कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
७३६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश २ और अपने मनके अनुरूप एक गुरुके समीप निवास करे । वहाँ गुरुकी सेवा करते हुए पहले अपनी शाखाका अध्ययन करे । फिर क्रमशः सम्पूर्ण विद्याओंका अभ्यास करते हुए बारह वर्षोंतक गुरु-सेवापूर्वक ब्रह्मचर्यका पालन करे । तत्पश्चात् क्रमशः पचीस वर्षोंतक गृहस्थ-धर्मका और पचीस वर्षोंतक वानप्रस्थ-आश्रमके धर्मोंका विधिपूर्वक पालन करे । चार प्रकारके ब्रह्मचर्य, * छः प्रकारके गार्हस्थ्य† तथा चार प्रकारके वानप्रस्थ‡-धर्मका भलीभाँति अभ्यास करके उन-उन आश्रमोंके उचित समस्त कर्मोंका यथावत् अनुष्ठान करे । फिर साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न हो समस्त संसारसे ऊपर उठकर मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा सब प्रकारकी आशाको त्याग दे । इसी प्रकार वासनाओं और एषणाओंके भी ऊपर उठे—उनका भी त्याग कर दे । फिर सबके प्रति वैरभावका त्याग करके मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए संन्यासी हो जाय । परमहंस-आश्रम (सन्यास) मे रहकर अपने अच्युतस्वरूपका चिन्तन करते हुए जो शरीर-त्याग करता है, वह मुक्त हो जाता है, वह मुक्त हो जाता है । यह उपनिषद् (गूढ रहस्यमय ज्ञान ) है ॥ २ ॥ ॥ प्रथम उपदेश समाप्त ॥ १ ॥ द्वितीय उपदेश संन्यास-ग्रहणका क्रम तदनन्तर वे शौनक आदि सम्पूर्ण महर्षि इन भगवान् नारदजीसे विनयपूर्वक बोले—'भगवन् ! हमें सन्यासकी विधि बताइये।' नारदजीने उनकी ओर देखकर कहा— 'सन्यासका सारा स्वरूप लोकपितामह ब्रह्माजीके मुखसे ही समझना उचित होगा।' यों कहकर सत्रयागकी पूर्तिके पश्चात् उन सबको साथ ले वे सत्यलोकमें गये और विधिवत् ब्रह्मचिन्तनमें लगे हुए परमेष्ठीको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे । स्तुति करनेके अनन्तर पितामहकी आज्ञासे वे सबके साथ वहाँ यथायोग्य आसनपर बैठे । तदनन्तर नारदजीने पितामहसे कहा—"भगवन् ! आप हमारे गुरु, पिता, सम्पूर्ण विद्याओंके रहस्यको जाननेवाले तथा सर्वज्ञ हैं । अतः आप मुझे एक रहस्यकी बात, जो मुझे बहुत प्रिय है,
- चार प्रकारके ब्रह्मचारी ये हैं—गायत्र, ब्राह्म, प्राजापत्य तथा बृहन् । इनमेंसे उपनयनके बाद जो तीन राततक बिना नमकका भोजन करके गायत्रीका जप करता है, वह गायत्र है, जो वेदाध्ययनपर्यन्त ब्रह्मचर्यका पालन करता है, वह ब्राह्म है, जो एक वर्षतक वैदिकव्रत (ब्रह्मचर्य) का पालन करता है, वह प्राजापत्य कहलाता है और जो मृत्युपर्यन्त गुरुकुलमें रहकर ब्रह्मचर्य- का पालन करता है, वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी बृहन् कहा गया है। † छ प्रकारके गृहस्थोंके नाम ये हैं—वार्ताक, शालीन, यायावर, घोर सन्यासिक, उञ्छवृत्ति और अयाचित । इनमें जो खेती, गो-रक्षा और वाणिज्यरूप वैश्योचित वृत्तिसे जीवन-निर्वाह करते हुए स्व-धर्मका पालन करता है, वह वार्ताक कहलाता है, जो यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें सलग्न रहकर याजन; अध्यापन और प्रतिग्रहके द्वारा जीवन-निर्वाह करता है, वह शालीन माना गया है, जो सत्पुरुषोंके घरोंपर जा-जाकर उनसे थोड़ा-थोड़ा माँगकर अपने कुटुम्बके भरण-पोषणके लिये आवश्यक अन्नका सग्रह करता है, वह यायावर कहलाता है, जो अपने हाथसे निकाले हुए पवित्र जलसे सब कार्य करते हुए प्रतिदिन साधुपुरुषोंसे एक दिनके निर्वाहके लिये अन्न ग्रहण करता है, वह घोर सन्यासिक है, जो खेत कट जानेपर या बाजार उठ जानेपर वहाँ बिखरे हुए अनाजके दानोंको चुन-चुनकर लाता है और उन्हींसे जीवन-निर्वाह करता है, उसे उञ्छ कहते ' हैं और जो किसीसे याचना न करके दैवेच्छासे प्राप्त हुए अन्नपर ही जीवन-निर्वाह करता है, वह अयाचक कहलाता है । ‡ वानप्रस्थके भी चार भेद हैं—वैखानस, औदुम्बर, बालखिल्य और फेनप । इनमेंसे जो बिना जोते-बोये उत्पन्न हुए नीवार आदि अगली अन्नोंसे अग्निहोत्र आदि कर्म करता है, वह वैखानस कहलाता है, जो सबेरे उठते ही जिस दिशाकी ओर दृष्टि जाय, उसी दिशामें जाकर वहाँके गूलर, बेर आदि फलों तथा नीवार और श्यामाक आदि अन्नोंका सग्रह करके उन्हींसे प्रतिदिन जीविका चलाता है, वह औदुम्बर माना गया है, जो जटा और वल्कल धारण करके आठ महीनोंतक वृत्ति उपार्जन करता, चौमासेमें संगृहीत अन्नका भोजन करता तथा कार्तिककी पूर्णिमाको संगृहीत फूल और फलका त्याग करता है, वह बालखिल्य कहलाता है, तथा जो सूखे पत्ते और फलका आहार करते हुए जहाँ-कहीं भी रहकर अपने कर्तव्यका पालन करता है, उसे फेनप कहते हैं।
॥ द्वितीय उपदेश समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय उपदेश संन्यासके अधिकारी, स्वरूप, विधि, नियम एवं आचार आदिका निरूपण
तदनन्तर देवर्षि नारदने अपने पिता ब्रह्माजीसे पूछा— 'भगवन् ! किस प्रकार सन्यास लिया जाता है ? तथा सन्यासका अधिकारी कौन है ?' ब्रह्माजीने कहा—'अच्छा, पहले सन्यासका अधिकारी कौन है, इसका निरूपण करके पश्चात् सन्यासकी विधि बतायी जायगी, सावधान होकर सुनो । नपुंसक, पतित, किसी अङ्गसे हीन, स्त्रीके प्रति अधिक आसक्त, बहरा, बालक, गूँगा, पाखण्डी, चक्री ( षड्यन्त्रकारी ), लिङ्गी (वेषधारी), वैखानसदर द्विज, वेतन लेकर अध्यापन करनेवाला, शिपिविष्ट ( गंजा अथवा कोढ़ी ) तथा अग्निहोत्र न करनेवाला—ये वैराग्यवान् होनेपर भी सन्यासके अधिकारी नहीं हैं। यदि सन्यास ले भी लें, तो भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंका उपदेश प्राप्त करनेके अधिकारी नहीं होत । जो पहलेसे ही सन्यासी है, अर्थात् कर्मफलकी इच्छा न रखते हुए वर्णाश्रमोचित कर्तव्यका पालन करता है, वही सन्यास आश्रममें प्रवेश करनेका अधिकारी है ॥ १ ॥
'जो दूसरोंसे स्वय नहीं डरता तथा दूसरोको अपनेद्वारा भय नहीं पहुँचाता, वही परिव्राजक ( सन्यासी ) है—ऐसा स्मृतियोंका कथन है । नपुसक, किसी अङ्गसे हीन, अंधा, बालक, पापी, पतित, परस्त्रीगामी, वैखानसदर द्विज, चक्री, लिङ्गी, पाखण्डी, शिपिविष्ट, अग्निहोत्र न करनेवाला, दो-तीन बार सन्यास ग्रहण करनेवाला तथा वेतन लेकर अध्यापन करनेवाला—ये आतुर-सन्यासके सिवा क्रम-सन्यासके अधिकारी नहीं होते ॥ २—४ ॥
उ० सं० ९३—
७३८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ३ 'यदि कहो, आतुर सन्यासका कौन-सा समय विद्वानोंको मान्य है, तो सुनो। जब प्राण निकलनेका समय अत्यन्त निकट हो, वह आतुर-सन्यासका ठीक समय माना गया है । इससे भिन्न समयको ठीक नहीं माना गया है। आतुर सन्यास यदि ठीक समयसे हो तो वह मुक्तिमार्गकी प्राप्ति करानेवाला होता है। आतुर-सन्यासमें भी विद्वान् पुरुष शास्त्रविहित मन्त्रोंका पाठ करते हुए विधिवत् सब आवश्यक कृत्य करके ही मन्त्रोच्चारणपूर्वक सन्यास ग्रहण करे। आतुर सन्यास हो चाहे क्रम-सन्यास, उसके विधि-विधानमे कोई भेद नहीं है, क्योंकि कर्म मन्त्रकी अपेक्षा करता है और कोई भी मन्त्र ऐसा नहीं है, जो किसी न किसी कर्मसे सम्बन्ध न रखता हो । मन्त्रहीन कर्म वास्तवमें कर्म ही नहीं है। अतः मन्त्रका परित्याग न करे। यदि मन्त्रके बिना कर्म करे तो वह राखमें छोड़ी हुई आहुतिके समान व्यर्थ होता है। मुने ! शास्त्रविधिके अनुसार बताये हुए कर्मको संक्षेपमें करनेसे आतुर-सन्यास सम्पन्न होता है। इसलिये आतुर-सन्यासमें मन्त्रोंका बार-बार उच्चारण आवश्यक एव विहित है ॥ ५-९ ॥ 'यदि अग्निहोत्री पुरुष देशान्तरमें गया हुआ हो और उसे वैराग्य हो जाय तो जलमे ही प्राजापत्येष्टि करके तत्काल सन्यास ले ले । यह प्राजापत्य याग केवल मनसे करे अथवा विधिमें बताये अनुसार मन्त्रोंका उच्चारणमात्र करके करे अथवा वेदोक्त अनुष्ठान पद्धतिके अनुसार विधिवत् कर्म अनुष्ठान करे । यह सब करके ही विद्वान् पुरुष सन्यास ग्रहण करे। अन्यथा वह पतित हो जाता है ॥ १०-११ ॥ 'जब मनमे सब पदार्थोंकी ओरसे पूर्ण वैराग्य हो जाय, तभी सन्यासकी इच्छा करनी चाहिये । इसके विपरीत आचरण करनेसे मनुष्य पतित हो जाता है । विरक्त बुद्धिमान् सन्यास ग्रहण करे और रागवान् पुरुष घरपर ही निवास करे । जो मनमे राग (आसक्ति ) होते हुए भी सन्यास ग्रहण करता है, वह द्विजोंमे अधम है तथा उसे नरककी प्राप्ति होती है ॥ १२-१३ ॥ 'जिसकी जिह्वा, शिश्नेन्द्रिय, उदर और हाथ आदि सभी इन्द्रियाँ भलीभाँति वशमें हों तथा जिसने विवाह न किया हो, ऐसा ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही सन्यास ले । संसारको सारहीन समझकर सार वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे बुद्धिमान् पुरुष पूर्ण वैराग्यका आश्रय लेकर विवाह किये बिना ही सन्यास ले लेते हैं। कर्म ही प्रवृत्ति (संसारमें प्रवृत्त होने) का लक्षण है और ज्ञान ही सन्यासका मुख्य लक्षण है। अतः बुद्धिमान् पुरुष ज्ञानको सामने रखकर ही यहाँ सन्यास ग्रहण करे ॥ १४-१६॥ 'जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्मका ज्ञान हो जाय, तब एक दण्ड धारण करके यज्ञोपवीतसहित शिखाको त्याग दे। जो परमात्मामें अनुरक्त और उनसे भिन्न वस्तुओंकी ओरसे विरक्त है, जिसके मनसे लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा—ये सभी एषणाएँ निकल गयी हैं, वही भिक्षान्नभोजन करने (सन्यास लेने) का अधिकारी है। जैसे साधारण मनुष्य अपनी पूजा और वन्दना होनेपर अत्यधिक प्रसन्न होता है, वैसी ही प्रसन्नता जब डंडोंसे पीटे जानेपर भी हो; तभी वह भिक्षु होनेका अधिकारी होता है। मै ही वासुदेव नामसे प्रसिद्ध अद्वितीय अविनाशी ब्रह्म हूँ—ऐसा भाव जिसके मनमे दृढ हो गया है, वही भिक्षान्नभोजनका अधिकारी है। जिस पुरुषमे शान्ति, शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह), शौच, सतोष, सत्य, सरलता, कुछ भी सग्रह न करनेका भाव तथा दम्भका अभाव हो, वही सन्यास-आश्रममें प्रवेश करे। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापका भाव नहीं रखता, तभी सन्यासका अधिकारी होता है । (मनुप्रोक्त) दस प्रकारके धर्मोंका अनुष्ठान करते हुए एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक उपनिषदोंका श्रवण करे तथा ब्रह्मचर्य पालन एव स्वाध्यायद्वारा ऋषि- ऋणसे, यज्ञानुष्ठानद्वारा देव ऋणसे और पुत्रकी उत्पत्तिद्वारा पितृ-ऋणसे मुक्त होकर (विरक्त) द्विज सन्यास ग्रहण करे। धृति, क्षमा, दम (मनोनिग्रह), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह, ह्री (निषिद्ध कर्म एव अविनय आदिसे स्वाभाविक सकोच), विद्या, सत्य तथा अक्रोध (क्रोधका अभाव)—ये दस धर्मके स्वरूप हैं। जो भूतकालमे किये हुए भोगोंका चिन्तन, भविष्यमें मिलनेवाले भोगोकी आकाङ्क्षा तथा वर्तमान समयमें प्राप्त हुए भोगोंका अभिनन्दन नहीं करता, वही सन्यास-आश्रममे निवास कर सकता है। जो अन्तःकरणमें स्थित इन्द्रियोंको अपने भीतर और बाहरके विषयोंको बाहर ही रोक रखनेमें सदा समर्थ है, वही सन्यास-आश्रममें निवास करे। जैसे प्राण निकल जानेपर शरीर सुख-दुःखका अनुभव नहीं करता, उसी प्रकार प्राण रहते हुए भी जिसपर सुख-दुःखका प्रभाव नहीं पड़ता, वही सन्यास-आश्रममें निवास करनेका अधिकारी है ॥ १७-२७॥ 'दो कौपीन (लँगोटियाँ), एक कन्था (गुदड़ी) और एक दण्ड—इतनी ही वस्तुओंका परमहंस सन्यासीको सग्रह करनेका अधिकार है, इससे अधिक सग्रहका उसके लिये विधान नहीं
उपदेश ३ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३९
है। यदि रागवश अधिक वस्तुओंका संग्रह करता है तो वह मृत्युके पश्चात् रौरव नरकमें जाकर पुनः पशु-पक्षी आदि योनियोंमें जन्म लेता है। शीत आदिसे बचनेके लिये फटे-पुराने साफ कपड़ोंको सीकर एक गुदड़ी बना ले और बस्तीसे बाहर रहकर गेरुए रंगका वस्त्र धारण करे । संन्यासी एक ही वस्त्र धारण करे अथवा बिना वस्त्रके ही (दिगम्बर) रहे। दृष्टिको इधर-उधर चारों ओर न ले जाकर एक ही स्थानपर नियन्त्रित रक्खे। मनमें किसी भी वस्तुके लिये लोभ न आने दे । सदा अकेला ही विचरण करे । वर्षा ऋतुमें किसी एक ही स्थानपर निवास करे । कुटुम्ब, स्त्री-पुत्र, (व्याकरण आदि) वेदाङ्गोंके ग्रन्थ, यज्ञ और यज्ञोपवीतका त्याग करके संन्यासीको सर्वत्र गूढ भावसे (बिना अपना विज्ञापन किये) विचरण करना चाहिये ॥ २८-३२ ॥ 'काम, क्रोध, घमण्ड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष हैं, उन सबका परित्याग करके सन्यासी सब ओरसे ममताको हरु ले। अपने मनमें राग और द्वेषको स्थान न दे। मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझे । प्राणियोंकी हिंसासे सर्वथा दूर रहे तथा सब ओरसे निःस्पृह होकर मुनिवृत्तिसे रहे। जो दम्भ और अहङ्कारसे मुक्त है, हिंसा और चुगली आदि दोषोसे दूर है तथा आत्मज्ञानके लिये उपयोगी गुणोंसे सुशोभित है, वह सन्यासी मोक्षको प्राप्त होता है। इन्द्रियोंकी विषयोंमे आसक्ति रहनेपर मनुष्य निःसन्देह अनेक प्रकारके दोषोंमें फँस जाता है; किंतु यदि उन्हीं इन्द्रियोंको अच्छी प्रकार वशमें कर ले तो वह (मोक्षरूप) सिद्धिको प्राप्त होता है। विषय भोगोंकी कामना भोगोंके उपभोगसे कदापि शान्त नहीं होती। भोगसे तो वह उल्टे बढती ही है—ठीक उसी तरह, जैसे घी डालनेसे आग और भी प्रज्वलित हो उठती है। जो मधुर या कटु शब्द सुनकर, कोमल या कठोर वस्तुका स्पर्श कर, स्वादिष्ट या स्वादहीन भोजन करके, सुन्दर या विकृत रूप देखकर और सुगन्ध या दुर्गन्ध सूँघकर न तो हर्षसे फूल उठता है और न ग्लानिका ही अनुभव करता है, उसीको जितेन्द्रिय जानना चाहिये । जिसके मन और वाणी शुद्ध हैं तथा सर्वदा भलीभाँति दोषोंसे सुरक्षित (बचे हुए) हैं, वही वेदान्तश्रवणका पूर्ण फल प्राप्त करता है । ब्राह्मण सम्मानसे विषकी भाँति उद्विग्न रहे और अपमानको अमृतकी भाँति समझकर सदा उसकी अभिलाषा करे । अपमानित पुरुष सुखसे सोता, सुखसे जागता और इस लोकमें सुखसे ही विचरता है. किंतु अपमान करनेवाला स्वतः नष्ट हो जाता है। अतिवादों (कठोर वचनों) को सहन करे, किसीका अनादर न करे तथा इस (नश्वर) देहको लेकर किसीके साथ वैर न करे। जो अपने ऊपर क्रोध करता है, उसके प्रति बदलेमें क्रोध न करे। यदि वह गाली देता हो, तो भी स्वय तो उसे अच्छी ही बात कहे। दो नेत्र, दो कान, दो नासिकाछिद्र और एक मुख—इन सातों द्वारोंके अनुभवसे सम्बन्ध रखनेवाली वाणीको कभी असत्यरूपमे न बोले । सुख चाहनेवाला पुरुष अध्यात्मतत्त्वमें अनुराग रखकर स्थिरभावसे बैठे, किसीसे कोई अपेक्षा न रक्खे, मनसे सब तरहकी कामनाओंको निकाल दे तथा अपने सिवा किसी दूसरेको सहायक न बनाकर अकेला ही इस ससारमें विचरता रहे। इन्द्रियोंको वशमें रखने, राग-द्वेषका नाश करने तथा किसी भी प्राणीकी हिंसा न करनेसे मनुष्य अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है। यह शरीर रोगोंका घर है, इसमें हड्डियोंके खंभे लगे हैं। स्नायुजालकी डोरीसे यह बँधा है। मास और रक्त इसपर थोप दिया गया हैं। इसे चमड़ेसे मढ दिया गया है। यह मल और मूत्रसे सदा ही पूर्ण रहता है। इससे दुर्गन्ध निकलती रहती है। बुढापे और शोकसे व्याप्त होनेके कारण यह सदा आतुर (असमर्थ) रहता है। वीर्य और रजसे उत्पन्न होनेके कारण यह रजखल (रजोगुणी अथवा धूलसे भरा हुआ) है। साथ ही यह अनित्य भी है (आज गिरेगा या कल, इसका कुछ भी ठिकाना नही है)। इसमें पाँच भूत सदा ही डेरा डाले रहते हैं, अतः इसे त्याग दे (इसके प्रति अहता और ममता न रक्खे)। यदि मूर्ख मनुष्य मास, रक्त, पीव, मल, मूत्र, नाड़ी, मज्जा और हड्डियोंके समुदायभूत इस शरीरसे प्रेम करता है तो वह नरकसे भी अवश्य प्रेम करेगा। इस शरीरमें जो अहम्भाव है, वही कालसूत्र नामक नरकका मार्ग है, वही महावीचि नामक नरकमें ले जानेके लिये बिछा हुआ जाल है। तथा वही असिपत्र वन नामक नरककी श्रेणी है। शरीरमें होनेवाली अहता कुत्तेका मास लेकर चलनेवाली चाण्डालिनीके समान है। उसको सब प्रकारके यत्नोंद्वारा त्याग दे। सर्वनाश उपस्थित हो, तो भी कल्याणकामी पुरुषको उसका संगर्तक नही करना चाहिये। अपने प्रियजनोंमें सुकृत (पुण्य) को और अप्रियजनोंमे दुष्कृत (पाप) को छोड़कर—स्वयं उनसे सम्बन्ध न रखकर ध्यानयोगके द्वारा साधक सनातन ब्रह्म- को प्राप्त कर लेता है। इस प्रकार धीरे धीरे सम्पूर्ण आसक्तियों- का त्याग करके सन्यासी पुरुष सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे मुक्त हो परब्रह्म परमात्मामें ही स्थिति प्राप्त करता है। सिद्धिलाभके
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[शीर्षक]
७४० · ' नारदपरिव्राजकोपनिषद् [ उपदेश ३
[बायाँ स्तम्भ]
लिये किसी दूसरेको साथी न बनाकर सदा अकेला ही विचरण करे । एककी सिद्धि देखकर सन्यासी न तो अपने साधन- को छोड़ता है और न ऋद्धिसे वञ्चित होता है ॥ ३३–५३ ॥ ‘पानी पीनेके लिये कपाल (लकड़ी या नारियलका पात्र ), रहनेके लिये किसी वृक्षकी जड़, पहननेको फटे पुराने कपड़े, सदा अकेले रहनेका स्वभाव और सबमे समताका भाव— यही जीवन्मुक्त पुरुषका लक्षण है । सन्यासी सम्पूर्ण भूतोंका हितैषी हो, शान्तभावसे रहे, त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करे, एकमात्र आत्मामे ही रमण करनेवाला हो तथा सब कुछ छोड़कर अकेला घूमता रहे । केवल भिक्षाके लिये ही वह गाँवमे प्रवेश करे । सन्यासी यदि अकेला रहे, तभी वह शास्त्रीय आदेशके अनुसार यथार्थ भिक्षु होता है। एकसे दो होते ही वह 'मिथुन' (जोड़ा ) माना गया है । तीनका समुदाय होनेपर उसे 'गाँव' कहा गया है, तथा इससे अधिक व्यक्ति एक साथ हो जायें, तब तो पूरा नगर-सा ही हो जाता है । सन्यासीको कभी अपने पास अधिक व्यक्तियोको आनेका अवसर देकर नगर, गाँव अथवा मिथुनकी स्थिति नहीं उत्पन्न करनी चाहिये । इन तीनों ( नगर, ग्राम और मिथुन ) का आयोजन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे गिर जाता है । अनेक व्यक्तियोंका एकत्र सयोग होनेपर उनमे या तो राजा—प्रभु, सेठ आदिकी बातें होगी, अथवा कहाँ कैसी भिक्षा मिलती है—यह चर्चा शुरू हो जायगी, अथवा परस्पर स्नेह, चुगली और मत्सरता आदिके भाव उत्पन्न होगे । इसमे तनिक भी सदेह नहीं है । सन्यासी निःस्पृह होकर सदा अकेला रहे । किसीके साथ वार्तालाप न करे । वह सदा 'नारायण' कहकर ही दूसरोंकी बात या नमस्कार आदिका उत्तर दे । वह एकाकी रहकर मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा केवल ब्रह्मका ही चिन्तन करे । किसी तरह भी मृत्यु या जीवनका अभिनन्दन न .करे । जबतक आयु पूरी न हो, तबतक केवल कालकी ही प्रतीक्षा करता रहे। न तो वह मृत्युकी प्रशसा करे और न जीवनका अभिनन्दन करे । जैसे भृत्य अपने स्वामीकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करता रहता है, प्रकार वह एकमात्र की प्रतीक्षा करे। (जिह्वारहित), ॰ लूला, अ एव मुग्ध (जड) की भाँति नवाला भिक्षु प्रकारके गुणोंसे निश्चय ही मुक्त । जाता भोजन करते हुए भी 'यह स्वादिष्ट नहीं है।' इस भावसे अन्नके तथा हितकर, सत्य और नपी तुली बात
[दायाँ स्तम्भ]
करता है, उसे 'अजिह्व' (जिह्वारहित) कहते हैं। जो आजकी जन्मी हुई नवजात कन्या, सोलह वर्षोकी युवती नारी तथा सौ वर्षोंकी आयुवाली वृद्धा स्त्रीको देखकर कहीं भी राग द्वेष आदि विकारोंके वशीभूत नहीं होता, वह 'षण्डक' (नपुंसक) कहा गया है । भिक्षाके लिये तथा मल मूत्रका त्याग करनेके लिये ही जिसका घूमना होता है, और एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेके लिये भी जो प्रतिदिन एक योजन (चार कोस) से आगे नहीं जाता (एक योजनका रास्ता तै करके शेष समय ध्यान आदिमे व्यतीत करता है), वह 'पङ्गु' (लूला) ही है। चलते या खड़ा होते समय जिसके नेत्र चार युग (लगभग दस हाथ ) भूमि छोड़कर उससे अधिक दूरतक नहीं देखते, वह सन्यासी 'अन्ध' कहलाता है । हितकी बात हो या अहितकी, मनको सुख देनेवाली बात हो या शोक प्रदान करनेवाली, उसे सुनकर भी जो मानो नही सुनता (उनपर ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' कहा गया है । विषय अपने समीप हों, शरीरमे शक्ति हो और सभी इन्द्रियाँ स्वस्थ हों, तब भी जो सोये हुए पुरुषकी भाँति उन विषयोंके प्रति आकृष्ट नहीं होता, उस भिक्षुको 'मुग्ध' (भोलाभाला) कहते हैं ॥ ५४–६८ ॥ 'नट आदिके खेल, जूआ, युवती स्त्री, सम्बन्धियो, भक्ष्य भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री—इन छः वस्तुओंकी ओर सन्यासी कभी दृष्टिपात न करे । राग, द्वेष, मद, माया, दूसरोके प्रति द्रोह तथा अपनाके प्रति मोह—इन छः बातो को संन्यासी कभी मनसे भी न सोचे । मञ्च (कुर्सी), श्वेत वस्त्र, स्त्रियोंकी चर्चा, इन्द्रियोंकी लोलुपता, दिनमे सोना और सवारी पर चलना—ये सन्यासियोंके लिये छः पातक हैं । आत्म चिन्तन करनेवाला सन्यासी दूरकी यात्राका यत्नपूर्वक त्याग करे ॥ ६९–७१ ॥ 'सन्यासी सदा मोक्षकी हेतुभूता उपनिषद् विद्याका अभ्यास करे । वह न तो सदा तीर्थोंका सेवन करे और न अधिक उपवास ही करे । वह अधिक विद्याएँ पढनेका स्वभाव न बनाये । सभाओंमें व्याख्यान देनेवाला न बने । सदा ऐसा बर्ताव करे जिसम पाप, शठता और कुटिलता न हो । जैसे कछुआ सब ओरसे अपने अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियोको विषयोंकी ओरसे समेटकर जो इन्द्रिय और मनके व्यापारको क्षीण कर देता है, कामना और परिग्रहसे मुँह मोड़ लेता है, सुख दुःख आदि द्वन्द्वोंसे हर्ष या शोकके वशीभूत नहीं होता, नमस्कार (भिन्न-भिन्न देवताओंकी स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध तर्पण) को छोड़ देता है,
उपदेश ३ ] , * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४१
ममता और अहङ्कारसे शून्य हो जाता है, किसी भी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रखता, निष्काम तथा एकान्तसेवी हो जाता है, वह निश्चय ही ससार बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ७२-७६ ॥
'प्रमादरहित, कर्म, भक्ति एव ज्ञानसे सम्पन्न तथा केवल आत्माके ही अधीन रहनेवाला साधक, चाहे वह—ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ—कोई भी क्यों न हो, वैराग्य होनेपर सन्यास ग्रहण कर सकता है। अथवा यदि वैराग्य मन्द होनेके कारण उन-उन आश्रमोंमे प्रधानतः आस्था बनी हुई हो तो पहले ब्रह्मचर्याश्रमकी अवधि पूरी करके गृहस्थ बने, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो जाय और वानप्रस्थ होनेके अनन्तर सन्यास ले । अथवा तीव्र वैराग्य होनेपर ब्रह्मचर्य-आश्रमसे ही सन्यासमे प्रवेश करे। या गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ-आश्रमसे सन्यास ग्रहण करे। अथवा ब्रह्मचारी हो या अब्रह्मचारी, स्नातक हो या न हो, अग्निहोत्र त्याग चुका हो या उससे अलग ही रहा हो— जिस दिन उसे वैराग्य हो, उसी दिन वह घर छोड़कर सन्यासी हो जाय। सन्यास-आश्रममे प्रवेशके समय कुछ विद्वान् प्राजापत्य नामक इष्टि करते हैं, उसे करे अथवा न करे। अथवा केवल 'आग्नेयी' इष्टिका ही अनुष्ठान करे (अग्नि देवतासे सम्बन्ध रखनेके कारण यह इष्टि 'आग्नेयी' कहलाती है)। अग्नि ही प्राण है, अतः इस आग्नेयी इष्टिद्वारा साधक प्राणका ही पोषण करता है। अथवा 'त्रैधातवीया' इष्टि का ही (जिसका इन्द्र देवतासे सम्बन्ध है) अनुष्ठान करे। सत्त्व, रज और तम—ये ही तीन धातु हैं, जिनका इस त्रैधातवीय इष्टिके द्वारा हवन किया जाता है। शास्त्रोक्त विधिसे इष्टि करके 'अयं ते योनि '* इस मन्त्रसे अग्निको सूँघे । मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—'हे अग्निदेव ! यह समष्टि प्राण तुम्हारे आविर्भावका कारण है। यह प्राण ही सवत्सरात्मक काल है, जिससे उत्पन्न होकर तुम उत्तम कान्तिसे देदीप्यमान हो रहे हो। अपनी उत्पत्तिके कारणभूत इस प्राणको जानकर तुम इसीमे स्थित हो जाओ और इस प्रकार हमारे प्राणसे तादात्म्य प्राप्त करके हमारे ज्ञानरूपी धनको बढाओ ।' निश्चय ही यह प्राण अग्निकी उत्पत्तिका कारण है। इसलिये 'प्राण गच्छ स्वा योनिं गच्छ स्वाहा' ( हे अग्निदेव ! तुम प्राणको प्राप्त कर, अपने कारणको प्राप्त कर उसके साथ एक हो जाओ) इसी प्रकार यह मन्त्र कहता है। (इसी प्रकार साधक भी कहे।)
- अय ते योनिऋत्वियो यतो जातो अरोचथा । त जानन्नग्न आरोहाथा नो वर्धया रयिम् ॥
'आहवनीय अग्निमेसे अग्नि ले जाकर पूर्वोक्त प्रकारसे इष्टि करके अग्निको सूँघे । यदि अग्नि न मिल सके तो जलम ही हवन करे। 'निश्चय ही सम्पूर्ण देवता जलस्वरूप हैं। सम्पूर्ण देवताओके लिये मैं हवन करता हूँ, यह उन्हें प्राप्त हो' (आपो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहा) यों कहकर हवन करे। फिर उस जलमेसे थोड़ा सा जल उठाकर उसका आचमन कर ले । वह घृतयुक्त जल आरोग्यकारक एव मोक्षदायक होता है। फिर शिखा, यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र, स्त्री, कर्म, अध्ययन एव अन्यान्य मन्त्रोंका जप त्यागकर ही आत्मवेत्ता पुरुष परिव्राजक (सन्यासी) होता है। त्रैधातवीय मोक्षसम्बन्धी मन्त्रोंसे ब्रह्मको जाने। जो सत्य, ज्ञान आदि लक्षणोसे युक्त है, वही ब्रह्म है, वही उपासनाके योग्य है। यह ठीक ऐसा ही है' ॥ ७७-७९ ॥
नारदजीने ब्रह्माजीसे पुनः प्रश्न किया—'यज्ञोपवीत न रहनेपर वह ब्राह्मण कैसे रह सकता है?' तब ब्रह्माजीने उनसे कहा—'विद्वान् पुरुष शिखासहित सम्पूर्ण सिरके बालो- का मुण्डन कराके शरीरपर यज्ञोपवीतके रूपमे धारण किये जानेवाले बाह्य सूत्रको तो त्याग दे और जो अविनाशी परब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको सबमे व्यापक सूत्ररूप समझकर अपने भीतर धारण करे। जो सूचन (ज्ञान) का हेतु हो, उसे 'सूत्र' कहते हैं। अतः 'सूत्र' परमपदका नाम है। जिसने उस परमपदरूप सूत्रको जान लिया, वही वेदांका पारगामी ब्राह्मण है। जैसे सूत्रमे मनके पिरोये हुए होते हैं उसी प्रकार जिस परमात्मामें यह सम्पूर्ण जगत् पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योगका ज्ञाता तत्त्वदर्शी योगी उसी सूत्रको धारण करे। विद्वान् पुरुष उत्तम योगका आश्रय ल बाह्य सूत्रका तो त्याग करे और इस ब्रह्मस्वरूप सूत्रको धारण करे। जो यो करता है, वही चेतन है। उम ब्रह्मरूप सूत्रके धारण करनेसे सन्यासी न तो कभी उच्छिष्ट (जूठे मुँह) होता है और न कभी अपवित्र ही होता है। ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत धारण करनेवाले जिन सन्यासियोंके भीतर वह ब्रह्मरूपी सूत्र विद्यमान है, वे ही इस ससारमे सूत्रके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले तथा यज्ञोपवीतधारी हैं। सन्यासी ज्ञा मयी शिखा धारण करते हैं, ज्ञानमे ही स्थित होते हैं और ज्ञानका ही यज्ञोपवीत पहनते हैं। उनके लिये ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। ज्ञान ही सबसे पवित्र बताया गया है। जैसे अग्निकी शिखा उसके स्वरूपसे भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार जिस विद्वान् सन्यासीने ज्ञानमयी शिखा धारणा कर रक्खी है, वही शिखाधारी कहलाता है, दूसरे
७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ४
लोग, जो केवल केश धारण करते हैं, वास्तविक शिखाधारी नहीं हैं। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मके अधिकारी माने जाते हैं, उन्हींको यह बाह्य सूत्र—यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये, क्योंकि वह कर्मका अङ्ग माना गया है। जिसके ज्ञानमयी शिखा और ज्ञानमय ही यज्ञोपवीत है, उसीमे पूर्णरूपसे ब्राह्मणत्व प्रतिष्ठित है—ब्रह्मज्ञ पुरुष यही मानते हैं ॥ ८०-८९ ॥
'यह सब जानकर ब्राह्मण घरका त्याग करके सन्यासी हो जाय, एक वस्त्र धारण करे, सिरके बाल मुँडा ले और किसी भी वस्तुका संग्रह न करे। यदि शारीरिक क्लेश सहनेमें समर्थ न हो, तो कौपीन आदि धारण करे । यदि वह शारीरिक क्लेश सह सकता हो तो विधिपूर्वक सन्यास ले दिगम्बर रहे। अपने पुत्र, मित्र, स्त्री, माननीय गुरुजन तथा भाई-बन्धु आदिको छोड़कर चला जाय, स्वाध्याय एव वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका त्याग करके समस्त ब्रह्माण्डके साथ सम्बन्ध त्याग दे। कौपीन, दण्ड और अङ्ग ढकनेका वस्त्र भी न रक्खे। सब प्रकारके द्वन्द्वोंका सहन करते हुए न सर्दीकी परवा करे न गर्मीकी; न सुखके लिये लालायित हो और न दुःख-से भयभीत ही हो । निद्राकी भी चिन्ता न करे । मान-अपमानमें समान भावसे रहे। छहों ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो। निन्दा, अहङ्कार, मत्सरता (डाह), गर्व, दम्भ, ईर्ष्या, असूया (दोषदृष्टि), इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि छोड़कर, अपने शरीरको मुर्देके समान मानकर, आत्मासे अतिरिक्त दूसरी किसी भी वस्तुको बाहर भीतर न स्वीकार करते हुए, न तो किसीके सामने मस्तक झुकाये, न यज्ञ और श्राद्ध करे, न किसीकी निन्दा या स्तुति करे। अकेला ही स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करता रहे। दैवेच्छासे भोजन आदिके लिये जो कुछ भी मिल जाय, उसीपर सन्तुष्ट रहे । सुवर्ण आदिका संग्रह न करे। न किसीका आवाहन करे न विसर्जन । न मन्त्रका प्रयोग करे न मन्त्रका त्याग करे। न ध्यान करे न उपासना। न कोई लक्ष्य हो न लक्ष्यहीनता। न किसीसे अलग रहे, न सयुक्त । न किसी एक स्थानपर रहनेका आग्रह हो, न अन्यत्र जानेका । कोई उसका अपना घर या आश्रम न हो । उसकी बुद्धि सदा स्थिर रहे । जनशून्य भवन, वृक्षकी जड़, देवालय, घास फूसकी कुटिया, कुलालशाला, अग्निहोत्रशाला, अग्निदिगन्तर, नदी-तट, पुलिन (कछार), भूगृह (गुफा), पर्वतीय गुफा, झरनेके पास, चबूतरे या वेदीपर अथवा वनमें रहे । श्वेतकेतु, ऋभु, निदाघ, ऋषभ, दुर्वासा, संवर्तक, दत्तात्रेय तथा रैवतककी भाँति न कोई चिह्न धारण करे और न अपने आचारको ही किसीपर प्रकट होने दे । बालक, उन्मत्त अथवा पिशाचकी भाँति व्यवहार करे । उन्मत्त न होते हुए भी उन्मत्तकी भाँति आचरण करे । त्रिदण्ड, झोली, पात्र, कमण्डलु, कटिसूत्र और कौपीन—सब कुछ 'भूः स्वाहा' कहकर जलमें छोड़ दे ॥ ९० ॥
'कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु—सबको जलमें छोड़कर दिगम्बर होकर विचरे । आत्माका अनुसंधान करे । दिगम्बरकी भाँति रहकर द्वन्द्वोंको सहन करे—उनसे प्रभावित न हो । किसी भी वस्तुका संग्रह न करे । तत्त्व एव ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले ज्ञानमार्गमे भलीभाँति स्थित रहे । मनको शुद्ध रक्खे । प्राण-रक्षाके लिये उचित समयपर हाथरूपी पात्रसे अथवा ओर किसी पात्रसे बिना माँगे ही मिले हुए आहारको ग्रहण करे । लाभ हानिको समान मानकर ममतासे रहित हो जाय । केवल ब्रह्मका चिन्तन करे । अध्यात्म चिन्तनमें ही निष्ठा रक्खे । शुभाशुभ कर्मोंका निर्मूलन करके अपने आत्माके अतिरिक्त प्रत्येक वस्तुको सर्वथा त्याग दे । एकमात्र पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके बोधसे सम्पन्न हो, 'अहं ब्रह्मास्मि' (वह ब्रह्म मैं ही हूँ) ऐसी निश्चित धारणा रखकर भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी तरह केवल ब्रह्मस्वरूप प्रणवका ही चिन्तन करे । तीनों शरीरोंके प्रति अहंता और ममताका भाव त्यागकर, सर्वत्याग करके ही वह शरीरका त्याग करे । इस प्रकार करनवाला सन्यासी कृतकृत्य होता है, यह उपनिषद् है ॥ ९१-९२ ॥
॥ तृतीय उपदेश समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ उपदेश
संन्यास-धर्मके पालनका महत्त्व तथा संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि
'जो लोक, वेद, विषय भोग तथा इन्द्रियोंकी अधीनता त्यागकर केवल आत्मामें ही स्थित रहता है, वह सन्यासी परमगतिको प्राप्त होता है। श्रेष्ठ सन्यासी नाम, गोत्र आदिके वरण देश, काल, शास्त्रज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, मत और शीलका विज्ञापन न करे। किसी भी स्त्रीसे बातचीत न करे। पहलेकी देखी हुई किसी स्त्रीका स्मरणतक न करे, उनकी चर्चासे भी दूर रहे तथा स्त्रियोंका चित्र भी न देखे । सम्भाषण, स्मरण, चर्चा और चित्रावलोकन—स्त्रीसम्बन्धी
उपदेश ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४३ इन चार बातोंका जो मोहवश आचरण करता है, उसके चित्तमें अवश्य ही विकार उत्पन्न होता है और उस विकारसे उसका धर्म निश्चय ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, क्रोध, असत्य, माया, लोभ, मोह, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यानमे योग देना, कामना, राग, सग्रह, अहङ्कार, ममता, चिकित्साका व्यवसाय, धर्मके लिये साहसका कार्य, प्रायश्चित्त, दूसरोंके घरपर रहना, मन्त्र प्रयोग, औषध वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना-ये सब सन्यासीके लिये निषिद्ध हैं। इनका सेवन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे नीचे गिर जाता है। मोक्षधर्ममे तत्पर रहनेवाला मुनि (सन्यासी) अपने किसी सुहृद्के लिये भी 'आओ, जाओ, ठहरो' स्वागत और सम्मान- की बात न करे। भिक्षु स्वप्नमें भी कभी किसीका दिया हुआ दान न ले। दूसरोंको भी न दिलाये और न स्वय किसीको देने-लेनेके लिये प्रेरित ही करे। स्त्री, भाई, पुत्र आदि तथा अन्य बन्धु बान्धवोंके शुभ या अशुभ समाचारको सुनकर या देखकर भी संन्यासी कभी कम्पित (विचलित) न हो; वह शोक और मोहको सर्वथा त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (किसी वस्तुका सग्रह न करना), उद्दण्डताका अभाव, किसीके सामने दीन न बनना, स्वाभाविक प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, स्नेह न करना, गुरुकी सेवा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, सबके प्रति उदासीनताका भाव, धीरता, स्वभावकी मधुरता, सहन- शीलता, करुणा, लज्जा, ज्ञान-विज्ञान परायणता, स्वल्प आहार तथा धारणा-यह मनको वशमें रखनेवाले सन्यासियोंका विख्यात सुधर्म है। द्वन्द्वोंसे रहित, सत्त्वगुणमें सर्वदा स्थित और सर्वत्र समान दृष्टि रखनेवाला तुरीयाश्रममे स्थित परमहंस सन्यासी साक्षात् नारायणका स्वरूप है। गाँवमें एक रात रहे और बड़े नगरमें पाँच रात, किंतु यह नियम वर्षाके अतिरिक्त समयके लिये ही है, वर्षा में चार महीनेतक वह किसी एक ही स्थानपर निवास करे। भिक्षु गाँवमे दो रात कभी न रहे। यदि रहता है तो उसके अन्तःकरणमे राग आदिका प्रसङ्ग आ सकता है। इससे वह नरकगामी होता है। गाँवके एक किनारे किसी निर्जन प्रदेशमें मन और इन्द्रियोंको सयममे रखते हुए निवास करे। कहीं भी अपने लिये मठ या आश्रम न बनाये। जैसे कीड़े हमेशा घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आठ महीनोंतक सन्यासी इस पृथिवीपर विचरता रहे। केवल वर्षाके चार महीनोंमें वह एकत्र निवास करे। वह एक वस्त्र पहन- कर रहे अथवा बिना वस्त्रके दिगम्बर होकर रहे। उसकी दृष्टि इधर-उधर चञ्चल न होकर एक लक्ष्यपर ही स्थिर रहे। वह कभी विषयोंमें आसक्त न हो तथा सत्पुरुषोंके पथको कलङ्कित न करते हुए ध्यानपरायण रहकर पृथ्वीपर विचरे। संन्यासी अपने धर्मका पालन करते हुए सदा पवित्र स्थानपर रहे। योगपरायण भिक्षु पृथवीतलपर दृष्टि रखते हुए ही सदा विचरण करे। रातको, दोपहरमें तथा दोनों सन्ध्याओंके समय कभी भ्रमण न करे तथा ऐसे स्थानोंपर भी न घूमे जो शून्य, दुर्गम तथा प्राणियोंके लिये बाधाकारक हों। गाँवमें एक रात, पुरवेमे दो दिन, पत्तन (छोटे शहर, कस्बे) में तीन दिन और नगरमें पाँच रात्रियोंतक सन्यासीको रहना चाहिये। वर्षाकालमे किसी एक स्थानपर, जो पवित्र जलसे घिरा हुआ हो, निवास करना चाहिये। भिक्षु सम्पूर्ण भूतोंको अपने ही समान देखता हुआ अंधे, जड़, बहरे, पागल और गूँगेकी भाँति चेष्टा रखकर पृथ्वीपर विचरण करे। बहूदक और वनस्थ यतियोंके लिये तीनों कालोंका स्नान बताया गया है। परन्तु जो 'हंस' सन्यासी है, उसके लिये एक ही बार स्नान करनेका विधान है। हमसे भी ऊंची स्थितिमें जो परमहंस है, उसके लिये स्नान आदिका कोई बन्धन नहीं है ॥ १-२२ ॥ 'मौन, योगासन, योग, तितिक्षा, एकान्तशीलता, निस्पृहता तथा समता - ये सात एकदण्डी सन्यासियोंके पालन करनेयोग्य नियम हैं। जो परमहंसकी स्थितिमें पहुँचा हुआ है, उसके लिये स्नान आदि अनिवार्य न होनेके कारण वह केवल सम्पूर्ण चित्तवृत्तियोंका त्यागमात्र करे। चमड़ी, मास, रक्त, नाड़ी, मज्जा, मेद और हड्डियों- के समुदायरूप इस शरीरमे रमनेवाले पुरुषों तथा मल, मूत्र और पीवमे रमनेवाले कीड़ोंमें कितना अन्तर है ? सम्पूर्ण कफ आदि घृणित वस्तुओंकी महाराशिरूप यह शरीर कहाँ और अङ्गशोभा, सौन्दर्य एव कमनीयता आदि गुण कहाँ । मूर्ख मनुष्य मास, रक्त, पीव, विष्ठा, मूत्र, नाड़ी, मज्जा और हड्डियोंके समुदायरूप इस शरीरमें यदि प्रीति करता है, तो नरकमें भी उसकी अवश्य प्रीति होगी। स्त्रियोंके उच्चारण न करने योग्य गुप्त अङ्ग और सड़े हुए नाड़ीके घावमे कोई भेद न होनेपर भी मनुष्य अपने मनकी मान्यताके भेदसे प्रायः ठगा जाता है। स्त्रियोंका वह गुप्त अङ्ग क्या है?
- दो भागोंमें विदीर्ण हुआ चर्मखण्डमात्र। वह भी अपानवायु- के निकलनेसे दुर्गन्धपूर्ण रहता है। जो लोग उसमें रमण करते हैं, उन्हें नमस्कार है। भला, इससे बढकर दुस्साहस और क्या हो सकता है। विद्वान् सन्यामीके लिये न कोई कर्तव्य शेष रहता है और न चिह्नविशेषको धारण करनेकी आवश्यकता। वह ममतारहित, निर्भय, शान्त, निर्द्वन्द्व, वर्ण
७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् ' [ उपदेश ४ आदिके अभिमानमे रहित एव आहारोपार्जनकी चेष्टासे रहित होता है । संन्यासी मुनि कौपीन पहनकर रहे अथवा नगा ही रहकर ध्यानसे तत्पर रहे । इस प्रकार ज्ञानपरायण योगी ब्रह्मभावकी प्राप्तिमे समर्थ होता है । संन्यासका चिह्नविशेष होने हुए भी उनमें ज्ञान ही मोक्षका विशेष कारण है । प्राणियोके लिये नाना प्रकारके चिह्नोंका धारण मोक्षसाधक ज्ञानके अभावम निरर्थक ही होता है । जिसके विषयमे कोई भी यह नहीं जानता कि यह साधु है या असाधु, मूर्ख है या बहुत बड़ा विद्वान्, अथवा सदाचारी है या दुराचारी, वही ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण है । इसलिये विद्वान संन्यासी किसी भी चिह्नविशेषको न धारण करके स्वधर्मका ज्ञान रखते हुए सर्वोत्तम ब्रह्मचिन्तन न्तका पालन करे। वह गूढ धर्मका आश्रय लेकर इस प्रकार आचरण करे, जिससे उसके आचरणके विषयकी कोई बात दूसरोपर प्रकट न हो । समस्त प्राणियोंके लिये सदेहता विषय बना हुआ वह वर्ण और आश्रमसे रहित हो अन्ध, जड और मूककी भाँति पृथिवीपर विचरण करे । उस शान्तचित्त सन्यासीका दर्शन करके देवता भी वैसी स्थिति प्राप्त करनेके लिये लालायित होते हैं । जब आत्मसत्ताके अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तुके अस्तित्वका चिह्न भी न रह जाय, तभी कैवल्य प्राप्त होता है । यही ब्रह्म- तत्त्वका उपदेश है' ॥ २३-३६ ॥ तदनन्तर नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछा-'भगवन् ! सन्यासकी विधि क्या है, यह बतानेकी कृपा करें।' तब ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर स्वीकृति दी और इस प्रकार कहा-'आतुर-मन्त्रासमे अथवा क्रम सन्यासमे चतुर्थ आश्रम स्वीकार करनेके लिये पहले प्रायश्चित्तरूपमे कृच्छ्र आदि व्रत करके फिर अष्टश्राद्ध करे । देवता, ऋषि, दिव्यमनुष्य, भूत, पितर, माताएँ और आत्मा-इन आठके निमित्त आठ श्राद्ध करना आवश्यक है । पहले 'सत्य' और 'वसु' नामके विश्वेदेवोंका आवाहन करे, फिर देवश्राद्धमें ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजीका, ऋषिश्राद्धमें देवर्षि, राजर्षि तथा मानवर्षियोंका, दिव्यश्राद्धमे आठ वसुओं, ग्यारह रुद्रों तथा बारह आदित्योका, मनुष्य-श्राद्धमे सनक, सनन्दन, सनत्कुमार तथा सनत्सुजातका, भूतश्राद्धमे पृथिवी आदि पञ्च महाभूतो, नेत्र आदि इन्द्रियों तथा जरायुज आदि चतुर्विध प्राणिसमुदायोंका, पितृश्राद्धमें पिता, पितामह तथा प्रपितामहका, मातृश्राद्धमे माता, पितामही और प्रपितामहीका तथा आत्मश्राद्धमे अपना, अपने पिताका और पितामहका-यदि उसके पिता जीवित हो तो पिताको छोड़कर अपना, पितामह और प्रपितामहका आह्वान करे । आठो श्राद्धोंको एक ही यज्ञका अङ्ग बनाकर करनेपर प्रत्येक श्राद्धम दो ठाके क्रममे ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करके उनका विधिवत् पूजन करे । अथवा यदि आठ पृथक्-पृथक् यज्ञ किये जायँ तो ऐसी स्थितिम अपनी आग्नामे आये हुए मन्त्रोंद्वारा इन आठ श्राद्धोंको आठ दिनम या एक दिनमें करे । पितृयाग ( श्राद्धकल्प ) म बताये हुए विधानके अनुसार ब्राह्मणोंके पूजनसे लेकर भाजनतक सब कृत्य विधिपूर्वक सम्पन्न करके पिण्डदान दे । फिर दक्षिणा और ताम्बूलसे ब्राह्मणोंको सतुष्ट करके उन्हें विदा कर और शेष कमकी सिद्धिके लिये सात या आठ छोड़कर शेष गर्भा देर्शोको मुँड़वा दे । साथ ही मूँछ, दाढी और नग्न भी कटवा दे । ऊपर बताये अनुसार सात केशाको अवश्य बचा ल । काँग्त और उपस्थके केश भी न कटाये । औरके पश्चात् स्नान करे । उसके बाद सायंकालीन सध्या वन्दन करके एक सहस्र गायत्रीका जप करे । फिर ब्रह्मयज्ञ करके स्वतन्त्र अग्निकी स्थापना कर । फिर अपनी शाखाका उपमहार करके उसमे बताये अनुसार आज्यभागपर्यन्त घीकी आहुति दे । हवनकी विधि पूरी करके तीन ग्रास सत्तूका प्राशन (भोजन) कर । फिर आचमन करके अग्निकी रक्षाके लिये उसमे ईधन आदि रखकर स्वय अग्निसे उत्तरकी ओर काल मृगचर्मपर बैठ जाय और पुराण कथा सुनते हुए रातभर जागरण करे । रातके चौथे पहरके अन्तमे स्नान करके पूर्वोक्त अग्निमे चरु पकायें । फिर पुरुषसूक्तके सोलह मन्त्रोद्वारा उस चरुकी सोलह आहुतियाँ अग्निमे डाले और विरजा होम करके आचमनपूर्वक दक्षिणासहित वस्त्र, सुवर्ण, पात्र और धेनुका दान करे और इस प्रकार त्रिविकी पूर्ण करे । इसके बाद ब्रह्माका विसर्जन करके- स मा सिञ्चन्तु मरुत समिन्द्र स बृहस्पति । स मायमग्नि सिञ्चत्वायुषा च धनेन च बलेन नायुष्मन्त करोतु मा ॥* या ते अग्ने यज्ञिया तनूस्तयेह्यारोहात्मानमात्मन् । अच्छा वसूनि कृण्वन्नस्मे नर्या पुरूणि ॥ यज्ञो भूत्वा यज्ञमासीद स्वा योनिम् । जातवेदो भुव आजायमान सक्षय एहि ॥†
- अर्थात् मरुद्गण, इन्द्र, बृहस्पति तथा अग्नि-ये सभी देवता मुझपर कल्याणकी वर्षा करें । ये अग्निदेव मुझे आयु, ज्ञान- रूपी धन तथा साधनकी शक्तिमे सम्पन्न करें, साथ ही मुझको दीर्घजीवी भी बनायें । † हे अग्निदेव ' जो तुम्हारा यज्ञिय ( यज्ञोंमें प्रकट होनेवाला ) स्वरूप है, उसी स्वरूपसे तुम यहाँ पधारो और मेरे लिये बहुत-से
उपदेश ४ ] • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।
—इन दो मन्त्रोंद्वारा अग्निके आधिदैविक स्वरूपको अपने आत्मामें स्थापित कर ले। फिर अग्निका ध्यान करके प्रदक्षिणा और नमस्कारपूर्वक अग्निशालामे उसका विसर्जन कर दे। तदनन्तर प्रात.मध्याेपासन करके सहस्र बार गायत्रीका जप और सूर्योपस्थान करे। तत्पश्चात् नाभितक जलमें प्रवेश करके उसमें बैठकर अष्ट दिक्पालोंको अर्घ्य दे। फिर गायत्रीका विसर्जन करके सावित्रीको व्याहृतियोंमें प्रविष्ट करे अर्थात्
- सावित्रीदेवीसे व्याहृतियोंमें प्रवेश करनेकी प्रार्थना करे। प्रार्थनाके मन्त्र इस प्रकार हैं— 'अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतो- क्षित। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्।' * 'यदश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृता- त्सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम् ॥† शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मण कोशोऽसि मेधयापिहितः। श्रुतं मे गोपाय ॥‡' 'दारैषणायाश्च धनैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थितोऽहम्' 'ॐ भूः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया' 'ॐ सुवः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भूर्भुवः सुवः संन्यस्तं मया' § 'इस प्रकार मन्द, मध्यम और उच्च स्वरसे वाणीद्वारा अथवा मन-ही-मन इन मन्त्रोंका उच्चारण करके तथा 'अभय मनुष्योपयोगी विशुद्ध धन (साधन-सम्पत्ति) की सृष्टि करते हुए आत्मारूपमे मेरे आत्मामें विराजमान हो जाओ। तुम यशरूप होकर अपने कारणरूप यशमें पहुँच जाओ। हे जातवेदा ! तुम पृथिवीसे सम्पन्न होकर अपने धामके साथ यहाँ पधारो।
- इस मन्त्रका अर्थ इसी अङ्कके पृष्ठ ३०८ पर देखिये। †-‡ ये दोनों मन्त्र एक ही मन्त्रके भाग हैं। पूरे मन्त्रका अर्थ भी अङ्कके पृष्ठ ३१८ पर देखिये। § इन वाक्योंका अर्थ इस प्रकार है—'मैं स्त्रीकी कामना, धनकी कामना और लोकमें ख्यातिकी कामनासे ऊपर उठ गया हूँ। मैंने भूलोकका सन्यास (पूर्णत त्याग) कर दिया। मैंने भुव (अन्तरिक्ष) लोकका परित्याग कर दिया तथा मैंने स्वर्गलोकको भी सर्वथा त्याग दिया। मैंने भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक—इन तीनोंको भलीभाँति त्याग दिया।' उ० अं० १५—
सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते स्वाहा' (मेरी ओरसे सब प्राणियोंको अभयदान दिया गया, मुझसे ही सबकी प्रवृत्ति होती है) इस मन्त्रसे जलका आचमन करके पूर्व दिशाकी ओर पूरी अञ्जलि भर जल डालकर 'ॐ स्वाहा' कहकर शेष बचे हुए शिखाके बालोंको उड़ाड़ डाले। तत्पश्चात्— यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ यज्ञोपवीतं बहिर्न निवसेत् त्वमन्त प्रविश्य मध्ये ह्यजस्रम्। परमं पवित्रं यशो बलं ज्ञानवैराग्य मेधा प्रयच्छ ॥* —यह मन्त्र पढ़कर यज्ञोपवीत तोड़ डाले। और उसे जलाञ्जलिके साथ हाथमें लेकर 'ॐ भूः समुद्रे गच्छ स्वाहा' —इस मन्त्रके द्वारा जलमे ही होम दे। फिर 'ॐ भूः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भुवः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ सुवः सन्न्यस्तं मया'—इस प्रकार तीन बार कहकर, तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके उसका आचमन करे। तत्पश्चात् 'ॐ भूः स्वाहा' कहकर वस्त्र और कटिसूत्रको भी जलमें ही त्याग दे। तदनन्तर इस बातका स्मरण करते हुए कि मैं सब कर्मोंका त्यागी हूँ, दिगम्बर होकर स्वरूपका चिन्तन करते हुए ऊपर बाँह उठाये हुए उत्तर दिशाकी ओर चला जाय ॥ ३७ ॥ 'यदि पूर्ववत् विद्वत्-सन्यासी हो तो गुरुसे प्रणव और महावाक्यका उपदेश प्राप्त करके, मुझसे भिन्न दूसरा कोई नहीं है—इस निश्चयके साथ आनन्दपूर्वक विचरण करता रहे। फल, पत्र और जलका ही आहार करे। पर्वत, वन तथा देवमन्दिरोंमें संचरण करे। संन्यासके बाद यदि दिगम्बर हो गया तो वह अपने हृदयमें सदा केवल आनन्दस्वरूप आत्माकी अनुभूतिका ही भरकर कर्मोंसे अत्यन्त दूर रहनेमें ही लाभ मानता हुआ फलोंके रस, छिलके, पत्ते, मूल एवं जलसे प्राण धारण करे और केवल मोक्षकी ही अभिलाषा रखकर पर्वतकी कन्दराओंमें प्रणवका जप एव ब्रह्मका चिन्तन करते हुए सर्वत्र संचरण करनेवाले अपने शरीरका त्याग कर दे॥३८॥
- यह यज्ञसूत्र परम पवित्र है। यह पूर्वकालमें प्रजापतिके साथ ही प्रकट हुआ था। यह सर्वश्रेष्ठ आयुष्य (आयु बढ़ानेका साधन) है। इस यज्ञोपवीतको मेरे कण्ठमें पहना दो। यह शुभ्र यज्ञोपवीत मेरे बल और तेजको बढ़ानेवाला हो। यज्ञोपवीत बाहर न रहे। हे यज्ञमय सूत्र ! तुम मेरे भीतर प्रवेशकर मेरे आत्माके साथ निरन्तर एक होकर रहो। तुम परम पवित्र हो। मुझे सुयश, बल, ज्ञान, वैराग्य तथा धारणाशक्ति प्रदान करो।
पग जानेके पश्चात् आचार्य आदि ब्राह्मणोंद्वारा यों कहकर
७४६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ५ 'यदि ज्ञानप्राप्तिकी इच्छासे संन्यासी हुआ हो तो वह सौ पग जानेके पश्चात् आचार्य आदि ब्राह्मणोंद्वारा यों कहकर बुलानेपर कि—'हे महाभाग ! ठहरो, ठहरो, यह दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु ग्रहण करो। तुम्हे प्रणव और महावाक्यका उपदेश ग्रहण करनेके लिये गुरुके निकट आना चाहिये।' उनके समीप आ जाय। फिर आचार्योंद्वारा देनेपर दण्ड, कटिसूत्र, कौपीन, एक शाटी (चादर) और एक कमण्डलु ग्रहण करे। दण्ड बाँसका होना चाहिये। उसकी ऊँचाई पैरसे लेकर मस्तक तककी हो। वह खरोंच अथवा छेदसे रहित, बराबर चिकना एव उत्तम लक्षणोंसे युक्त हो। उसका रंग काला न हो। इन सब वस्तुओंको लेनेके पहले वह आचमन कर ले और— सखा मा गोपायोज. सखा योऽनीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय ॥* —इस मन्त्रका उच्चारण करके दण्डको हाथमें ले। फिर— जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं मा ते मा मन्त्रयस्व सर्वदा सर्वसौम्य । —इस मन्त्रके साथ प्रणवका उच्चारण करते हुए कमण्डलु ग्रहण करे। तत्पश्चात् 'कौपीनाधारं कटिसूत्रमोम्' यों कहकर कटिसूत्र ग्रहण करे; 'गुह्याच्छादकं कौपीनमोम्' यों कहकर कौपीन ग्रहण करे तथा 'शीतवातोष्णात्राणकरं देहंकरक्षण वस्त्रमोम्' इस मन्त्रका उच्चारण करके वस्त्र ग्रहण करे। तदनन्तर पुनः आचमन करके योगपट्टाभिषिक्त हो 'में कृतार्थ हो गया,' यह मानता हुआ अपने आश्रमोचित सदाचारके पालनमें तत्पर हो जाय। यह उपनिषद् है ॥ ३९ ॥ ॥ चतुर्थ उपदेश समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम उपदेश संन्यास और संन्यासीके भेद तथा संन्यास-धर्म और उसके पालनका महत्त्व इसके बाद अपने पिता ब्रह्माजीसे देवर्षि नारदने पूछा— 'भगवन् ! आपने ही बताया है कि सन्यास सब कर्मोंकी निवृत्ति करनेवाला है; फिर आप ही यह भी कहते हैं कि संन्यासी अपने आश्रमोचित आचारके पालनमें तत्पर हो जाय। (ये दोनों बातें परस्परविरुद्ध जान पड़ती हैं। इस विरोधका परिहार कैसे हो ?)' तब पितामहने कहा—'शरीरमें स्थित देहधारी जीवकी चार अवस्थाएँ होती हैं—जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। इन अवस्थाओंके अधीन होकर ही पुरुष कर्म, ज्ञान और वैराग्यके प्रवर्त्तक होते हैं। तथा समस्त प्राणी इन चार अवस्थाओंके अधीन होकर जब-जब जिस अवस्थामें स्थित होते हैं, उसके अनुकूल आचरण करते हैं। (इसी प्रकार जो जिस आश्रममें स्थित होता है, वह उसीके अनुकूल आचरण करता है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थके द्वारा अनिवार्यरूपसे सेवन करनेयोग्य जो श्रौत-स्मार्त कर्म हैं, सन्यास उन्हीं कर्मोंका निवर्तक है। परंतु सन्यास आश्रमके अनुकूल जो श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि साधन हैं, उनका त्याग वहाँ भी नहीं होता। इसी दृष्टिसे यह कहा गया है कि सन्यासी अपने आश्रमोचित सदाचारके पालनमें तत्पर हो जाय।' नारदजीने कहा—'भगवन् ! ठीक है। अब हमे यथार्थरूपसे यह बताइये कि सन्यासके कितने भेद हैं और उनके अनुष्ठानमे किस प्रकारका अन्तर है ?' ब्रह्माजीने कहा—'बहुत अच्छा। संन्यास-भेदसे आचार- भेद कैसे होता है, यह जानना चाहते हो तो बतलाता हूँ; श्रवण करो। वास्तवमे तो सन्यास एक ही है; किंतु अज्ञानसे, असमर्थतावश और कर्मलोपके कारण तीन भेदोंमें विभक्त होकर वैराग्य-सन्यास, ज्ञान-सन्यास, ज्ञान-वैराग्य-सन्यास और कर्म-सन्यास—इन चार भेदोंको प्राप्त होता है। वह सब इस प्रकार है। मनमें अनर्थकारी दुष्ट काम का अभाव होनेसे विषयोंकी ओरसे विरक्त होकर जो पूर्वजन्मके पुण्यकर्मके प्रभावसे सन्यास लेता है, वह वैराग्य-संन्यासी कहलाता है। जो शास्त्रको जाननेसे तथा पापमय एव पुण्यमय लोकोंका अनुभव और श्रवण करनेसे प्रपञ्चकी ओरसे स्वभावतः विरक्त हो गया है, क्रोध, ईर्ष्या, असूया (दोषदृष्टि), अहकार और अभिमान ही जिसके स्वरूप हैं, ऐसे समस्त ससारको अपने मनसे हटाकर, स्त्री-कामना धन-कामना' और लोकमें ख्यातकी
- हे दण्ड ! तुम मेरे सखा (सहायक) हो, मेरी रक्षा करो। मेरे ओज (प्राणशक्ति) की रक्षा करो। तुम वही मेरे सखा हो, जो इन्द्रके हाथमें वज्रके रूपमें रहते हो। तुमने ही वज्ररूपसे आघात करके वृत्रासुरका सहार किया है। तुम मेरे लिये कल्याणमय बनो। मुझमें जो पाप हो, उसका निवारण करो।
उपदेश ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५७ कामना—इन त्रिविध स्वरूपोंवाली दैहिक वासनाको, शास्त्रवासना- को तथा लोक-वासनाको त्याग देता है, तथा जैसे साधारण लोग वमन किये हुए अन्नको त्याज्य समझते हैं, उसी प्रकार इन समस्त भोगोंको त्याज्य मानकर जो साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न हो सन्यास ग्रहण करता है, वही ज्ञान-सन्यासी कहलाता है। जो क्रमशः सब शास्त्रोंका अभ्यास करके, सब कुछ अनुभवमें लाकर ज्ञान और वैराग्यके द्वारा केवल अपने स्वरूपका ही चिन्तन करते हुए दिगम्बर हो जाता है, वही यह ज्ञान-वैराग्य-सन्यासी है। जो ब्रह्मचर्यको समाप्त करके गृहस्थ होकर, तथा गृहस्थसे वानप्रस्थ- आश्रममे प्रवेश करके पूर्ण वैराग्य न होनेपर भी आश्रम-क्रमके अनुसार अन्तमें सन्यास ग्रहण करता है, वह कर्म-सन्यासी है। अथवा ब्रह्मचर्यसे ही सन्यास लेकर सन्याससे जो दिगम्बर हो जाता है, वह वैराग्य-सन्यासी है। विद्वत्सन्यासी ज्ञान-सन्यासी है। तथा विविदिषा-संन्यासी कर्म-सन्यासी है ॥ १-७ ॥ “कर्म-सन्यास भी दो प्रकारका होता है—एक निमित्त सन्यास और दूसरा अनिमित्त-सन्यास। आतुर-सन्यास निमित्त-सन्यास कहलाता है और क्रम-सन्यासको अनिमित्त-सन्यास कहते हैं। रोग आदिसे आतुर होनेके कारण जिसमें सब कर्मोंका लोप हो जाता है, अर्थात् जिसमें नित्य-नैमित्तिक आदि कोई कर्म नहीं बन सकते, तथा जो प्राणत्यागके समय स्वीकार किया जाता है, वह सन्यास निमित्त-सन्यास माना गया है। (इसीको आतुर सन्यास भी कहते हैं।) शरीरके सबल होनेपर जो विचारके द्वारा यह निश्चय करके कि उत्पन्न होनेवाली सब वस्तुएँ नश्वर हैं, देह आदि सबको त्याज्य मानता और— हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ 'वह परमात्मा आकाशमें विचरनेवाला हंस (सूर्य) है, अन्तरिक्षचारी वसु है। वही होता और वेदीपर स्थापित अग्नि है। गृहस्थोंके घरोंमें अतिथिरूपसे आश्रय लेनेवाला भी वही है। मनुष्योंमें उसीकी सत्ता है। श्रेष्ठ वस्तुओंमें भी उसीका अस्तित्व है। सत्यमें उसीका निवास है। आकाशमें भी वही सत्य है। वही जलसे प्रकट होता है। वही गौ (पृथ्वी एव वाणी) से प्रकट होनेवाला है। सत्यसे भी उसीका प्रादुर्भाव होता है। वही पर्वतोंसे प्रकट होता है तथा इन सबसे भिन्न एव विलक्षणरूपमें वही एकमात्र महान् सत्य है।' —इस मन्त्रके अनुसार केवल परब्रह्म परमेश्वरको ही सत्य समझता और ब्रह्मसे अतिरिक्त सब कुछ नश्वर है, इस निश्चय- पर पहुँचकर क्रमशः सन्यास-आश्रम ग्रहण करता है, उसका वह सन्यास अनिमित्त-सन्यास कहा गया है। सन्यासी छः प्रकारके होते हैं—कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत तथा अवधूत। कुटीचक सन्यासी शिखा और यज्ञोपवीतसे युक्त होता है। वह दण्ड, कमण्डलु, कौपीन और कन्था धारण करता है। पिता, माता और गुरु—तीनोंकी सेवा- में सलग्न रहता है। पिठर (पात्र), खनित्र (खनती) और झोली आदि साथ रखता है और मन्त्र-साधनमें लगा रहता है, एक ही जगह भोजन करता रहता है, श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है और त्रिदण्डी होता है। बहूदक भी कुटीचककी भाँति शिखा, यज्ञोपवीत, दण्ड, कमण्डलु, कौपीन और कन्था धारण करते हैं। ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाते हैं। सबके प्रति समभाव रखते हैं और मधुकरी- वृत्तिसे कई घरोंसे अन्न लाकर केवल आठ ग्रास भोजन करते हैं। हंसनामक सन्यासी जटा धारण करनेवाले, त्रिपुण्ड्रोर्ध्व- पुण्ड्रधारी, अनिश्चित घरोंसे मधुकरी लाकर भोजन करने- वाले तथा कौपीनखण्ड एव तुण्ड (तूँबी) धारण करते हैं। परमहंस शिखा और यज्ञोपवीतसे रहित होते हैं। वे पाँच गृहोंसे अन्न लाकर केवल एक रात भोजन करते हैं अर्थात् दूसरे दिन दूसरे पाँच गृहोंका अन्न ग्रहण करते हैं। उनका हाथ ही पात्र होता है। अतएव वे 'करपात्री' कहलाते हैं। एक कौपीन धारण करते, एक ओढनेका वस्त्र रखते और बाँसका दण्ड धारण करते हैं। वे या तो एक चादर ओढकर रहते हैं या सब अङ्गोंमें भस्म रमाये रहते हैं। परमहंस सर्वत्यागी होते हैं। तुरीयातीत सन्यासी गोमुख होते हैं अर्थात् जैसे गायें दैवेच्छावश जो तृण आदि प्राप्त हो जाय, उसीसे निर्वाह करती हैं, उसी प्रकार वे दैवेच्छावश जो कुछ प्राप्त हो जाय उसीको अपना ग्रास बनाते हैं। विशेषतः वे फलाहारी होते हैं। यदि अन्नाहारी हों तो केवल तीन घरोंका अन्न ग्रहण करते हैं। देहके सिवा और कुछ उनके पास शेष नहीं रहता। वे दिगम्बर रहते और मुर्दोंकी तरह शारीरिक चेष्टासे रहित होते हैं। अवधूत किसी नियमके बन्धनमें नहीं रहता। वह कलङ्कित और पतित मनुष्योंको छोड़कर शेष सभी वर्णोंके मनुष्योंसे अजगर-वृत्तिके अनुसार आहार ग्रहण करता है तथा सर्वदा अपने स्वरूपके चिन्तनमें लगा रहता है ॥ ८—१७ ॥ 'आतुर पुरुष सन्यास लेनेके बाद यदि जी जाय तो उसे सम्पूर्ण विधियोंका पालन करते हुए क्रम-सन्यास ग्रहण करना चाहिये। कुटीचक, बहूदक और हंस—इन तीन प्रकारके सन्यासियोंकी सन्यास विधि ब्रह्मचर्यादि आश्रमसे लेकर चतुर्था-
[उपदेश ५] ७४८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् *
श्रमककी भाँति है अर्थात् उनके लिये क्रम-संन्यासका विधान है। परमहंस आदि (अर्थात् परमहंस, तुरीयातीत एव अवधूत—इन) तीन प्रकारके संन्यासियोंके लिये कटिसूत्र, कौपीन, वस्त्र, कमण्डलु और दण्ड धारण करनेकी आवश्यकता नहीं है। वे सभी वर्णोंके घरसे एक बार भिक्षाटन कर सकते हैं, तथा उन्हें दिगम्बर होना चाहिये। यही उनके लिये सामान्य विधि है। संन्यास ग्रहणके समय भी जबतक उनके भीतर अलबुद्धि न हो जाय अर्थात् अबतक मैंने जो कुछ अध्ययन किया है, वह पर्याप्त है, उससे अधिक अध्ययन करनेकी अपने लिये कोई आवश्यकता नहीं है—ऐसी बुद्धि जबतक उत्पन्न न हो जाय, तबतक उन्हें अध्ययन करना चाहिये। उसके पश्चात् कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु—सबका जलमें विसर्जन कर देना चाहिये। यदि वह दिगम्बर हो तो कन्थाका लेशमात्र भी अपने पास न रक्खे । न अध्ययन करे, न व्याख्यान दे और न कुछ श्रवण ही करे। प्रणवके सिवा और कुछ न पढे। न तर्कशास्त्र पढे, न शब्दशास्त्र । बहुत-से शब्दोंकी शिक्षा न दे। वागिन्द्रियके द्वारा वाणीका व्यर्थ अपव्यय न करे (अधिक न बोले)। हाथ आदिके इशारे-से बात करना या अन्य किसी भाषाविशेषके द्वारा भी बात करना निषिद्ध है। शूद्र, स्त्री, पतित एवं रजस्वलासे बातचीत न करे। यतिके लिये देव-पूजाका विधान नहीं है। उसे उत्सव नहीं देखना चाहिये तथा तीर्थ यात्रा भी उसके लिये आवश्यक नहीं है ॥ १८-२० ॥
'अब पुनः संन्यासीके विशेष नियम बताये जाते हैं। कुटीचक संन्यासीके लिये ही एक स्थानपर भिक्षा ग्रहण करनेकी विधि है। बहूदकके लिये अनिश्चित घरोंसे मधुकरी ग्रहण करने-का विधान है। इसके लिये आठ घरोंसे आठ ग्रास अन्न लेकर भोजन करनेका विधान है। परमहंसके लिये पाँच घरोंसे अन्न लेनेका नियम है। हाथ ही उसका पात्र है। तुरीयातीत-के लिये गोमुख-वृत्तिसे फलाहारका नियम है। अर्थात् जैसे गायको जो कुछ भी खिलाया जाय, वह मुँह खोलकर ले लेती है, उसी प्रकार दैवेच्छासे जो कुछ भी फल फूल मिल जाय, उसीको वह ग्रहण करे। अवधूतके लिये सभी वर्गोंके लोगोंके यहाँसे अजगरवृत्तिके अनुसार अन्न-ग्रहण करनेका नियम है। यति किसी गृहस्थके घर एक रात भी न ठहरे। किसीको भी नमस्कार न करे। तुरीयातीत और अवधूत—इन दोनोंमें अवस्थाके अनुसार कोई जेठा या छोटा नहीं होता। जिसे अपने स्वरूपका ज्ञान नहीं है, वह अवस्था में बड़ा होनेपर भी छोटा ही है। संन्यासी अपने हाथसे तैरकर नदी पार न करे। पेड़पर न चढे। सवारीपर न चले। खरीद-बिक्री न करे। किसी वस्तुकी अदला-बदली भी न करे। दम्भी और असत्य-वादी न बने। यतिके लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है। यदि है तो उसमे अन्य आश्रमोंके धर्मोंकी संकरताका दोष आता है। इसलिये संन्यासियोंका मनन आदिमें ही अधिकार है ॥२१॥
'आतुर और कुटीचकके लिये भूर्लोक और भुवर्लोककी प्राप्ति होती है। बहूदकको स्वर्गलोक, हंसको तपोलोक तथा परमहंसको सत्यलोक प्राप्त होता है। तुरीयातीत एव अवधूतको अपने आत्मामे ही कैवल्य प्राप्त होता है। वह भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी भाँति निरन्तर स्वरूपका अनुसंधान करते रहनेके कारण आत्मरूप ही हो जाता है। मनुष्य जिस-जिस भावका चिन्तन करते हुए अन्तमें शरीरका त्याग करता है, उसी-उसीको वह प्राप्त होता है—यह बात अन्यथा नहीं है। यह श्रुतिका उपदेश है ॥ २२-२३ ॥
'अतः यों जानकर सन्यासी आत्माके स्वरूपका चिन्तन छोड़कर और किसी आचारमे तत्पर न हो। भिन्न-भिन्न आचारोंका अनुष्ठान करनेसे तदनुकूल लोकोंकी प्राप्ति होती है; परंतु ज्ञान-वैराग्यसम्पन्न सन्यासीकी अपने आपमे ही मुक्ति होती है। किसी भी अन्य आचारमें आसक्त न होना ही उसका अपना आचार है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंमे वह एकरूप होता है। जाग्रत्कालमें वही विश्व, स्वप्नकालमे तैजस और सुषुप्तिकालमें प्राज्ञ कहलाता है। अवस्था भेदसे उन-उन अवस्थाओंके स्वामीमें भेद होता है। कार्य-भेदसे ही कारण-भेद माना जाता है। जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें चौदह करणोंकी¹ जो बाह्य वृत्तियाँ और अन्तर्वृत्तियाँ हैं, उनका उपादान कारण एक है। आन्तरिक वृत्तियाँ चार मानी गयी हैं—मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त। उन-उन वृत्तियोंके व्यापार-भेदसे पृथक् पृथक् आचार-भेद होता है ॥ २४ ॥
'जाग्रत्-अवस्था और उसके स्वामी विश्वकी स्थिति नेत्रके भीतर है। स्वप्न और उसके अधिष्ठाता तैजसका कण्ठमें समावेश है। सुषुप्त और उसके स्वामी प्राज्ञकी स्थिति हृदयमें है तथा तुरीय परमेश्वरकी स्थिति मस्तक (ब्रह्मरन्ध्र) में मानी
¹ श्रोत्र, नेत्र, घ्राण, त्वचा, रसना—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, वाक्, पाणि, चरण, गुदा और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार—ये चार अन्त करण—सब मिलकर चौदह करण कहे गये हैं।
उपदेश ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४९
गयी है। जाग्रत् आदि तीनों अवस्थाओंको प्रकाशित करते हुए तुरीयरूपमें जिसकी स्थिति बतायी गयी है, वह तुरीयरूप अविनाशी परमात्मा मैं ही हूँ—यों जानकर जो जाग्रत्- अवस्था में भी सुषुप्तकी भाँति रहता है; जो-जो सुनी और जो-जो देखी हुई वस्तु है, वह सब मानो अविज्ञात (अपरिचित)- सी है—इस प्रकार उनकी ओर ध्यान न देते हुए जो निवास करता है, उसकी स्वप्नावस्थामें भी वैसी ही अवस्था बनी रहती है। अर्थात् वह स्वप्नमें उपलब्ध पदार्थों को भी ग्रहण नहीं करता। ऐसा पुरुष जीवन्मुक्त है—इस प्रकार ज्ञानीजन कहते हैं। समस्त श्रुतियोंके अर्थका प्रतिपादन भी यही है कि उसी- की मुक्ति होती है। भिक्षु इहलोक और परलोकके विषयोंकी भी अपेक्षा नहीं रखता। यदि उसमे अपेक्षा हो तो उसीके अनुरूप वह बन जायगा—अपने स्वरूपसे नीचे गिर जायगा। स्वरूपानुसन्धानको छोड़कर अन्य शास्त्रोंका अभ्यास उसके लिये उसी प्रकार व्यर्थ है, जैसे ऊँटकी पीठपर लदा हुआ केसरका भार। उसकी योगशास्त्रमें प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये। उसे सांख्यशास्त्रका अभ्यास तथा मन्त्र-तन्त्रका व्यापार भी नहीं करना चाहिये। यदि सन्यासीकी प्रवृत्ति अन्यान्य शास्त्रों- में होती है, तो वह सब उसके लिये मुर्देको पहनाये हुए आभूषणके समान है। चमारकी भाँति सबसे अत्यन्त दूर रहकर कर्म, आचार और विद्यासे भी दूर रहे। प्रणवका भी उच्च स्वरसे कीर्तन न करे, क्योंकि मनुष्य जो-जो कर्म करता है, उसका फल भी उसे भोगना पड़ता है। अतः सबको रेड़ी- के तेलके फेनकी भाँति निःसार समझकर त्याग दे और परमात्मचिन्तनमें संलग्न मनोमय दण्ड तथा हाथरूपी पात्र धारण करनेवाले दिगम्बर सन्यासीका दर्शन करके—उसके आदर्शको सामने रखकर भिक्षु सब ओर विचरण करे। वह बालक, उन्मत्त तथा पिशाचकी भाँति जीवन अथवा मृत्युकी कामना न करे। आज्ञाकारी भृत्यकी भाँति भिक्षु केवल काल की ही प्रतीक्षा करता रहे ॥ २५-२६॥
'जो तितिक्षा (सहनशीलता), ज्ञान, वैराग्य और शम दम आदि सद्गुणोंमें शून्य रहकर केवल भिक्षासे जीवन- निर्वाह करता है, वह सन्यासी सन्यास वृत्तिका हनन करनेवाला है। केवल दण्ड धारण करने, मूँड़ मुँड़ाने, वेष बनाने और दिखावेके लिये किसी आचारका पालन करनेसे मोक्ष नहीं मिलता। जिसने ज्ञानरूप दण्ड धारण किया है, वही एकदण्डी कहलाता है। जिसने काष्ठका दण्ड तो धारण कर लिया है किंतु मनसे सम्पूर्ण कामनाओंको स्थान दे रक्खा है, तथा जो ज्ञानसे सर्वथा शून्य है, वह सन्यासी महारौरव नामक घोर नरकोंमें पड़ता है। महर्षियोंने प्रतिष्ठाको शूकरीकी विष्ठाके समान बताया है। अतः सन्यासी इस प्रतिष्ठाको त्यागकर, कीटकी भाँति सर्वत्र विचरण करे। दिगम्बर सन्यासी बिना माँगे जो मिल जाय, वही भोजन करे और वैसे ही वस्त्रसे अपने शरीरको ढँके। वह दूसरोंकी इच्छासे ही वस्त्र पहने और दूसरोंकी इच्छासे ही स्नान करे। जो स्वप्नमें भी जाग्रत्- अवस्थाकी भाँति ही विशेषरूपसे सावधान हो वैसी ही चेष्टा करता है, वह श्रेष्ठ सन्यासी ब्रह्मवेत्ताओंमें वरिष्ठ (प्रधान) माना गया है। भिक्षा आदि न मिलनेपर विषाद न करे और मिल जानेपर हर्षसे फूल न उठे। भिक्षा उतनी ही ग्रहण करे, जितनेसे प्राण-रक्षा हो सके। शब्द आदि विषयोंकी आसक्तिसे सर्वथा दूर रहे। सम्मानकी प्राप्तिको वह सब प्रकारसे घृणाकी दृष्टिसे ही देखे। सम्मानका लाभ उठानेवाला सन्यासी मुक्त होनेपर भी बँध जाता है॥२७-३४॥
'जब चूल्हेकी आग बुझ जाय, घरके सब लोग भोजन कर लें, ऐसे समयमें सन्यासी उत्तम वर्णवाले गृहस्थोंके घर भिक्षा लेने जाय। भिक्षाका उद्देश्य प्राण-यात्राका निर्वाहमात्र होना चाहिये। हाथको ही पात्र बनाकर विचरनेवाला करपात्री यति बार-बार भिक्षा न माँगे। एक बारमें जो मिल जाय, उसे खड़े-खड़े पा ले या चलते चलते भोजन करे। जबतक हाथका भोजन समाप्त न हो जाय, बीचमे आचमन (जलपान) न करे। सन्यासी समुद्रकी भाँति मर्यादाके भीतर ही रहते हैं। उनका आशय महान् होता है। वे महान् होकर भी सूर्यकी भाँति नियति (नियत मार्ग) का त्याग नहीं करते। जिस समय सन्यासी मुनि गौकी भाँति मुखसे आहार ग्रहण करने लगता है अर्थात् यदि कोई उसके मुखमे कुछ डाल दे, तभी वह भोजन करता है, उस समय सम्पूर्ण प्राणियोंके प्रति उसका समभाव हो जाता है और वह अमृतत्व (मोक्ष) प्राप्तिका अधिकारी बन जाता है। जो घर निन्दनीय न हो, वहीँ भिक्षा लेनेके लिये जाय। निन्दनीय घरोंको छोड़ दे। जिस घरका दरवाजा खुला हो, उसीमे प्रवेश करे। जिसका द्वार बंद हो, उस घरमे न जाय। वह धूलसे आच्छादित निर्जन घरोंमें आश्रय ले अथवा वृक्षकी जड़को ही अपना निवासस्थान बनाये। समस्त प्रिय और अप्रियकी भावनाओंको त्याग दे ॥ ३५—४० ॥
'सन्यासी मुनि जहाँ सूर्यास्त हो जाय वहीं सो रहे। न तो अग्नि रक्खे और न कोई घर ही बनाये। दैवेच्छासे जो कुछ प्राप्त हो जाय उसीपर जीवन निर्वाह करे। मन
७५० * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ५
और इन्द्रियोंको सदा अपने वशमे रक्खे । जो सन्यासी घरसे निकलकर वनका आश्रय ले इन्द्रिय-संयमपूर्वक आनन्दका अनुष्ठान करता है और कालकी प्रतीक्षा करता हुआ विचरता रहता है, वह निश्चय ही ब्रह्मभावको प्राप्त करनेका अधिकारी होता है। जो मुनिसम्पूर्ण भूतोको अभय-दान करके विचरता है, उसे भी किसी प्राणीसे कहीं भय उत्पन्न नहीं होता। जो मन और अहङ्कारका त्याग करके द्वन्द्वजनित विकारोसे रहित हो जाता है, जिसके मनके संदेह नष्ट हो जाते हैं, जो न तो किसीपर क्रोध करता न किसीसे द्वेष रखता और न वाणीसे कभी असत्य ही बोलता है; जो पुण्य-स्थानोमे विचरता, किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता तथा समय प्राप्त होनेपर भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता है वह ब्रह्मभावको प्राप्त करनेमें समर्थ होता है। संन्यासी वानप्रस्थ और गृहस्थोंसे कभी संसर्ग न रक्खे । वह इस बातको चाहता रहे कि जिससे उसकी जीवन- चर्या दूसरोपर प्रकट न हो। संन्यासीने हर्षवा आवेश नहीं होना चाहिये। जैसे कीट सदा चलते रहते हैं उसी प्रकार सन्यासी भी सूर्यके दिखाये हुए मार्गसे पृथिवीपर विचरतारहे अर्थात् रातको न चले ॥ ४१-४६ ॥ 'दम्भात्से युक्त, हिंसासे युक्त तथा लोक संग्रहसे युक्त जो-जो कर्म हैं उनको सन्यासी न तो स्वय करे और न दूसरोसे ही कराये। असत् शास्त्रोने कभी आसक्त न हो। कोई जीविकाका साधनभूत कर्म करके जीवन-निर्वाह न करे। अनावश्यक बात करना और तर्क करना छोड़ दे। वादी और प्रतिवादीमेंसे किसीका पक्ष ग्रहण न करे। शिष्योंका संग्रह न करे। बहुत-से ग्रन्थोंका अभ्यास न करे तथा अपने पक्षकी सिद्धिके लिये लौकिकवाक्यकी व्याख्याका उपयोग न करे। नये-नये आयोजन कभी न करे-सर्वथा निःसङ्कल्प होकर रहे। वह अपने आश्रमके चिह्नविशेष तथा अपने गूढ़ अभिप्रायको दूसरोपर प्रकट न होने दे। मुनि होकर भी उन्मत्त और बालककी भाँति चेष्टा करे। विद्वान् होते हुए भी मूर्खकी भाँति रहे। मनुष्योके समक्ष उन्हींकी दृष्टिके अनुसार अपनेको प्रदर्शित करे। दृष्ट न तो कुछ करे न कुछ बोले और न भले अथवा बुरेका चिन्तन ही करे। अपने आत्मामे ही रमण करता रहे। सन्यासी मुनि इसी वृत्तिसे रहकर जडकी भाँति सर्वत्र विचरतारहे। इन्द्रियोंको सयममें रखते हुए आसक्तिका सर्वथा त्याग करके वह अकेला ही इस पृथिवीपर भ्रमण करे। आत्मामे ही क्रीडा और आत्मामें ही रमण करने- वाला मनस्वी पुरुष सर्वत्र समान दृष्टि रक्खे । विद्वान् होकर भी बालककी भाँति क्रीडा करे। कार्यकुशल होकर भी मूर्खकी भाँति आचरण करे उन्मत्तकी भाँति बात करे और वेदोका विद्वान् होकर भी गोकी भाँति आचरण करे अर्थात् यह हो और यह न हो-इस बातके लिये कोई आग्रह न रक्खे । दुष्ट पुरुषोंके आक्षेप करने, अपमान करने, वञ्चना एवं दोषारोपण करनेपर भी सम रहे। उनके मारने, बाँध रखने या वृत्तिमे बाधा डालकर कष्ट पहुँचानेपर भी वह विचलित न हो। मूर्ख लोग शरीरपर या आसनपर मल- मूत्रका त्यागकर दें अथवा और भी अनेक प्रकारके कष्ट देकर तंग करें, तो भी कल्याणकामी पुरुष चुपचाप सहन करे। संकटमें पड़नेपर भी वह अपने आत्माके द्वारा अपना ही उद्धार करे। लोगोंसे मिला हुआ सम्मान योग-सम्पत्तिकी बड़ी भारी हानि करता है। साधारण लोगोंद्वारा अपमानित योगी योगसिद्धिको अवश्य प्राप्त कर लेता है। योगी पुरुष सत्पुरुषोंके धर्मको कलङ्कित न करते हुए अवश्य ही ऐसा आचरण करे, जिससे साधारण लोग उसका अपमान ही करें और उसके सम्पर्कमें न आवें। सन्यासी योगयुक्त होकर मन, वाणी, शरीर और क्रियाद्वारा जरायुज और अण्डज आदि किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करे तथा सब प्रकारकी आसक्तियोंको त्याग दे। काम, क्रोध, घमंड, लोभ और मोह आदि जितने भी दोष हैं, उनका परित्याग करके सन्यासी निर्भय हो जाता है ॥ ४७-५९॥ 'भिक्षाका अन्न भोजन करना मौन रहना, तपस्या करना, विशेषतः ध्यानमे लगे रहना, उत्तम ज्ञान प्राप्त करना और वैराग्यवान् होना-यह भिक्षुका धर्म माना गया है। गेरुआ वस्त्र पहनकर सन्यासी सदा ध्यानयोगमे तत्पर रहे। गाँवके किनारे, वृक्षके नीचे अथवा किसी देवालयमे निवास करे। वह नित्य भिक्षाके अन्नसे ही जीवन निर्वाह करे। किसी एकके अन्नका भोजन तो वह कभी न करे। बुद्धिमान् पुरुष प्रतिदिन अपने आश्रमोचित आचारका पालन करे और तबतक करता रहे जबतक अन्तःकरण पूर्णतः शुद्ध न हो जाय। अन्त करण शुद्ध हो जानेपर वह संन्यास लेकर जहाँ कहीं भी स्वेच्छानुसार विचरण करे। सन्यासी बाहर और भीतर-सर्वत्र नारायणका दर्शन करते हुए वायुकी भाँति पाप-सम्पर्कसे रहित होकर मौनभावसे सब ओर विचरता रहे। वह सुख-दुःखमे समान भावसे रहे। मनमें क्षमा-भाव रक्खे । हाथपर जो कुछ आ जाय, उसीको भोजन करे। कहीं भी बैर न रखते हुए ब्राह्मण गौ, घोडे और मृग आदि सभी प्राणियोंमे समदृष्टि
उपदेश ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५१
रक्खे । मन-ही-मन सबके ईश्वर सर्वव्यापी परमात्माका चिन्तन शरीर और क्रियाद्वारा समस्त संसारको त्यागकर, प्रपञ्चकी ओरसे करते हुए, 'मैं ही परमानन्दस्वरूप ब्रह्म हूँ, ऐसी भावना मुँह मोड़कर भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी भाँति सदा रक्खे । जो इस प्रकार जानकर, मनोमय दण्ड धारण करके, अपने स्वरूपके चिन्तनमें ही संलग्न रहता है, वह मुक्त हो आशासे निवृत्त हो जाता है तथा दिगम्बर होकर सदा मन, वाणी, जाता है। यह उपनिषद् है' ॥ ६०--६६ ॥ ॥ पञ्चम उपदेश समाप्त ॥ ५ ॥ षष्ठ उपदेश तुरीयातीत पद और उसकी प्राप्तिके उपाय तथा यतिकी जीवनचर्या तदनन्तर नारदजीने ब्रह्माजीसे पूछा--'भगवन् ! पुष्ट करता रहे। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति--इन तीन अवस्थाओं- भ्रमर-कीट-न्यायसे अपने स्वरूपका अनुसन्धान करनेपर मोक्ष को पार करके तुरीयावस्थामें पहुँचकर संन्यासी तुरीयातीत प्राप्त होता है--यह आपने बताया, किंतु उस स्वरूपानु- परमात्मपदमें प्रवेश करे ॥ २ ॥ सन्धानका अभ्यास कैसे हो ?' तब ब्रह्माजीने नारदजीसे कहा-- 'दिन जाग्रत्-अवस्था है, रात्रि स्वप्न है, अर्द्धरात्रि सुषुप्ति- 'सत्यवादी होकर ज्ञान और वैराग्यद्वारा इस शरीरकी स्थानीय है। ये तीनों अवस्थाएँ तुरीयमें हैं और तुरीयकी आसक्तिको त्यागकर, शेष बचे हुए एक विशिष्ट शरीरमें स्थिति तुरीयातीतमें है । इस प्रकार एककी अवस्थामें स्थित होकर रहे ॥१॥ चार अवस्थाएँ हैं। मन, बुद्धि, चित्त, अहङ्कार--इन चार "ज्ञान ही वह शरीर है। वैराग्यको ही उसका प्राण समझो । अन्तःकरणोंमेसे प्रत्येकके अधीन जो नेत्र आदि चौदह करण शम और दम--ये दो नेत्र हैं। विशुद्ध मन मुख है, बुद्धि हैं, उनके व्यापार बतलाये जाते हैं। नेत्रोंका काम है रूपको कला है, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, पाँच ग्रहण करना, श्रोत्रोंका कार्य है शब्दकी उपलब्धि, जिह्वा- विषय, चार अन्तःकरण तथा अव्यक्त प्रकृति--ये पचीस तत्त्व का कार्य है रसास्वादन, गन्धका अनुभव घ्राणेन्द्रियका काम ही उस शरीरके अवयव हैं। समष्टिगत जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, है, बोलनेकी क्रिया वाक्-इन्द्रियका व्यापार है, हाथोंका काम है तुरीय और तुरीयातीत--ये पाँच अवस्थाएँ ही उस विशिष्ट किसी वस्तुको ग्रहण करना, पैरोंका कार्य है चलना, मल- शरीरके पाँच महाभूत हैं। कर्म, भक्ति, ज्ञान और वैराग्य--ये त्याग गुदाका और विषयजनित आनन्दका अनुभव उपस्थका शरीरकी शाखा अर्थात् भुजाएँ हैं। अथवा जाग्रत्, स्वप्न, कार्य है। त्वचाका कार्य स्पर्शका अनुभव करना है। इनके सुषुप्ति और तुरीय--ये चार अवस्थाएँ ही चार भुजाएँ हैं। अधीन विषय-ग्रहणकी बुद्धि है। बुद्धिसे जानता है। चित्तसे पहले बताये हुए चौदह करण पङ्कमें स्थित कमजोर कर्मोंके चेतना प्राप्त करता है। अहङ्कारसे अहंताका अनुभव करता है। इन समान हैं। ऐसी स्थितिमें भी जैसे कीचड़में पड़ी हुई नावको सब भावोंकी विशेषरूपसे सृष्टि करके इनके समुदायरूपी शरीरमें भी अच्छा नाविक ढकेलकर उसे ठीक मार्गपर ला ही देता है, आत्माभिमान करनेके कारण तुरीय-चेतन ही जीव 'हो जाता उसी प्रकार संसार-सिन्धुके पङ्कमें फँसी हुई इस जीवनरूपी है। जैसे घरमें अभिमान करके मनुष्य गृहस्थ बनता है, उसी नौकाको उत्तम बुद्धिके द्वारा वशमें रखकर पार लगाये-ठीक प्रकार शरीरमें अभिमान करके तुरीय-चेतन जीव होकर उसी तरह, जैसे हाथीवान् हाथीको अपने वशमें रखकर उसे विचरता है। शरीरके भीतर जो अष्टदल कमलसे युक्त हृदय ठीक रास्तेसे ले जाता है। ज्ञानमय विशिष्ट शरीरमें स्थित हुआ है, उसमें रहनेवाला जीव जब उक्त कमलके पूर्ववर्ती दलमें पुरुष 'मेरे अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह सब कल्पित होनेके विचरता है, तब उसमे पुण्यानुष्ठानकी प्रवृत्ति होती है। आग्नेय कारण नश्वर है'--यों समझकर सदा 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं कोणवाले दलमें जानेपर उसे निद्रा और आलस्य सताते हैं। ब्रह्म ही हूँ) इस प्रकार उच्चारण करे। अपने आत्माके अतिरिक्त दक्षिण दिशाके दलमें स्थित होनेपर उसमें क्रूरताका भाव दूसरी कोई भी वस्तु ज्ञातव्य नहीं है, ऐसा निश्चय करके आता है। नैर्ऋत्यकोणवाले दलका आश्रय लेनेपर उसमें पाप- जीवन्मुक्त होकर रहे। इस प्रकार रहनेवाला पुरुष कृतकृत्य बुद्धि जाग्रत् होती है। पश्चिम दलमें स्थिति होनेपर उसका हो जाता है। व्यवहार-कालमें भी यों न कहे कि 'मैं ब्रह्म क्रीडामें अनुराग होता है। वायव्यकोणके दलमे जानेपर उसकी नहीं हूँ।' अपितु निरन्तर 'मैं ब्रह्म हूँ' इस धारणाको ही बुद्धि गमनमें लगती है-वह इधर-उधर जानेका सङ्कल्प
७५२ ⸪ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ⸫ [ उपदेश ६ करता है। उत्तर दिशावाले दलमे प्रवेश करनेपर उसे शान्ति का अनुभव होता है। ईशान दलमें जानेपर ज्ञान होता है। उस कमलकी कर्णिकामे स्थित होनेपर उसके भीतर वैराग्य भाव जाग्रत् होता है तथा केशरोंमें स्थित होनेपर उसका मन आत्मचिन्तनमे लगता है। इस प्रकार चैतन्य ही जिसमे मुखकी भाँति प्रधान है, उस आत्मस्वरूपको जानकर विद्वान् पुरुष तुरीयातीत ब्रह्मरूपमे स्थित हो जाता है ॥ ३ ॥ 'जीवकी चार अवस्थाओंमें प्रथम अवस्था जाग्रत् है, दूसरी अवस्था स्वप्न है, तीसरी अवस्था सुषुप्ति है, चौथी अवस्था तुरीय है तथा इन चारोंसे रहित तुरीयातीत है। एक ही आत्मा विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तटस्थ भेदसे चार प्रकार- का प्रतीत होता है। अतः 'एक ही परमात्मदेव सबके साक्षी एव सत्त्वादि गुणोंसे रहित हैं और वह ब्रह्म मैं स्वयं हूँ' यो कहे। तुरीयातीत पुरुषको जाग्रत् आदि चारों अवस्थाओंके अनुभवसे परे मानना चाहिये। नही तो जैसे जाग्रत्-अवस्थामे जाग्रत् आदि चार अवस्थाएँ होती है, स्वप्नमें स्वप्नादि चार अवस्थाएँ होती हैं, सुषुप्तिमे सुषुप्ति आदि चार अवस्थाएँ होती है तथा तुरीयमें तुरीयादि चार अवस्थाएँ होती ह, उसी प्रकार तुरीयातीतमें भी इन अवस्थाओंके होनेकी सम्भावना हो सकती है। किंतु वास्तवमे तुरीयातीत-तत्त्व निर्गुण है, अतः उसमे इस प्रकारके अवस्था भेद सम्भव नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म एव कारणरूप जो विश्व, तैजस एव प्राज्ञ ईश्वर है, उनके साथ सब अवस्थाओंमें एक ही साक्षी स्थित होता है। अथवा तटस्थ ईश्वर ही द्रष्टा हैं—यदि यो कहेंतो ठीक नहीं, क्योकि तटस्थ पुरुष बीजोपाधिक (मायोपाधिक)ईश्वररूपसे देखे जाते हैं। अतः उनका भी कोई द्रष्टा होनेके कारण तटस्थको द्रष्टा नहीं माना जा सकता। इसलिये वह द्रष्टा नहीं है, ऐसा ही निश्चय करना चाहिये। फिर तो जीवको ही द्रष्टा मान लिया जा सकता है। नहीं, जीव द्रष्टा नहीं हो सकता, क्योकि वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व और अहङ्कार आदिसे सयुक्त है। जीवसे इतर जो तुरीयातीत परमात्मा हैं, वे उक्त दोनोंके सम्पर्कसे रहित हैं। यदि कहें जीव भी तो स्वरूपत शुद्ध चैतन्य ही है, अत वह भी कर्तृत्व आदिके ससर्गेसे रहित है, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि उसमें जीवत्वका अभिमान होनेसे इस शरीररूपी क्षेत्र- में भी उसका अभिमान है और शरीराभिमानके कारण ही उसमें जीवत्व है। परमात्मासे जीवत्वका व्यवधान वैसा ही है, जैसे महाकाशसे घटाकाशका। व्यवधानके कारण ही यह इस- स्वरूप जीव उच्छ्वास और निःश्वासके बहाने सदा 'सोऽहम्' इस मन्त्रका जप करते हुए अपन स्वरूपका अनुसधान करता है। यो समझकर शरीरमे आत्माभिमान त्याग दे। जो शरीराभिमानी नहीं होता, वही ब्रह्म है, यह कहा जाता है। सन्यासी आसक्तिका त्याग करके क्रोधपर विजय प्राप्त करे, स्वल्पाहारी एव जितेन्द्रिय हो तथा बुद्धिके द्वारा समस्त इन्द्रिय- द्वारोंको बद करके मनको परमात्मचिन्तनमें लगाये। योगी सदा साधनमे सलग्न रहकर कहीं निर्जन स्थानोमे, गुफाओं और वनोंमें बैठ जाय और भलीभाँति ध्यान आरम्भ करे। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला योगवेत्ता पुरुष अतिथि सत्कार, श्राद्ध और यज्ञोंमे तथा देवयात्रा-सम्बन्धी उत्सवोंमे जहाँ अधिक जनसमुदाय एकत्र होता हो, कदापि न जाय। योगी पुरुष योगमे प्रवृत्त होकर ऐसा बर्ताव करे, जिससे दूसरे लोग उसका अनादर और तिरस्कार करें। परतु यह सत्पुरुषोंके मार्गको कलङ्कित न करे। वाग्दण्ड, कर्मदण्ड और मनो- दण्ड—ये तीन दण्ड सदा जिसके नियन्त्रणमें रहते हों, वह महासन्यासी ही यथार्थ त्रिदण्डी है। जो यति धुआँ निकलना बद हो जाने और अग्नि बुझ जानेपर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे मधुकरी लाकर उसका आहार करता है, वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जो बिना अनुराग ही सन्यास-धर्ममें स्थित रहकर दण्ड धारणपूर्वक भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता है, किंतु जिसे ससारसे वैराग्य नहीं होता, वह सन्यासी नीच श्रेणीका माना गया है। जिस घरमे उसे विशेषरूपसे भिक्षा मिलती है, उसमें वासनावश पुनः भिक्षाके लिये जो नहीं जाता, वही वास्तविक यति माना गया है—इससे विपरीत आचरण करनेवाला नहीं। जो शरीर और इन्द्रिय आदिसे रहित, सर्वसाक्षी, पारमार्थिक विज्ञानस्वरूप, सुखमय, स्वयम्प्रकाश एव परमतत्त्वरूप परमात्माको अपने आत्मरूपसे जानता है, वही वर्ण और आश्रमसे अतीत यथार्थ सन्यासी है। देहमें वर्ण और आश्रम आदिकी कल्पना मायासे ही हुई है। 'मै बोधस्वरूप आत्मा हूँ, मुझसे उन वर्ण और आश्रम आदिका किसी कालमें सम्बन्ध नहीं है'—इस प्रकार जो उपनिषदोंके अनुशीलनद्वारा भली- भाँति समझ लेता है, वही अतिवर्णाश्रमी (यथार्थ सन्यासी) है। अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेनेके कारण जिसके वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचार छूट गये हैं, वह समस्त वर्णों और आश्रमोंसे ऊपर उठकर अपने आत्मामें ही स्थित है। जो पुरुष अपने आश्रमो और वर्णोंसे ऊपर उठकर आत्मामें ही स्थित है, उसीको सम्पूर्ण वेदार्थका ज्ञान रखनेवाले ज्ञानी पुरुषोंने अतिवर्णाश्रमी (यथार्थ सन्यासी) कहा है। इसलिये नारद! सभी वर्ण और आश्रम अन्यगत (शरीरगत) होनेपर भी
उपदेश ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५३
भ्रान्तिवश आत्मामें आरोपित कर लिये जाते हैं, परंतु आत्मवेत्ता पुरुष ऐसा नहीं करते । नारद ! ब्रह्मज्ञानी-पुरुषों- के लिये न कोई विधि है न निषेध । उनके लिये अमुक वस्तु त्याज्य है और अमुक वस्तु त्याज्य नहीं है, इस तरहकी कल्पना नहीं होती । और भी नियम उनपर लागू नहीं होते ॥ ४-१९ ॥
'जिज्ञासुको चाहिये कि वह सम्पूर्ण भूतोंसे तथा ब्रह्मा- तकके पदसे भी विरक्त हो, सबमें, पुत्र और धन आदिमे भी प्रेम न रखते हुए मोक्षके साधनोंमे श्रद्धा करे और उपनिषदों- का ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे हाथमे कुछ भेंट लेकर ब्रह्मवेत्ता गुरुकी सेवामें जाय । वहाँ दीर्घकालतक अपनी सेवाओंसे गुरुको संतुष्ट रखते हुए चित्तको भलीभाँति एकाग्र करके ध्यानपूर्वक उपनिषद्-वाक्योंके अर्थका श्रवण करे। ममता और अहङ्कार त्याग दे । सब प्रकारकी आसक्तियोंसे पृथक् रहे तथा शम दम आदि साधनोंसे सम्पन्न होकर अपनेमें ही आत्माका दर्शन करे । संसारमें सदा जन्म, मृत्यु और जरा आदि दोषोंका दर्शन करनेसे ही उसकी ओरसे विरक्ति होती है। और जो संसारसे विरक्त हो गया है, उसीके द्वारा यथार्थ- रूपसे सन्न्यासग्रहण सम्भव होता है । इसमे तनिक भी सन्देहके लिये स्थान नहीं है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला परमहंस उपनिषदोंके श्रवण आदिके द्वारा साक्षात् मोक्षके एकमात्र साधन ब्रह्मविज्ञानका अभ्यास करे। परमहंस नामक यति ब्रह्मविज्ञानकी प्राप्तिके लिये शम-दम आदि सम्पूर्ण साधनोंसे सम्पन्न होवे । वेदान्तवेत्ता विद्वान् योगी सदा उपनिषदोंके अभ्यासमे तत्पर रहे। शम-दम आदिसे सम्पन्न हो मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें कर ले । भयको त्याग दे । कहीं भी ममता न रक्खे । सदा निर्द्वन्द्व रहे । परिग्रहको सर्वथा त्याग दे । सिरके बालोको मुँड़ा ले। पुराने वस्त्रका कौपीन पहने अथवा दिगम्बर रहे। मनमें ममता और अहङ्कारको कभी स्थान न दे । जो मित्र और शत्रु आदिमें समान भाव रखता है तथा सम्पूर्ण जीवोंके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त है, वह एकमात्र ज्ञानी पुरुष ही संसार-समुद्रसे पार होता है, दूसरा —अज्ञानी नहीं ॥ २०-२९ ॥
'जिज्ञासु पुरुष गुरुके हितमें तत्पर रहकर वहाँ एक वर्ष- तक निवास करे । नियमोके पालनमें कभी प्रमाद न करे तथा ब्रह्मचर्य और अहिंसा आदि यमोके पालनमे भी सतत सावधान रहे । इस प्रकार साधन करते हुए (गुरुकृपासे ) वर्षके अन्तमे सर्वोत्तम ज्ञानयोगकी उपलब्धि करके धर्मानुकूल आचरण करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करे । ऊपर बताये अनुसार वर्षके अन्तमे सर्वोत्तम ज्ञानयोगकी प्राप्तिके अनन्तर ब्रह्मचर्य आदि तीनो आश्रमोंका त्याग करके अन्तिम आश्रम सन्न्यासको ग्रहण करे तथा गुरुकी आज्ञा लेकर इस पृथ्वीपर विचरण करे । वह आसक्तिको त्याग दे । क्रोधको काबूमें रक्खे । आहार स्वल्पमात्र करे और सदा जितेन्द्रिय बना रहे ॥ ३०-३३ ॥
'कर्म न करनेवाला गृहस्थ और कर्मपरायण भिक्षु—ये दोनों अपने आश्रमके विपरीत व्यवहार करनेके कारण कभी शोभा नही पाते । मनुष्य मदिराको तो पीनेपर मतवाला होता है, परंतु तरुणी स्त्रीको देखकर ही उन्मत्त हो उठता है । इसलिये दर्शनमात्रसे विषका सा प्रभाव डालनेवाली नारीको सन्यासी दूरसे ही त्याग दे । स्त्रियोंके साथ बातचीत करना, उनके पास सन्देश भेजना, नाचना, गाना, हास-परिहास करना तथा परायी निन्दा करना—सन्यासी इन सबका त्याग कर दे । नारद ! यतिके लिये (नैमित्तिक) स्नान, जप, पूजा, होम तथा अग्निहोत्र आदि कार्य कर्तव्य नहीं हैं। उसके लिये देव-पूजन, श्राद्ध-तर्पण, तीर्थयात्रा, व्रत, धर्म-अधर्म तथा लोकाचारसम्बन्धी कार्य भी नही हैं। योगयुक्त सन्यासी सम्पूर्ण कर्मोंको त्याग दे, समस्त लोकाचारोंसे भी दूर रहे । विद्वान् यति अपनी बुद्धिको परमार्थमें लगाकर कृमि, कीट, पतङ्ग तथा वनस्पति आदि जीवोंकी कभी हिंसा न करे । वह सदा अन्तर्मुख रहे, बाहर और भीतरसे भी स्वच्छता रक्खे । अपने अन्तःकरणको पूर्णतः शान्त बनाये रहे तथा बुद्धिको आत्मानन्दसे ही परिपूर्ण किये रहे। नारद ! तुम भीतरसे सम्पूर्ण आसक्तियोंका परित्याग करके ससारमें विचरते रहो । सन्यासीको अकेले किसी ऐसे प्रदेशमें नहीं घूमना चाहिये, जहाँ अराजकता फैली हुई हो । सन्यासी स्तुति और नमस्कारसे दूर रहे । श्राद्ध और तर्पणसे भी अलग रहे। किसी शून्य भवनमें अथवा पर्वतकी गुफाओंमे आश्रय ले । सन्यासीको सदा स्वच्छन्दरूपसे विचरना चाहिये । यह उपनिषद् है' ॥ ३४-४२ ॥
॥ षष्ठ उपदेश समाप्त ॥ ६ ॥
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उ० अ० ९५—
७५४ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ७ सप्तम उपदेश संन्यासीके सामान्य नियम और कुटीचक आदिके विशेष नियम तदनन्तर नारदजीके यह पूछनेपर कि 'यतिका नियम कैसा होना चाहिये ?' ब्रह्माजीने इस प्रश्नको सामने रखकर उत्तर देना आरम्भ किया। उन्होंने कहा, 'संन्यासी विरक्त होकर केवल वर्षाके चार महीनोंमें ही किसी निश्चित स्थानपर विश्राम करे। शेष आठ महीनोंमे एकाकी विचरण करे। कहां एक स्थानपर अधिक दिनोंतक निवास न करे; क्योकि वैसा करनेसे पतनका भय है। भ्रमरोंकी भाँति एक स्थानपर न ठहरे । अपने अन्यत्र जानेका यदि कोई विरोध करे तो सन्यासी उस विरोधको स्वीकार न करे। अपने हाथों तैरकर नदी पार न करे। पेड़पर भी न चढे । देव-उत्सवके निमित्त होनेवाले मेलेको न देखे । सदा एक घरका भोजन और आत्माके अतिरिक्त बाह्य देवताओंका पूजन न करे। आत्माके अतिरिक्त सबका त्याग करके मधुकरी वृत्तिसे भिक्षा लाकर ग्रहण करे। शरीरको कृश बनाये रखे। मेदकी वृद्धि न होने दे। घीको रुधिरके समान समझकर त्याग दे। एक घरके अन्नको मासकी भाँति समझकर छोड़ दे। इत्र या चन्दन आदिके लेपको अशुद्ध मल मूत्रादिके लेपकी भाँति मानकर उसका त्याग करे। क्षार (सोडा, साबुन आदि) को चाण्डालके समान अस्पृश्य समझे। कौपीन आदिके अतिरिक्त अन्य वस्त्रोंको जूठे बर्तनके समान समझकर उन्हें त्याग दे। अभ्यङ्ग (तेल आदि मलने) को स्त्रीके आलिङ्गनकी भाँति मानकर उससे दूर रहे। मित्रोंके आनन्ददायक सङ्गको मूत्रके समान त्याज्य समझे। किसी वस्तुकी प्राप्तिके लिये मनमें होनेवाली स्पृहाको अपने लिये गोमासके समान वर्जनीय माने। परिचित स्थानको चाण्डालका बगीचा समझे। स्त्रीको सर्पिणीके समान भयङ्कर समझे । सुवर्णको कालकूट, सभा स्थलको श्मशानभूमि, राजधानीको कुम्भीपाक नरक तथा एक स्थानके अन्नको मुर्देके लिये अर्पित पिण्डकी भाँति समझकर त्याग दे । देहको आत्मासे पृथक् देखना और प्रवृत्तिमे फँसना छोड़ दे। स्वदेशको त्याग दे और परिचित स्थानोंसे भी दूर रहे। अपनी आनन्दरूपताका निरन्तर चिन्तन करते हुए ऐसी प्रसन्नताका अनुभव करे मानो कोई भूली हुई बहुमूल्य वस्तु पुनः प्राप्त हो गयी हो। जहाँ जानेपर अपने शरीरमें ही आत्माभिमान जाग्रत् हो जाय, जिसमें अपने शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाले लोग रहते हों, उस प्रदेशको सदाके लिये भूल जाय। अपने शरीरको भी मुर्देकी भाँति त्याज्य मानकर उसमें आसक्त न हो। जैसे जेलखानेसे छूटा हुआ चोर लज्जावश अपनी जन्मभूमिको न जाकर कहीं दूर जा बसता है, उसी प्रकार सन्यासी जहाँ उसके पुत्र और माता पितादि गुरुजन रहते हों, उस स्थानको छोड़कर वहाँसे दूर ही रहे। बिना यत्न किये ही जो कुछ प्राप्त हो जाय, उसीका आहार करे । ब्रह्मस्वरूप प्रणवके चिन्तनमें तत्पर रहकर अन्य समस्त कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाय । काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सरता आदिको जलाकर त्रिगुणातीत हो जाय। क्षुधा, पिपासा आदि छः प्रकार की ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो । जन्म, वृद्धि आदि छः प्रकारके भावविकारोंसे भी अपना सम्बन्ध न माने। सत्य बोले, शरीर और मनसे पवित्र रहे तथा किसीसे भी द्रोह न करे। गाँवमे एक रात, नगरमें पाँच रात, किसी पुण्यक्षेत्रमे पाँच रात तथा तीर्थमें भी पाँच रातसे अधिक न रहे। कहीं भी अपने लिये घर न बनाये। बुद्धिको परमात्मचिन्तनमें स्थिर रक्खे । झूठ कभी न बोले । पर्वतकी गुफाओंमें निवास करे । भ्रमणकालमें सदा अकेला ही रहे। (चौमासेके समय) दो व्यक्तियोंके साथ भी रह सकता है। तीनके साथ रहनेपर तो गाँव-सा ही बन जाता है; और चारके साथ वहाँ नगर-सा बस जाता है। अतः सन्यासी अकेला ही रहे। अपने चौदह करणों (इन्द्रियो) को पृथक् पृथक् विषयोंके चिन्तनका अवकाश न दे । अखण्ड बोधसे वैराग्य-सम्पत्तिका अनुभव करके 'मुझसे भिन्न दूसरा कोई नही है, मेरे सिवा दूसरेका अस्तित्व ही नहीं है'-ऐसा मन-ही-मन विचार करके सब ओर अपने स्वरूपका ही साक्षात्कार करता हुआ जीवन्मुक्त-अवस्थाको प्राप्त करे। जबतक प्रारब्धके प्रतिभासका नाश न हो जाय, प्रणव-चिन्तनपूर्वक ओत, अनुज्ञातृ आदि चार स्वरूपोंमें अभिव्यक्त होनेवाले तुरीय तुरीयरूपमें स्थित अपने निर्विकल्प आत्माका सम्यक् बोध प्राप्त करे । स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जबतक यह शरीर गिर न जाय, तबतक स्वरूपका चिन्तन करते हुए ही कालयापन करता रहे ॥ १ ॥ 'कुटीचकके लिये तीनों काल स्नानका विधान है। बहूदक साय-प्रातः दो बार स्नान करे । इसके लिये दिनमें एक बार ही स्नानका नियम है । परमहंस मानसिक स्नान करे । तुरीयातीतके लिये भस्मस्नान बताया गया है। अर्थात् वह सारे शरीरमें केवल विभूति लगा ले । तथा अवधूतके लिये वायव्य-
उपदेश ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५५ [बायाँ स्तम्भ] ज्ञान कहा गया है। अर्थात् शरीरमें वायुके स्पर्शमात्रसे ही वह शुद्ध हो जाता है, उसे जलसे स्नान करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥ 'कुटीचकके लिये ललाटमें ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगानेका विधान है। बहूदकके लिये त्रिपुण्ड्रका तथा हंसके लिये ऊर्ध्वपुण्ड्र, त्रिपुण्ड्र दोनोंकी विधि है। परमहंस केवल विभूति धारण करे। तुरीयातीतके लिये तिलकपुण्ड्र कहा गया है। अवधूतके लिये किसी प्रकारका तिलक आवश्यक नहीं है अथवा तुरीयातीत एवं अवधूत दोनोंके लिये ही तिलक अनावश्यक है ॥ ३ ॥ 'कुटीचक दो महीनेपर बाल बनवाये; बहूदक चार महीने- पर । हंस और परमहंसके लिये बाल बनवानेका विधान नहीं है। यदि है भी तो छः महीनेपर । तुरीयातीत और अवधूतके लिये तो क्षौरका नियम है ही नहीं ॥ ४ ॥ 'कुटीचकके लिये एक स्थानका अन्न खानेकी विधि है। बहूदकको मधुकरीका अन्न खाना चाहिये । हंस और परमहंसके लिये हाथ ही पात्र है, उसपर जो कुछ आ जाय, उतना ही खाकर सन्तोष करे । तुरीयातीतके लिये गो-मुखवृत्ति है अर्थात् उसके मुखमें दूसरा कोई जो कुछ फल फूल देना चाहे, उसे वह गायकी भाँति मुँह फैलाकर ले ले। अवधूतके लिये अजगर-वृत्ति है अर्थात् दैवेच्छा या परेच्छासे कभी जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसीपर वह संतोष करे ॥ ५ ॥ 'कुटीचकके लिये दो वस्त्र रखनेका विधान है। बहूदकके लिये एक चादर और हंसके लिये वस्त्रका एक टुकड़ा रखनेका नियम है । परमहंस दिगम्बर रहे अथवा एक कौपीनमात्र धारण करे । तुरीयातीत और अवधूतको तो दिगम्बर ही रहना चाहिये । हंस और परमहंसके लिये ही [दायाँ स्तम्भ] मृगचर्म रखनेका विधान है, अन्य संन्यासियोंके लिये नहीं ॥ ६ ॥ 'कुटीचक और बहूदकके लिये प्रत्यक्ष देवपूजनका विधान है। हंस और परमहंस केवल मानसिक पूजन कर सकते हैं । तुरीयातीत और अवधूत केवल 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं ही हूँ) यही भावना करें ॥ ७ ॥ 'कुटीचक और बहूदकका मन्त्र-जपमें अधिकार है। हंस और परमहंस केवल ध्यानके अधिकारी हैं। तुरीयातीत और अवधूतका स्वरूपानुसंधानके सिवा और किसी कार्यमें अधिकार नहीं है। तुरीयातीत, अवधूत और परमहंस—इन तीनको ही 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके उपदेशका अधिकार प्राप्त है। कुटीचक, बहूदक और हंस—ये तीनों दूसरोंके लिये उपदेश देनेके अधिकारी नहीं हैं ॥ ८ ॥ 'कुटीचक और बहूदकके लिये मातृप्रणव अर्थात् बाह्य- प्रणवके चिन्तनका विधान है। हंस और परमहंसको अन्तः- प्रणवका तथा तुरीयातीत और अवधूतको ब्रह्मरूप प्रणवका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९ ॥ 'कुटीचक और बहूदकका प्रमुख साधन है—श्रवण। हंस और परमहंसका प्रमुख साधन है मनन तथा तुरीयातीत और अवधूतका प्रमुख साधन है निदिध्यासन। आत्मानुसंधानकी इन सभीके लिये विधि है ॥ १० ॥ 'इस प्रकार मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला सन्यासी सदा संसार-सागरसे पार उतारनेवाले तारकमन्त्र (प्रणव) का चिन्तन करते हुए जीवन्मुक्त होकर रहे । वह अधिकार- विशेषके अनुसार कैवल्य प्राप्तिके उपायका अन्वेषण करे । यह उपनिषद् है' ॥ ११ ॥ ॥ सप्तम उपदेश समाप्त ॥ ७ ॥ उपदेश प्रणवके स्वरूपका विवेचन [निचला बायाँ स्तम्भ] तत्पश्चात् नारदजीने भगवान् ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! जन्म-मृत्युसे तारनेवाला मन्त्र कौन-सा है ? मैं आपकी शरणमें हूँ, बतानेकी कृपा करें।' ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया—'वत्स ! ॐ यही तारक-मन्त्र है। [निचला दायाँ स्तम्भ] यह ब्रह्मस्वरूप है। व्यष्टि और समष्टि दोनों प्रकारसे इसीका चिन्तन करना चाहिये।' नारदजीने पूछा—'भगवन् ! व्यष्टि और समष्टि क्या है ?' ब्रह्माजीने कहा—'व्यष्टि और समष्टि ब्रह्म प्रणवके अङ्ग हैं। एक ही ब्रह्म-प्रणवके तीन भेद माने