भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 797

उपदेश ३ ] , * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७४१

ममता और अहङ्कारसे शून्य हो जाता है, किसी भी वस्तुकी अपेक्षा नहीं रखता, निष्काम तथा एकान्तसेवी हो जाता है, वह निश्चय ही ससार बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ ७२-७६ ॥

'प्रमादरहित, कर्म, भक्ति एव ज्ञानसे सम्पन्न तथा केवल आत्माके ही अधीन रहनेवाला साधक, चाहे वह—ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ—कोई भी क्यों न हो, वैराग्य होनेपर सन्यास ग्रहण कर सकता है। अथवा यदि वैराग्य मन्द होनेके कारण उन-उन आश्रमोंमे प्रधानतः आस्था बनी हुई हो तो पहले ब्रह्मचर्याश्रमकी अवधि पूरी करके गृहस्थ बने, गृहस्थसे वानप्रस्थ हो जाय और वानप्रस्थ होनेके अनन्तर सन्यास ले । अथवा तीव्र वैराग्य होनेपर ब्रह्मचर्य-आश्रमसे ही सन्यासमे प्रवेश करे। या गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ-आश्रमसे सन्यास ग्रहण करे। अथवा ब्रह्मचारी हो या अब्रह्मचारी, स्नातक हो या न हो, अग्निहोत्र त्याग चुका हो या उससे अलग ही रहा हो— जिस दिन उसे वैराग्य हो, उसी दिन वह घर छोड़कर सन्यासी हो जाय। सन्यास-आश्रममे प्रवेशके समय कुछ विद्वान् प्राजापत्य नामक इष्टि करते हैं, उसे करे अथवा न करे। अथवा केवल 'आग्नेयी' इष्टिका ही अनुष्ठान करे (अग्नि देवतासे सम्बन्ध रखनेके कारण यह इष्टि 'आग्नेयी' कहलाती है)। अग्नि ही प्राण है, अतः इस आग्नेयी इष्टिद्वारा साधक प्राणका ही पोषण करता है। अथवा 'त्रैधातवीया' इष्टि का ही (जिसका इन्द्र देवतासे सम्बन्ध है) अनुष्ठान करे। सत्त्व, रज और तम—ये ही तीन धातु हैं, जिनका इस त्रैधातवीय इष्टिके द्वारा हवन किया जाता है। शास्त्रोक्त विधिसे इष्टि करके 'अयं ते योनि '* इस मन्त्रसे अग्निको सूँघे । मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—'हे अग्निदेव ! यह समष्टि प्राण तुम्हारे आविर्भावका कारण है। यह प्राण ही सवत्सरात्मक काल है, जिससे उत्पन्न होकर तुम उत्तम कान्तिसे देदीप्यमान हो रहे हो। अपनी उत्पत्तिके कारणभूत इस प्राणको जानकर तुम इसीमे स्थित हो जाओ और इस प्रकार हमारे प्राणसे तादात्म्य प्राप्त करके हमारे ज्ञानरूपी धनको बढाओ ।' निश्चय ही यह प्राण अग्निकी उत्पत्तिका कारण है। इसलिये 'प्राण गच्छ स्वा योनिं गच्छ स्वाहा' ( हे अग्निदेव ! तुम प्राणको प्राप्त कर, अपने कारणको प्राप्त कर उसके साथ एक हो जाओ) इसी प्रकार यह मन्त्र कहता है। (इसी प्रकार साधक भी कहे।)


  • अय ते योनिऋत्वियो यतो जातो अरोचथा । त जानन्नग्न आरोहाथा नो वर्धया रयिम् ॥

'आहवनीय अग्निमेसे अग्नि ले जाकर पूर्वोक्त प्रकारसे इष्टि करके अग्निको सूँघे । यदि अग्नि न मिल सके तो जलम ही हवन करे। 'निश्चय ही सम्पूर्ण देवता जलस्वरूप हैं। सम्पूर्ण देवताओके लिये मैं हवन करता हूँ, यह उन्हें प्राप्त हो' (आपो वै सर्वा देवताः सर्वाभ्यो देवताभ्यो जुहोमि स्वाहा) यों कहकर हवन करे। फिर उस जलमेसे थोड़ा सा जल उठाकर उसका आचमन कर ले । वह घृतयुक्त जल आरोग्यकारक एव मोक्षदायक होता है। फिर शिखा, यज्ञोपवीत, पिता, पुत्र, स्त्री, कर्म, अध्ययन एव अन्यान्य मन्त्रोंका जप त्यागकर ही आत्मवेत्ता पुरुष परिव्राजक (सन्यासी) होता है। त्रैधातवीय मोक्षसम्बन्धी मन्त्रोंसे ब्रह्मको जाने। जो सत्य, ज्ञान आदि लक्षणोसे युक्त है, वही ब्रह्म है, वही उपासनाके योग्य है। यह ठीक ऐसा ही है' ॥ ७७-७९ ॥

नारदजीने ब्रह्माजीसे पुनः प्रश्न किया—'यज्ञोपवीत न रहनेपर वह ब्राह्मण कैसे रह सकता है?' तब ब्रह्माजीने उनसे कहा—'विद्वान् पुरुष शिखासहित सम्पूर्ण सिरके बालो- का मुण्डन कराके शरीरपर यज्ञोपवीतके रूपमे धारण किये जानेवाले बाह्य सूत्रको तो त्याग दे और जो अविनाशी परब्रह्म परमात्मा हैं, उन्हींको सबमे व्यापक सूत्ररूप समझकर अपने भीतर धारण करे। जो सूचन (ज्ञान) का हेतु हो, उसे 'सूत्र' कहते हैं। अतः 'सूत्र' परमपदका नाम है। जिसने उस परमपदरूप सूत्रको जान लिया, वही वेदांका पारगामी ब्राह्मण है। जैसे सूत्रमे मनके पिरोये हुए होते हैं उसी प्रकार जिस परमात्मामें यह सम्पूर्ण जगत् पिरोया हुआ है, वही सूत्र है। योगका ज्ञाता तत्त्वदर्शी योगी उसी सूत्रको धारण करे। विद्वान् पुरुष उत्तम योगका आश्रय ल बाह्य सूत्रका तो त्याग करे और इस ब्रह्मस्वरूप सूत्रको धारण करे। जो यो करता है, वही चेतन है। उम ब्रह्मरूप सूत्रके धारण करनेसे सन्यासी न तो कभी उच्छिष्ट (जूठे मुँह) होता है और न कभी अपवित्र ही होता है। ज्ञानरूपी यज्ञोपवीत धारण करनेवाले जिन सन्यासियोंके भीतर वह ब्रह्मरूपी सूत्र विद्यमान है, वे ही इस ससारमे सूत्रके यथार्थ स्वरूपको जाननेवाले तथा यज्ञोपवीतधारी हैं। सन्यासी ज्ञा मयी शिखा धारण करते हैं, ज्ञानमे ही स्थित होते हैं और ज्ञानका ही यज्ञोपवीत पहनते हैं। उनके लिये ज्ञान ही सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। ज्ञान ही सबसे पवित्र बताया गया है। जैसे अग्निकी शिखा उसके स्वरूपसे भिन्न नहीं होती, उसी प्रकार जिस विद्वान् सन्यासीने ज्ञानमयी शिखा धारणा कर रक्खी है, वही शिखाधारी कहलाता है, दूसरे