कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 780, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७२४ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय ६
है तथा उनकी आज्ञा लेकर और ऊपर जाकर विविध विचित्र अनन्त मूल-अविद्याके विलासोंको देखकर उपासक परम आश्चर्यान्वित होता है ॥ १५ ॥ 'वहाँ अखण्ड परिपूर्ण परमानन्दस्वरूप परब्रह्मके समस्त स्वरूपोंमें विरोध प्रदर्शित करनेवाली (सब प्रकारसे विरुद्ध धर्मोंवाली), अपरिच्छिन्न यवनिका (पर्दे) के आकारवाली, भगवान् विष्णुकी महायोगमाया मूर्तिमान् अनन्त महामाया- स्वरूपोंसे भली प्रकार सेवित है। उनका नगर अत्यन्त कौतुकोंसे पूर्ण, अत्यन्त आश्चर्यसागर, आनन्दस्वरूप, शाश्वत है। अविद्यासागरमे प्रतिबिम्बित नित्य वैकुण्ठके प्रतिबिंबस्वरूप दूसरे वैकुण्ठकी भाँति (वह) प्रकाशित है ॥ १६ ॥ 'उस पुरमे पहुँचकर, उपासक योगलक्ष्मी अङ्गमहामायाका ध्यान करके अनेक प्रकारके उपचारोसे उनकी आराधना करता है तथा उनके द्वारा पूजित होकर और उनकी आज्ञा प्राप्त करके और ऊपर जाता है। वहाँ मायाके अनन्त विलासोंको देखकर वह परम आश्चर्यमें डूब जाता है ॥ १७ ॥ 'उससे ऊपर पादविभूति नामक वैकुण्ठ-नगर शोभित है। अत्यन्त आश्चर्यमय अनन्त ऐश्वर्यका समष्टिरूप, आनन्द- रसके प्रवाहोंसे भूषित, चारों ओर अमृत नदीके प्रवाहसे अत्यन्त मङ्गलस्वरूप, ब्रह्मतेजोविशेषस्वरूप अनन्त ब्रह्मवनोंसे चारों ओर घिरा हुआ, अनन्त नित्य-मुक्तोंसे चारो ओर व्याप्त, अनन्त चिन्मय भवनसमूहोंसे भरा हुआ अनादि पादविभूति नामक वैकुण्ठ इस प्रकार सुशोभित है। और उसके मध्यमें चिदानन्द- पर्वत शोभित है। उस (पर्वत) के ऊपर निरतिशय आनन्द- स्वरूप दिव्य तेजोरराशि प्रज्वलित है। उसके मध्यमें परमानन्द- रूप विमान प्रकाशित है। उसके भीतर मध्यस्थानमे चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसनरूप) पद्मकी कर्णिकापर निरतिशय दिव्य तेजोरराशिके मध्य समासीन आदि-नारायणका ध्यान करके विविध उपचारोंसे उनकी आराधना करता है, तथा उनसे पूजित होकर, उनकी आज्ञा लेकर और ऊपर जाता है। आवरणसहित अविद्या-अण्डका भेदन करके, अविद्या- पादको पारकर विद्या-अविद्याकी संधि (मध्यस्थान) में जो विष्वक्सेन-वैकुण्ठ नामक नगर शोभित है (साधक वहाँ पहुँचता है) ॥ १८-१९॥ 'अनन्त दिव्य तेजकी ज्वालामालाओंसे चारों ओर निरन्तर प्रज्वलित, अनन्त ज्ञान एव आनन्दके मूर्तिमान् स्वरूपोंद्वारा चारों ओर घिरा हुआ, शुद्ध ज्ञानरूप विमानावलियोंसे विराजित वह नगर अनन्त आनन्दरूप पर्वतोंसे परम कौतुकमय प्रतीत होता है। उस (पुर) के मध्यमे कल्याणपर्वतके ऊपर शुद्ध आनन्द- रूप विमान शोभित हे। उसके भीतर दिव्य मङ्गलमय आसन विराजमान है। उस (आसनरूप) पद्मकी कर्णिकापर ब्रह्म- तेजोरराशिके मध्यमे समासीन भगवान्के अनन्त ऐश्वर्यस्वरूप, विधि निषेधके परिपालक, समस्त प्रवृत्तियों एव सम्पूर्ण कारणोंके कारणस्वरूप, निरतिशय आनन्दलक्षण, महाविष्णुस्वरूप, समस्त मोक्षोंके परिपालक, अमितपराक्रमी—इस प्रकारके श्रीविष्वक्सेनजीका ध्यान करके, प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करता है। फिर विविध उपचारोंसे (उनकी) पूजा करके, उनकी आज्ञा लेकर, और ऊपर जाकर उपासक विद्याविभूतिको प्राप्त करता है तथा विद्यामय, चारो ओर स्थित ब्रह्मतेजोमय अनन्त वैकुण्ठोको देखकर परमानन्द प्राप्त करता है॥ २०॥ '(वहाँसे आगे) विद्यामय अनन्त समुद्रोंको पार करके ब्रह्मविद्या नदीको पाकर (उसके पार पहुँचकर) वहाँ स्नान करके, भगवान्का ध्यान करते हुए उपासक पुनः गोता लगाता है और मन्त्रमय शरीरको छोड़कर, विद्यानन्दमय अमृत दिव्य शरीर ग्रहण करता है। इस प्रकार नारायणकी सरूपता (उनके जैसा विग्रह) प्राप्त करके, आत्माकी पूजा करता है, फिर नित्यमुक्त सभी वैकुण्ठस्वामियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर, आनन्द-रससे भरपूर ब्रह्मविद्या प्रवाहोंसे, अनन्त क्रीडानन्द नामक पर्वतोंसे चारो ओर व्याप्त, ब्रह्म विद्यामय सहस्रो प्राचीरोंसे तथा आनन्दामृतसे पूर्ण स्वाभाविक दिव्य गन्धसे युक्त चिन्मय अनन्त ब्रह्मवनोंसे अत्यन्त शोभित—इस प्रकारके ब्रह्मविद्या-वैकुण्ठमें उपासक प्रवेश करता है। उसके भीतर अवस्थित अत्यन्त उन्नत बोधानन्द- मय भवनके अग्र (सम्मुख) भागमें स्थित प्रणवरूप विमानके ऊपर विराजमान अपार ब्रह्मविद्या साम्राज्यकी अधिष्ठातृदेवी, अपने अमोघ मन्दकटाक्षसे अनादि मूल-अविद्याको नष्ट कर देनेवाली, एकमात्र अद्वितीया, अनन्त मोक्षसाम्राज्य लक्ष्मीका इस प्रकार ध्यान करके, प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके अनेक प्रकारके उपचारोंसे उनकी आराधना करता है। फिर पुष्पाञ्जलि समर्पित करके, विशिष्ट स्तोत्रोंसे उनकी स्तुति करके, उनके द्वारा भलीभाँति पूजित होकर, उनकी आज्ञा लेकर उन्हींके साथ और ऊपर जाता है। वहाँ ब्रह्मविद्याके तटपर पहुँचकर, ज्ञान एव आनन्दमय अनन्त वैकुण्ठोंको देखकर, निरतिशय आनन्द प्राप्त करता है तथा ज्ञानानन्दमय अनन्त समुद्रोंको पार करके, ब्रह्मवनोंमे तथा परम मङ्गलमय पर्वत- शिखरपर बराबर चलते हुए, ज्ञानानन्दरूप विमानोंकी