भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 779

अध्याय ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२३ षष्ठ अध्याय मोक्षमार्गके स्वरूपका निरूपण

'तब परमानन्दकी प्राप्ति होनेपर उपासक आवरणसहित ब्रह्माण्डका भेदन करके, चारों ओर देखकर ब्रह्माण्डके स्वरूप- का निरीक्षण करता है तथा परमार्थतः उनके स्वरूपको ब्रह्मज्ञान के द्वारा जानकर ( समझ जाता है कि) समस्त वेद, शास्त्र, इतिहास, पुराण, समस्त विद्या-समूह, ब्रह्मादि सब देवता और सभी परमर्षि भी ब्रह्माण्डके भीतर स्थित प्रपञ्चके एक देश (एक अङ्ग) का ही वर्णन करते हैं। (वे सब) ब्रह्माण्डके स्वरूपको नहीं जानते। ब्रह्माण्डसे बाहर स्थित प्रपञ्चके रहस्यको तो जानते ही नहीं। फिर ब्रह्माण्डके भीतर एव बाहरके प्रपञ्च- ज्ञानसे दूर मोक्षप्रपञ्च (स्वरूप) ज्ञान तथा अविद्या प्रपञ्च- ज्ञानको तो जान ही कैसे सकते हैं? ॥ १ ॥ 'ब्रह्माण्डका स्वरूप कैसा है?' ॥ २ ॥ 'वह सूर्यके अण्डेके समान आवरण महत्तत्त्वादि-समष्टि मय ब्रह्माण्ड तेजोमय, तपे हुए स्वर्णके समान प्रभावाला, उदय होते हुए करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिवाला, चारों प्रकारकी (उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज, जरायुज) सृष्टिमे उपलक्षित पाँचों (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाशरूप) महाभूतोंसे ढका हुआ, तथा महत्तत्त्व, अहङ्कार, तम और मूलप्रकृतिसे घिरा हुआ है ॥ ३ ॥ 'अण्डकी भित्ति सत्तर करोड़ योजन विशाल है। प्रत्येक आवरण उसी प्रमाणका (उतना ही विशाल) है ॥ ४ ॥ 'चारों ओरसे ब्रह्माण्डका प्रमाण दो रत्न योजन है। महामण्डूक आदि अनन्त शक्तियोंसे वह अधिष्ठित (धारण किया हुआ) है। श्रीनारायणके खेलनेकी गेंदके समान वह है। परमाणुके समान विष्णुप्रेङ्कमें चिपका है। किसीके द्वारा न देखी, न सुनी अनेक प्रकारकी अनन्त विचित्रताओंकी विशेषतासे युक्त है ॥ ५ ॥ 'इस ब्रह्माण्डके चारों ओर ऐसे ही दूसरे अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड अपने आवरणोंके साथ प्रकाशित होते हुए अवस्थित हैं ॥ ६ ॥ '(वे ब्रह्माण्ड) चार मुखोंके, पाँच मुखोंके, छः मुखोंवाले, सात मुखोंके, आठ मुखोंके—इस प्रकार संख्याक्रमसे सहस्र मुखोंतकके, श्रीनारायणके अंशरूप, रजोगुणप्रधान एक-एक सृष्टिकर्त्ता (ब्रह्मा) द्वारा अधिष्ठित हैं। विष्णु, महेश्वर नाम- वाले, श्रीनारायणके अंशरूप, सत्त्व तथा तमोगुणप्रधान एक-

एक स्थिति तथा संहारकर्त्तामें भी अधिष्ठित हैं। (वे सब ब्रह्माण्ड) विशाल जलप्रवाहमें मत्स्य तथा बुलबुलोंके अनन्त समूहोंकी भाँति घूमते रहते हैं ॥ ७ ॥ 'क्रीड़ामें लगे बालककी हथेलीमे आँवलोंके समूहकी भाँति महाविष्णुकी हथेलीमे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड शोभित हो रहे हैं ॥ ८ ॥ 'जल्यन्त्र (रहँट) में लगे घड़ोंकी मालाके समूहकी भाँति महाविष्णुके एक-एक रोमकूपके छिद्रोंमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड अपने आवरणोंके साथ घूमते रहते हैं ॥ ९ ॥ '(उपर्युक्त गति प्राप्त उपासक) समस्त ब्रह्माण्डोंके भीतर एव बाहरके प्रापञ्चिक रहस्यको ब्रह्मज्ञानके द्वारा जानकर तथा नाना प्रकारकी विचित्र-अनन्त परमेश्वर्यकी समष्टिरूप विशेषोंको भली प्रकार देखकर अत्यन्त आश्चर्यमय अमृतसागरमें गोता लगाता है और निरतिशय आनन्द समुद्ररूप होकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्डसमुद्रोंको पार कर जाता है। इसी प्रकार अमित, अपरिच्छिन्न तमःसागरको पार करके, मूल अविद्यापुरको देखकर, विविध विचित्र अनन्त महामायाविशेषोंसे घिरी हुई, अनन्त महामायाशक्तियोंकी समष्टिरूपा, अनन्त दिव्य तेजोमय ज्वालामालाओंसे सुशोभित, अनन्त महामायाविलासोंकी परम अधिष्ठानस्वरूपा, निरन्तर अमित आनन्द पर्वतपर विहार करनेवाली, मूल प्रकृतिकी जननी अविद्यालक्ष्मीका इस प्रकार (वर्णित रूपसे) ध्यान करता है। फिर विविध उपचारोंसे उनकी आराधना करके, समस्त ब्रह्माण्ड समष्टिकी जननी भगवान् विष्णुकी महामायाको नमस्कार करके उनसे आज्ञा लेकर और ऊपर-से ऊपर जाकर महाविराट् पदको पाता है' ॥ १० ॥ 'महाविराट् स्वरूप कैसा है?' 'समस्त अविद्यापाद विराट् है । सब ओर आँखोंवाला, सब ओर मुखोंवाला, सब ओर हाथोंवाला तथा सब ओर पैरोंवाला है। हाथोंके द्वारा (हाथवालोंको) तथा पंखोंके द्वारा उड़नेवालोंको युक्त करता है। यह देवता अकेला ही स्वर्ग तथा पृथिवीको उत्पन्न करता है। इसका रूप दृष्टिमं नहीं ठहरता। इसे कोई नेत्रोंसे नहीं देखता। हृदयसे, बुद्धिसे तथ मनसे इसका ध्यान किया जाता है। जो इसको जानते हैं, वे अमृतरूप (मुक्त) हो जाते हैं ॥ ११-१४ ॥ '(ऐसे) मन तथा वाणीसे अगोचर विराट्स्वरूपका ध्यान करके नाना प्रकारके उपचारोंसे उनकी आराधना करता