कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 804, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें[उपदेश ५] ७४८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् *
श्रमककी भाँति है अर्थात् उनके लिये क्रम-संन्यासका विधान है। परमहंस आदि (अर्थात् परमहंस, तुरीयातीत एव अवधूत—इन) तीन प्रकारके संन्यासियोंके लिये कटिसूत्र, कौपीन, वस्त्र, कमण्डलु और दण्ड धारण करनेकी आवश्यकता नहीं है। वे सभी वर्णोंके घरसे एक बार भिक्षाटन कर सकते हैं, तथा उन्हें दिगम्बर होना चाहिये। यही उनके लिये सामान्य विधि है। संन्यास ग्रहणके समय भी जबतक उनके भीतर अलबुद्धि न हो जाय अर्थात् अबतक मैंने जो कुछ अध्ययन किया है, वह पर्याप्त है, उससे अधिक अध्ययन करनेकी अपने लिये कोई आवश्यकता नहीं है—ऐसी बुद्धि जबतक उत्पन्न न हो जाय, तबतक उन्हें अध्ययन करना चाहिये। उसके पश्चात् कटिसूत्र, कौपीन, दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु—सबका जलमें विसर्जन कर देना चाहिये। यदि वह दिगम्बर हो तो कन्थाका लेशमात्र भी अपने पास न रक्खे । न अध्ययन करे, न व्याख्यान दे और न कुछ श्रवण ही करे। प्रणवके सिवा और कुछ न पढे। न तर्कशास्त्र पढे, न शब्दशास्त्र । बहुत-से शब्दोंकी शिक्षा न दे। वागिन्द्रियके द्वारा वाणीका व्यर्थ अपव्यय न करे (अधिक न बोले)। हाथ आदिके इशारे-से बात करना या अन्य किसी भाषाविशेषके द्वारा भी बात करना निषिद्ध है। शूद्र, स्त्री, पतित एवं रजस्वलासे बातचीत न करे। यतिके लिये देव-पूजाका विधान नहीं है। उसे उत्सव नहीं देखना चाहिये तथा तीर्थ यात्रा भी उसके लिये आवश्यक नहीं है ॥ १८-२० ॥
'अब पुनः संन्यासीके विशेष नियम बताये जाते हैं। कुटीचक संन्यासीके लिये ही एक स्थानपर भिक्षा ग्रहण करनेकी विधि है। बहूदकके लिये अनिश्चित घरोंसे मधुकरी ग्रहण करने-का विधान है। इसके लिये आठ घरोंसे आठ ग्रास अन्न लेकर भोजन करनेका विधान है। परमहंसके लिये पाँच घरोंसे अन्न लेनेका नियम है। हाथ ही उसका पात्र है। तुरीयातीत-के लिये गोमुख-वृत्तिसे फलाहारका नियम है। अर्थात् जैसे गायको जो कुछ भी खिलाया जाय, वह मुँह खोलकर ले लेती है, उसी प्रकार दैवेच्छासे जो कुछ भी फल फूल मिल जाय, उसीको वह ग्रहण करे। अवधूतके लिये सभी वर्गोंके लोगोंके यहाँसे अजगरवृत्तिके अनुसार अन्न-ग्रहण करनेका नियम है। यति किसी गृहस्थके घर एक रात भी न ठहरे। किसीको भी नमस्कार न करे। तुरीयातीत और अवधूत—इन दोनोंमें अवस्थाके अनुसार कोई जेठा या छोटा नहीं होता। जिसे अपने स्वरूपका ज्ञान नहीं है, वह अवस्था में बड़ा होनेपर भी छोटा ही है। संन्यासी अपने हाथसे तैरकर नदी पार न करे। पेड़पर न चढे। सवारीपर न चले। खरीद-बिक्री न करे। किसी वस्तुकी अदला-बदली भी न करे। दम्भी और असत्य-वादी न बने। यतिके लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है। यदि है तो उसमे अन्य आश्रमोंके धर्मोंकी संकरताका दोष आता है। इसलिये संन्यासियोंका मनन आदिमें ही अधिकार है ॥२१॥
'आतुर और कुटीचकके लिये भूर्लोक और भुवर्लोककी प्राप्ति होती है। बहूदकको स्वर्गलोक, हंसको तपोलोक तथा परमहंसको सत्यलोक प्राप्त होता है। तुरीयातीत एव अवधूतको अपने आत्मामे ही कैवल्य प्राप्त होता है। वह भ्रमरका चिन्तन करनेवाले कीटकी भाँति निरन्तर स्वरूपका अनुसंधान करते रहनेके कारण आत्मरूप ही हो जाता है। मनुष्य जिस-जिस भावका चिन्तन करते हुए अन्तमें शरीरका त्याग करता है, उसी-उसीको वह प्राप्त होता है—यह बात अन्यथा नहीं है। यह श्रुतिका उपदेश है ॥ २२-२३ ॥
'अतः यों जानकर सन्यासी आत्माके स्वरूपका चिन्तन छोड़कर और किसी आचारमे तत्पर न हो। भिन्न-भिन्न आचारोंका अनुष्ठान करनेसे तदनुकूल लोकोंकी प्राप्ति होती है; परंतु ज्ञान-वैराग्यसम्पन्न सन्यासीकी अपने आपमे ही मुक्ति होती है। किसी भी अन्य आचारमें आसक्त न होना ही उसका अपना आचार है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंमे वह एकरूप होता है। जाग्रत्कालमें वही विश्व, स्वप्नकालमे तैजस और सुषुप्तिकालमें प्राज्ञ कहलाता है। अवस्था भेदसे उन-उन अवस्थाओंके स्वामीमें भेद होता है। कार्य-भेदसे ही कारण-भेद माना जाता है। जाग्रत् आदि अवस्थाओंमें चौदह करणोंकी¹ जो बाह्य वृत्तियाँ और अन्तर्वृत्तियाँ हैं, उनका उपादान कारण एक है। आन्तरिक वृत्तियाँ चार मानी गयी हैं—मन, बुद्धि, अहङ्कार और चित्त। उन-उन वृत्तियोंके व्यापार-भेदसे पृथक् पृथक् आचार-भेद होता है ॥ २४ ॥
'जाग्रत्-अवस्था और उसके स्वामी विश्वकी स्थिति नेत्रके भीतर है। स्वप्न और उसके अधिष्ठाता तैजसका कण्ठमें समावेश है। सुषुप्त और उसके स्वामी प्राज्ञकी स्थिति हृदयमें है तथा तुरीय परमेश्वरकी स्थिति मस्तक (ब्रह्मरन्ध्र) में मानी
¹ श्रोत्र, नेत्र, घ्राण, त्वचा, रसना—ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, वाक्, पाणि, चरण, गुदा और उपस्थ—ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा मन, बुद्धि, चित्त और अहङ्कार—ये चार अन्त करण—सब मिलकर चौदह करण कहे गये हैं।