कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 778, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७२२ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय ५
अवस्थाओंमें प्रकाशित होते हैं। समस्त संसार नारायणमय प्रतीत होता है। नारायणसे भिन्न कुछ नहीं है, इस बुद्धिसे उपासक सर्वत्र विहार करता है॥ १० ॥ '(इस प्रकार) निरन्तर (भाव-) समाधिकी परम्परासे सब कहीं, सभी अवस्थाओमे जगदीश्वरका रूप ही प्रतीत होता है। ऐसे महापुरुषको कभी कभी ईश्वर साक्षात्कार भी होता है॥११॥ 'इस (महापुरुष) को जब शरीर छोड़नेकी इच्छा होती है, तब भगवान् विष्णुके सब पार्षद उसके पास आते हैं। तब भगवान्का ध्यान करता हुआ हृदय-कमलमे स्थित आत्म- तत्त्वका अपने अन्तरात्माके रूपमें चिन्तन करके भली प्रकार (मानसिक) उपचारोसे (उसकी) अर्चा करता है। फिर हस मन्त्र 'सोऽहम्' का उच्चारण करता हुआ, सभी (इन्द्रिय-) द्वारोंका सयम करके, मनका भली प्रकार निरोध करता है और प्रणव (के उच्चारण) से प्रणव (के अर्थ) का अनुसन्धान (विचार) करता हुआ ऊपरकी ओर गमन करनेवाले वायु (प्राण) के साथ धीरे-धीरे ब्रह्मरन्ध्रमे बाहर चला जाता है। वहाँ 'सोऽहम्' इस मन्त्रसे बारह (दस इन्द्रियाँ और मन तथा बुद्धि) के अन्तमें (उनके आधाररूपसे) स्थित परमात्मा (चेतनतत्त्व) को एकत्र करके (अर्थात् इन्द्रियों, मन एव बुद्धिसे चेतना आकर्षित करके) पञ्चोपचार (जल, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) से (मानसिक रूपमे उस चेतन-तत्त्वका) पूजन करता है। फिर 'सोऽहम्' इस मन्त्रसे षोडश तत्त्वोंमें स्थित ज्ञानात्माको एकत्र करके भली प्रकार उपचारोंसे उसकी पूजा करता है। इस प्रकार पहलेके प्राकृत शरीरका त्याग करके फिर कल्पनामय, मन्त्रमय, शुद्ध ब्रह्म तेजोमय, निरतिशय आनन्दमय महाविष्णुके स्वरूपके समान स्वरूपवाले शरीरको धारण करता है और सूर्यमण्डलमें स्थित भगवान् अनन्तके दिव्य चरणारविन्दके अङ्गुष्ठसे निकले हुए निरतिशय आनन्दमय देवनदी गङ्गाजीके प्रवाहका आकर्षण करके भावनाके द्वारा इस (देवगङ्गा-प्रवाह) में स्नान करता है। तत्पश्चात् वस्त्र-आभरणादि सामग्रियोंसे अपनी पूजा (अलङ्कृति) करके, साक्षात् नारायण- स्वरूप होकर फिर गुरुको नमस्कार करके प्रणवस्वरूप गरुड़ का ध्यान करता है और ध्यानके द्वारा प्रकट महाप्रणवरूप गरुड़की पञ्चोपचारसे अर्चा करता है। इसके बाद वह गुरुकी आज्ञासे प्रदक्षिणा एव नमस्कार करके प्रणवरूप गरुड़पर सवार होता है और महाविष्णुके समस्त असाधारण चिह्नोसे चिह्नित होकर तथा उन्हींके समस्त असाधारण दिव्य आभूषणोंसे भूषित होकर, सुदर्शन पुरुष (पुरुष विग्रहधारी सुदर्शनचक्र) को आगे करके, विपक्षसेनेनसे रक्षित, भगवान्के पार्षदोंसे घिरा हुआ आकाशमार्गमे प्रवेश करता है। मार्गके दोनों पार्श्वोंमें स्थित अनेक पुण्यलोकों को पार करके, वहाँ रहनेवाले पुण्य-पुरुषोंसे पूजित होकर, सत्यलोकमे प्रवेश करके ब्रह्माजीकी पूजा करता है और ब्रह्मा तथा सत्यलोकके सभी वासियोंद्वारा भली प्रकार पूजित होकर, भगवान् शङ्करके ईशान कैवल्य (दिव्य कैलास) में जा पहुँचता है। वहाँ भगवान् शङ्करका ध्यान करके, शिवजी- की पूजा करके, सभी शिवगणों एव शङ्करजीद्वारा भी पूजित होकर ग्रहमण्डल तथा सप्तर्षिमण्डलको पार करके सूर्यमण्डल एव चन्द्रमण्डलका भेदन करता है और त्रिलोकनारायणका ध्यान करके, ध्रुवमण्डलका दर्शन करके, भगवान् ध्रुवकी पूजा करता है। फिर शिशमार-चक्रका भेदन करके, शिशुमार प्रजापतिकी भली प्रकार अर्चा करता है और चक्र (शिशुमारचक्र) के मध्यमे स्थित सर्वाधार सनातन महाविष्णुकी आराधना करके, उनके द्वारा पूजित होकर तत्र ऊपर जाकर परमानन्दको प्राप्त होता है ॥१२॥ 'तब सब वैकुण्ठनिवासी उसके पास आते हैं। उन सबकी पूजा करके, उन सबसे पूजित होकर तथा और ऊपर जाकर विरजा नदीको प्राप्त करता है। वहाँ स्नान करके भगवान्का ध्यान करते हुए फिर उसमे डुबकी लगाकर, वहाँ अपञ्चीकृत (मूलरूप, अमिश्रित) पञ्च महाभूतोंसे बने सूक्ष्म अङ्गवाले भोगके साधनरूप सूक्ष्मशरीरको छोड़ देता है तथा मन्त्रमय, दिव्य तेजोमय, निरतिशय आनन्दमय महाविष्णुके स्वरूपके समान शरीर धारण करके, फिर जलसे बाहर निकल आता है। वहाँ अपनी पूजा करके, प्रदक्षिणा एव नमस्कार करते हुए ब्रह्ममय वैकुण्ठमे प्रवेश करके, वहाँके निवासियोंकी भली प्रकार पूजा करके (देखता है कि) उस दिव्यधामके मध्यमें ब्रह्मा- नन्दमय अनन्त परकोटे, भवन, फाटक, विमान एव उपवन- समूहोसे तथा देदीप्यमान शिखरोंसे उपलक्षित निरुपम, नित्य, निर्दोष, निरतिशय, असीम ब्रह्मानन्दनामक पर्वत सुशोभित है १३ 'उस (पर्वत) के ऊपर निरतिशयानन्दमय दिव्य तेजोरानि प्रज्वलित है। उस (तेजोराशि) के मध्यमें शुद्ध ज्ञानमय आनन्दस्वरूप प्रकाशित है। उसके मध्यमे चिन्मय वेदी है। यह (वेदी) आनन्दमय एव आनन्दवनसे भूषित है। उसके मध्यमें उसके ऊपर अमित तेजोरानि प्रज्वलित है। (उस तेजोरानिमें) परममङ्गलमय आसन सुशोभित है। उस (मद्रासनपद्म) की कर्णिकापर शुद्ध शेषभगवान्का भोगासन सुशोभित है। उसके ऊपर भली प्रकार विराजमान आनन्द- परिपालक आदि-नारायणका ध्यान करके, उन सर्वेश्वरका विविध उपचारोंसे पूजन करता है। फिर प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके, उनकी आज्ञा लेकर और ऊपर-ऊपर जाकर पाँचों वैकुण्ठों- को पार करता है तथा अण्डविराट्के कैवल्यपदको प्राप्त करके, उनकी आराधना करके उपासक परमानन्द प्राप्त करता है' १४
॥ पञ्चम अध्याय समाप्त ॥ ५ ॥