भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 832 में से

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पृष्ठ 799

उपदेश ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४३ इन चार बातोंका जो मोहवश आचरण करता है, उसके चित्तमें अवश्य ही विकार उत्पन्न होता है और उस विकारसे उसका धर्म निश्चय ही नष्ट हो जाता है। तृष्णा, क्रोध, असत्य, माया, लोभ, मोह, प्रिय, अप्रिय, शिल्पकला, व्याख्यानमे योग देना, कामना, राग, सग्रह, अहङ्कार, ममता, चिकित्साका व्यवसाय, धर्मके लिये साहसका कार्य, प्रायश्चित्त, दूसरोंके घरपर रहना, मन्त्र प्रयोग, औषध वितरण, जहर देना, आशीर्वाद देना-ये सब सन्यासीके लिये निषिद्ध हैं। इनका सेवन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे नीचे गिर जाता है। मोक्षधर्ममे तत्पर रहनेवाला मुनि (सन्यासी) अपने किसी सुहृद्के लिये भी 'आओ, जाओ, ठहरो' स्वागत और सम्मान- की बात न करे। भिक्षु स्वप्नमें भी कभी किसीका दिया हुआ दान न ले। दूसरोंको भी न दिलाये और न स्वय किसीको देने-लेनेके लिये प्रेरित ही करे। स्त्री, भाई, पुत्र आदि तथा अन्य बन्धु बान्धवोंके शुभ या अशुभ समाचारको सुनकर या देखकर भी संन्यासी कभी कम्पित (विचलित) न हो; वह शोक और मोहको सर्वथा त्याग दे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (किसी वस्तुका सग्रह न करना), उद्दण्डताका अभाव, किसीके सामने दीन न बनना, स्वाभाविक प्रसन्नता, स्थिरता, सरलता, स्नेह न करना, गुरुकी सेवा करना, श्रद्धा, क्षमा, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, सबके प्रति उदासीनताका भाव, धीरता, स्वभावकी मधुरता, सहन- शीलता, करुणा, लज्जा, ज्ञान-विज्ञान परायणता, स्वल्प आहार तथा धारणा-यह मनको वशमें रखनेवाले सन्यासियोंका विख्यात सुधर्म है। द्वन्द्वोंसे रहित, सत्त्वगुणमें सर्वदा स्थित और सर्वत्र समान दृष्टि रखनेवाला तुरीयाश्रममे स्थित परमहंस सन्यासी साक्षात् नारायणका स्वरूप है। गाँवमें एक रात रहे और बड़े नगरमें पाँच रात, किंतु यह नियम वर्षाके अतिरिक्त समयके लिये ही है, वर्षा में चार महीनेतक वह किसी एक ही स्थानपर निवास करे। भिक्षु गाँवमे दो रात कभी न रहे। यदि रहता है तो उसके अन्तःकरणमे राग आदिका प्रसङ्ग आ सकता है। इससे वह नरकगामी होता है। गाँवके एक किनारे किसी निर्जन प्रदेशमें मन और इन्द्रियोंको सयममे रखते हुए निवास करे। कहीं भी अपने लिये मठ या आश्रम न बनाये। जैसे कीड़े हमेशा घूमते रहते हैं, उसी प्रकार आठ महीनोंतक सन्यासी इस पृथिवीपर विचरता रहे। केवल वर्षाके चार महीनोंमें वह एकत्र निवास करे। वह एक वस्त्र पहन- कर रहे अथवा बिना वस्त्रके दिगम्बर होकर रहे। उसकी दृष्टि इधर-उधर चञ्चल न होकर एक लक्ष्यपर ही स्थिर रहे। वह कभी विषयोंमें आसक्त न हो तथा सत्पुरुषोंके पथको कलङ्कित न करते हुए ध्यानपरायण रहकर पृथ्वीपर विचरे। संन्यासी अपने धर्मका पालन करते हुए सदा पवित्र स्थानपर रहे। योगपरायण भिक्षु पृथवीतलपर दृष्टि रखते हुए ही सदा विचरण करे। रातको, दोपहरमें तथा दोनों सन्ध्याओंके समय कभी भ्रमण न करे तथा ऐसे स्थानोंपर भी न घूमे जो शून्य, दुर्गम तथा प्राणियोंके लिये बाधाकारक हों। गाँवमें एक रात, पुरवेमे दो दिन, पत्तन (छोटे शहर, कस्बे) में तीन दिन और नगरमें पाँच रात्रियोंतक सन्यासीको रहना चाहिये। वर्षाकालमे किसी एक स्थानपर, जो पवित्र जलसे घिरा हुआ हो, निवास करना चाहिये। भिक्षु सम्पूर्ण भूतोंको अपने ही समान देखता हुआ अंधे, जड़, बहरे, पागल और गूँगेकी भाँति चेष्टा रखकर पृथ्वीपर विचरण करे। बहूदक और वनस्थ यतियोंके लिये तीनों कालोंका स्नान बताया गया है। परन्तु जो 'हंस' सन्यासी है, उसके लिये एक ही बार स्नान करनेका विधान है। हमसे भी ऊंची स्थितिमें जो परमहंस है, उसके लिये स्नान आदिका कोई बन्धन नहीं है ॥ १-२२ ॥ 'मौन, योगासन, योग, तितिक्षा, एकान्तशीलता, निस्पृहता तथा समता - ये सात एकदण्डी सन्यासियोंके पालन करनेयोग्य नियम हैं। जो परमहंसकी स्थितिमें पहुँचा हुआ है, उसके लिये स्नान आदि अनिवार्य न होनेके कारण वह केवल सम्पूर्ण चित्तवृत्तियोंका त्यागमात्र करे। चमड़ी, मास, रक्त, नाड़ी, मज्जा, मेद और हड्डियों- के समुदायरूप इस शरीरमे रमनेवाले पुरुषों तथा मल, मूत्र और पीवमे रमनेवाले कीड़ोंमें कितना अन्तर है ? सम्पूर्ण कफ आदि घृणित वस्तुओंकी महाराशिरूप यह शरीर कहाँ और अङ्गशोभा, सौन्दर्य एव कमनीयता आदि गुण कहाँ । मूर्ख मनुष्य मास, रक्त, पीव, विष्ठा, मूत्र, नाड़ी, मज्जा और हड्डियोंके समुदायरूप इस शरीरमें यदि प्रीति करता है, तो नरकमें भी उसकी अवश्य प्रीति होगी। स्त्रियोंके उच्चारण न करने योग्य गुप्त अङ्ग और सड़े हुए नाड़ीके घावमे कोई भेद न होनेपर भी मनुष्य अपने मनकी मान्यताके भेदसे प्रायः ठगा जाता है। स्त्रियोंका वह गुप्त अङ्ग क्या है?

  • दो भागोंमें विदीर्ण हुआ चर्मखण्डमात्र। वह भी अपानवायु- के निकलनेसे दुर्गन्धपूर्ण रहता है। जो लोग उसमें रमण करते हैं, उन्हें नमस्कार है। भला, इससे बढकर दुस्साहस और क्या हो सकता है। विद्वान् सन्यामीके लिये न कोई कर्तव्य शेष रहता है और न चिह्नविशेषको धारण करनेकी आवश्यकता। वह ममतारहित, निर्भय, शान्त, निर्द्वन्द्व, वर्ण