भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 802

७४६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ५ 'यदि ज्ञानप्राप्तिकी इच्छासे संन्यासी हुआ हो तो वह सौ पग जानेके पश्चात् आचार्य आदि ब्राह्मणोंद्वारा यों कहकर बुलानेपर कि—'हे महाभाग ! ठहरो, ठहरो, यह दण्ड, वस्त्र और कमण्डलु ग्रहण करो। तुम्हे प्रणव और महावाक्यका उपदेश ग्रहण करनेके लिये गुरुके निकट आना चाहिये।' उनके समीप आ जाय। फिर आचार्योंद्वारा देनेपर दण्ड, कटिसूत्र, कौपीन, एक शाटी (चादर) और एक कमण्डलु ग्रहण करे। दण्ड बाँसका होना चाहिये। उसकी ऊँचाई पैरसे लेकर मस्तक तककी हो। वह खरोंच अथवा छेदसे रहित, बराबर चिकना एव उत्तम लक्षणोंसे युक्त हो। उसका रंग काला न हो। इन सब वस्तुओंको लेनेके पहले वह आचमन कर ले और— सखा मा गोपायोज. सखा योऽनीन्द्रस्य वज्रोऽसि वार्त्रघ्नः शर्म मे भव यत्पापं तन्निवारय ॥* —इस मन्त्रका उच्चारण करके दण्डको हाथमें ले। फिर— जगज्जीवनं जीवनाधारभूतं मा ते मा मन्त्रयस्व सर्वदा सर्वसौम्य । —इस मन्त्रके साथ प्रणवका उच्चारण करते हुए कमण्डलु ग्रहण करे। तत्पश्चात् 'कौपीनाधारं कटिसूत्रमोम्' यों कहकर कटिसूत्र ग्रहण करे; 'गुह्याच्छादकं कौपीनमोम्' यों कहकर कौपीन ग्रहण करे तथा 'शीतवातोष्णात्राणकरं देहंकरक्षण वस्त्रमोम्' इस मन्त्रका उच्चारण करके वस्त्र ग्रहण करे। तदनन्तर पुनः आचमन करके योगपट्टाभिषिक्त हो 'में कृतार्थ हो गया,' यह मानता हुआ अपने आश्रमोचित सदाचारके पालनमें तत्पर हो जाय। यह उपनिषद् है ॥ ३९ ॥ ॥ चतुर्थ उपदेश समाप्त ॥ ४ ॥ पञ्चम उपदेश संन्यास और संन्यासीके भेद तथा संन्यास-धर्म और उसके पालनका महत्त्व इसके बाद अपने पिता ब्रह्माजीसे देवर्षि नारदने पूछा— 'भगवन् ! आपने ही बताया है कि सन्यास सब कर्मोंकी निवृत्ति करनेवाला है; फिर आप ही यह भी कहते हैं कि संन्यासी अपने आश्रमोचित आचारके पालनमें तत्पर हो जाय। (ये दोनों बातें परस्परविरुद्ध जान पड़ती हैं। इस विरोधका परिहार कैसे हो ?)' तब पितामहने कहा—'शरीरमें स्थित देहधारी जीवकी चार अवस्थाएँ होती हैं—जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। इन अवस्थाओंके अधीन होकर ही पुरुष कर्म, ज्ञान और वैराग्यके प्रवर्त्तक होते हैं। तथा समस्त प्राणी इन चार अवस्थाओंके अधीन होकर जब-जब जिस अवस्थामें स्थित होते हैं, उसके अनुकूल आचरण करते हैं। (इसी प्रकार जो जिस आश्रममें स्थित होता है, वह उसीके अनुकूल आचरण करता है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थके द्वारा अनिवार्यरूपसे सेवन करनेयोग्य जो श्रौत-स्मार्त कर्म हैं, सन्यास उन्हीं कर्मोंका निवर्तक है। परंतु सन्यास आश्रमके अनुकूल जो श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि साधन हैं, उनका त्याग वहाँ भी नहीं होता। इसी दृष्टिसे यह कहा गया है कि सन्यासी अपने आश्रमोचित सदाचारके पालनमें तत्पर हो जाय।' नारदजीने कहा—'भगवन् ! ठीक है। अब हमे यथार्थरूपसे यह बताइये कि सन्यासके कितने भेद हैं और उनके अनुष्ठानमे किस प्रकारका अन्तर है ?' ब्रह्माजीने कहा—'बहुत अच्छा। संन्यास-भेदसे आचार- भेद कैसे होता है, यह जानना चाहते हो तो बतलाता हूँ; श्रवण करो। वास्तवमे तो सन्यास एक ही है; किंतु अज्ञानसे, असमर्थतावश और कर्मलोपके कारण तीन भेदोंमें विभक्त होकर वैराग्य-सन्यास, ज्ञान-सन्यास, ज्ञान-वैराग्य-सन्यास और कर्म-सन्यास—इन चार भेदोंको प्राप्त होता है। वह सब इस प्रकार है। मनमें अनर्थकारी दुष्ट काम का अभाव होनेसे विषयोंकी ओरसे विरक्त होकर जो पूर्वजन्मके पुण्यकर्मके प्रभावसे सन्यास लेता है, वह वैराग्य-संन्यासी कहलाता है। जो शास्त्रको जाननेसे तथा पापमय एव पुण्यमय लोकोंका अनुभव और श्रवण करनेसे प्रपञ्चकी ओरसे स्वभावतः विरक्त हो गया है, क्रोध, ईर्ष्या, असूया (दोषदृष्टि), अहकार और अभिमान ही जिसके स्वरूप हैं, ऐसे समस्त ससारको अपने मनसे हटाकर, स्त्री-कामना धन-कामना' और लोकमें ख्यातकी

  • हे दण्ड ! तुम मेरे सखा (सहायक) हो, मेरी रक्षा करो। मेरे ओज (प्राणशक्ति) की रक्षा करो। तुम वही मेरे सखा हो, जो इन्द्रके हाथमें वज्रके रूपमें रहते हो। तुमने ही वज्ररूपसे आघात करके वृत्रासुरका सहार किया है। तुम मेरे लिये कल्याणमय बनो। मुझमें जो पाप हो, उसका निवारण करो।