कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 796, कुल 832 में से
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[शीर्षक]
७४० · ' नारदपरिव्राजकोपनिषद् [ उपदेश ३
[बायाँ स्तम्भ]
लिये किसी दूसरेको साथी न बनाकर सदा अकेला ही विचरण करे । एककी सिद्धि देखकर सन्यासी न तो अपने साधन- को छोड़ता है और न ऋद्धिसे वञ्चित होता है ॥ ३३–५३ ॥ ‘पानी पीनेके लिये कपाल (लकड़ी या नारियलका पात्र ), रहनेके लिये किसी वृक्षकी जड़, पहननेको फटे पुराने कपड़े, सदा अकेले रहनेका स्वभाव और सबमे समताका भाव— यही जीवन्मुक्त पुरुषका लक्षण है । सन्यासी सम्पूर्ण भूतोंका हितैषी हो, शान्तभावसे रहे, त्रिदण्ड और कमण्डलु धारण करे, एकमात्र आत्मामे ही रमण करनेवाला हो तथा सब कुछ छोड़कर अकेला घूमता रहे । केवल भिक्षाके लिये ही वह गाँवमे प्रवेश करे । सन्यासी यदि अकेला रहे, तभी वह शास्त्रीय आदेशके अनुसार यथार्थ भिक्षु होता है। एकसे दो होते ही वह 'मिथुन' (जोड़ा ) माना गया है । तीनका समुदाय होनेपर उसे 'गाँव' कहा गया है, तथा इससे अधिक व्यक्ति एक साथ हो जायें, तब तो पूरा नगर-सा ही हो जाता है । सन्यासीको कभी अपने पास अधिक व्यक्तियोको आनेका अवसर देकर नगर, गाँव अथवा मिथुनकी स्थिति नहीं उत्पन्न करनी चाहिये । इन तीनों ( नगर, ग्राम और मिथुन ) का आयोजन करनेवाला सन्यासी अपने धर्मसे गिर जाता है । अनेक व्यक्तियोंका एकत्र सयोग होनेपर उनमे या तो राजा—प्रभु, सेठ आदिकी बातें होगी, अथवा कहाँ कैसी भिक्षा मिलती है—यह चर्चा शुरू हो जायगी, अथवा परस्पर स्नेह, चुगली और मत्सरता आदिके भाव उत्पन्न होगे । इसमे तनिक भी सदेह नहीं है । सन्यासी निःस्पृह होकर सदा अकेला रहे । किसीके साथ वार्तालाप न करे । वह सदा 'नारायण' कहकर ही दूसरोंकी बात या नमस्कार आदिका उत्तर दे । वह एकाकी रहकर मन, वाणी, शरीर तथा क्रियाद्वारा केवल ब्रह्मका ही चिन्तन करे । किसी तरह भी मृत्यु या जीवनका अभिनन्दन न .करे । जबतक आयु पूरी न हो, तबतक केवल कालकी ही प्रतीक्षा करता रहे। न तो वह मृत्युकी प्रशसा करे और न जीवनका अभिनन्दन करे । जैसे भृत्य अपने स्वामीकी आज्ञाकी प्रतीक्षा करता रहता है, प्रकार वह एकमात्र की प्रतीक्षा करे। (जिह्वारहित), ॰ लूला, अ एव मुग्ध (जड) की भाँति नवाला भिक्षु प्रकारके गुणोंसे निश्चय ही मुक्त । जाता भोजन करते हुए भी 'यह स्वादिष्ट नहीं है।' इस भावसे अन्नके तथा हितकर, सत्य और नपी तुली बात
[दायाँ स्तम्भ]
करता है, उसे 'अजिह्व' (जिह्वारहित) कहते हैं। जो आजकी जन्मी हुई नवजात कन्या, सोलह वर्षोकी युवती नारी तथा सौ वर्षोंकी आयुवाली वृद्धा स्त्रीको देखकर कहीं भी राग द्वेष आदि विकारोंके वशीभूत नहीं होता, वह 'षण्डक' (नपुंसक) कहा गया है । भिक्षाके लिये तथा मल मूत्रका त्याग करनेके लिये ही जिसका घूमना होता है, और एक स्थानसे दूसरे स्थानपर जानेके लिये भी जो प्रतिदिन एक योजन (चार कोस) से आगे नहीं जाता (एक योजनका रास्ता तै करके शेष समय ध्यान आदिमे व्यतीत करता है), वह 'पङ्गु' (लूला) ही है। चलते या खड़ा होते समय जिसके नेत्र चार युग (लगभग दस हाथ ) भूमि छोड़कर उससे अधिक दूरतक नहीं देखते, वह सन्यासी 'अन्ध' कहलाता है । हितकी बात हो या अहितकी, मनको सुख देनेवाली बात हो या शोक प्रदान करनेवाली, उसे सुनकर भी जो मानो नही सुनता (उनपर ध्यान नहीं देता), वह 'बधिर' कहा गया है । विषय अपने समीप हों, शरीरमे शक्ति हो और सभी इन्द्रियाँ स्वस्थ हों, तब भी जो सोये हुए पुरुषकी भाँति उन विषयोंके प्रति आकृष्ट नहीं होता, उस भिक्षुको 'मुग्ध' (भोलाभाला) कहते हैं ॥ ५४–६८ ॥ 'नट आदिके खेल, जूआ, युवती स्त्री, सम्बन्धियो, भक्ष्य भोज्य पदार्थ तथा रजस्वला स्त्री—इन छः वस्तुओंकी ओर सन्यासी कभी दृष्टिपात न करे । राग, द्वेष, मद, माया, दूसरोके प्रति द्रोह तथा अपनाके प्रति मोह—इन छः बातो को संन्यासी कभी मनसे भी न सोचे । मञ्च (कुर्सी), श्वेत वस्त्र, स्त्रियोंकी चर्चा, इन्द्रियोंकी लोलुपता, दिनमे सोना और सवारी पर चलना—ये सन्यासियोंके लिये छः पातक हैं । आत्म चिन्तन करनेवाला सन्यासी दूरकी यात्राका यत्नपूर्वक त्याग करे ॥ ६९–७१ ॥ 'सन्यासी सदा मोक्षकी हेतुभूता उपनिषद् विद्याका अभ्यास करे । वह न तो सदा तीर्थोंका सेवन करे और न अधिक उपवास ही करे । वह अधिक विद्याएँ पढनेका स्वभाव न बनाये । सभाओंमें व्याख्यान देनेवाला न बने । सदा ऐसा बर्ताव करे जिसम पाप, शठता और कुटिलता न हो । जैसे कछुआ सब ओरसे अपने अङ्गोंको समेट लेता है, उसी प्रकार इन्द्रियोको विषयोंकी ओरसे समेटकर जो इन्द्रिय और मनके व्यापारको क्षीण कर देता है, कामना और परिग्रहसे मुँह मोड़ लेता है, सुख दुःख आदि द्वन्द्वोंसे हर्ष या शोकके वशीभूत नहीं होता, नमस्कार (भिन्न-भिन्न देवताओंकी स्तुति) और स्वधा (श्राद्ध तर्पण) को छोड़ देता है,