरूप विमानके ऊपर विराजमान अपार ब्रह्मविद्या साम्राज्यकी अधिष्ठातृदेवी, अपने अमोघ मन्दकटाक्षसे अनादि मूल-अविद्याको नष्ट कर देनेवाली, एकमात्र अद्वितीया, अनन्त मोक्षसाम्राज्य लक्ष्मीका इस प्रकार ध्यान करके, प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके अनेक प्रकारके उपचारोंसे उनकी आराधना करता है। फिर पुष्पाञ्जलि समर्पित करके, विशिष्ट स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करके, उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर, उनकी आज्ञा लेकर उन्हींके साथ और ऊपर जाता है। वहाँ ब्रह्मविद्याके तटपर पहुँचकर, ज्ञान एव आनन्दमय अनन्त वैकुण्ठोंको देखकर, निरतिशय आनन्द प्राप्त करता है तथा ज्ञानानन्दमय अनन्त समुद्रोंको पार करके, ब्रह्मवनोंमे तथा परम मङ्गलमय पर्वत- शिखरपर बराबर चलते हुए, ज्ञानानन्दरूप विमानोंकी

अध्याय ६] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७२५

अध्याय ६] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२५ क्रमबद्ध पङ्क्तियोंमें (पहुँचकर) उपासक परमानन्द लाभ करता है ॥ २१ ॥ 'उसके बाद तुलसी नामका वैकुण्ठ नगर प्रकाशित है। वह परम कल्याणरूप, अनन्त ऐश्वर्ययुक्त, अमित तेजोगशि- स्वरूप, अनन्त ब्रह्मतेजोराशिका समष्टिस्वरूप, चिदानन्दमय अनेक प्राकार विशेषों (चहारदीवारियों) से घिरा हुआ, अमितबोधमय आनन्दपर्वतके ऊपर स्थित, बोधानन्द नदीके प्रवाहसे अत्यन्त मङ्गलमय, निरतिशयानन्दस्वरूप अनन्त तुलसी वनोंसे अत्यन्त शोभित, सम्पूर्ण पवित्रोंमें परम पवित्र, चित्स्वरूप, अनन्त नित्यमुक्त पुरुषोंसे अत्यधिक मङ्गल तथा आनन्दमय अनन्त विमान-समूहोंसे सुशोभित, अमित तेजोगशिके अन्तर्गत दिव्य तेजःस्वरूप है ॥ २२ ॥ 'उपासक ऐसे आकारवाले तुलसी-वैकुण्ठमे प्रवेश करके, उसके भीतर दिव्य विमानके ऊपर विराजमान, सर्वपरिपूर्ण महाविष्णुके सर्वाङ्गोंमें विहार करनेवाली, निरतिशय सौन्दर्य- लावण्यकी अधिष्ठात्री देवी, बोधानन्दमय अनन्त नित्य परिजनोंसे परिसेविता, महालक्ष्मीकी सखी श्रीतुलसी लक्ष्मीका इस प्रकार ध्यानकर, उनकी प्रदक्षिणा तथा (उन्हे) नमस्कार करता है तथा अनेक प्रकारके उपचारोंसे उनकी पूजा करके, स्तोत्रविशेषसे स्तुति करता है। फिर उनके द्वारा भली प्रकार पूजित होकर तथा वहाँके निवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर, उनकी आज्ञा पाकर और ऊपर- ऊपर जाकर परमानन्द नदीके किनारे पहुँचता है। वहाँ चारों ओर स्थित शुद्ध ज्ञानानन्दमय अनन्त वैकुण्ठोंको देखकर, निरतिशय आनन्द प्राप्त करता है तथा वहाँके निवासी चिद्रूप (ज्ञानस्वरूप) पुराणपुरुषोंद्वारा भली प्रकार पूजित होता है। आगे दिव्य गन्ध एव आनन्दमय पुष्पवृष्टिसमन्वित दिव्य मङ्गल भवन ब्रह्मवनोंमें, अमित तेजोगशिखरूप एव तरङ्ग- मालाओंसे परिपूर्ण निरतिशय आनन्दरूप अमृतके सागरोंमें, फिर अनन्त शुद्ध ज्ञानस्वरूप विमान-समुदायोंमे भरे आनन्द- गिरिके शिखरसमूहोंमे बराबर चलते हुए उपासक वहाँसे भी ऊपर ऊपर विमानपङ्क्तियों तथा अनन्त तेजोमय पर्वतपङ्क्तियोंमे चलकर, इस क्रमसे विद्यापाद तथा आनन्दपादकी संधि (मध्यस्थान) में पहुँचता है। वहाँ आनन्दनदीके प्रवाहमे स्नान करके, बोधानन्द-वनमे पहुँचकर (देखता है कि) यहाँ अमृतमय पुष्पोंकी निरन्तर वर्षासे युक्त शुद्धबोधमय परमानन्द-स्वरूप वन है। परमानन्दरूप प्रवाहोंसे (वह वन चारों ओर) व्याप्त है। मूर्तिमान् परम मङ्गलोंसे परमाश्चर्य- स्वरूप हो रहा है। वह अपार आनन्द सिन्धुरूप है। क्रीडानन्द नामक पर्वतोंद्वारा सब ओर शोभित है। उसके बीचमें शुद्ध बोधानन्दमय वैकुण्ठ है। यही ब्रह्मविद्यापादका वैकुण्ठ है, जो सहस्रों आनन्द-प्राचीरोंसे प्रज्वलित (भलीभाँति प्रकाशमान) है। वह अनन्त आनन्दरूप विमान समूहोंसे भरा हुआ, अनन्त बोधमयविशेष भवनोंसे चारों ओर निरन्तर जगमगाता हुआ अनन्त क्रीडा-मण्डपोंसे युक्त, बोध-आनन्दमय, अनन्त श्रेष्ठ छत्र, ध्वजाएँ चँवर, वितान (चँदोवे) तथा द्वारोंसे अलङ्कृत, परमानन्द व्यूहरूप (घनीभूत परमानन्दविग्रह) नित्य मुक्तोद्वारा चारो ओरसे व्याप्त, अनन्त दिव्यतेजोमय पर्वतोंका समष्टिरूप, अपरिच्छिन्न अनन्तं शुद्धबोधमय आनन्दका मण्डल, वाणीसे अगोचर (अवर्ण्य), आनन्दमय ब्रह्म-तेजोराशि-मण्डल, अखण्ड तेजोमण्डलरूप, शुद्धानन्द- स्वरूपका समष्टि मण्डलरूप, अखण्ड चिद्घनानन्द-स्वरूप है ॥ २३ ॥ 'उपासक इस प्रकारके बोधानन्दमय वैकुण्ठमें प्रवेश करके, वहाँके सभी निवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होता है। परमानन्द पर्वतपर अखण्ड बोधरूप विमान प्रकाशमय रूपमें स्थित है। उसके भीतर चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसन) के ऊपर अखण्ड आनन्दमय तेजोमण्डल सुशोभित है। उसके मध्यमे समासीन आदि नारायणका ध्यान करके, प्रदक्षिणा एव नमस्कार करके, उपासक विविध प्रकारके उपचारोंसे उनकी भली प्रकार पूजा करता है तथा पुष्पाञ्जलि निवेदित करके, स्तोत्र विशेषसे स्तुति करता है। अपने (नारायण) स्वरूपसे' अवस्थित उपासकको देखकर, उस उपाभकको आदि-नारायण अपने सिंहासनपर भली प्रकार बैठाकर, उस वैकुण्ठके सभी निवासियोंके साथ समस्त मोक्ष-साम्राज्यके पट्टाभिषेक (राज- तिलक) के उद्देश्यसे उसे मन्त्रोंद्वारा पवित्र किये हुए आनन्दस्वरूप कलशोंके (जल) द्वारा स्नान कराते हैं, तथा दिव्य मङ्गलस्वरूप महावाग्यौके (घोषके) साथ नाना प्रकारके उपचारोंसे उसकी भली प्रकार अर्चा करते हैं। फिर अपने सभी मूर्तिमान् अलङ्कारोंसे अलङ्कृत करके, (उसकी) प्रदक्षिणा तथा (उसको) नमस्कार करते हैं और 'तुम ब्रह्म हो। मैं ब्रह्म हूँ। हम दोनोंमें अन्तर नहीं है। तुम्हीं 'मैं' (मेरे स्वरूप) हो। मैं ही तुम (तुम्हारा स्वरूप) हूँ।' यों उच्चारण- कर (दीक्षा देकर), यों कहकर (उसका तत्त्व प्रत्यक्ष कराके) उस समय आदिनारायण अन्तर्हित हो जाते हैं' ॥ २४-२५ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥

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अध्याय ७] - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७२७

अध्याय ७] - * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२७ आनन्दस्वरूप, अनिर्वचनीय, अमितबोधसागर, अपार आनन्द- का समुद्र, विजातीय विशेषताओं (विशेषों) से रहित, सजातीय विशेषताओंसे युक्त, निरवयव, निराधार, निर्विकार, निरञ्जन, अनन्त, ब्रह्मानन्द-समष्टिका घनीभाव, परमचिद्विलासका समष्टि- स्वरूप, निर्मल, निष्कलङ्क एव दूसरे किसीके आश्रयसे रहित है। अत्यन्त निर्मल अनन्तकोटि सूर्योंके प्रकाश उसके सम्मुख एक चिनगारीके समान हैं, जो अनन्त उपनिषदोंका अर्थ- स्वरूप, समस्त प्रमाणोंसे अतीत, मन एव वाणीका अविषय और नित्यमुक्तस्वरूप है। उसका कोई आधार नहीं है, वह आदि-मध्य- अन्तरहित, कैवल्यरूप, परम शान्त, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, महान्से भी परम महान्, अमित आनन्दस्वरूप, शुद्ध बोध- आनन्द-ऐश्वर्यरूप, अनन्त आनन्दमय स्वरूपोंका समष्टिरूप, अविनाशी, अनिर्देश्य, कूटस्थ (निर्विकार), अचल, ध्रुव, दिशा- देश एव कालसे रहित, भीतर और बाहरसे भी सम्पूर्ण जगत्- को व्याप्त करके परिपूर्ण, परम योगियोंद्वारा अन्वेषणीय, देश- काल तथा वस्तुके परिच्छेदसे रहित, निरन्तर नूतन, नित्य परिपूर्ण, अखण्ड आनन्द अमृतरूप, शाश्वत, परमपद, निरतिशय आनन्दमय अनन्त त्रिगुत्यवर्तोंके समान, अद्वितीय, तथा अपने ही प्रकाशसे निरन्तर प्रकाशित है। (वहाँ) परमानन्दस्वरूप अपरिच्छिन्न अनन्त परम ज्योति, जो शाश्वत है, निरन्तर प्रकाशमान है ॥ १७ १८ ॥ 'उसके भीतर बोधानन्द-महोज्ज्वल, नित्य मङ्गल-मन्दिर, चिन्मय समुद्रके मन्थनसे उत्पन्न चित्साररूप, अनन्त आश्चर्योका सागर, अमित तेजोग्राशिके अन्तर्गत विशेष तेजः- स्वरूप, अनन्त आनन्द-प्रवाहोंसे अलङ्कृत निरतिशय आनन्द- सागर-स्वरूप, निरुपम, नित्य, निर्दोष, निरतिशय, निस्सीम तेजोगशिरूप, निरतिशय आनन्दस्वरूप सहस्रों प्राकारो (चहारदीवारियों) से अलङ्कृत, शुद्ध बोधमय भवनसमूहोंसे भूषित, चिदानन्दमय अनन्त दिव्य उपवनोंसे सुशोभित, निरन्तर होनेवाली अपार पुष्पवर्षासे चारों ओरसे व्याप्त धाम है। वही त्रिपाद्विभूति वैकुण्ठ स्थान है। 'वही परम कैवल्य है। वही अबाधित परमतत्त्व है। वही अनन्त उपनिषदोंद्वारा अन्वेषणीय पद है। वही समस्त परम- योगियों तथा मुमुक्षुओं द्वारा चाहा जाता है। वही घनीभूत सत् है। वही घनीभूत चित् है। वही घनीभूत आनन्द है। वही घनीभूत शुद्धबोधरूप अखण्ड आनन्दमय ब्रह्मचैतन्यका अधिदेवता स्वरूप है। सबका अधिष्ठान, अद्वय परब्रह्मका विहार-मण्डल, निरतिशय आनन्दरूप तेजोमण्डल, अद्वैत परमानन्दरूप परब्रह्मका परम अधिष्ठानरूप मण्डल, निरतिशय परमानन्दका परममूर्तस्वरूप मण्डल, अनन्त श्रेष्ठ मूर्तियोंका समष्टिरूप मण्डल, निरतिशय परमानन्दरूप-स्वरूप परब्रह्मकी परममूर्त्तिरूप परमतत्त्वके विलायका स्वरूपभूत मण्डल, बोधानन्दमय अनन्त परम विलासोंकी विभूतियोंका समष्टिरूप मण्डल, अनन्त चिद्विलासकी विभूतियोंको समष्टिरूप मण्डल, अखण्ड शुद्ध चैतन्यका निजमूर्त्तिरूप विग्रह, वाणीके अगोचर अनन्त शुद्धबोधका विग्रहरूप, अनन्त आनन्दसमुद्रों- का समष्टिरूप, अनन्त बोधस्वरूप पर्वतो तथा अनन्त बोधानन्द- रूप पर्वतोंसे अधिष्ठित, निरतिशय आनन्द एव परम मङ्गलमय स्वरूपोंका समष्टिरूप, अखण्ड अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्मकी परममूर्तिके परम तेजःपुञ्जका पिण्डरूप, चिद्रूप (ज्ञानस्वरूप) सूर्यका मण्डलरूप तथा बत्तीस विभिन्न व्यूहोंसे अधिष्ठित है। केशवादि चौबीस व्यूह, सुदर्शन आदिके न्यास मन्त्र, सुदर्शनादि यन्त्रोंका उद्धार, अनन्त-गरुड़-विष्वक्सेनादि (पार्षद) तथा निरतिशय आनन्दरूप भी उसीमे ह ॥ १९-२० ॥ 'उपर्युक्त आनन्द व्यूहके बीचमे सहस्रकोटि योजन विस्तीर्ण उन्नत चिन्मय प्रासाद है। (वह) ब्रह्मानन्दमय करोड़ों विमानसे युक्त एव अत्यन्त मङ्गलस्वरूप है। अनन्त उपनिषदोंके अर्थ- स्वरूप उपवन-समुदायोंने भरा है। सामवेदरूपी हसोके कलनादसे उसकी अत्यन्त शोभा होती है। आनन्दमय अनन्त शिखरोंसे यह अलङ्कृत है। चिदानन्द रसके झरनोंसे व्याप्त है। अखण्डा- नन्दरूप तेजोगशिके भीतर स्थित है। अनन्त आनन्दमय आश्चर्योंका समुद्र है। उसके भीतरी भागमें निरतिशय आनन्दस्वरूप प्रणव नामक विमान है, जिसका प्राकार अनन्तकोटि सूर्योंके प्रकाशसे भी अतिशय प्रकाशमय है (वह विमान) आनन्दमय शतकोटि शिखरोंसे जगमगा रहा है। उसके भीतर बोधानन्द-पर्वतके ऊपर अष्टाक्षरीमण्डप सुशोभित है। उस (मण्डप) के मध्यमे आनन्दवनसे विभूषित चिदानन्दमयी वेदिका है। उसके ऊपर निरतिशयानन्दस्वरूप तेजोगशि प्रज्वलित हो रही है। उसके भीतर अष्टाक्षरी पद्मसे विभूषित चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसनरूप पद्म) की प्रणवरूपी कर्णिकापर चिन्मय सूर्य, चन्द्र तथा अनिके मण्डल (क्रमशः एकके ऊपर एक) प्रज्वलित हैं। वहाँ अखण्ड आनन्दरूप तेजोगशिके भीतर परम मङ्गलाकार अनन्तासन विराजमान है। उसके ऊपर महायन्त्र प्रज्वलित है। निरतिशय ब्रह्मानन्दकी परममूर्त्तिरूप वह महायन्त्र समस्त ब्रह्मतेजकी राशिका समाष्टस्वरूप, चित्स्वरूप, निर्मल, परब्रह्म- स्वरूप, एव परब्रह्मका परम रहस्यमय कैवल्यरूप है।