कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 798, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७४२ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ४
लोग, जो केवल केश धारण करते हैं, वास्तविक शिखाधारी नहीं हैं। जो ब्राह्मण आदि द्विज वैदिक कर्मके अधिकारी माने जाते हैं, उन्हींको यह बाह्य सूत्र—यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये, क्योंकि वह कर्मका अङ्ग माना गया है। जिसके ज्ञानमयी शिखा और ज्ञानमय ही यज्ञोपवीत है, उसीमे पूर्णरूपसे ब्राह्मणत्व प्रतिष्ठित है—ब्रह्मज्ञ पुरुष यही मानते हैं ॥ ८०-८९ ॥
'यह सब जानकर ब्राह्मण घरका त्याग करके सन्यासी हो जाय, एक वस्त्र धारण करे, सिरके बाल मुँडा ले और किसी भी वस्तुका संग्रह न करे। यदि शारीरिक क्लेश सहनेमें समर्थ न हो, तो कौपीन आदि धारण करे । यदि वह शारीरिक क्लेश सह सकता हो तो विधिपूर्वक सन्यास ले दिगम्बर रहे। अपने पुत्र, मित्र, स्त्री, माननीय गुरुजन तथा भाई-बन्धु आदिको छोड़कर चला जाय, स्वाध्याय एव वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानका त्याग करके समस्त ब्रह्माण्डके साथ सम्बन्ध त्याग दे। कौपीन, दण्ड और अङ्ग ढकनेका वस्त्र भी न रक्खे। सब प्रकारके द्वन्द्वोंका सहन करते हुए न सर्दीकी परवा करे न गर्मीकी; न सुखके लिये लालायित हो और न दुःख-से भयभीत ही हो । निद्राकी भी चिन्ता न करे । मान-अपमानमें समान भावसे रहे। छहों ऊर्मियोंसे प्रभावित न हो। निन्दा, अहङ्कार, मत्सरता (डाह), गर्व, दम्भ, ईर्ष्या, असूया (दोषदृष्टि), इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि छोड़कर, अपने शरीरको मुर्देके समान मानकर, आत्मासे अतिरिक्त दूसरी किसी भी वस्तुको बाहर भीतर न स्वीकार करते हुए, न तो किसीके सामने मस्तक झुकाये, न यज्ञ और श्राद्ध करे, न किसीकी निन्दा या स्तुति करे। अकेला ही स्वतन्त्रतापूर्वक विचरण करता रहे। दैवेच्छासे भोजन आदिके लिये जो कुछ भी मिल जाय, उसीपर सन्तुष्ट रहे । सुवर्ण आदिका संग्रह न करे। न किसीका आवाहन करे न विसर्जन । न मन्त्रका प्रयोग करे न मन्त्रका त्याग करे। न ध्यान करे न उपासना। न कोई लक्ष्य हो न लक्ष्यहीनता। न किसीसे अलग रहे, न सयुक्त । न किसी एक स्थानपर रहनेका आग्रह हो, न अन्यत्र जानेका । कोई उसका अपना घर या आश्रम न हो । उसकी बुद्धि सदा स्थिर रहे । जनशून्य भवन, वृक्षकी जड़, देवालय, घास फूसकी कुटिया, कुलालशाला, अग्निहोत्रशाला, अग्निदिगन्तर, नदी-तट, पुलिन (कछार), भूगृह (गुफा), पर्वतीय गुफा, झरनेके पास, चबूतरे या वेदीपर अथवा वनमें रहे । श्वेतकेतु, ऋभु, निदाघ, ऋषभ, दुर्वासा, संवर्तक, दत्तात्रेय तथा रैवतककी भाँति न कोई चिह्न धारण करे और न अपने आचारको ही किसीपर प्रकट होने दे । बालक, उन्मत्त अथवा पिशाचकी भाँति व्यवहार करे । उन्मत्त न होते हुए भी उन्मत्तकी भाँति आचरण करे । त्रिदण्ड, झोली, पात्र, कमण्डलु, कटिसूत्र और कौपीन—सब कुछ 'भूः स्वाहा' कहकर जलमें छोड़ दे ॥ ९० ॥
'कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु—सबको जलमें छोड़कर दिगम्बर होकर विचरे । आत्माका अनुसंधान करे । दिगम्बरकी भाँति रहकर द्वन्द्वोंको सहन करे—उनसे प्रभावित न हो । किसी भी वस्तुका संग्रह न करे । तत्त्व एव ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाले ज्ञानमार्गमे भलीभाँति स्थित रहे । मनको शुद्ध रक्खे । प्राण-रक्षाके लिये उचित समयपर हाथरूपी पात्रसे अथवा ओर किसी पात्रसे बिना माँगे ही मिले हुए आहारको ग्रहण करे । लाभ हानिको समान मानकर ममतासे रहित हो जाय । केवल ब्रह्मका चिन्तन करे । अध्यात्म चिन्तनमें ही निष्ठा रक्खे । शुभाशुभ कर्मोंका निर्मूलन करके अपने आत्माके अतिरिक्त प्रत्येक वस्तुको सर्वथा त्याग दे । एकमात्र पूर्णानन्दस्वरूप परमात्माके बोधसे सम्पन्न हो, 'अहं ब्रह्मास्मि' (वह ब्रह्म मैं ही हूँ) ऐसी निश्चित धारणा रखकर भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी तरह केवल ब्रह्मस्वरूप प्रणवका ही चिन्तन करे । तीनों शरीरोंके प्रति अहंता और ममताका भाव त्यागकर, सर्वत्याग करके ही वह शरीरका त्याग करे । इस प्रकार करनवाला सन्यासी कृतकृत्य होता है, यह उपनिषद् है ॥ ९१-९२ ॥
॥ तृतीय उपदेश समाप्त ॥ ३ ॥
चतुर्थ उपदेश
संन्यास-धर्मके पालनका महत्त्व तथा संन्यासग्रहणकी शास्त्रीय विधि
'जो लोक, वेद, विषय भोग तथा इन्द्रियोंकी अधीनता त्यागकर केवल आत्मामें ही स्थित रहता है, वह सन्यासी परमगतिको प्राप्त होता है। श्रेष्ठ सन्यासी नाम, गोत्र आदिके वरण देश, काल, शास्त्रज्ञान, कुल, अवस्था, आचार, मत और शीलका विज्ञापन न करे। किसी भी स्त्रीसे बातचीत न करे। पहलेकी देखी हुई किसी स्त्रीका स्मरणतक न करे, उनकी चर्चासे भी दूर रहे तथा स्त्रियोंका चित्र भी न देखे । सम्भाषण, स्मरण, चर्चा और चित्रावलोकन—स्त्रीसम्बन्धी