भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 781

अध्याय ६] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२५ क्रमबद्ध पङ्क्तियोंमें (पहुँचकर) उपासक परमानन्द लाभ करता है ॥ २१ ॥ 'उसके बाद तुलसी नामका वैकुण्ठ नगर प्रकाशित है। वह परम कल्याणरूप, अनन्त ऐश्वर्ययुक्त, अमित तेजोगशि- स्वरूप, अनन्त ब्रह्मतेजोराशिका समष्टिस्वरूप, चिदानन्दमय अनेक प्राकार विशेषों (चहारदीवारियों) से घिरा हुआ, अमितबोधमय आनन्दपर्वतके ऊपर स्थित, बोधानन्द नदीके प्रवाहसे अत्यन्त मङ्गलमय, निरतिशयानन्दस्वरूप अनन्त तुलसी वनोंसे अत्यन्त शोभित, सम्पूर्ण पवित्रोंमें परम पवित्र, चित्स्वरूप, अनन्त नित्यमुक्त पुरुषोंसे अत्यधिक मङ्गल तथा आनन्दमय अनन्त विमान-समूहोंसे सुशोभित, अमित तेजोगशिके अन्तर्गत दिव्य तेजःस्वरूप है ॥ २२ ॥ 'उपासक ऐसे आकारवाले तुलसी-वैकुण्ठमे प्रवेश करके, उसके भीतर दिव्य विमानके ऊपर विराजमान, सर्वपरिपूर्ण महाविष्णुके सर्वाङ्गोंमें विहार करनेवाली, निरतिशय सौन्दर्य- लावण्यकी अधिष्ठात्री देवी, बोधानन्दमय अनन्त नित्य परिजनोंसे परिसेविता, महालक्ष्मीकी सखी श्रीतुलसी लक्ष्मीका इस प्रकार ध्यानकर, उनकी प्रदक्षिणा तथा (उन्हे) नमस्कार करता है तथा अनेक प्रकारके उपचारोंसे उनकी पूजा करके, स्तोत्रविशेषसे स्तुति करता है। फिर उनके द्वारा भली प्रकार पूजित होकर तथा वहाँके निवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर, उनकी आज्ञा पाकर और ऊपर- ऊपर जाकर परमानन्द नदीके किनारे पहुँचता है। वहाँ चारों ओर स्थित शुद्ध ज्ञानानन्दमय अनन्त वैकुण्ठोंको देखकर, निरतिशय आनन्द प्राप्त करता है तथा वहाँके निवासी चिद्रूप (ज्ञानस्वरूप) पुराणपुरुषोंद्वारा भली प्रकार पूजित होता है। आगे दिव्य गन्ध एव आनन्दमय पुष्पवृष्टिसमन्वित दिव्य मङ्गल भवन ब्रह्मवनोंमें, अमित तेजोगशिखरूप एव तरङ्ग- मालाओंसे परिपूर्ण निरतिशय आनन्दरूप अमृतके सागरोंमें, फिर अनन्त शुद्ध ज्ञानस्वरूप विमान-समुदायोंमे भरे आनन्द- गिरिके शिखरसमूहोंमे बराबर चलते हुए उपासक वहाँसे भी ऊपर ऊपर विमानपङ्क्तियों तथा अनन्त तेजोमय पर्वतपङ्क्तियोंमे चलकर, इस क्रमसे विद्यापाद तथा आनन्दपादकी संधि (मध्यस्थान) में पहुँचता है। वहाँ आनन्दनदीके प्रवाहमे स्नान करके, बोधानन्द-वनमे पहुँचकर (देखता है कि) यहाँ अमृतमय पुष्पोंकी निरन्तर वर्षासे युक्त शुद्धबोधमय परमानन्द-स्वरूप वन है। परमानन्दरूप प्रवाहोंसे (वह वन चारों ओर) व्याप्त है। मूर्तिमान् परम मङ्गलोंसे परमाश्चर्य- स्वरूप हो रहा है। वह अपार आनन्द सिन्धुरूप है। क्रीडानन्द नामक पर्वतोंद्वारा सब ओर शोभित है। उसके बीचमें शुद्ध बोधानन्दमय वैकुण्ठ है। यही ब्रह्मविद्यापादका वैकुण्ठ है, जो सहस्रों आनन्द-प्राचीरोंसे प्रज्वलित (भलीभाँति प्रकाशमान) है। वह अनन्त आनन्दरूप विमान समूहोंसे भरा हुआ, अनन्त बोधमयविशेष भवनोंसे चारों ओर निरन्तर जगमगाता हुआ अनन्त क्रीडा-मण्डपोंसे युक्त, बोध-आनन्दमय, अनन्त श्रेष्ठ छत्र, ध्वजाएँ चँवर, वितान (चँदोवे) तथा द्वारोंसे अलङ्कृत, परमानन्द व्यूहरूप (घनीभूत परमानन्दविग्रह) नित्य मुक्तोद्वारा चारो ओरसे व्याप्त, अनन्त दिव्यतेजोमय पर्वतोंका समष्टिरूप, अपरिच्छिन्न अनन्तं शुद्धबोधमय आनन्दका मण्डल, वाणीसे अगोचर (अवर्ण्य), आनन्दमय ब्रह्म-तेजोराशि-मण्डल, अखण्ड तेजोमण्डलरूप, शुद्धानन्द- स्वरूपका समष्टि मण्डलरूप, अखण्ड चिद्घनानन्द-स्वरूप है ॥ २३ ॥ 'उपासक इस प्रकारके बोधानन्दमय वैकुण्ठमें प्रवेश करके, वहाँके सभी निवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होता है। परमानन्द पर्वतपर अखण्ड बोधरूप विमान प्रकाशमय रूपमें स्थित है। उसके भीतर चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसन) के ऊपर अखण्ड आनन्दमय तेजोमण्डल सुशोभित है। उसके मध्यमे समासीन आदि नारायणका ध्यान करके, प्रदक्षिणा एव नमस्कार करके, उपासक विविध प्रकारके उपचारोंसे उनकी भली प्रकार पूजा करता है तथा पुष्पाञ्जलि निवेदित करके, स्तोत्र विशेषसे स्तुति करता है। अपने (नारायण) स्वरूपसे' अवस्थित उपासकको देखकर, उस उपाभकको आदि-नारायण अपने सिंहासनपर भली प्रकार बैठाकर, उस वैकुण्ठके सभी निवासियोंके साथ समस्त मोक्ष-साम्राज्यके पट्टाभिषेक (राज- तिलक) के उद्देश्यसे उसे मन्त्रोंद्वारा पवित्र किये हुए आनन्दस्वरूप कलशोंके (जल) द्वारा स्नान कराते हैं, तथा दिव्य मङ्गलस्वरूप महावाग्यौके (घोषके) साथ नाना प्रकारके उपचारोंसे उसकी भली प्रकार अर्चा करते हैं। फिर अपने सभी मूर्तिमान् अलङ्कारोंसे अलङ्कृत करके, (उसकी) प्रदक्षिणा तथा (उसको) नमस्कार करते हैं और 'तुम ब्रह्म हो। मैं ब्रह्म हूँ। हम दोनोंमें अन्तर नहीं है। तुम्हीं 'मैं' (मेरे स्वरूप) हो। मैं ही तुम (तुम्हारा स्वरूप) हूँ।' यों उच्चारण- कर (दीक्षा देकर), यों कहकर (उसका तत्त्व प्रत्यक्ष कराके) उस समय आदिनारायण अन्तर्हित हो जाते हैं' ॥ २४-२५ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥