भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 792

७३६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश २ और अपने मनके अनुरूप एक गुरुके समीप निवास करे । वहाँ गुरुकी सेवा करते हुए पहले अपनी शाखाका अध्ययन करे । फिर क्रमशः सम्पूर्ण विद्याओंका अभ्यास करते हुए बारह वर्षोंतक गुरु-सेवापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करे । तत्पश्चात् क्रमशः पचीस वर्षोंतक गृहस्थ-धर्मका और पचीस वर्षोंतक वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मोंका विधिपूर्वक पालन करे । चार प्रकारके ब्रह्मचर्य, * छः प्रकारके गार्हस्थ्य† तथा चार प्रकारके वानप्रस्थ‡-धर्मका भलीभाँति अभ्यास करके उन-उन आश्रमोंके उचित समस्त कर्मोंका यथावत् अनुष्ठान करे । फिर साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न हो समस्त संसारसे ऊपर उठकर मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा सब प्रकारकी आशाको त्याग दे । इसी प्रकार वासनाओं और एषणाओंके भी ऊपर उठे—उनका भी त्याग कर दे । फिर सबके प्रति वैरभावका त्याग करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए संन्यासी हो जाय । परमहंस-आश्रम (सन्यास) मे रहकर अपने अच्युतस्वरूपका चिन्तन करते हुए जो शरीर-त्याग करता है, वह मुक्त हो जाता है, वह मुक्त हो जाता है । यह उपनिषद् (गूढ रहस्यमय ज्ञान ) है ॥ २ ॥ ॥ प्रथम उपदेश समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय उपदेश संन्यास-ग्रहणका क्रम तदनन्तर वे शौनक आदि सम्पूर्ण महर्षि इन भगवान् नारदजीसे विनयपूर्वक बोले—'भगवन् ! हमें सन्यासकी विधि बताइये।' नारदजीने उनकी ओर देखकर कहा— 'सन्यासका सारा स्वरूप लोकपितामह ब्रह्माजीके मुखसे ही समझना उचित होगा।' यों कहकर सत्रयागकी पूर्तिके पश्चात् उन सबको साथ ले वे सत्यलोकमें गये और विधिवत् ब्रह्मचिन्तनमें लगे हुए परमेष्ठीको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे । स्तुति करनेके अनन्तर पितामहकी आज्ञासे वे सबके साथ वहाँ यथायोग्य आसनपर बैठे । तदनन्तर नारदजीने पितामहसे कहा—"भगवन् ! आप हमारे गुरु, पिता, सम्पूर्ण विद्याओंके रहस्यको जाननेवाले तथा सर्वज्ञ हैं । अतः आप मुझे एक रहस्यकी बात, जो मुझे बहुत प्रिय है,

  • चार प्रकारके ब्रह्मचारी ये हैं—गायत्र, ब्राह्म, प्राजापत्य तथा बृहन् । इनमेंसे उपनयनके बाद जो तीन राततक बिना नमकका भोजन करके गायत्रीका जप करता है, वह गायत्र है, जो वेदाध्ययनपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करता है, वह ब्राह्म है, जो एक वर्षतक वैदिकव्रत (ब्रह्मचर्य) का पालन करता है, वह प्राजापत्य कहलाता है और जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्य- का पालन करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी बृहन् कहा गया है। † छ प्रकारके गृहस्थोंके नाम ये हैं—वार्ताक, शालीन, यायावर, घोर सन्यासिक, उञ्छवृत्ति और अयाचित । इनमें जो खेती, गो-रक्षा और वाणिज्यरूप वैश्योचित वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हुए स्व-धर्मका पालन करता है, वह वार्ताक कहलाता है, जो यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें सलग्न रहकर याजन; अध्यापन और प्रतिग्रहके द्वारा जीवन-निर्वाह करता है, वह शालीन माना गया है, जो सत्पुरुषोंके घरोंपर जा-जाकर उनसे थोड़ा-थोड़ा माँगकर अपने कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये आवश्यक अन्नका सग्रह करता है, वह यायावर कहलाता है, जो अपने हाथसे निकाले हुए पवित्र जलसे सब कार्य करते हुए प्रतिदिन साधुपुरुषोंसे एक दिनके निर्वाहके लिये अन्न ग्रहण करता है, वह घोर सन्यासिक है, जो खेत कट जानेपर या बाजार उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए अनाजके दानोंको चुन-चुनकर लाता है और उन्हींसे जीवन-निर्वाह करता है, उसे उञ्छ कहते ' हैं और जो किसीसे याचना न करके दैवेच्छासे प्राप्त हुए अन्नपर ही जीवन-निर्वाह करता है, वह अयाचक कहलाता है । ‡ वानप्रस्थके भी चार भेद हैं—वैखानस, औदुम्बर, बालखिल्य और फेनप । इनमेंसे जो बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए नीवार आदि अगली अन्नोंसे अग्निहोत्र आदि कर्म करता है, वह वैखानस कहलाता है, जो सबेरे उठते ही जिस दिशाकी ओर दृष्टि जाय, उसी दिशामें जाकर वहाँके गूलर, बेर आदि फलों तथा नीवार और श्यामाक आदि अन्नोंका सग्रह करके उन्हींसे प्रतिदिन जीविका चलाता है, वह औदुम्बर माना गया है, जो जटा और वल्कल धारण करके आठ महीनोंतक वृत्ति उपार्जन करता, चौमासेमें संगृहीत अन्नका भोजन करता तथा कार्तिककी पूर्णिमाको संगृहीत फूल और फलका त्याग करता है, वह बालखिल्य कहलाता है, तथा जो सूखे पत्ते और फलका आहार करते हुए जहाँ-कहीं भी रहकर अपने कर्तव्यका पालन करता है, उसे फेनप कहते हैं।