कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७२५
अध्याय ६] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२५ क्रमबद्ध पङ्क्तियोंमें (पहुँचकर) उपासक परमानन्द लाभ करता है ॥ २१ ॥ 'उसके बाद तुलसी नामका वैकुण्ठ नगर प्रकाशित है। वह परम कल्याणरूप, अनन्त ऐश्वर्ययुक्त, अमित तेजोगशि- स्वरूप, अनन्त ब्रह्मतेजोराशिका समष्टिस्वरूप, चिदानन्दमय अनेक प्राकार विशेषों (चहारदीवारियों) से घिरा हुआ, अमितबोधमय आनन्दपर्वतके ऊपर स्थित, बोधानन्द नदीके प्रवाहसे अत्यन्त मङ्गलमय, निरतिशयानन्दस्वरूप अनन्त तुलसी वनोंसे अत्यन्त शोभित, सम्पूर्ण पवित्रोंमें परम पवित्र, चित्स्वरूप, अनन्त नित्यमुक्त पुरुषोंसे अत्यधिक मङ्गल तथा आनन्दमय अनन्त विमान-समूहोंसे सुशोभित, अमित तेजोगशिके अन्तर्गत दिव्य तेजःस्वरूप है ॥ २२ ॥ 'उपासक ऐसे आकारवाले तुलसी-वैकुण्ठमे प्रवेश करके, उसके भीतर दिव्य विमानके ऊपर विराजमान, सर्वपरिपूर्ण महाविष्णुके सर्वाङ्गोंमें विहार करनेवाली, निरतिशय सौन्दर्य- लावण्यकी अधिष्ठात्री देवी, बोधानन्दमय अनन्त नित्य परिजनोंसे परिसेविता, महालक्ष्मीकी सखी श्रीतुलसी लक्ष्मीका इस प्रकार ध्यानकर, उनकी प्रदक्षिणा तथा (उन्हे) नमस्कार करता है तथा अनेक प्रकारके उपचारोंसे उनकी पूजा करके, स्तोत्रविशेषसे स्तुति करता है। फिर उनके द्वारा भली प्रकार पूजित होकर तथा वहाँके निवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होकर, उनकी आज्ञा पाकर और ऊपर- ऊपर जाकर परमानन्द नदीके किनारे पहुँचता है। वहाँ चारों ओर स्थित शुद्ध ज्ञानानन्दमय अनन्त वैकुण्ठोंको देखकर, निरतिशय आनन्द प्राप्त करता है तथा वहाँके निवासी चिद्रूप (ज्ञानस्वरूप) पुराणपुरुषोंद्वारा भली प्रकार पूजित होता है। आगे दिव्य गन्ध एव आनन्दमय पुष्पवृष्टिसमन्वित दिव्य मङ्गल भवन ब्रह्मवनोंमें, अमित तेजोगशिखरूप एव तरङ्ग- मालाओंसे परिपूर्ण निरतिशय आनन्दरूप अमृतके सागरोंमें, फिर अनन्त शुद्ध ज्ञानस्वरूप विमान-समुदायोंमे भरे आनन्द- गिरिके शिखरसमूहोंमे बराबर चलते हुए उपासक वहाँसे भी ऊपर ऊपर विमानपङ्क्तियों तथा अनन्त तेजोमय पर्वतपङ्क्तियोंमे चलकर, इस क्रमसे विद्यापाद तथा आनन्दपादकी संधि (मध्यस्थान) में पहुँचता है। वहाँ आनन्दनदीके प्रवाहमे स्नान करके, बोधानन्द-वनमे पहुँचकर (देखता है कि) यहाँ अमृतमय पुष्पोंकी निरन्तर वर्षासे युक्त शुद्धबोधमय परमानन्द-स्वरूप वन है। परमानन्दरूप प्रवाहोंसे (वह वन चारों ओर) व्याप्त है। मूर्तिमान् परम मङ्गलोंसे परमाश्चर्य- स्वरूप हो रहा है। वह अपार आनन्द सिन्धुरूप है। क्रीडानन्द नामक पर्वतोंद्वारा सब ओर शोभित है। उसके बीचमें शुद्ध बोधानन्दमय वैकुण्ठ है। यही ब्रह्मविद्यापादका वैकुण्ठ है, जो सहस्रों आनन्द-प्राचीरोंसे प्रज्वलित (भलीभाँति प्रकाशमान) है। वह अनन्त आनन्दरूप विमान समूहोंसे भरा हुआ, अनन्त बोधमयविशेष भवनोंसे चारों ओर निरन्तर जगमगाता हुआ अनन्त क्रीडा-मण्डपोंसे युक्त, बोध-आनन्दमय, अनन्त श्रेष्ठ छत्र, ध्वजाएँ चँवर, वितान (चँदोवे) तथा द्वारोंसे अलङ्कृत, परमानन्द व्यूहरूप (घनीभूत परमानन्दविग्रह) नित्य मुक्तोद्वारा चारो ओरसे व्याप्त, अनन्त दिव्यतेजोमय पर्वतोंका समष्टिरूप, अपरिच्छिन्न अनन्तं शुद्धबोधमय आनन्दका मण्डल, वाणीसे अगोचर (अवर्ण्य), आनन्दमय ब्रह्म-तेजोराशि-मण्डल, अखण्ड तेजोमण्डलरूप, शुद्धानन्द- स्वरूपका समष्टि मण्डलरूप, अखण्ड चिद्घनानन्द-स्वरूप है ॥ २३ ॥ 'उपासक इस प्रकारके बोधानन्दमय वैकुण्ठमें प्रवेश करके, वहाँके सभी निवासियोंद्वारा भलीभाँति पूजित होता है। परमानन्द पर्वतपर अखण्ड बोधरूप विमान प्रकाशमय रूपमें स्थित है। उसके भीतर चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसन) के ऊपर अखण्ड आनन्दमय तेजोमण्डल सुशोभित है। उसके मध्यमे समासीन आदि नारायणका ध्यान करके, प्रदक्षिणा एव नमस्कार करके, उपासक विविध प्रकारके उपचारोंसे उनकी भली प्रकार पूजा करता है तथा पुष्पाञ्जलि निवेदित करके, स्तोत्र विशेषसे स्तुति करता है। अपने (नारायण) स्वरूपसे' अवस्थित उपासकको देखकर, उस उपाभकको आदि-नारायण अपने सिंहासनपर भली प्रकार बैठाकर, उस वैकुण्ठके सभी निवासियोंके साथ समस्त मोक्ष-साम्राज्यके पट्टाभिषेक (राज- तिलक) के उद्देश्यसे उसे मन्त्रोंद्वारा पवित्र किये हुए आनन्दस्वरूप कलशोंके (जल) द्वारा स्नान कराते हैं, तथा दिव्य मङ्गलस्वरूप महावाग्यौके (घोषके) साथ नाना प्रकारके उपचारोंसे उसकी भली प्रकार अर्चा करते हैं। फिर अपने सभी मूर्तिमान् अलङ्कारोंसे अलङ्कृत करके, (उसकी) प्रदक्षिणा तथा (उसको) नमस्कार करते हैं और 'तुम ब्रह्म हो। मैं ब्रह्म हूँ। हम दोनोंमें अन्तर नहीं है। तुम्हीं 'मैं' (मेरे स्वरूप) हो। मैं ही तुम (तुम्हारा स्वरूप) हूँ।' यों उच्चारण- कर (दीक्षा देकर), यों कहकर (उसका तत्त्व प्रत्यक्ष कराके) उस समय आदिनारायण अन्तर्हित हो जाते हैं' ॥ २४-२५ ॥ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
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अध्याय ७] - महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७२७
अध्याय ७] - * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२७ आनन्दस्वरूप, अनिर्वचनीय, अमितबोधसागर, अपार आनन्द- का समुद्र, विजातीय विशेषताओं (विशेषों) से रहित, सजातीय विशेषताओंसे युक्त, निरवयव, निराधार, निर्विकार, निरञ्जन, अनन्त, ब्रह्मानन्द-समष्टिका घनीभाव, परमचिद्विलासका समष्टि- स्वरूप, निर्मल, निष्कलङ्क एव दूसरे किसीके आश्रयसे रहित है। अत्यन्त निर्मल अनन्तकोटि सूर्योंके प्रकाश उसके सम्मुख एक चिनगारीके समान हैं, जो अनन्त उपनिषदोंका अर्थ- स्वरूप, समस्त प्रमाणोंसे अतीत, मन एव वाणीका अविषय और नित्यमुक्तस्वरूप है। उसका कोई आधार नहीं है, वह आदि-मध्य- अन्तरहित, कैवल्यरूप, परम शान्त, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्मतर, महान्से भी परम महान्, अमित आनन्दस्वरूप, शुद्ध बोध- आनन्द-ऐश्वर्यरूप, अनन्त आनन्दमय स्वरूपोंका समष्टिरूप, अविनाशी, अनिर्देश्य, कूटस्थ (निर्विकार), अचल, ध्रुव, दिशा- देश एव कालसे रहित, भीतर और बाहरसे भी सम्पूर्ण जगत्- को व्याप्त करके परिपूर्ण, परम योगियोंद्वारा अन्वेषणीय, देश- काल तथा वस्तुके परिच्छेदसे रहित, निरन्तर नूतन, नित्य परिपूर्ण, अखण्ड आनन्द अमृतरूप, शाश्वत, परमपद, निरतिशय आनन्दमय अनन्त त्रिगुत्यवर्तोंके समान, अद्वितीय, तथा अपने ही प्रकाशसे निरन्तर प्रकाशित है। (वहाँ) परमानन्दस्वरूप अपरिच्छिन्न अनन्त परम ज्योति, जो शाश्वत है, निरन्तर प्रकाशमान है ॥ १७ १८ ॥ 'उसके भीतर बोधानन्द-महोज्ज्वल, नित्य मङ्गल-मन्दिर, चिन्मय समुद्रके मन्थनसे उत्पन्न चित्साररूप, अनन्त आश्चर्योका सागर, अमित तेजोग्राशिके अन्तर्गत विशेष तेजः- स्वरूप, अनन्त आनन्द-प्रवाहोंसे अलङ्कृत निरतिशय आनन्द- सागर-स्वरूप, निरुपम, नित्य, निर्दोष, निरतिशय, निस्सीम तेजोगशिरूप, निरतिशय आनन्दस्वरूप सहस्रों प्राकारो (चहारदीवारियों) से अलङ्कृत, शुद्ध बोधमय भवनसमूहोंसे भूषित, चिदानन्दमय अनन्त दिव्य उपवनोंसे सुशोभित, निरन्तर होनेवाली अपार पुष्पवर्षासे चारों ओरसे व्याप्त धाम है। वही त्रिपाद्विभूति वैकुण्ठ स्थान है। 'वही परम कैवल्य है। वही अबाधित परमतत्त्व है। वही अनन्त उपनिषदोंद्वारा अन्वेषणीय पद है। वही समस्त परम- योगियों तथा मुमुक्षुओं द्वारा चाहा जाता है। वही घनीभूत सत् है। वही घनीभूत चित् है। वही घनीभूत आनन्द है। वही घनीभूत शुद्धबोधरूप अखण्ड आनन्दमय ब्रह्मचैतन्यका अधिदेवता स्वरूप है। सबका अधिष्ठान, अद्वय परब्रह्मका विहार-मण्डल, निरतिशय आनन्दरूप तेजोमण्डल, अद्वैत परमानन्दरूप परब्रह्मका परम अधिष्ठानरूप मण्डल, निरतिशय परमानन्दका परममूर्तस्वरूप मण्डल, अनन्त श्रेष्ठ मूर्तियोंका समष्टिरूप मण्डल, निरतिशय परमानन्दरूप-स्वरूप परब्रह्मकी परममूर्त्तिरूप परमतत्त्वके विलायका स्वरूपभूत मण्डल, बोधानन्दमय अनन्त परम विलासोंकी विभूतियोंका समष्टिरूप मण्डल, अनन्त चिद्विलासकी विभूतियोंको समष्टिरूप मण्डल, अखण्ड शुद्ध चैतन्यका निजमूर्त्तिरूप विग्रह, वाणीके अगोचर अनन्त शुद्धबोधका विग्रहरूप, अनन्त आनन्दसमुद्रों- का समष्टिरूप, अनन्त बोधस्वरूप पर्वतो तथा अनन्त बोधानन्द- रूप पर्वतोंसे अधिष्ठित, निरतिशय आनन्द एव परम मङ्गलमय स्वरूपोंका समष्टिरूप, अखण्ड अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्मकी परममूर्तिके परम तेजःपुञ्जका पिण्डरूप, चिद्रूप (ज्ञानस्वरूप) सूर्यका मण्डलरूप तथा बत्तीस विभिन्न व्यूहोंसे अधिष्ठित है। केशवादि चौबीस व्यूह, सुदर्शन आदिके न्यास मन्त्र, सुदर्शनादि यन्त्रोंका उद्धार, अनन्त-गरुड़-विष्वक्सेनादि (पार्षद) तथा निरतिशय आनन्दरूप भी उसीमे ह ॥ १९-२० ॥ 'उपर्युक्त आनन्द व्यूहके बीचमे सहस्रकोटि योजन विस्तीर्ण उन्नत चिन्मय प्रासाद है। (वह) ब्रह्मानन्दमय करोड़ों विमानसे युक्त एव अत्यन्त मङ्गलस्वरूप है। अनन्त उपनिषदोंके अर्थ- स्वरूप उपवन-समुदायोंने भरा है। सामवेदरूपी हसोके कलनादसे उसकी अत्यन्त शोभा होती है। आनन्दमय अनन्त शिखरोंसे यह अलङ्कृत है। चिदानन्द रसके झरनोंसे व्याप्त है। अखण्डा- नन्दरूप तेजोगशिके भीतर स्थित है। अनन्त आनन्दमय आश्चर्योंका समुद्र है। उसके भीतरी भागमें निरतिशय आनन्दस्वरूप प्रणव नामक विमान है, जिसका प्राकार अनन्तकोटि सूर्योंके प्रकाशसे भी अतिशय प्रकाशमय है (वह विमान) आनन्दमय शतकोटि शिखरोंसे जगमगा रहा है। उसके भीतर बोधानन्द-पर्वतके ऊपर अष्टाक्षरीमण्डप सुशोभित है। उस (मण्डप) के मध्यमे आनन्दवनसे विभूषित चिदानन्दमयी वेदिका है। उसके ऊपर निरतिशयानन्दस्वरूप तेजोगशि प्रज्वलित हो रही है। उसके भीतर अष्टाक्षरी पद्मसे विभूषित चिन्मय आसन विराजमान है। उस (आसनरूप पद्म) की प्रणवरूपी कर्णिकापर चिन्मय सूर्य, चन्द्र तथा अनिके मण्डल (क्रमशः एकके ऊपर एक) प्रज्वलित हैं। वहाँ अखण्ड आनन्दरूप तेजोगशिके भीतर परम मङ्गलाकार अनन्तासन विराजमान है। उसके ऊपर महायन्त्र प्रज्वलित है। निरतिशय ब्रह्मानन्दकी परममूर्त्तिरूप वह महायन्त्र समस्त ब्रह्मतेजकी राशिका समाष्टस्वरूप, चित्स्वरूप, निर्मल, परब्रह्म- स्वरूप, एव परब्रह्मका परम रहस्यमय कैवल्यरूप है।
७२८ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय ७
[बायाँ स्तम्भ]
महायन्त्रमय परम वैकुण्ठका यह नारायणयन्त्र विजयी होता है ॥ २१–२९ ॥
‘उसका स्वरूप कैसा है १' शिष्यके इस प्रकार पूछनेपर गुरु 'वह ऐसा है' कहकर (यन्त्रका स्वरूप) बतलाते हैं— “पहले षट्कोण चक्र बनाना चाहिये। उसके मध्यमे छः दलोका कमल अङ्कित करे। उस कमलकी कर्णिकापर प्रणव (ॐ) लिखे। प्रणवके बीचमे नारायणका बीज मन्त्र (अ) लिखे। वह बीज मन्त्र साध्यगर्भित होना चाहिये। अर्थात् उसके साथ जिस उद्देश्यसे यन्त्र पूजा करनी हो, उसका सूचक 'मम सर्वाभीष्टसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा' यह वाक्य लिखना चाहिये। कमलके दलोंपर विष्णु एव नृसिंहके षडक्षर मन्त्रोको लिखना चाहिये। * विष्णु षडक्षर मन्त्र 'ॐ विष्णवे नम' और नृसिंह षडक्षर मन्त्र 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्ष्रौं फट्' है। दल-कपोलोंमें (दो दलोंके मध्यमे) श्रीराम तथा श्रीकृष्णके षडक्षर मन्त्रोको लिखे। राम-षडक्षर मन्त्र 'रा रामाय नम' और कृष्ण षडक्षर मन्त्र 'क्लीं कृष्णाय नम.' है। षट्कोण चक्रके छः कोणोमे 'सहस्रार हुं फट्' यह सुदर्शन षडक्षर मन्त्र लिखे। छहों कोण कपोलोंमें (दो कोनोंके मध्य अर्थात् रेखाओके सामने बाहर) 'ॐ नम. शिवाय' यह प्रणव युक्त शिव-पञ्चाक्षर मन्त्र लिखे ॥ ३० ॥
“उस (षट्कोण चक्र) के बाहर प्रणवको इस प्रकार मालाकी भाँति लिखे कि वृत्त बन जाय। वृत्तके बाहर अष्टदल कमल बनाये। उसके दलोंपर 'ॐ नमो नारायणाय' यह नारायण-अष्टाक्षर मन्त्र और 'जय जय नरसिंह' यह नृसिंह अष्टाक्षर मन्त्र लिखे। दलोंके बीचके स्थानोंपर राम, कृष्ण तथा श्रीकरके
१ 'मम' यह पद अथवा साधकका षष्ठयन्त नाम बीज-मन्त्रके ऊपर होगा 'सर्वाभीष्टसिद्धिम्' यह पद बीज-मन्त्रके नीचे होगा। बीजके वामपार्श्वमें 'कुरु कुरु' लिखा जायगा और दक्षिण पार्श्वमें 'स्वाहा' रहेगा।
* इस प्रकार जहाँ भी मन्त्र लिखनेका वर्णन आता है, वहाँ मन्त्रका एक-एक अक्षर एक-एक दलपर, दलोंके मध्यमें या कोणपर—जहाँ लिखे हैं—क्रमश लिखने चाहिये। एक मन्त्रको लिखकर उसके अक्षरोके नीचे दूसरे मन्त्रके अक्षरोंको उसी प्रकार लिखना चाहिये। इस प्रकार जितने मन्त्र लिखने हों, उनके अक्षरोंको क्रमश एकके नीचे एक लिखता जाय। सयुक्ताक्षरोंको एक ही अक्षर मानकर लिखे।
[दायाँ स्तम्भ]
अष्टाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र क्रमशः ये हैं—'ॐ रामाय हु फट् स्वाहा' 'क्लीं दामोदराय नम.' 'उत्तिष्ठ श्रीकर स्वाहा' ॥ ३१ ॥
“उस (अष्टदल कमल) के बाहर प्रणवके मालाकी तरह लिखते हुए वृत्ताकार बना दे। वृत्तके बाहर नौ दलोंका कमल बनाये। कमलके दलोंगे (क्रमशः) राम, कृष्ण एव हयग्रीवके नवाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र क्रमशः ये हे—'ॐ रामचन्द्राय नम. ॐ', 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय ह्रीं', 'हम्भो हयग्रीवाय नम हम्भोँ।' दलोंके मध्यमें 'ॐ दक्षिणा-मूर्तितीरेश्वरोम्' यह दक्षिणामूर्ति नवाक्षर मन्त्र लिखे ॥३२॥
"उसके बाहर नारायण बीज (अं) से युक्त (अर्थात् अ अं लिखते हुए) वृत्त बनाये। वृत्तसे बाहर दस दलोंका कमल बनाये। उन दलोंपर राम तथा कृष्णके दशाक्षर मन्त्र लिखे। वे मन्त्र ये ह—'हु जानकीवल्लभाय स्वाहा' 'गोपीजन-वल्लभाय स्वाहा'। दलोंके संधिस्थानोंमें 'ॐ नमो भगवते श्रीमहानृसिंहाय कालदंष्ट्रवदनाय मम विघ्नान् पच पच स्वाहा' यह नृसिंह-माला-मन्त्र लिखे ॥३३॥
“दशदल कमलके बाहर नृसिंहके एकाक्षर मन्त्र 'क्ष्रौं'के द्वारा वृत्त बनाये। वृत्तके बाहर बारह दलोंका कमल बनाये। दलोंपर नारायण तथा वासुदेवके द्वादशाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र क्रमश. ये हैं—'ॐ नमो भगवते नारायणाय', 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।' दलोंके कपोलोमे (क्रमशः) महाविष्णु, श्रीराम तथा श्रीकृष्णके द्वादशाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र इस प्रकार हे—'ॐ नमो भगवते महाविष्णवे', 'ॐ ह्रीं भरताग्रज राम ह्रीं स्वाहा', 'श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय नम' ॥३४॥
“उसके बाहर जगन्मोहन बीज-मन्त्र 'क्लीं' से वृत्त बनाये। वृत्तसे बाहर चौदह दलोंका कमल बनाये। उन दलोंपर (क्रमशः) लक्ष्मीनारायण, हयग्रीव, गोपाल तथा दधिवामनके मन्त्रोको लिखे। मन्त्र ये हैं—'ॐ ह्रीं ह्रूं श्रीं श्रीं लक्ष्मीवासुदेवाय नम', 'ॐ नम सर्वकोटिसर्वविद्या-राजाय', 'क्लीं कृष्णाय गोपालचूडामणये स्वाहा', 'ॐ नमो भगवते दधिवामनाय ॐ।' दो दलोंके सन्धि-स्थानोंपर 'ह्रीं पद्मावत्यन्नपूर्णा माहेश्वरि स्वाहा' यह अन्नपूर्णेश्वरी-मन्त्र लिखे ॥३५॥
'उसके बाहर केवल प्रणवसे एक वृत्त बनाये। वृत्तसे बाहर सोलह दलोंका कमल बनाये। उसके दलोंपर श्रीकृष्ण तथा सुदर्शनके षोडशाक्षर मन्त्रोंको लिखे। मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हे—'ॐ नमो भगवते रुक्मिणीवल्लभाय स्वाहा', 'ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय हु फट्।' उसके दलोंके सन्धि भागोंमें
अध्याय ७ ]
अध्याय ७ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२९
[ बायाँ स्तम्भ ]
सब स्वर तथा सुदर्शन माला मन्त्र लिखे । पूरा मन्त्र यह है—'सुदर्शनमहाचक्राय दीप्तरूपाय सर्वतो मां रक्ष रक्ष सहस्रार हु फट् स्वाहा ।' ( पहले एक एक स्वर लिखा जायगा, फिर स्वरोंके नीचे क्रमशः प्रत्येक दलपर मन्त्रके दो-दो अक्षर जैसे प्रथम दलपर 'सुद' दूसरेपर 'र्शन' इस प्रकार लिखे जायेंगे ) ॥३६॥
"उसके बाहर वराह-बीजसे युक्त वृत्त रहेगा। वह बीज 'हुं' है। वृत्तसे बाहर अठारह दलोंका कमल बनाये । उन दलोंपर श्रीकृष्ण तथा वामनके अष्टादशाक्षर मन्त्र लिखे । मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हैं—'हीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा', 'ॐ नमो विष्णवे सुरपतये महाबलाय स्वाहा ।' दलके सन्धि-स्थानोंपर गरुड-पञ्चाक्षर मन्त्र और गरुड-माला मन्त्र लिखे । मन्त्र क्रमशः ये हैं—'क्षिप ॐ स्वाहा', 'ॐ नम पक्षिराजाय सर्वविषभूतरक्षःकृत्यादिभेदनाय सर्वैश्वर्यप्रदाय स्वाहा।' ( इसमें पहले दलपर 'क्षिप', दूसरेपर 'ॐ', तीसरेपर 'स्वाहा', चौथेपर 'ॐ नम', पाँचवेंपर 'पक्षि', छठेपर 'राजाय' और शेषपर शेष मन्त्रभागके दो दो अक्षर लिखे जायेंगे ) ॥३७॥
"उसके बाहर 'ह्रीं' इस माया-बीजसे वृत्त बनाये । उसके बाहर फिर अष्टदल कमल बनाये। उन दलोंपर श्रीकृष्ण तथा वामनके अष्टाक्षर मन्त्र 'ॐ नमो दामोदराय' और 'ॐ वामनाय नम ॐ' इनको ( क्रमशः ) लिखे । दलोके सन्धि-स्थलोंपर नीलकण्ठके त्र्यक्षर तथा गरुडके पञ्चाक्षर मन्त्रोंको (पहले तीन दलोंपर पहलेका एक एक अक्षर, फिर शेषपर दूसरेका एक-एक अक्षर—इस प्रकार ) लिखे । मन्त्र ये हैं—'प्रैं रीं ठ, नमोऽण्डजाय' ॥ ३८ ॥
"उसके बाहर कामदेवके बीज मन्त्र ( क्लीं ) से वृत्त बनाये । वृत्तसे बाहर चौबीस दलोंका कमल निर्मित करे । उन दलोंपर शरणागत मन्त्र एव नारायण मन्त्र ( पहले एक एक अक्षरके क्रमसे शरणागत मन्त्र और शेष दलोपर नारायण मन्त्रके अक्षर ) तथा नारायण एव हयग्रीवके गायत्री-मन्त्र (क्रमशः ) लिखे । मन्त्र इस प्रकार है—'श्रीमन्नारायणचरणौ शरणं प्रपद्ये', 'श्रीमते नारायणाय नम', 'नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्' 'वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंस प्रचोदयात् ।' उसके दलोंके सन्धि भागोंमें नृसिंह-गायत्री, सुदर्शन-गायत्री तथा ब्रह्मगायत्री-मन्त्र (क्रमशः) लिखे । मन्त्र ये हैं—'वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्न सिंह प्रचोदयात्', 'सुदर्शनाय विद्महे हेतिराजाय धीमहि तन्नश्चक्र प्रचोदयात्' 'तत्सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्' ॥३९॥
उ० अं० ९२—
[ दायाँ स्तम्भ ]
"उसके बाहर 'ह्सौं' इस हयग्रीवके एकाक्षर बीज मन्त्रसे वृत्त बनाये । उसके बाहर बत्तीस दलोंका कमल बनाये । उसके दलोंपर ( क्रमशः ) नृसिंह एव हयग्रीवके अनुष्टुप् मन्त्रोको लिखे । मन्त्र ये हैं—
उग्रं वीरं महाविष्णु ज्वलन्त सर्वतोमुखम् । नृसिह भीषण भद्र मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥ ऋग्यजुःसामरूपाय वेदाहरणकर्मणे । प्रणवोद्गीथवपुषे महाश्वशिरसे नमः ॥
"दलोंके सन्धि-भागोंमे ( क्रमशः ) राम तथा कृष्णके अनुष्टुप्-मन्त्र लिखें—
रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम । भो दशास्यान्तकास्माक रक्षा देहि श्रिय च ते ॥ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनय कृष्ण त्वामहं शरणं गत ॥
"उसके बाहर प्रणवसे सम्पुटित अग्निवीज (ॐ रमोम्) से वृत्त बनाये । वृत्तमे बाहर छत्तीस दलोंका कमल बनाये । उसके दलोपर हयग्रीवका छत्तीस अक्षरोंवाला और फिर ( उसके नीचे ) अड़तीस अक्षरोंवाला मन्त्र लिखे । मन्त्र क्रमशः यों ह—
'हस' विश्रोत्तीर्णस्वरूपाय चिन्मयानन्दरूपिणे । तुभ्यं नमो हयग्रीव विद्याराजाय विष्णवे 'सोऽहम्' ॥ 'ह्सौं ॐ नमो भगवते हयग्रीवाय सर्ववागीश्वरेश्वराय सर्ववेदमयाय सर्वविद्यां मे देहि स्वाहा ।'
" ( इस मन्त्रमें ३८ अक्षर होनेमे पहलेके दो 'ह्सौमोम्' प्रथम दलपर तथा 'नमो' दूसरे दलपर और शेषपर एक-एक अक्षर लिखे जायेंगे । ) दलोंके सन्धि-स्थलोंमें आदिमे 'ॐ' तथा अन्तमे 'नम' लगाकर केशवादिके चतुर्थी विभक्ति-युक्त चौबीस नाममन्त्र (प्रत्येक दलपर पूरा एक मन्त्र) तथा शेष बारह दलोंपर राम-कृष्णके दोनों गायत्री-मन्त्रोंके चार-चार अक्षर एक-एक स्थलपर ( पहली गायत्रीके चार-चार अक्षरके बाद दूसरीके चार-चार अक्षर क्रमसे ) लिखे । मन्त्र ये हैं—
ॐ केशवाय नम, ॐ नारायणाय नम, ॐ माधवाय नमः, ॐ गोविन्दाय नम, ॐ विष्णवे नम, ॐ मधुसूदनाय नम, ॐ त्रिविक्रमाय नम', ॐ वामनाय नम', ॐ श्रीधराय नम, ॐ हृषीकेशाय नम, ॐ पद्मनाभाय नम, ॐ दामोदराय नम, ॐ संकर्षणाय नम, ॐ वासुदेवाय नम', ॐ प्रद्युम्नाय नम, ॐ अनिरुद्धाय नम, ॐ पुरुषोत्तमाय
७२० -- त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् -- [ अध्याय ७
७२० -- त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् -- [ अध्याय ७ नम', ॐ अधोक्षजाय नम ॐ नारसिंहाय नम, ॐ अच्युताय नम ॐ जनार्दनाय नम, ॐ उपेन्द्राय नम., ॐ हरये नम, ॐ श्रीकृष्णार नम ।' (श्रीरामगायत्री--) दाशरणाय विद्महे सीतावह्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् । (श्रीकृष्णगायत्री--) दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्न कृष्ण. प्रचोदयात्। "उसके बाहर प्रणवते सम्पुटित अङ्कुश-व्रीज 'ॐ क्रों ॐ' मन्त्रसे वृत्त बनाये। उस वृत्तसे बाहर (कुछ अन्तर छोड़कर उसी मन्त्रसे) फिर वृत्त बनाये । दोनों वृत्तोंके मध्यमें बारह कोष्ठ (वृत्त) बनाये, जिनके मध्यमें अन्तर हो। उन कोष्ठो (वृत्तो) मे आदिमे प्रणव तथा अन्तमे 'नम' लगाकर चतुर्थी विभक्तियुक्त कौस्तुभ, वनमाल, श्रीवत्स, सुदर्शन गरुड, पद्म, ध्वज, अनन्त, शार्ङ्ग, गदा, शङ्ख एवं नन्दकके मन्त्र लिखे। मन्त्र इसे प्रकार होंगे- ॐ कौस्तुभाय नम, ॐ वनमालायै नम, ॐ श्रीवत्साय नम, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गरुडाय नम', ॐ पद्माय नम, ॐ ध्वजाय नम, ॐ अनन्ताय नम', ॐ शार्ङ्गाय नम, ॐ गदायै नम, ॐ शङ्खाय नम, ॐ नन्दकाय नमः। "कोष्ठोंके अन्तरानोंमें आदिमे प्रणवयुक्त ये मन्त्र लिखे- ॐ विष्वक्सेनाय नम, ॐ आचक्राय स्वाहा, ॐ विचक्राय स्वाहा, ॐ सुचक्राय स्वाहा, ॐ धीचक्राय स्वाहा, ॐ सचक्राय स्वाहा, ॐ ज्वालाचक्राय स्वाहा, ॐ क्रुद्धोल्काय स्वाहा, ॐ महोल्काय स्वाहा, ॐ वीर्योल्काय स्वाहा, ॐ विद्योल्काय स्वाहा, ॐ सहस्रोल्काय स्वाहा ॥ ४०-४२ ॥ "उसके बाहर प्रणवसे सम्पुटित गरुडपञ्चाक्षर 'ॐ क्षिप ॐ स्वाहा ॐ' मन्त्रसे वृत्त बनाये। दोनों वृत्तोंके मध्य भागमे अन्तर छोड़कर बारह वज्र बनाये । उन वज्रोंके कोणोंमें ये मन्त्र लिखे- ॐ पद्मनिधये नम, ॐ महापद्मनिधये नम, ॐ गह्व- निधये नम, ॐ शङ्खनिधये नम, ॐ मकरनिधये नम', ॐ कच्छपनिधये नम, ॐ विद्यानिधये नम., ॐ परमानन्द- निधये नम, ॐ मोक्षनिधये नम, ॐ लक्ष्मीनियये नम', ॐ ब्रह्मनिधये नम, ॐ मुकुन्दनिधये नम । "उन वज्रोंके बीचके भागोंमे ये मन्त्र लिखे- ॐ विद्याकल्पकतरवे नम, ॐ आनन्दकल्पकतरवे नम., ॐ ब्रह्मकल्पकतरवे नम., ॐ मुक्तिकल्पकतरवे नम', ॐ अमृतकल्पकतरवे नम, ॐ बोधकल्पकतरवे नम, ॐ विभूति- कल्पकतरवे नम. ॐ वैकुण्ठकल्पकतरवे नम, ॐ वेदकल्पक- तरवे नम., ॐ योगल्पस्तरवे नन, ॐ यज्ञकल्पकतरवे नम', ॐ पद्मकल्पकतरवे नम । "इस वृत्तको शिवगायत्री तथा परब्रह्म-मन्त्रके अक्षरोंद्वारा वृत्तरूपसे घेरे । (अर्थात् वृत्तके बाहर पहले शिवगायत्री इस प्रकार लिखे कि वृत्तके चारो ओर गोलाईमें आधी दूरके लगभग वह लिखी जाय और आगे 'परब्रह्म' मन्त्र लिखकर उस गोलेको पूरा कर दे ।) मन्त्र ये हैं- (शिव-गायत्री-) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्। (परब्रह्ममन्त्र-) श्रीमन्नारायणो ज्योतिरात्मा नारायण. परः । नारायणपर ब्रह्म नारायण नमोऽस्तु ते ॥ "उसके बाहर प्रणवसे सम्पुटित श्रीबीज अर्थात् 'ॐ श्रीमोम्' मन्त्रसे वृत्त बनाये। वृत्तके बाहर चालीस दलोंका कमल बनाये। उसके दलोपर व्याहृति एवं शिरोभागसे सम्पुटित वेद-गायत्रीके चारों पाद तथा सूर्याष्टाक्षर मन्त्र लिखे । मन्त्र इस प्रकार होगे- 'ॐ भू ॐ भुवः ॐ सुव. ॐ महः ॐ जन. ॐ तप. ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम् ॐ भर्गो देवस्य धीमहि ॐ धियो यो न प्रचोदयात् । ॐ परो रजसे सावद्रोम् ओ- मापो ज्योतो रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुव सुवरोम् ।' 'ॐ घृणि. सूर्य आदित्य ।', "दलोंके सन्धि-स्थलोंपर सब कहीं प्रणव और श्रीबीजसे सम्पुटित नारायण-बीज अर्थात् 'ॐ श्रींमं श्रीमोम्' यह मन्त्र लिखे ॥ ४३-४४ ॥ "उसके बाहर आठ शूलोंसे अङ्कित भू-चक्र बनाये । चक्रके भीतर चारों दिशाओंमे प्रणवसे सम्पुटित 'हंस' सोऽहम्' मन्त्र और नारायणाष्ट्र मन्त्र लिखे । पूरा मन्त्र यह है- 'ॐ हंस सोऽहमोम्' 'ॐ नमो नारायणाय हु फट्' ॥ ४५ ॥ "उसके बाहर प्रणव-मालासे युक्त वृत्त बनाये । वृत्तके बाहर पचास दलोंका कमल बनाये । उन दलोंमें 'ळ' को छोड़कर मातृकाके सभी शेष पचास अक्षर (अर्थात् अ आ इ ई उ ऊ
अध्याय ७] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७३१
अध्याय ७] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३१
[बायाँ स्तम्भ]
ॠ ॡ लृ ट् ए ऐ ओ औ अं अ क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त् थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्ष) लिखे । उसके दलोंकी सन्धियोंमे प्रणव तथा श्रीबीजसे सम्पुटित राम एव कृष्णके माला-मन्त्र (क्रमश ऊपर-नीचे) लिखे । मन्त्र इस प्रकार होंगे— (राममाला मन्त्र—) ‘ॐ श्रींमों नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनायामिततेजमे बलाय रामाय विष्णवे नम श्रीमोम्’ । (श्रीकृष्णमाला मन्त्र—) ‘ॐ श्रींमों नमः कृष्णाय देवकीपुत्राय वासुदेवाय निगलच्छेदनाय सर्वलोकाधिपतये सर्वजगन्मोहनाय विष्णवे कामितार्थदाय स्वाहा श्रीमोम्’ ॥ ४६ ॥ “उसके बाहर अष्टशूलोंमे अङ्कित एक भूचक्र और बनाये । उन शूलोंमे प्रणवसम्पुटित महानीलकण्ठ-मन्त्रके अक्षर अर्थात् ‘ॐ ॐ नमो नीलकण्ठाय ॐ’ लिखे । शूलोंके अग्रभागमें आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नम लगाकर चतुर्थी विभक्तियुक्त लोकपालोंके मन्त्र इस प्रकार क्रमशः लिखे— ओमिन्द्राय नमः, ओमग्नये नमः, ॐ यमाय नम, ॐ निर्ऋतये नम, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नम, ॐ सोमाय नम, ओमीशानाय नम ॥ ४७ ॥ “उसके बाहर प्रणव (ॐ) की मालासे युक्त तीन वृत्त बनाये। उसके बाहर चार द्वारोंसे युक्त चार भूपुर बनाये, जिसमें चक्रके चारों कोनोंपर महावज्र शोभित हों। उन वज्रोंमें प्रणव तथा श्रीबीजसे सम्पुटित दो अमृत-बीज—‘ॐ श्रीं वं वं श्रीं ॐ’ लिखे । प्रणव-वृत्तोंके बाहर सबसे बाहरी भूपुर-वीथीमें ये मन्त्र लिखे— ‘ओमाधारशक्त्यै नमः, ॐ मूलप्रकृत्यै नमः, ओमादिकूर्माय नम, ओमनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नम ।’ मध्यभूपुर-मार्गमे ये मन्त्र लिखे—ॐ क्षीरसमुद्राय नमः, ॐ रत्नद्वीपाय नम, ॐ रत्नमण्डपाय नम, ॐ श्वेतच्छत्राय नम, ॐ कल्पकवृक्षाय नम, ॐ रत्नसिंहासनाय नम ।’ प्रथम भूपुर-वीथीमें आदिमे प्रणव तथा अन्तमे नमः लगाकर चतुर्थी विभक्तियुक्त धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य, सत्त्व, रजस्, तमस्, माया, अविद्या, अनन्त एव पद्मके मन्त्र लिखे । (इन मन्त्रोंके ये रूप होंगे—ॐ धर्माय नम, ॐ ज्ञानाय नम, ॐ वैराग्याय नमः, ओमैश्वर्याय नम, ओमधर्माय नम, ओमज्ञानाय नमः, ओमवैराग्याय नम, ओमनैश्वर्याय नम, ॐ सत्त्वाय नमः,
[दायाँ स्तम्भ]
ॐ रजसे नम, ॐ तमसे नमः, ॐ मायायै नम, ओमाविद्यायै नमः, ओमनन्ताय नमः, ॐ पद्माय नमः ।) बाहरी वृत्तकी वीथीमें—विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना—इन सबके चतुर्थ्यन्त नाम आदिमें प्रणव और अन्तमे ‘नमः’ लगाकर लिखे (ॐ विमलायै नम, ओमुत्कर्षिण्यै नम, ॐ ज्ञानायै नमः, ॐ क्रियायै नम, ॐ योगायै नम, ॐ प्रह्व्यै नमः, ॐ सत्यायै नम, ओमीशानायै नम) । भीतरी वृत्तकी वीथी- में ‘ओमनुग्रहायै नमः, ॐ नमो भगवते विष्णवे सर्व- भूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगयोगपीठात्मने नम’ लिखे । ‘वृत्तोंके बीचके स्थानोंमें—मन्त्रोंके बीज, प्राण, शक्ति, दृष्टि, वश्य आदि, मन्त्र-यन्त्रोंके नाम, गायत्री, प्राणप्रतिष्ठा, भूतशुद्धि तथा दिक्पालोंके बीज—ये यन्त्रके दस अङ्ग ( तथा इनके अतिरिक्त ) मूलमन्त्र, मालामन्त्र, कवच तथा दिग्वन्धन- के मन्त्र भी दिये जाते हैं। ‘इस प्रकारका यह यन्त्र महायन्त्रमय है । योगके द्वारा जिनका अन्तःकरण ज्ञानसे आलोकित हो उठा है, ऐसे पुरुषों- द्वारा इसे परम मन्त्रोंसे अलङ्कृत किया गया है । षोडशो- पचारोंसे पूजे जानेपर तथा जप-हवनादिसे साधित (सिद्ध) होनेपर यह यन्त्र शुद्ध ब्रह्मतेजोमय, सब प्रकारके भयोंसे छुड़ानेवाला, समस्त पापोंका नाशक, सभी अभीष्टोंको देनेवाला तथा सायुज्य मुक्ति देनेवाला है। यह परमवैकुण्ठ-महानारायण- यन्त्र प्रकाशमान है ॥ ४८-४९ ॥ ‘उस (यन्त्र) के ऊपर भी आदिनारायणका ध्यान करे । वे निरतिशय आनन्दमयी तेजोरशिके भीतर भलीभाँति विराजमान हैं । शब्दातीत आनन्दमय तेजोरराशिस्वरूप, चैतन्य (ज्ञान) के धारसे आविर्भूत आनन्दमय विग्रहयुक्त, बोधानन्दस्वरूप, निरतिशय सौन्दर्यसिन्धु, तुरीयस्वरूप, तुरीयातीत तथा अद्वैत परमानन्दमय हैं । निरन्तर तुरीयातीत निरतिशय सौन्दर्य एवं आनन्दके पारावार हैं, लावण्य-सरिताकी लहरोंसे उल्लसित तथा विद्युत्की-सी कान्तिसे प्रकाशित हैं, उनका विग्रह दिव्य एव मङ्गलमय है । वे मूर्तिधारी परम मङ्गलोंसे सेवित हैं। चिदानन्दमय अनन्तकोटि सूर्योंके समान तेजोमय प्रकाशवाले अनन्त भूपणोंसे अलङ्कृत हैं। सुदर्शन, चक्र, पाञ्चजन्य शङ्ख, पद्म, कौमोदकी गदा, नन्दक खड्ग, शाङ्ग-धनुप, मुसल, परिघ आदि चिन्मय अनेकों मूर्तिमान् आयुधोंसे सुसेवितं हैं। श्रीवत्स, कौस्तुभ एव वनमालासे उनका वक्षःस्थल अङ्कित (शोभित) है। ब्रह्मरूप कल्पवनके अमृतमय पुष्पोंकी वर्षासे निरन्तर आनन्दस्वरूप हैं। ब्रह्मानन्दमय
७३२ त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [अध्याय ८
७३२ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [अध्याय ८
रसके असंख्य झरनोंसे अत्यन्त मङ्गल रूप हैं। शेषनागके दम सहस्र फणसमूहोंके विशाल छत्रसे शोभित हैं। उस फणोंके मण्डलमें स्थित अत्यन्त तेजस्वी मणियोंकी ज्योतिसे उनका श्रीविग्रह विशेष देदीप्यमान है, तथा शेषनागकी अङ्ग-कान्तिके निर्झरोंसे व्याप्त है। वे निरतिशय ब्रह्मगन्धस्वरूपकी निरतिशय आनन्दरूप ब्रह्ममय गन्धके विशेष (घन) स्वरूप हैं। अनन्त ब्रह्मगन्ध-मूर्तियोंके समष्टिरूप हैं। अनन्त आनन्दमय तुलसीकी मालाओंसे नित्य नूतनरूप हैं। चिदानन्दमय अनन्त पुष्प- मालाओंसे सुशोभित हैं। तेज-प्रवाहकी तरङ्गोंके अविरल प्रवाहसे प्रकाशमान हैं। निरतिशय अनन्त कान्तिविशेषके आवर्तोंसे सर्वदा सब ओर प्रज्वलित हैं। बोधानन्दमय अनन्त धूप दीपावलियोंसे अत्यन्त शोभित हैं। निरतिशय आनन्द- स्वरूप चँवरोंसे परिसेवित हैं। निरन्तर निरुपम निरतिशय उत्कट ज्ञानानन्दमय अनन्त फलोंके गुच्छोंसे अलङ्कृत हैं। चिन्मयानन्दरूप दिव्य विमान, छत्र एव ध्वजसमूहोंसे विशेष शोभित है। परम मङ्गलमय अनन्त दिव्य तेजोंसे सर्वदा प्रकाशमान हैं। वाणीसे अतीत अनन्त तेजोराशिके अन्तर्गत, अर्धमात्रास्वरूप, तुरीय, अनाहत ध्वनिरूप, तुरीयातीत, अकथनीय तथा नाद-बिन्दु-कला एव अध्यात्मस्वरूप आदि अनन्त रूपोंमें अवस्थित, निर्गुण, निष्क्रिय, निर्मल, निर्दोष, निरञ्जन, निराकार, दूसरेके आश्रयसे हीन, निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप (उन) आदिनारायणका ध्यान करे' ॥५०॥
॥ सप्तम अध्याय समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम अध्याय परम सायुज्य-मुक्तिके स्वरूपका निरूपण
तब पितामह् ब्रह्माजी भगवान् महाविष्णुसे पूछते हैं— भगवन् ! शुद्ध अद्वैत परमानन्दस्वरूप आप ब्रह्मके (स्वरूपके) विरुद्ध (ये पूर्ववर्णित) वैकुण्ठ, भवन, प्राचीरें, विमान प्रभृति अनन्त वस्तुरूप भेद कैसे हैं ? ॥ १ ॥ 'तुमने ठीक ही कहा' यह कहकर भगवान् महाविष्णु शङ्का- का निवारण करते हैं—'जैसे शुद्ध स्वर्णके कड़े, मुकुट, बाजूबन्द आदि भेद होते हैं (जैसे ये आकार-भेद स्वर्णकी एकताके बाधक नहीं), जैसे समुद्रीय जलके बड़ी छोटी तरङ्गें, फेन, बुलबुले, ओले, नमक, बर्फ आदि अनन्त वस्तुरूप भेद हैं (जैसे ये भेद जलके एकत्वमें बाधक नहीं), जैसे भूमिके पर्वत, वृक्ष, तिनके, झाड़ियाँ, लता आदि अनन्त वस्तुभेद हैं (जैसे ये भेद भूमिके एकत्वके विरोधी नहीं), वैसे ही अद्वैत परमानन्द- स्वरूप मुझ परम ब्रह्मका सब कुछ अद्वैतरूप सिद्ध ही है। सब (प्रतीयमान लौकिक पारलौकिक भेद) मेरे स्वरूप ही हैं। मेरे अतिरिक्त एक अणु भी विद्यमान नहीं। (मुझसे भिन्न तुच्छतम भी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है)' ॥ २ ॥ पितामह ब्रह्मा फिर पूछते हैं—'भगवन् ! परम वैकुण्ठ ही परम मोक्ष (धाम) है। सर्वत्र (सभी शास्त्रोंमें) परम मोक्ष एक ही सुनायी पड़ता (वर्णित) है। फिर अनन्त वैकुण्ठ तथा अनन्त आनन्द-समुद्रादि अनन्त मूर्तियाँ किस प्रकार हैं?' ॥ ३ ॥ 'यह ठीक ही है' कहकर भगवान् महाविष्णु बोले—'एक ही अविद्यापादमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड अपने आवरणोंके साथ सुने जाते (शास्त्रोंमे प्रतिपादित) हैं। (जैसे अनन्त ब्रह्माण्ड- भेद होनेसे अविद्याकी एकतामें बाधा नहीं आती, वैसे ही) एक ही अण्ड (ब्रह्माण्ड) में बहुत से लोक, बहुत से वैकुण्ठ और अनन्त विभूतियाँ भी हैं ही। सभी ब्रह्माण्डोंमें अनन्त लोक हैं और अनन्त वैकुण्ठ हैं, यह सभी (शास्त्रों)को निश्चित रूपसे मान्य है। (जब एक अविद्यापादकी यह स्थिति है तो) पादत्रयके सम्बन्धमें भी यही बात है, उसमें कहना क्या है। निरतिशय आनन्दका आविर्भाव मोक्ष है, यह मोक्षका लक्षण तीनों पादोंमें है, इसलिये तीनों पाद परम मोक्षधाम हैं। तीनों पाद परम वैकुण्ठ हैं। तीनों पाद परम कैवल्य (धाम) हैं। वहाँ शुद्ध चिदानन्द ब्रह्मके विलासरूप आनन्द, अनन्त परमा- नन्दमय ऐश्वर्य, अनन्त वैकुण्ठ और अनन्त परमानन्द- समुद्रादि हैं ही ॥ ४॥ "उपासक वहाँ (सातवें अध्यायमे वर्णित श्रीनारायणके समीप) पहुँचकर इस प्रकारके (जैसा स्वरूप उनका वर्णित है) नारायणका ध्यान करके, (उनकी) प्रदक्षिणा तथा (उन्हें) नमस्कार करता है, तथा अनेक प्रकारके उपचारोंसे उनकी अर्चना करके निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप हो जाता है। उनके आगे सावधानीसे बैठकर अद्वैतयोगका आश्रय लेता है और सर्वाद्वैत परमानन्दस्वरूप अखण्ड अमित तेजोराशि- स्वरूपकी विशेष रूपसे (सम्यक्) भावना करके उपासक स्वयं शुद्ध बोधानन्दमय अमृतरूप एव निरतिशय आनन्दमय तेजोराशिस্বরূপ हो जाता है। तब महावाक्योंके अर्थका बार-बार स्मरण करता हुआ—'ब्रह्म मै हूँ, मैं ही हूँ,
अध्याय ८ ] महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ७३३
अध्याय ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३३ ब्रह्म मैं हूँ, जो भी मैं हूँ, ब्रह्म ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ, 'वह (अनायास अविलम्ब तत्त्वज्ञान) कैसे होता है ?' मैं अहंता (भेद-प्रतीति) का हवन करता हूँ—स्वाहा (वह इस शंकाके उत्तरमें बतलाते हैं—'भक्तवत्सल भगवान् स्वयं ही भस्म हो जाय), मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारकी भावनाद्वारा, जैसे मोक्षके सभी विघ्नोंसे सभी भक्तिनिष्ठ लोगों (भक्तों) की परम तेजोरूप महानदीका प्रवाह परम तेजोरूप समुद्रमें प्रवेश रक्षा करते हैं। (उनके) समस्त अभीष्ट प्रदान करते हैं। कर जाय, जैसे परम तेजोमय समुद्रकी तरङ्ग उस परम मोक्ष दिलवाते हैं। (भक्त स्वतः मोक्ष नहीं चाहता। भगवान् तेजोमय समुद्रमें प्रवेश कर जायँ, उसी प्रकार सच्चिदानन्द- उसे अपनी ओरसे मोक्ष प्रदान करते हैं, इसीसे दिलवाते हैं— स्वरूप उपासक सर्वरूपसे परिपूर्ण, अद्वैत परमानन्दस्वरूप वरबस देते हैं, यह कहा गया ।) विष्णु-भक्तिके बिना ब्रह्मादि परब्रह्म मुझ नारायणमें 'मैं सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ, मैं अजन्मा समस्त (देवताओं) का भी करोड़ों कल्पोंमें भी मोक्ष हूँ, मैं परिपूर्ण हूँ' इस प्रकार (स्वरूपभूत होकर) प्रविष्ट हो नहीं होता । क्योंकि कारणके बिना कार्य प्रकट नहीं जाता है। तब उपासक तद्रूपहीन, अद्वैत, अपार, निरतिशय होता, अतः भक्ति (जो कारण है, उस) के बिना (कार्य) सच्चिदानन्द-समुद्र हो जाता है ॥ ५ ॥ ब्रह्मज्ञान कभी उत्पन्न नहीं होता। इसलिये तुम भी समस्त 'जो इस (उपदिष्ट) मार्गके द्वारा भलीभाँति आचरण उपायोंको छोड़कर भक्तिका आश्रय लो । भक्तिनिष्ठ बनो । (उपासना) करता है, वह निश्चय ही नारायण हो जाता है। भक्तिनिष्ठ बनो । भक्तिके द्वारा सभी सिद्धियाँ सिद्ध (प्राप्त) सभी मुनिगण इसी मार्गसे सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। असंख्यों होती हैं। भक्तिके द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १२ ॥ परम योगी (इसी मार्गसे) सिद्धिको (परम गतिको) 'इस प्रकार गुरुके उपदेशको सुनकर, परम तत्त्वके सभी पहुँचे हैं' ॥ ६ ॥ रहस्योंको जानकर, सम्पूर्ण संशयोंको दूर करके 'शीघ्र ही तब (उपर्युक्त उपदेशके अनन्तर) शिष्य गुरुसे पूछता मोक्ष प्राप्त कर लूँगा' ऐसा निश्चय करके, तब शिष्य उठा । है—भगवन् ! सालम्ब एवं निरालम्ब योग किस प्रकारके उठकर गुरुकी प्रदक्षिणा एवं उन्हें नमस्कार करके, गुरुकी पूजा हैं ॥ ७ ॥ करके, गुरुकी ही आज्ञासे उसने क्रमशः भक्तिनिष्ठ होकर परिपक्व (गुरुदेव बतलाते हैं—) 'सालम्बयोग वह है, जिसमें भक्तिके आधिक्यसे परिपक्व विज्ञान प्राप्त किया। उस (परिपक्व सब प्रकारके कर्मोंसे दूर रहकर कर चरण आदि अङ्गोंवाली विज्ञान) से बिना परिश्रमके ही शिष्य शीघ्र ही साक्षात् मूर्तिविशेष अथवा मण्डल (ज्योति) आदिका (ध्यान- नारायणस्वरूप हो गया' ॥ १३ ॥ उपासनादिके लिये) आलम्बन किया जाय; यही सालम्ब (यह आख्यान सुनाकर) तब भगवान् महाविष्णु योग है। चतुर्मुख ब्रह्माजीकी ओर देखकर बोले—'ब्रह्माजी ! मैंने आपसे 'निरालम्बयोग वह है, जिसमें समस्त नाम, रूप, कर्मको परम तत्त्वका समस्त रहस्य कह दिया । उसके स्मरणमात्रसे अत्यन्त दूरसे छोड़कर, समस्त कामनादि अन्तःकरणकी वृत्तियों- मोक्ष हो जाता है। उसके अनुष्ठानसे सम्पूर्ण अज्ञात ज्ञात हो के साक्षीरूपसे, उस (अन्तःकरणकी किसी भी वृत्ति) के जाता है। जिसके स्वरूपको जान लेनेसे अज्ञात भी ज्ञात हो आलम्बनसे शून्य रहकर भावना की जाय। यही (भावनाहीन जाता है, वह सम्पूर्ण परमतत्त्व रहस्य मैंने बतला दिया' ॥१४॥ स्थितिमे स्थित होना ही) निरालम्बयोग है' ॥ ८ ॥ 'गुरु कौन है ?' ब्रह्माजीके इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् 'तब तो (जब निरालम्बयोग इतना दुरूह है) निरालम्ब- बतलाते हैं—'गुरु साक्षात् आदिनारायण पुरुष है। वह आदि- योगका अधिकारी किस प्रकारका होता है ?'॥ ९ ॥ नारायण मैं ही हूँ। इसलिये एकमात्र मेरी शरणमें आओ। 'जो पुरुष अमानित्व आदि (ज्ञानके) लक्षणोंसे युक्त हो, मेरी भक्तिमें निष्ठावान् होओ। मेरी उपासना करो । इस प्रकार उसीको निरालम्बयोगका अधिकारी बनाना (मानना) चाहिये। मुझे ही प्राप्त करोगे । मेरे अतिरिक्त सब कुछ बाधित ऐसा अधिकारी कोई विरला ही है। इसलिये सभी अधिकारी- (अतत्त्व) है । मुझसे अतिरिक्त अबाधित (सत्ता रखने- अनधिकारियोंके लिये भक्तियोग ही श्रेष्ठ कहा जाता है। वाला) कुछ भी नहीं है। अद्वितीय निरतिशय आनन्द मैं ही भक्तियोग उपद्रव (विघ्न)-रहित है । भक्तियोगसे मुक्ति हूँ। सब प्रकार परिपूर्ण मैं ही हूँ, मैं ही सबका आश्रय हूँ। प्राप्त होती है । भक्तोंको बिना परिश्रमके अविलम्ब ही वाणीका अविषय निराकार परब्रह्मस्वरूप मैं ही हूँ। मुझसे स्वज्ञान हो जाता है ॥ १० ११ ॥ भिन्न अणुमात्र भी नहीं है' ॥ १५ ॥
७३४ त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय ८
७३४ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय ८
इस प्रकार भगवान् महाविष्णुके इस परम उपदेशका लाभ करके पितामह ब्रह्माजीने परम आनन्द प्राप्त किया। तदनन्तर भगवान् विष्णुके कर स्पर्शसे दिव्यज्ञान प्राप्त करके पितामह उठे और उठकर उन्होंने प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके त्रिविध उपचारोंसे भगवान् महाविष्णुकी भलीभाँति पूजा की। फिर अञ्जलि बाँधकर, विनयपूर्वक समीप जाकर बोले— 'भगवन् ! मुझे भक्तिनिष्ठा प्रदान करें। हे कृपानिधे ! मैं आपसे अभिन्न हूँ, मेरा सब प्रकार पालन करें' ॥ १६-१७ ॥
'वही हो; साधु ! साधु !' इस प्रकार (ब्रह्माजीकी) भलीभाँति प्रशंसा करते हुए भगवान् महाविष्णु बोले—'मेरा उपासक सबसे उत्कृष्ट हो जाता है । मेरी उपासनासे सब मङ्गल होते हैं। मेरी उपासनासे वह सबको विजय कर लेता है। मेरा उपासक सबके द्वारा वन्दनीय होता है। मेरे उपासकके लिये असाध्य कुछ नहीं है। सम्पूर्ण बन्धन पूर्णत. नष्ट हो जाते हैं। सदाचारीकी जैसे सब लोग सेवा करते हैं, वैसे ही समस्त देवता उसकी सेवा करते हैं। महाश्रेय भी (उसकी) सेवा करते हैं। मेरा उपासक उस (उपासना) से निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है। जो भी मुमुक्षु इस मार्गसे सम्यक् आचरण करता है, वह परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है ॥ १८ ॥
'जो कोई (इस) परमतत्त्व-रहस्य आथर्वण महानारायणो- पनिषद्का अध्ययन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह जान-बूझकर तथा अनजानमे किये पापोंसे मुक्त हो जाता है। महापापोंसे पवित्र हो जाता है। छिपाकर किये गये, प्रकट- रूपसे किये गये, बहुत दिनोंतक अधिक रूपमें किये गये सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह सभी लोकोंको जीत लेता है। उसकी सभी मन्त्रोंके जपमें निष्ठा हो जाती है। वह समस्त वेदान्तके रहस्यको प्राप्त करके परमार्थका ज्ञाता हो जाता है। वह सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता (उन भोगोंके द्वारा मिलनेवाले आनन्दसे युक्त) हो जाता है। उसे सभी योगोंका ज्ञान हो जाता है। वह समस्त जगत्का परिपालक हो जाता है। वह अद्वैत- परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है ॥ १९ ॥
'यह परमतत्त्व-रहस्य गुरुभक्तिविहीनको नहीं बतलाना चाहिये। जो सुनना न चाहता हो, उसे भी नहीं बतलाना चाहिये; न तपस्याविहीन नास्तिकको और न मेरी (भगवान्की) भक्तिसे रहित दाम्भिकको बतलाना चाहिये। मत्सरयुक्त पुरुषको नहीं बतलाना चाहिये। मेरी निन्दामे लगे (भगवान्में दोषदृष्टि करनेवाले) कृतघ्नको भी नहीं बतलाना चाहिये ॥२०॥
'जो यह परम रहस्य मेरे (भगवान्के) भक्तको बतलावेगा, वह मेरी भक्तिमें निष्ठावान् होकर मुझे (भगवान्- को) ही प्राप्त करेगा। जो हम दोनों (ब्रह्माजी एवं भगवान् विष्णु) के इस संवादका अध्ययन करेगा, वह मनुष्य ब्रह्म- निष्ठ हो जायगा। जो श्रद्धावान् तथा असूया (दोषदृष्टि) रहित होकर सुनेगा या हम दोनोंके इस संवादको पढ़ेगा, वह पुरुष मेरे सायुज्यको प्राप्त करेगा' ॥ २१-२३ ॥
(इतना कहकर) तब महाविष्णु अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजी अपने स्थान (ब्रह्मलोक) को चले गये ॥२४॥
॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥
॥ उत्तरकाण्ड समाप्त ॥
॥ अथर्ववेदीय त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ 'अथर्ववेदीय नारदपरिव्राजकोपनिषद्
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
प्रथम उपदेश नारद-शौनक-संवाद
[बायाँ स्तम्भ] एक समयकी बात है, परिव्राजकोंके समुदायको सुशोभित करनेवाले नारदजी सब लोकोंमें विचरण कर रहे थे । उन्होंने अपूर्व-अपूर्व पुण्य-स्थलों एव पुण्य-तीर्थोंमें जाकर उन्हें और भी पवित्र बनाया और उन तीर्थोंके दर्शनसे स्वयं भी चित्तशुद्धि प्राप्त की । उनके मनमे कही किसी भी प्राणीके प्रति वैरका भाव नहीं था । उनका मन शान्त था और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ वशमे हो गयी थीं । वे सब ओरसे विरक्त होकर अपने स्वरूपके अनुसंधानमें लगे हुए थे । घूमते- घूमते वे नैमिषारण्यमे आये, जो नियमजनित आनन्दके कारण विशेषरूपसे गणना करनेयोग्य पवित्र तीर्थ है । वह स्थान असंख्य मुनिजनोंसे भरा हुआ था । उन्होंने उस पुण्य- स्थलीका दर्शन किया । वे अपनी वीणाके तारोंसे वैराग्य- बोधक 'स रि ग म प ध नि' इन स्वरविशेषोंका झकार कर रहे थे । वे जागतिक चर्चासे दूर रहकर मुखसे भगवान्- की मधुर कथाके गीत आलाप रहे थे । उन्हें सुनकर स्थावर- जङ्गम सभी प्राणी आनन्दसे झूम उठते थे। वे उस भक्तिप्रधान संगीतसे मनुष्य, मृग, किम्पुरुष, देवता, किंनर तथा अप्सराओंको भी मोहित कर रहे थे । नैमिषारण्यमें बारह वर्षांका सत्रयाग चल रहा था । उसमें वेदाध्ययनसे सम्पन्न, सर्वज्ञ, तपस्यामे सलग्न रहनेवाले और ज्ञान-वैराग्यसे विभूषित शौनक आदि महर्षि सम्मिलित हुए थे । उन्होंने परम भागवत ब्रह्मकुमार देवर्षि नारदको आया देख उनकी अगवानी की । उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और यथायोग्य अतिथि-सत्कार करके उन्हें एक सुन्दर आसनपर बैठाया । फिर स्वय भी सब लोग यथास्थान बैठ गये । तत्पश्चात् शौनक आदि महर्षियोंने विनयपूर्वक उनसे पूछा—'भगवन् ! ब्रह्मकुमार नारदजी ! ससार-बन्धन-
[दायाँ स्तम्भ] से मुक्ति कैसे होती है ? उस मुक्तिका उपाय क्या है—यह हमलोगोंको बतानेकी कृपा करें' ॥ १ ॥ उनके इस प्रकार प्रश्न करनेपर वे त्रिभुवनप्रसिद्ध देवर्षि नारदजी इस प्रकार बोले—'उत्तम कुलमे उत्पन्न पुरुष यदि उपनयन-सस्कारसे युक्त न हुआ हो तो पहले विधिपूर्वक उपनयन सस्कार कराये। फिर चौवालीस* सस्कारोंसे सम्पन्न
* चौवालीस सस्कार इस प्रकार हैं—( १ ) गर्भाधान, ( २ ) पुसवन, ( ३ ) सीमन्तोन्नयन, ( ४ ) विष्णुवलि, ( ५ ) जातकर्म, ( ६ ) नामकरण, ( ७ ) उपनिष्क्रमण, ( ८ ) अन्नप्राशन, ( ९ ) चूडाकर्म, ( १० ) कर्णवेध, ( ११ ) अक्षरारम्भ, ( १२ ) उपनयन, ( १३ ) व्रतारम्भ, ( १४ ) समावर्तन, ( १५ ) विवाह, ( १६ ) उपाकर्म, ( १७ ) उत्सर्जन । सप्त पाकयज्ञ-संस्था ( १८ ) हुत, ( १९ ) प्रहुत, ( २० ) आहुत, ( २१ ) शूलगव, ( २२ ) बलिहरण, ( २३ ) प्रत्यवरोहण, ( २४ ) अष्टकाहोम । सप्त हविर्यज्ञ-संस्था ( २५ ) अग्न्याधान, ( २६ ) अग्निहोत्र, ( २७ ) दर्श-पूर्णमास, ( २८ ) चातुर्मास्य, ( २९ ) आग्रयणेष्टि, ( ३० ) निरूढपशु- बन्ध, ( ३१ ) सौत्रामणी । सप्त सोमयज्ञ-संस्था ( ३२ ) अग्निष्टोम, ( ३३ ) अत्यग्निष्टोम, ( ३४ ) उक्थ्य, (३५) षोडशी, (३६) वाजपेय, (३७) अतिरात्र, (३८) आप्तोर्याम । ( ३९ ) वानप्रस्थ, ( ४० ) सन्यास—ये तो चालीस सस्कार हैं, इनके साथ शौच, सतोष, तप और स्वाध्याय—ये चार और गिन लेनेसे चौवालीस सस्कार होते हैं ।
७३६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश २ और अपने मनके अनुरूप एक गुरुके समीप निवास करे । वहाँ गुरुकी सेवा करते हुए पहले अपनी शाखाका अध्ययन करे । फिर क्रमशः सम्पूर्ण विद्याओंका अभ्यास करते हुए बारह वर्षोंतक गुरु-सेवापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करे । तत्पश्चात् क्रमशः पचीस वर्षोंतक गृहस्थ-धर्मका और पचीस वर्षोंतक वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मोंका विधिपूर्वक पालन करे । चार प्रकारके ब्रह्मचर्य, * छः प्रकारके गार्हस्थ्य† तथा चार प्रकारके वानप्रस्थ‡-धर्मका भलीभाँति अभ्यास करके उन-उन आश्रमोंके उचित समस्त कर्मोंका यथावत् अनुष्ठान करे । फिर साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न हो समस्त संसारसे ऊपर उठकर मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा सब प्रकारकी आशाको त्याग दे । इसी प्रकार वासनाओं और एषणाओंके भी ऊपर उठे—उनका भी त्याग कर दे । फिर सबके प्रति वैरभावका त्याग करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए संन्यासी हो जाय । परमहंस-आश्रम (सन्यास) मे रहकर अपने अच्युतस्वरूपका चिन्तन करते हुए जो शरीर-त्याग करता है, वह मुक्त हो जाता है, वह मुक्त हो जाता है । यह उपनिषद् (गूढ रहस्यमय ज्ञान ) है ॥ २ ॥ ॥ प्रथम उपदेश समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय उपदेश संन्यास-ग्रहणका क्रम तदनन्तर वे शौनक आदि सम्पूर्ण महर्षि इन भगवान् नारदजीसे विनयपूर्वक बोले—'भगवन् ! हमें सन्यासकी विधि बताइये।' नारदजीने उनकी ओर देखकर कहा— 'सन्यासका सारा स्वरूप लोकपितामह ब्रह्माजीके मुखसे ही समझना उचित होगा।' यों कहकर सत्रयागकी पूर्तिके पश्चात् उन सबको साथ ले वे सत्यलोकमें गये और विधिवत् ब्रह्मचिन्तनमें लगे हुए परमेष्ठीको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे । स्तुति करनेके अनन्तर पितामहकी आज्ञासे वे सबके साथ वहाँ यथायोग्य आसनपर बैठे । तदनन्तर नारदजीने पितामहसे कहा—"भगवन् ! आप हमारे गुरु, पिता, सम्पूर्ण विद्याओंके रहस्यको जाननेवाले तथा सर्वज्ञ हैं । अतः आप मुझे एक रहस्यकी बात, जो मुझे बहुत प्रिय है,
- चार प्रकारके ब्रह्मचारी ये हैं—गायत्र, ब्राह्म, प्राजापत्य तथा बृहन् । इनमेंसे उपनयनके बाद जो तीन राततक बिना नमकका भोजन करके गायत्रीका जप करता है, वह गायत्र है, जो वेदाध्ययनपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करता है, वह ब्राह्म है, जो एक वर्षतक वैदिकव्रत (ब्रह्मचर्य) का पालन करता है, वह प्राजापत्य कहलाता है और जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्य- का पालन करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी बृहन् कहा गया है। † छ प्रकारके गृहस्थोंके नाम ये हैं—वार्ताक, शालीन, यायावर, घोर सन्यासिक, उञ्छवृत्ति और अयाचित । इनमें जो खेती, गो-रक्षा और वाणिज्यरूप वैश्योचित वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हुए स्व-धर्मका पालन करता है, वह वार्ताक कहलाता है, जो यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें सलग्न रहकर याजन; अध्यापन और प्रतिग्रहके द्वारा जीवन-निर्वाह करता है, वह शालीन माना गया है, जो सत्पुरुषोंके घरोंपर जा-जाकर उनसे थोड़ा-थोड़ा माँगकर अपने कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये आवश्यक अन्नका सग्रह करता है, वह यायावर कहलाता है, जो अपने हाथसे निकाले हुए पवित्र जलसे सब कार्य करते हुए प्रतिदिन साधुपुरुषोंसे एक दिनके निर्वाहके लिये अन्न ग्रहण करता है, वह घोर सन्यासिक है, जो खेत कट जानेपर या बाजार उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए अनाजके दानोंको चुन-चुनकर लाता है और उन्हींसे जीवन-निर्वाह करता है, उसे उञ्छ कहते ' हैं और जो किसीसे याचना न करके दैवेच्छासे प्राप्त हुए अन्नपर ही जीवन-निर्वाह करता है, वह अयाचक कहलाता है । ‡ वानप्रस्थके भी चार भेद हैं—वैखानस, औदुम्बर, बालखिल्य और फेनप । इनमेंसे जो बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए नीवार आदि अगली अन्नोंसे अग्निहोत्र आदि कर्म करता है, वह वैखानस कहलाता है, जो सबेरे उठते ही जिस दिशाकी ओर दृष्टि जाय, उसी दिशामें जाकर वहाँके गूलर, बेर आदि फलों तथा नीवार और श्यामाक आदि अन्नोंका सग्रह करके उन्हींसे प्रतिदिन जीविका चलाता है, वह औदुम्बर माना गया है, जो जटा और वल्कल धारण करके आठ महीनोंतक वृत्ति उपार्जन करता, चौमासेमें संगृहीत अन्नका भोजन करता तथा कार्तिककी पूर्णिमाको संगृहीत फूल और फलका त्याग करता है, वह बालखिल्य कहलाता है, तथा जो सूखे पत्ते और फलका आहार करते हुए जहाँ-कहीं भी रहकर अपने कर्तव्यका पालन करता है, उसे फेनप कहते हैं।
॥ द्वितीय उपदेश समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय उपदेश संन्यासके अधिकारी, स्वरूप, विधि, नियम एवं आचार आदिका निरूपण
तदनन्तर देवर्षि नारदने अपने पिता ब्रह्माजीसे पूछा— 'भगवन् ! किस प्रकार सन्यास लिया जाता है ? तथा सन्यासका अधिकारी कौन है ?' ब्रह्माजीने कहा—'अच्छा, पहले सन्यासका अधिकारी कौन है, इसका निरूपण करके पश्चात् सन्यासकी विधि बतायी जायगी, सावधान होकर सुनो । नपुंसक, पतित, किसी अङ्गसे हीन, स्त्रीके प्रति अधिक आसक्त, बहरा, बालक, गूँगा, पाखण्डी, चक्री ( षड्यन्त्रकारी ), लिङ्गी (वेषधारी), वैखानसदर द्विज, वेतन लेकर अध्यापन करनेवाला, शिपिविष्ट ( गंजा अथवा कोढ़ी ) तथा अग्निहोत्र न करनेवाला—ये वैराग्यवान् होनेपर भी सन्यासके अधिकारी नहीं हैं। यदि सन्यास ले भी लें, तो भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंका उपदेश प्राप्त करनेके अधिकारी नहीं होत । जो पहलेसे ही सन्यासी है, अर्थात् कर्मफलकी इच्छा न रखते हुए वर्णाश्रमोचित कर्तव्यका पालन करता है, वही सन्यास आश्रममें प्रवेश करनेका अधिकारी है ॥ १ ॥
'जो दूसरोंसे स्वय नहीं डरता तथा दूसरोको अपनेद्वारा भय नहीं पहुँचाता, वही परिव्राजक ( सन्यासी ) है—ऐसा स्मृतियोंका कथन है । नपुसक, किसी अङ्गसे हीन, अंधा, बालक, पापी, पतित, परस्त्रीगामी, वैखानसदर द्विज, चक्री, लिङ्गी, पाखण्डी, शिपिविष्ट, अग्निहोत्र न करनेवाला, दो-तीन बार सन्यास ग्रहण करनेवाला तथा वेतन लेकर अध्यापन करनेवाला—ये आतुर-सन्यासके सिवा क्रम-सन्यासके अधिकारी नहीं होते ॥ २—४ ॥
उ० सं० ९३—
७३८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ३ 'यदि कहो, आतुर सन्यासका कौन-सा समय विद्वानोंको मान्य है, तो सुनो। जब प्राण निकलनेका समय अत्यन्त निकट हो, वह आतुर-सन्यासका ठीक समय माना गया है । इससे भिन्न समयको ठीक नहीं माना गया है। आतुर सन्यास यदि ठीक समयसे हो तो वह मुक्तिमार्गकी प्राप्ति करानेवाला होता है। आतुर-सन्यासमें भी विद्वान् पुरुष शास्त्रविहित मन्त्रोंका पाठ करते हुए विधिवत् सब आवश्यक कृत्य करके ही मन्त्रोच्चारणपूर्वक सन्यास ग्रहण करे। आतुर सन्यास हो चाहे क्रम-सन्यास, उसके विधि-विधानमे कोई भेद नहीं है, क्योंकि कर्म मन्त्रकी अपेक्षा करता है और कोई भी मन्त्र ऐसा नहीं है, जो किसी न किसी कर्मसे सम्बन्ध न रखता हो । मन्त्रहीन कर्म वास्तवमें कर्म ही नहीं है। अतः मन्त्रका परित्याग न करे। यदि मन्त्रके बिना कर्म करे तो वह राखमें छोड़ी हुई आहुतिके समान व्यर्थ होता है। मुने ! शास्त्रविधिके अनुसार बताये हुए कर्मको संक्षेपमें करनेसे आतुर-सन्यास सम्पन्न होता है। इसलिये आतुर-सन्यासमें मन्त्रोंका बार-बार उच्चारण आवश्यक एव विहित है ॥ ५-९ ॥ 'यदि अग्निहोत्री पुरुष देशान्तरमें गया हुआ हो और उसे वैराग्य हो जाय तो जलमे ही प्राजापत्येष्टि करके तत्काल सन्यास ले ले । यह प्राजापत्य याग केवल मनसे करे अथवा विधिमें बताये अनुसार मन्त्रोंका उच्चारणमात्र करके करे अथवा वेदोक्त अनुष्ठान पद्धतिके अनुसार विधिवत् कर्म अनुष्ठान करे । यह सब करके ही विद्वान् पुरुष सन्यास ग्रहण करे। अन्यथा वह पतित हो जाता है ॥ १०-११ ॥ 'जब मनमे सब पदार्थोंकी ओरसे पूर्ण वैराग्य हो जाय, तभी सन्यासकी इच्छा करनी चाहिये । इसके विपरीत आचरण करनेसे मनुष्य पतित हो जाता है । विरक्त बुद्धिमान् सन्यास ग्रहण करे और रागवान् पुरुष घरपर ही निवास करे । जो मनमे राग (आसक्ति ) होते हुए भी सन्यास ग्रहण करता है, वह द्विजोंमे अधम है तथा उसे नरककी प्राप्ति होती है ॥ १२-१३ ॥ 'जिसकी जिह्वा, शिश्नेन्द्रिय, उदर और हाथ आदि सभी इन्द्रियाँ भलीभाँति वशमें हों तथा जिसने विवाह न किया हो, ऐसा ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही सन्यास ले । संसारको सारहीन समझकर सार वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे बुद्धिमान् पुरुष पूर्ण वैराग्यका आश्रय लेकर विवाह किये बिना ही सन्यास ले लेते हैं। कर्म ही प्रवृत्ति (संसारमें प्रवृत्त होने) का लक्षण है और ज्ञान ही सन्यासका मुख्य लक्षण है। अतः बुद्धिमान् पुरुष ज्ञानको सामने रखकर ही यहाँ सन्यास ग्रहण करे ॥ १४-१६॥ 'जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्मका ज्ञान हो जाय, तब एक दण्ड धारण करके यज्ञोपवीतसहित शिखाको त्याग दे। जो परमात्मामें अनुरक्त और उनसे भिन्न वस्तुओंकी ओरसे विरक्त है, जिसके मनसे लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा—ये सभी एषणाएँ निकल गयी हैं, वही भिक्षान्नभोजन करने (सन्यास लेने) का अधिकारी है। जैसे साधारण मनुष्य अपनी पूजा और वन्दना होनेपर अत्यधिक प्रसन्न होता है, वैसी ही प्रसन्नता जब डंडोंसे पीटे जानेपर भी हो; तभी वह भिक्षु होनेका अधिकारी होता है। मै ही वासुदेव नामसे प्रसिद्ध अद्वितीय अविनाशी ब्रह्म हूँ—ऐसा भाव जिसके मनमे दृढ हो गया है, वही भिक्षान्नभोजनका अधिकारी है। जिस पुरुषमे शान्ति, शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह), शौच, सतोष, सत्य, सरलता, कुछ भी सग्रह न करनेका भाव तथा दम्भका अभाव हो, वही सन्यास-आश्रममें प्रवेश करे। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापका भाव नहीं रखता, तभी सन्यासका अधिकारी होता है । (मनुप्रोक्त) दस प्रकारके धर्मोंका अनुष्ठान करते हुए एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक उपनिषदोंका श्रवण करे तथा ब्रह्मचर्य पालन एव स्वाध्यायद्वारा ऋषि- ऋणसे, यज्ञानुष्ठानद्वारा देव ऋणसे और पुत्रकी उत्पत्तिद्वारा पितृ-ऋणसे मुक्त होकर (विरक्त) द्विज सन्यास ग्रहण करे। धृति, क्षमा, दम (मनोनिग्रह), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह, ह्री (निषिद्ध कर्म एव अविनय आदिसे स्वाभाविक सकोच), विद्या, सत्य तथा अक्रोध (क्रोधका अभाव)—ये दस धर्मके स्वरूप हैं। जो भूतकालमे किये हुए भोगोंका चिन्तन, भविष्यमें मिलनेवाले भोगोकी आकाङ्क्षा तथा वर्तमान समयमें प्राप्त हुए भोगोंका अभिनन्दन नहीं करता, वही सन्यास-आश्रममे निवास कर सकता है। जो अन्तःकरणमें स्थित इन्द्रियोंको अपने भीतर और बाहरके विषयोंको बाहर ही रोक रखनेमें सदा समर्थ है, वही सन्यास-आश्रममें निवास करे। जैसे प्राण निकल जानेपर शरीर सुख-दुःखका अनुभव नहीं करता, उसी प्रकार प्राण रहते हुए भी जिसपर सुख-दुःखका प्रभाव नहीं पड़ता, वही सन्यास-आश्रममें निवास करनेका अधिकारी है ॥ १७-२७॥ 'दो कौपीन (लँगोटियाँ), एक कन्था (गुदड़ी) और एक दण्ड—इतनी ही वस्तुओंका परमहंस सन्यासीको सग्रह करनेका अधिकार है, इससे अधिक सग्रहका उसके लिये विधान नहीं
उपदेश ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३९
है। यदि रागवश अधिक वस्तुओंका संग्रह करता है तो वह मृत्युके पश्चात् रौरव नरकमें जाकर पुनः पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेता है। शीत आदिसे बचनेके लिये फटे-पुराने साफ कपड़ोंको सीकर एक गुदड़ी बना ले और बस्तीसे बाहर रहकर गेरुए रंगका वस्त्र धारण करे । संन्यासी एक ही वस्त्र धारण करे अथवा बिना वस्त्रके ही (दिगम्बर) रहे। दृष्टिको इधर-उधर चारों ओर न ले जाकर एक ही स्थानपर नियन्त्रित रक्खे। मनमें किसी भी वस्तुके लिये लोभ न आने दे । सदा अकेला ही विचरण करे । वर्षा ऋतुमें किसी एक ही स्थानपर निवास करे । कुटुम्ब, स्त्री-पुत्र, (व्याकरण आदि) वेदाङ्गोंके ग्रन्थ, यज्ञ और यज्ञोपवीतका त्याग करके संन्यासीको सर्वत्र गूढ भावसे (बिना अपना विज्ञापन किये) विचरण करना चाहिये ॥ २८-३२ ॥ 'काम, क्रोध, घमण्ड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष हैं, उन सबका परित्याग करके सन्यासी सब ओरसे ममताको हरु ले। अपने मनमें राग और द्वेषको स्थान न दे। मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझे । प्राणियोंकी हिंसासे सर्वथा दूर रहे तथा सब ओरसे निःस्पृह होकर मुनिवृत्तिसे रहे। जो दम्भ और अहङ्कारसे मुक्त है, हिंसा और चुगली आदि दोषोसे दूर है तथा आत्मज्ञानके लिये उपयोगी गुणोंसे सुशोभित है, वह सन्यासी मोक्षको प्राप्त होता है। इन्द्रियोंकी विषयोंमे आसक्ति रहनेपर मनुष्य निःसन्देह अनेक प्रकारके दोषोंमें फँस जाता है; किंतु यदि उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी प्रकार वशमें कर ले तो वह (मोक्षरूप) सिद्धिको प्राप्त होता है। विषय भोगोंकी कामना भोगोंके उपभोगसे कदापि शान्त नहीं होती। भोगसे तो वह उल्टे बढती ही है—ठीक उसी तरह, जैसे घी डालनेसे आग और भी प्रज्वलित हो उठती है। जो मधुर या कटु शब्द सुनकर, कोमल या कठोर वस्तुका स्पर्श कर, स्वादिष्ट या स्वादहीन भोजन करके, सुन्दर या विकृत रूप देखकर और सुगन्ध या दुर्गन्ध सूँघकर न तो हर्षसे फूल उठता है और न ग्लानिका ही अनुभव करता है, उसीको जितेन्द्रिय जानना चाहिये । जिसके मन और वाणी शुद्ध हैं तथा सर्वदा भलीभाँति दोषोंसे सुरक्षित (बचे हुए) हैं, वही वेदान्तश्रवणका पूर्ण फल प्राप्त करता है । ब्राह्मण सम्मानसे विषकी भाँति उद्विग्न रहे और अपमानको अमृतकी भाँति समझकर सदा उसकी अभिलाषा करे । अपमानित पुरुष सुखसे सोता, सुखसे जागता और इस लोकमें सुखसे ही विचरता है. किंतु अपमान करनेवाला स्वतः नष्ट हो जाता है। अतिवादों (कठोर वचनों) को सहन करे, किसीका अनादर न करे तथा इस (नश्वर) देहको लेकर किसीके साथ वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करता है, उसके प्रति बदलेमें क्रोध न करे। यदि वह गाली देता हो, तो भी स्वय तो उसे अच्छी ही बात कहे। दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाछिद्र और एक मुख—इन सातों द्वारोंके अनुभवसे सम्बन्ध रखनेवाली वाणीको कभी असत्यरूपमे न बोले । सुख चाहनेवाला पुरुष अध्यात्मतत्त्वमें अनुराग रखकर स्थिरभावसे बैठे, किसीसे कोई अपेक्षा न रक्खे, मनसे सब तरहकी कामनाओंको निकाल दे तथा अपने सिवा किसी दूसरेको सहायक न बनाकर अकेला ही इस ससारमें विचरता रहे। इन्द्रियोंको वशमें रखने, राग-द्वेषका नाश करने तथा किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेसे मनुष्य अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है। यह शरीर रोगोंका घर है, इसमें हड्डियोंके खंभे लगे हैं। स्नायुजालकी डोरीसे यह बँधा है। मास और रक्त इसपर थोप दिया गया हैं। इसे चमड़ेसे मढ दिया गया है। यह मल और मूत्रसे सदा ही पूर्ण रहता है। इससे दुर्गन्ध निकलती रहती है। बुढापे और शोकसे व्याप्त होनेके कारण यह सदा आतुर (असमर्थ) रहता है। वीर्य और रजसे उत्पन्न होनेके कारण यह रजखल (रजोगुणी अथवा धूलसे भरा हुआ) है। साथ ही यह अनित्य भी है (आज गिरेगा या कल, इसका कुछ भी ठिकाना नही है)। इसमें पाँच भूत सदा ही डेरा डाले रहते हैं, अतः इसे त्याग दे (इसके प्रति अहता और ममता न रक्खे)। यदि मूर्ख मनुष्य मास, रक्त, पीव, मल, मूत्र, नाड़ी, मज्जा और हड्डियोंके समुदायभूत इस शरीरसे प्रेम करता है तो वह नरकसे भी अवश्य प्रेम करेगा। इस शरीरमें जो अहम्भाव है, वही कालसूत्र नामक नरकका मार्ग है, वही महावीचि नामक नरकमें ले जानेके लिये बिछा हुआ जाल है। तथा वही असिपत्र वन नामक नरककी श्रेणी है। शरीरमें होनेवाली अहता कुत्तेका मास लेकर चलनेवाली चाण्डालिनीके समान है। उसको सब प्रकारके यत्नोंद्वारा त्याग दे। सर्वनाश उपस्थित हो, तो भी कल्याणकामी पुरुषको उसका संगर्तक नही करना चाहिये। अपने प्रियजनोंमें सुकृत (पुण्य) को और अप्रियजनोंमे दुष्कृत (पाप) को छोड़कर—स्वयं उनसे सम्बन्ध न रखकर ध्यानयोगके द्वारा साधक सनातन ब्रह्म- को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार धीरे धीरे सम्पूर्ण आसक्तियों- का त्याग करके सन्यासी पुरुष सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्मामें ही स्थिति प्राप्त करता है। सिद्धिलाभके
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[शीर्षक]
७४० · ' नारदपरिव्राजकोपनिषद् [ उपदेश ३
[बायाँ स्तम्भ]
लिये किसी दूसरेको साथी न बनाकर सदा अकेला ही विचरण करे । एककी सिद्धि देखकर सन्यासी न तो अपने साधन- को छोड़ता है और न ऋद्धिसे वञ्चित होता है ॥ ३३–५३ ॥ ‘पानी पीनेके लिये कपाल (लकड़ी या नारियलका पात्र ), रहनेके लिये किसी वृक्षकी जड़, पहननेको फटे पुराने कपड़े, सदा अकेले रहनेका स्वभाव और सबमे समताका भाव— यही जीवन्मुक्त पुरुषका लक्षण है । सन्यासी सम्पूर्ण भूतोंका हितैषी हो, शान्तभावसे रहे, त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करे, एकमात्र आत्मामे ही रमण करनेवाला हो तथा सब कुछ छोड़कर अकेला घूमता रहे । केवल भिक्षाके लिये ही वह गाँवमे प्रवेश करे । सन्यासी यदि अकेला रहे, तभी वह शास्त्रीय आदेशके अनुसार यथार्थ भिक्षु होता है। एकसे दो होते ही वह 'मिथुन' (जोड़ा ) माना गया है । तीनका समुदाय होनेपर उसे 'गाँव' कहा गया है, तथा इससे अधिक व्यक्ति एक साथ हो जायें, तब तो पूरा नगर-सा ही हो जाता है । सन्यासीको कभी अपने पास अधिक व्यक्तियोको आनेका अवसर देकर नगर, गाँव अथवा मिथुनकी स्थिति नहीं उत्पन्न करनी चाहिये । इन तीनों ( नगर, ग्राम और मिथुन ) का आयोजन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे गिर जाता है । अनेक व्यक्तियोंका एकत्र सयोग होनेपर उनमे या तो राजा—प्रभु, सेठ आदिकी बातें होगी, अथवा कहाँ कैसी भिक्षा मिलती है—यह चर्चा शुरू हो जायगी, अथवा परस्पर स्नेह, चुगली और मत्सरता आदिके भाव उत्पन्न होगे । इसमे तनिक भी सदेह नहीं है । सन्यासी निःस्पृह होकर सदा अकेला रहे । किसीके साथ वार्तालाप न करे । वह सदा 'नारायण' कहकर ही दूसरोंकी बात या नमस्कार आदिका उत्तर दे । वह एकाकी रहकर मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा केवल ब्रह्मका ही चिन्तन करे । किसी तरह भी मृत्यु या जीवनका अभिनन्दन न .करे । जबतक आयु पूरी न हो, तबतक केवल कालकी ही प्रतीक्षा करता रहे। न तो वह मृत्युकी प्रशसा करे और न जीवनका अभिनन्दन करे । जैसे भृत्य अपने स्वामीकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करता रहता है, प्रकार वह एकमात्र की प्रतीक्षा करे। (जिह्वारहित), ॰ लूला, अ एव मुग्ध (जड) की भाँति नवाला भिक्षु प्रकारके गुणोंसे निश्चय ही मुक्त । जाता भोजन करते हुए भी 'यह स्वादिष्ट नहीं है।' इस भावसे अन्नके तथा हितकर, सत्य और नपी तुली बात
[दायाँ स्तम्भ]
करता है, उसे 'अजिह्व' (जिह्वारहित) कहते हैं। जो आजकी जन्मी हुई नवजात कन्या, सोलह वर्षोकी युवती नारी तथा सौ वर्षोंकी आयुवाली वृद्धा स्त्रीको देखकर कहीं भी राग द्वेष आदि विकारोंके वशीभूत नहीं होता, वह 'षण्डक' (नपुंसक) कहा गया है । भिक्षाके लिये तथा मल मूत्रका त्याग करनेके लिये ही जिसका घूमना होता है, और एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेके लिये भी जो प्रतिदिन एक योजन (चार कोस) से आगे नहीं जाता (एक योजनका रास्ता तै करके शेष समय ध्यान आदिमे व्यतीत करता है), वह 'पङ्गु' (लूला) ही है। चलते या खड़ा होते समय जिसके नेत्र चार युग (लगभग दस हाथ ) भूमि छोड़कर उससे अधिक दूरतक नहीं देखते, वह सन्यासी 'अन्ध' कहलाता है । हितकी बात हो या अहितकी, मनको सुख देनेवाली बात हो या शोक प्रदान करनेवाली, उसे सुनकर भी जो मानो नही सुनता (उनपर ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' कहा गया है । विषय अपने समीप हों, शरीरमे शक्ति हो और सभी इन्द्रियाँ स्वस्थ हों, तब भी जो सोये हुए पुरुषकी भाँति उन विषयोंके प्रति आकृष्ट नहीं होता, उस भिक्षुको 'मुग्ध' (भोलाभाला) कहते हैं ॥ ५४–६८ ॥ 'नट आदिके खेल, जूआ, युवती स्त्री, सम्बन्धियो, भक्ष्य भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री—इन छः वस्तुओंकी ओर सन्यासी कभी दृष्टिपात न करे । राग, द्वेष, मद, माया, दूसरोके प्रति द्रोह तथा अपनाके प्रति मोह—इन छः बातो को संन्यासी कभी मनसे भी न सोचे । मञ्च (कुर्सी), श्वेत वस्त्र, स्त्रियोंकी चर्चा, इन्द्रियोंकी लोलुपता, दिनमे सोना और सवारी पर चलना—ये सन्यासियोंके लिये छः पातक हैं । आत्म चिन्तन करनेवाला सन्यासी दूरकी यात्राका यत्नपूर्वक त्याग करे ॥ ६९–७१ ॥ 'सन्यासी सदा मोक्षकी हेतुभूता उपनिषद् विद्याका अभ्यास करे । वह न तो सदा तीर्थोंका सेवन करे और न अधिक उपवास ही करे । वह अधिक विद्याएँ पढनेका स्वभाव न बनाये । सभाओंमें व्याख्यान देनेवाला न बने । सदा ऐसा बर्ताव करे जिसम पाप, शठता और कुटिलता न हो । जैसे कछुआ सब ओरसे अपने अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियोको विषयोंकी ओरसे समेटकर जो इन्द्रिय और मनके व्यापारको क्षीण कर देता है, कामना और परिग्रहसे मुँह मोड़ लेता है, सुख दुःख आदि द्वन्द्वोंसे हर्ष या शोकके वशीभूत नहीं होता, नमस्कार (भिन्न-भिन्न देवताओंकी स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध तर्पण) को छोड़ देता है,
उपदेश ३ ] , * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४१
ममता और अहङ्कारसे शून्य हो जाता है, किसी भी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रखता, निष्काम तथा एकान्तसेवी हो जाता है, वह निश्चय ही ससार बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ७२-७६ ॥
'प्रमादरहित, कर्म, भक्ति एव ज्ञानसे सम्पन्न तथा केवल आत्माके ही अधीन रहनेवाला साधक, चाहे वह—ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ—कोई भी क्यों न हो, वैराग्य होनेपर सन्यास ग्रहण कर सकता है। अथवा यदि वैराग्य मन्द होनेके कारण उन-उन आश्रमोंमे प्रधानतः आस्था बनी हुई हो तो पहले ब्रह्मचर्याश्रमकी अवधि पूरी करके गृहस्थ बने, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो जाय और वानप्रस्थ होनेके अनन्तर सन्यास ले । अथवा तीव्र वैराग्य होनेपर ब्रह्मचर्य-आश्रमसे ही सन्यासमे प्रवेश करे। या गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ-आश्रमसे सन्यास ग्रहण करे। अथवा ब्रह्मचारी हो या अब्रह्मचारी, स्नातक हो या न हो, अग्निहोत्र त्याग चुका हो या उससे अलग ही रहा हो— जिस दिन उसे वैराग्य हो, उसी दिन वह घर छोड़कर सन्यासी हो जाय। सन्यास-आश्रममे प्रवेशके समय कुछ विद्वान् प्राजापत्य नामक इष्टि करते हैं, उसे करे अथवा न करे। अथवा केवल 'आग्नेयी' इष्टिका ही अनुष्ठान करे (अग्नि देवतासे सम्बन्ध रखनेके कारण यह इष्टि 'आग्नेयी' कहलाती है)। अग्नि ही प्राण है, अतः इस आग्नेयी इष्टिद्वारा साधक प्राणका ही पोषण करता है। अथवा 'त्रैधातवीया' इष्टि का ही (जिसका इन्द्र देवतासे सम्बन्ध है) अनुष्ठान करे। सत्त्व, रज और तम—ये ही तीन धातु हैं, जिनका इस त्रैधातवीय इष्टिके द्वारा हवन किया जाता है। शास्त्रोक्त विधिसे इष्टि करके 'अयं ते योनि '* इस मन्त्रसे अग्निको सूँघे । मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—'हे अग्निदेव ! यह समष्टि प्राण तुम्हारे आविर्भावका कारण है। यह प्राण ही सवत्सरात्मक काल है, जिससे उत्पन्न होकर तुम उत्तम कान्तिसे देदीप्यमान हो रहे हो। अपनी उत्पत्तिके कारणभूत इस प्राणको जानकर तुम इसीमे स्थित हो जाओ और इस प्रकार हमारे प्राणसे तादात्म्य प्राप्त करके हमारे ज्ञानरूपी धनको बढाओ ।' निश्चय ही यह प्राण अग्निकी उत्पत्तिका कारण है। इसलिये 'प्राण गच्छ स्वा योनिं गच्छ स्वाहा' ( हे अग्निदेव ! तुम प्राणको प्राप्त कर, अपने कारणको प्राप्त कर उसके साथ एक हो जाओ) इसी प्रकार यह मन्त्र कहता है। (इसी प्रकार साधक भी कहे।)
- अय ते योनिऋत्वियो यतो जातो अरोचथा । त जानन्नग्न आरोहाथा नो वर्धया रयिम् ॥
'आहवनीय अग्निमेसे अग्नि ले जाकर पूर्वोक्त प्रकारसे इष्टि करके अग्निको सूँघे । यदि अग्नि न मिल सके तो जलम ही हवन करे। 'निश्चय ही सम्पूर्ण देवता जलस्वरूप हैं। सम्पूर्ण देवताओके लिये मैं हवन करता हूँ, यह उन्हें प्राप्त हो' (आपो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहा) यों कहकर हवन करे। फिर उस जलमेसे थोड़ा सा जल उठाकर उसका आचमन कर ले । वह घृतयुक्त जल आरोग्यकारक एव मोक्षदायक होता है। फिर शिखा, यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र, स्त्री, कर्म, अध्ययन एव अन्यान्य मन्त्रोंका जप त्यागकर ही आत्मवेत्ता पुरुष परिव्राजक (सन्यासी) होता है। त्रैधातवीय मोक्षसम्बन्धी मन्त्रोंसे ब्रह्मको जाने। जो सत्य, ज्ञान आदि लक्षणोसे युक्त है, वही ब्रह्म है, वही उपासनाके योग्य है। यह ठीक ऐसा ही है' ॥ ७७-७९ ॥
नारदजीने ब्रह्माजीसे पुनः प्रश्न किया—'यज्ञोपवीत न रहनेपर वह ब्राह्मण कैसे रह सकता है?' तब ब्रह्माजीने उनसे कहा—'विद्वान् पुरुष शिखासहित सम्पूर्ण सिरके बालो- का मुण्डन कराके शरीरपर यज्ञोपवीतके रूपमे धारण किये जानेवाले बाह्य सूत्रको तो त्याग दे और जो अविनाशी परब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको सबमे व्यापक सूत्ररूप समझकर अपने भीतर धारण करे। जो सूचन (ज्ञान) का हेतु हो, उसे 'सूत्र' कहते हैं। अतः 'सूत्र' परमपदका नाम है। जिसने उस परमपदरूप सूत्रको जान लिया, वही वेदांका पारगामी ब्राह्मण है। जैसे सूत्रमे मनके पिरोये हुए होते हैं उसी प्रकार जिस परमात्मामें यह सम्पूर्ण जगत् पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योगका ज्ञाता तत्त्वदर्शी योगी उसी सूत्रको धारण करे। विद्वान् पुरुष उत्तम योगका आश्रय ल बाह्य सूत्रका तो त्याग करे और इस ब्रह्मस्वरूप सूत्रको धारण करे। जो यो करता है, वही चेतन है। उम ब्रह्मरूप सूत्रके धारण करनेसे सन्यासी न तो कभी उच्छिष्ट (जूठे मुँह) होता है और न कभी अपवित्र ही होता है। ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत धारण करनेवाले जिन सन्यासियोंके भीतर वह ब्रह्मरूपी सूत्र विद्यमान है, वे ही इस ससारमे सूत्रके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले तथा यज्ञोपवीतधारी हैं। सन्यासी ज्ञा मयी शिखा धारण करते हैं, ज्ञानमे ही स्थित होते हैं और ज्ञानका ही यज्ञोपवीत पहनते हैं। उनके लिये ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। ज्ञान ही सबसे पवित्र बताया गया है। जैसे अग्निकी शिखा उसके स्वरूपसे भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार जिस विद्वान् सन्यासीने ज्ञानमयी शिखा धारणा कर रक्खी है, वही शिखाधारी कहलाता है, दूसरे
७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ४
लोग, जो केवल केश धारण करते हैं, वास्तविक शिखाधारी नहीं हैं। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मके अधिकारी माने जाते हैं, उन्हींको यह बाह्य सूत्र—यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये, क्योंकि वह कर्मका अङ्ग माना गया है। जिसके ज्ञानमयी शिखा और ज्ञानमय ही यज्ञोपवीत है, उसीमे पूर्णरूपसे ब्राह्मणत्व प्रतिष्ठित है—ब्रह्मज्ञ पुरुष यही मानते हैं ॥ ८०-८९ ॥
'यह सब जानकर ब्राह्मण घरका त्याग करके सन्यासी हो जाय, एक वस्त्र धारण करे, सिरके बाल मुँडा ले और किसी भी वस्तुका संग्रह न करे। यदि शारीरिक क्लेश सहनेमें समर्थ न हो, तो कौपीन आदि धारण करे । यदि वह शारीरिक क्लेश सह सकता हो तो विधिपूर्वक सन्यास ले दिगम्बर रहे। अपने पुत्र, मित्र, स्त्री, माननीय गुरुजन तथा भाई-बन्धु आदिको छोड़कर चला जाय, स्वाध्याय एव वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका त्याग करके समस्त ब्रह्माण्डके साथ सम्बन्ध त्याग दे। कौपीन, दण्ड और अङ्ग ढकनेका वस्त्र भी न रक्खे। सब प्रकारके द्वन्द्वोंका सहन करते हुए न सर्दीकी परवा करे न गर्मीकी; न सुखके लिये लालायित हो और न दुःख-से भयभीत ही हो । निद्राकी भी चिन्ता न करे । मान-अपमानमें समान भावसे रहे। छहों ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो। निन्दा, अहङ्कार, मत्सरता (डाह), गर्व, दम्भ, ईर्ष्या, असूया (दोषदृष्टि), इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि छोड़कर, अपने शरीरको मुर्देके समान मानकर, आत्मासे अतिरिक्त दूसरी किसी भी वस्तुको बाहर भीतर न स्वीकार करते हुए, न तो किसीके सामने मस्तक झुकाये, न यज्ञ और श्राद्ध करे, न किसीकी निन्दा या स्तुति करे। अकेला ही स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करता रहे। दैवेच्छासे भोजन आदिके लिये जो कुछ भी मिल जाय, उसीपर सन्तुष्ट रहे । सुवर्ण आदिका संग्रह न करे। न किसीका आवाहन करे न विसर्जन । न मन्त्रका प्रयोग करे न मन्त्रका त्याग करे। न ध्यान करे न उपासना। न कोई लक्ष्य हो न लक्ष्यहीनता। न किसीसे अलग रहे, न सयुक्त । न किसी एक स्थानपर रहनेका आग्रह हो, न अन्यत्र जानेका । कोई उसका अपना घर या आश्रम न हो । उसकी बुद्धि सदा स्थिर रहे । जनशून्य भवन, वृक्षकी जड़, देवालय, घास फूसकी कुटिया, कुलालशाला, अग्निहोत्रशाला, अग्निदिगन्तर, नदी-तट, पुलिन (कछार), भूगृह (गुफा), पर्वतीय गुफा, झरनेके पास, चबूतरे या वेदीपर अथवा वनमें रहे । श्वेतकेतु, ऋभु, निदाघ, ऋषभ, दुर्वासा, संवर्तक, दत्तात्रेय तथा रैवतककी भाँति न कोई चिह्न धारण करे और न अपने आचारको ही किसीपर प्रकट होने दे । बालक, उन्मत्त अथवा पिशाचकी भाँति व्यवहार करे । उन्मत्त न होते हुए भी उन्मत्तकी भाँति आचरण करे । त्रिदण्ड, झोली, पात्र, कमण्डलु, कटिसूत्र और कौपीन—सब कुछ 'भूः स्वाहा' कहकर जलमें छोड़ दे ॥ ९० ॥
'कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु—सबको जलमें छोड़कर दिगम्बर होकर विचरे । आत्माका अनुसंधान करे । दिगम्बरकी भाँति रहकर द्वन्द्वोंको सहन करे—उनसे प्रभावित न हो । किसी भी वस्तुका संग्रह न करे । तत्त्व एव ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले ज्ञानमार्गमे भलीभाँति स्थित रहे । मनको शुद्ध रक्खे । प्राण-रक्षाके लिये उचित समयपर हाथरूपी पात्रसे अथवा ओर किसी पात्रसे बिना माँगे ही मिले हुए आहारको ग्रहण करे । लाभ हानिको समान मानकर ममतासे रहित हो जाय । केवल ब्रह्मका चिन्तन करे । अध्यात्म चिन्तनमें ही निष्ठा रक्खे । शुभाशुभ कर्मोंका निर्मूलन करके अपने आत्माके अतिरिक्त प्रत्येक वस्तुको सर्वथा त्याग दे । एकमात्र पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके बोधसे सम्पन्न हो, 'अहं ब्रह्मास्मि' (वह ब्रह्म मैं ही हूँ) ऐसी निश्चित धारणा रखकर भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी तरह केवल ब्रह्मस्वरूप प्रणवका ही चिन्तन करे । तीनों शरीरोंके प्रति अहंता और ममताका भाव त्यागकर, सर्वत्याग करके ही वह शरीरका त्याग करे । इस प्रकार करनवाला सन्यासी कृतकृत्य होता है, यह उपनिषद् है ॥ ९१-९२ ॥
॥ तृतीय उपदेश समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ उपदेश
संन्यास-धर्मके पालनका महत्त्व तथा संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि
'जो लोक, वेद, विषय भोग तथा इन्द्रियोंकी अधीनता त्यागकर केवल आत्मामें ही स्थित रहता है, वह सन्यासी परमगतिको प्राप्त होता है। श्रेष्ठ सन्यासी नाम, गोत्र आदिके वरण देश, काल, शास्त्रज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, मत और शीलका विज्ञापन न करे। किसी भी स्त्रीसे बातचीत न करे। पहलेकी देखी हुई किसी स्त्रीका स्मरणतक न करे, उनकी चर्चासे भी दूर रहे तथा स्त्रियोंका चित्र भी न देखे । सम्भाषण, स्मरण, चर्चा और चित्रावलोकन—स्त्रीसम्बन्धी
उपदेश ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४३ इन चार बातोंका जो मोहवश आचरण करता है, उसके चित्तमें अवश्य ही विकार उत्पन्न होता है और उस विकारसे उसका धर्म निश्चय ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, क्रोध, असत्य, माया, लोभ, मोह, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यानमे योग देना, कामना, राग, सग्रह, अहङ्कार, ममता, चिकित्साका व्यवसाय, धर्मके लिये साहसका कार्य, प्रायश्चित्त, दूसरोंके घरपर रहना, मन्त्र प्रयोग, औषध वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना-ये सब सन्यासीके लिये निषिद्ध हैं। इनका सेवन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे नीचे गिर जाता है। मोक्षधर्ममे तत्पर रहनेवाला मुनि (सन्यासी) अपने किसी सुहृद्के लिये भी 'आओ, जाओ, ठहरो' स्वागत और सम्मान- की बात न करे। भिक्षु स्वप्नमें भी कभी किसीका दिया हुआ दान न ले। दूसरोंको भी न दिलाये और न स्वय किसीको देने-लेनेके लिये प्रेरित ही करे। स्त्री, भाई, पुत्र आदि तथा अन्य बन्धु बान्धवोंके शुभ या अशुभ समाचारको सुनकर या देखकर भी संन्यासी कभी कम्पित (विचलित) न हो; वह शोक और मोहको सर्वथा त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (किसी वस्तुका सग्रह न करना), उद्दण्डताका अभाव, किसीके सामने दीन न बनना, स्वाभाविक प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, स्नेह न करना, गुरुकी सेवा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, सबके प्रति उदासीनताका भाव, धीरता, स्वभावकी मधुरता, सहन- शीलता, करुणा, लज्जा, ज्ञान-विज्ञान परायणता, स्वल्प आहार तथा धारणा-यह मनको वशमें रखनेवाले सन्यासियोंका विख्यात सुधर्म है। द्वन्द्वोंसे रहित, सत्त्वगुणमें सर्वदा स्थित और सर्वत्र समान दृष्टि रखनेवाला तुरीयाश्रममे स्थित परमहंस सन्यासी साक्षात् नारायणका स्वरूप है। गाँवमें एक रात रहे और बड़े नगरमें पाँच रात, किंतु यह नियम वर्षाके अतिरिक्त समयके लिये ही है, वर्षा में चार महीनेतक वह किसी एक ही स्थानपर निवास करे। भिक्षु गाँवमे दो रात कभी न रहे। यदि रहता है तो उसके अन्तःकरणमे राग आदिका प्रसङ्ग आ सकता है। इससे वह नरकगामी होता है। गाँवके एक किनारे किसी निर्जन प्रदेशमें मन और इन्द्रियोंको सयममे रखते हुए निवास करे। कहीं भी अपने लिये मठ या आश्रम न बनाये। जैसे कीड़े हमेशा घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आठ महीनोंतक सन्यासी इस पृथिवीपर विचरता रहे। केवल वर्षाके चार महीनोंमें वह एकत्र निवास करे। वह एक वस्त्र पहन- कर रहे अथवा बिना वस्त्रके दिगम्बर होकर रहे। उसकी दृष्टि इधर-उधर चञ्चल न होकर एक लक्ष्यपर ही स्थिर रहे। वह कभी विषयोंमें आसक्त न हो तथा सत्पुरुषोंके पथको कलङ्कित न करते हुए ध्यानपरायण रहकर पृथ्वीपर विचरे। संन्यासी अपने धर्मका पालन करते हुए सदा पवित्र स्थानपर रहे। योगपरायण भिक्षु पृथवीतलपर दृष्टि रखते हुए ही सदा विचरण करे। रातको, दोपहरमें तथा दोनों सन्ध्याओंके समय कभी भ्रमण न करे तथा ऐसे स्थानोंपर भी न घूमे जो शून्य, दुर्गम तथा प्राणियोंके लिये बाधाकारक हों। गाँवमें एक रात, पुरवेमे दो दिन, पत्तन (छोटे शहर, कस्बे) में तीन दिन और नगरमें पाँच रात्रियोंतक सन्यासीको रहना चाहिये। वर्षाकालमे किसी एक स्थानपर, जो पवित्र जलसे घिरा हुआ हो, निवास करना चाहिये। भिक्षु सम्पूर्ण भूतोंको अपने ही समान देखता हुआ अंधे, जड़, बहरे, पागल और गूँगेकी भाँति चेष्टा रखकर पृथ्वीपर विचरण करे। बहूदक और वनस्थ यतियोंके लिये तीनों कालोंका स्नान बताया गया है। परन्तु जो 'हंस' सन्यासी है, उसके लिये एक ही बार स्नान करनेका विधान है। हमसे भी ऊंची स्थितिमें जो परमहंस है, उसके लिये स्नान आदिका कोई बन्धन नहीं है ॥ १-२२ ॥ 'मौन, योगासन, योग, तितिक्षा, एकान्तशीलता, निस्पृहता तथा समता - ये सात एकदण्डी सन्यासियोंके पालन करनेयोग्य नियम हैं। जो परमहंसकी स्थितिमें पहुँचा हुआ है, उसके लिये स्नान आदि अनिवार्य न होनेके कारण वह केवल सम्पूर्ण चित्तवृत्तियोंका त्यागमात्र करे। चमड़ी, मास, रक्त, नाड़ी, मज्जा, मेद और हड्डियों- के समुदायरूप इस शरीरमे रमनेवाले पुरुषों तथा मल, मूत्र और पीवमे रमनेवाले कीड़ोंमें कितना अन्तर है ? सम्पूर्ण कफ आदि घृणित वस्तुओंकी महाराशिरूप यह शरीर कहाँ और अङ्गशोभा, सौन्दर्य एव कमनीयता आदि गुण कहाँ । मूर्ख मनुष्य मास, रक्त, पीव, विष्ठा, मूत्र, नाड़ी, मज्जा और हड्डियोंके समुदायरूप इस शरीरमें यदि प्रीति करता है, तो नरकमें भी उसकी अवश्य प्रीति होगी। स्त्रियोंके उच्चारण न करने योग्य गुप्त अङ्ग और सड़े हुए नाड़ीके घावमे कोई भेद न होनेपर भी मनुष्य अपने मनकी मान्यताके भेदसे प्रायः ठगा जाता है। स्त्रियोंका वह गुप्त अङ्ग क्या है?
- दो भागोंमें विदीर्ण हुआ चर्मखण्डमात्र। वह भी अपानवायु- के निकलनेसे दुर्गन्धपूर्ण रहता है। जो लोग उसमें रमण करते हैं, उन्हें नमस्कार है। भला, इससे बढकर दुस्साहस और क्या हो सकता है। विद्वान् सन्यामीके लिये न कोई कर्तव्य शेष रहता है और न चिह्नविशेषको धारण करनेकी आवश्यकता। वह ममतारहित, निर्भय, शान्त, निर्द्वन्द्व, वर्ण
७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् ' [ उपदेश ४ आदिके अभिमानमे रहित एव आहारोपार्जनकी चेष्टासे रहित होता है । संन्यासी मुनि कौपीन पहनकर रहे अथवा नगा ही रहकर ध्यानसे तत्पर रहे । इस प्रकार ज्ञानपरायण योगी ब्रह्मभावकी प्राप्तिमे समर्थ होता है । संन्यासका चिह्नविशेष होने हुए भी उनमें ज्ञान ही मोक्षका विशेष कारण है । प्राणियोके लिये नाना प्रकारके चिह्नोंका धारण मोक्षसाधक ज्ञानके अभावम निरर्थक ही होता है । जिसके विषयमे कोई भी यह नहीं जानता कि यह साधु है या असाधु, मूर्ख है या बहुत बड़ा विद्वान्, अथवा सदाचारी है या दुराचारी, वही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण है । इसलिये विद्वान संन्यासी किसी भी चिह्नविशेषको न धारण करके स्वधर्मका ज्ञान रखते हुए सर्वोत्तम ब्रह्मचिन्तन न्तका पालन करे। वह गूढ धर्मका आश्रय लेकर इस प्रकार आचरण करे, जिससे उसके आचरणके विषयकी कोई बात दूसरोपर प्रकट न हो । समस्त प्राणियोंके लिये सदेहता विषय बना हुआ वह वर्ण और आश्रमसे रहित हो अन्ध, जड और मूककी भाँति पृथिवीपर विचरण करे । उस शान्तचित्त सन्यासीका दर्शन करके देवता भी वैसी स्थिति प्राप्त करनेके लिये लालायित होते हैं । जब आत्मसत्ताके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुके अस्तित्वका चिह्न भी न रह जाय, तभी कैवल्य प्राप्त होता है । यही ब्रह्म- तत्त्वका उपदेश है' ॥ २३-३६ ॥ तदनन्तर नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछा-'भगवन् ! सन्यासकी विधि क्या है, यह बतानेकी कृपा करें।' तब ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर स्वीकृति दी और इस प्रकार कहा-'आतुर-मन्त्रासमे अथवा क्रम सन्यासमे चतुर्थ आश्रम स्वीकार करनेके लिये पहले प्रायश्चित्तरूपमे कृच्छ्र आदि व्रत करके फिर अष्टश्राद्ध करे । देवता, ऋषि, दिव्यमनुष्य, भूत, पितर, माताएँ और आत्मा-इन आठके निमित्त आठ श्राद्ध करना आवश्यक है । पहले 'सत्य' और 'वसु' नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करे, फिर देवश्राद्धमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीका, ऋषिश्राद्धमें देवर्षि, राजर्षि तथा मानवर्षियोंका, दिव्यश्राद्धमे आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों तथा बारह आदित्योका, मनुष्य-श्राद्धमे सनक, सनन्दन, सनत्कुमार तथा सनत्सुजातका, भूतश्राद्धमे पृथिवी आदि पञ्च महाभूतो, नेत्र आदि इन्द्रियों तथा जरायुज आदि चतुर्विध प्राणिसमुदायोंका, पितृश्राद्धमें पिता, पितामह तथा प्रपितामहका, मातृश्राद्धमे माता, पितामही और प्रपितामहीका तथा आत्मश्राद्धमे अपना, अपने पिताका और पितामहका-यदि उसके पिता जीवित हो तो पिताको छोड़कर अपना, पितामह और प्रपितामहका आह्वान करे । आठो श्राद्धोंको एक ही यज्ञका अङ्ग बनाकर करनेपर प्रत्येक श्राद्धम दो ठाके क्रममे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उनका विधिवत् पूजन करे । अथवा यदि आठ पृथक्-पृथक् यज्ञ किये जायँ तो ऐसी स्थितिम अपनी आग्नामे आये हुए मन्त्रोंद्वारा इन आठ श्राद्धोंको आठ दिनम या एक दिनमें करे । पितृयाग ( श्राद्धकल्प ) म बताये हुए विधानके अनुसार ब्राह्मणोंके पूजनसे लेकर भाजनतक सब कृत्य विधिपूर्वक सम्पन्न करके पिण्डदान दे । फिर दक्षिणा और ताम्बूलसे ब्राह्मणोंको सतुष्ट करके उन्हें विदा कर और शेष कमकी सिद्धिके लिये सात या आठ छोड़कर शेष गर्भा देर्शोको मुँड़वा दे । साथ ही मूँछ, दाढी और नग्न भी कटवा दे । ऊपर बताये अनुसार सात केशाको अवश्य बचा ल । काँग्त और उपस्थके केश भी न कटाये । औरके पश्चात् स्नान करे । उसके बाद सायंकालीन सध्या वन्दन करके एक सहस्र गायत्रीका जप करे । फिर ब्रह्मयज्ञ करके स्वतन्त्र अग्निकी स्थापना कर । फिर अपनी शाखाका उपमहार करके उसमे बताये अनुसार आज्यभागपर्यन्त घीकी आहुति दे । हवनकी विधि पूरी करके तीन ग्रास सत्तूका प्राशन (भोजन) कर । फिर आचमन करके अग्निकी रक्षाके लिये उसमे ईधन आदि रखकर स्वय अग्निसे उत्तरकी ओर काल मृगचर्मपर बैठ जाय और पुराण कथा सुनते हुए रातभर जागरण करे । रातके चौथे पहरके अन्तमे स्नान करके पूर्वोक्त अग्निमे चरु पकायें । फिर पुरुषसूक्तके सोलह मन्त्रोद्वारा उस चरुकी सोलह आहुतियाँ अग्निमे डाले और विरजा होम करके आचमनपूर्वक दक्षिणासहित वस्त्र, सुवर्ण, पात्र और धेनुका दान करे और इस प्रकार त्रिविकी पूर्ण करे । इसके बाद ब्रह्माका विसर्जन करके- स मा सिञ्चन्तु मरुत समिन्द्र स बृहस्पति । स मायमग्नि सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन नायुष्मन्त करोतु मा ॥* या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानमात्मन् । अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्मे नर्या पुरूणि ॥ यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वा योनिम् । जातवेदो भुव आजायमान सक्षय एहि ॥†
- अर्थात् मरुद्गण, इन्द्र, बृहस्पति तथा अग्नि-ये सभी देवता मुझपर कल्याणकी वर्षा करें । ये अग्निदेव मुझे आयु, ज्ञान- रूपी धन तथा साधनकी शक्तिमे सम्पन्न करें, साथ ही मुझको दीर्घजीवी भी बनायें । † हे अग्निदेव ' जो तुम्हारा यज्ञिय ( यज्ञोंमें प्रकट होनेवाला ) स्वरूप है, उसी स्वरूपसे तुम यहाँ पधारो और मेरे लिये बहुत-से