भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 803, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 803

उपदेश ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५७ कामना—इन त्रिविध स्वरूपोंवाली दैहिक वासनाको, शास्त्रवासना- को तथा लोक-वासनाको त्याग देता है, तथा जैसे साधारण लोग वमन किये हुए अन्नको त्याज्य समझते हैं, उसी प्रकार इन समस्त भोगोंको त्याज्य मानकर जो साधन-चतुष्टयसे सम्पन्न हो सन्यास ग्रहण करता है, वही ज्ञान-सन्यासी कहलाता है। जो क्रमशः सब शास्त्रोंका अभ्यास करके, सब कुछ अनुभवमें लाकर ज्ञान और वैराग्यके द्वारा केवल अपने स्वरूपका ही चिन्तन करते हुए दिगम्बर हो जाता है, वही यह ज्ञान-वैराग्य-सन्यासी है। जो ब्रह्मचर्यको समाप्त करके गृहस्थ होकर, तथा गृहस्थसे वानप्रस्थ- आश्रममे प्रवेश करके पूर्ण वैराग्य न होनेपर भी आश्रम-क्रमके अनुसार अन्तमें सन्यास ग्रहण करता है, वह कर्म-सन्यासी है। अथवा ब्रह्मचर्यसे ही सन्यास लेकर सन्याससे जो दिगम्बर हो जाता है, वह वैराग्य-सन्यासी है। विद्वत्सन्‍यासी ज्ञान-सन्यासी है। तथा विविदिषा-संन्यासी कर्म-सन्यासी है ॥ १-७ ॥ “कर्म-सन्यास भी दो प्रकारका होता है—एक निमित्त सन्यास और दूसरा अनिमित्त-सन्यास। आतुर-सन्यास निमित्त-सन्यास कहलाता है और क्रम-सन्यासको अनिमित्त-सन्यास कहते हैं। रोग आदिसे आतुर होनेके कारण जिसमें सब कर्मोंका लोप हो जाता है, अर्थात् जिसमें नित्य-नैमित्तिक आदि कोई कर्म नहीं बन सकते, तथा जो प्राणत्यागके समय स्वीकार किया जाता है, वह सन्यास निमित्त-सन्यास माना गया है। (इसीको आतुर सन्यास भी कहते हैं।) शरीरके सबल होनेपर जो विचारके द्वारा यह निश्चय करके कि उत्पन्न होनेवाली सब वस्तुएँ नश्वर हैं, देह आदि सबको त्याज्य मानता और— हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥ 'वह परमात्मा आकाशमें विचरनेवाला हंस (सूर्य) है, अन्तरिक्षचारी वसु है। वही होता और वेदीपर स्थापित अग्नि है। गृहस्थोंके घरोंमें अतिथिरूपसे आश्रय लेनेवाला भी वही है। मनुष्योंमें उसीकी सत्ता है। श्रेष्ठ वस्तुओंमें भी उसीका अस्तित्व है। सत्यमें उसीका निवास है। आकाशमें भी वही सत्य है। वही जलसे प्रकट होता है। वही गौ (पृथ्वी एव वाणी) से प्रकट होनेवाला है। सत्यसे भी उसीका प्रादुर्भाव होता है। वही पर्वतोंसे प्रकट होता है तथा इन सबसे भिन्न एव विलक्षणरूपमें वही एकमात्र महान् सत्य है।' —इस मन्त्रके अनुसार केवल परब्रह्म परमेश्वरको ही सत्य समझता और ब्रह्मसे अतिरिक्त सब कुछ नश्वर है, इस निश्चय- पर पहुँचकर क्रमशः सन्यास-आश्रम ग्रहण करता है, उसका वह सन्यास अनिमित्त-सन्यास कहा गया है। सन्यासी छः प्रकारके होते हैं—कुटीचक, बहूदक, हंस, परमहंस, तुरीयातीत तथा अवधूत। कुटीचक सन्यासी शिखा और यज्ञोपवीतसे युक्त होता है। वह दण्ड, कमण्डलु, कौपीन और कन्था धारण करता है। पिता, माता और गुरु—तीनोंकी सेवा- में सलग्न रहता है। पिठर (पात्र), खनित्र (खनती) और झोली आदि साथ रखता है और मन्त्र-साधनमें लगा रहता है, एक ही जगह भोजन करता रहता है, श्वेत ऊर्ध्वपुण्ड्र धारण करता है और त्रिदण्डी होता है। बहूदक भी कुटीचककी भाँति शिखा, यज्ञोपवीत, दण्ड, कमण्डलु, कौपीन और कन्था धारण करते हैं। ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगाते हैं। सबके प्रति समभाव रखते हैं और मधुकरी- वृत्तिसे कई घरोंसे अन्न लाकर केवल आठ ग्रास भोजन करते हैं। हंसनामक सन्यासी जटा धारण करनेवाले, त्रिपुण्ड्रोर्ध्व- पुण्ड्रधारी, अनिश्चित घरोंसे मधुकरी लाकर भोजन करने- वाले तथा कौपीनखण्ड एव तुण्ड (तूँबी) धारण करते हैं। परमहंस शिखा और यज्ञोपवीतसे रहित होते हैं। वे पाँच गृहोंसे अन्न लाकर केवल एक रात भोजन करते हैं अर्थात् दूसरे दिन दूसरे पाँच गृहोंका अन्न ग्रहण करते हैं। उनका हाथ ही पात्र होता है। अतएव वे 'करपात्री' कहलाते हैं। एक कौपीन धारण करते, एक ओढनेका वस्त्र रखते और बाँसका दण्ड धारण करते हैं। वे या तो एक चादर ओढकर रहते हैं या सब अङ्गोंमें भस्म रमाये रहते हैं। परमहंस सर्वत्यागी होते हैं। तुरीयातीत सन्यासी गोमुख होते हैं अर्थात् जैसे गायें दैवेच्छावश जो तृण आदि प्राप्त हो जाय, उसीसे निर्वाह करती हैं, उसी प्रकार वे दैवेच्छावश जो कुछ प्राप्त हो जाय उसीको अपना ग्रास बनाते हैं। विशेषतः वे फलाहारी होते हैं। यदि अन्नाहारी हों तो केवल तीन घरोंका अन्न ग्रहण करते हैं। देहके सिवा और कुछ उनके पास शेष नहीं रहता। वे दिगम्बर रहते और मुर्दोंकी तरह शारीरिक चेष्टासे रहित होते हैं। अवधूत किसी नियमके बन्धनमें नहीं रहता। वह कलङ्कित और पतित मनुष्योंको छोड़कर शेष सभी वर्णोंके मनुष्योंसे अजगर-वृत्तिके अनुसार आहार ग्रहण करता है तथा सर्वदा अपने स्वरूपके चिन्तनमें लगा रहता है ॥ ८—१७ ॥ 'आतुर पुरुष सन्यास लेनेके बाद यदि जी जाय तो उसे सम्पूर्ण विधियोंका पालन करते हुए क्रम-सन्यास ग्रहण करना चाहिये। कुटीचक, बहूदक और हंस—इन तीन प्रकारके सन्यासियोंकी सन्यास विधि ब्रह्मचर्यादि आश्रमसे लेकर चतुर्था-