कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 801, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ४ ] • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ।
—इन दो मन्त्रोंद्वारा अग्निके आधिदैविक स्वरूपको अपने आत्मामें स्थापित कर ले। फिर अग्निका ध्यान करके प्रदक्षिणा और नमस्कारपूर्वक अग्निशालामे उसका विसर्जन कर दे। तदनन्तर प्रात.मध्याेपासन करके सहस्र बार गायत्रीका जप और सूर्योपस्थान करे। तत्पश्चात् नाभितक जलमें प्रवेश करके उसमें बैठकर अष्ट दिक्पालोंको अर्घ्य दे। फिर गायत्रीका विसर्जन करके सावित्रीको व्याहृतियोंमें प्रविष्ट करे अर्थात्
- सावित्रीदेवीसे व्याहृतियोंमें प्रवेश करनेकी प्रार्थना करे। प्रार्थनाके मन्त्र इस प्रकार हैं— 'अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतो- क्षित। इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम्।' * 'यदश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः। छन्दोभ्योऽध्यमृता- त्सम्बभूव। स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु। अमृतस्य देव धारणो भूयासम् ॥† शरीरं मे विचर्षणम्। जिह्वा मे मधुमत्तमा। कर्णाभ्यां भूरि विश्रुवम्। ब्रह्मण कोशोऽसि मेधयापिहितः। श्रुतं मे गोपाय ॥‡' 'दारैषणायाश्च धनैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थितोऽहम्' 'ॐ भूः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भुवः संन्यस्तं मया' 'ॐ सुवः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भूर्भुवः सुवः संन्यस्तं मया' § 'इस प्रकार मन्द, मध्यम और उच्च स्वरसे वाणीद्वारा अथवा मन-ही-मन इन मन्त्रोंका उच्चारण करके तथा 'अभय मनुष्योपयोगी विशुद्ध धन (साधन-सम्पत्ति) की सृष्टि करते हुए आत्मारूपमे मेरे आत्मामें विराजमान हो जाओ। तुम यशरूप होकर अपने कारणरूप यशमें पहुँच जाओ। हे जातवेदा ! तुम पृथिवीसे सम्पन्न होकर अपने धामके साथ यहाँ पधारो।
- इस मन्त्रका अर्थ इसी अङ्कके पृष्ठ ३०८ पर देखिये। †-‡ ये दोनों मन्त्र एक ही मन्त्रके भाग हैं। पूरे मन्त्रका अर्थ भी अङ्कके पृष्ठ ३१८ पर देखिये। § इन वाक्योंका अर्थ इस प्रकार है—'मैं स्त्रीकी कामना, धनकी कामना और लोकमें ख्यातिकी कामनासे ऊपर उठ गया हूँ। मैंने भूलोकका सन्यास (पूर्णत त्याग) कर दिया। मैंने भुव (अन्तरिक्ष) लोकका परित्याग कर दिया तथा मैंने स्वर्गलोकको भी सर्वथा त्याग दिया। मैंने भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक—इन तीनोंको भलीभाँति त्याग दिया।' उ० अं० १५—
सर्वभूतेभ्यो मत्तः सर्वं प्रवर्तते स्वाहा' (मेरी ओरसे सब प्राणियोंको अभयदान दिया गया, मुझसे ही सबकी प्रवृत्ति होती है) इस मन्त्रसे जलका आचमन करके पूर्व दिशाकी ओर पूरी अञ्जलि भर जल डालकर 'ॐ स्वाहा' कहकर शेष बचे हुए शिखाके बालोंको उड़ाड़ डाले। तत्पश्चात्— यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ यज्ञोपवीतं बहिर्न निवसेत् त्वमन्त प्रविश्य मध्ये ह्यजस्रम्। परमं पवित्रं यशो बलं ज्ञानवैराग्य मेधा प्रयच्छ ॥* —यह मन्त्र पढ़कर यज्ञोपवीत तोड़ डाले। और उसे जलाञ्जलिके साथ हाथमें लेकर 'ॐ भूः समुद्रे गच्छ स्वाहा' —इस मन्त्रके द्वारा जलमे ही होम दे। फिर 'ॐ भूः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ भुवः सन्न्यस्तं मया' 'ॐ सुवः सन्न्यस्तं मया'—इस प्रकार तीन बार कहकर, तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके उसका आचमन करे। तत्पश्चात् 'ॐ भूः स्वाहा' कहकर वस्त्र और कटिसूत्रको भी जलमें ही त्याग दे। तदनन्तर इस बातका स्मरण करते हुए कि मैं सब कर्मोंका त्यागी हूँ, दिगम्बर होकर स्वरूपका चिन्तन करते हुए ऊपर बाँह उठाये हुए उत्तर दिशाकी ओर चला जाय ॥ ३७ ॥ 'यदि पूर्ववत् विद्वत्-सन्यासी हो तो गुरुसे प्रणव और महावाक्यका उपदेश प्राप्त करके, मुझसे भिन्न दूसरा कोई नहीं है—इस निश्चयके साथ आनन्दपूर्वक विचरण करता रहे। फल, पत्र और जलका ही आहार करे। पर्वत, वन तथा देवमन्दिरोंमें संचरण करे। संन्यासके बाद यदि दिगम्बर हो गया तो वह अपने हृदयमें सदा केवल आनन्दस्वरूप आत्माकी अनुभूतिका ही भरकर कर्मोंसे अत्यन्त दूर रहनेमें ही लाभ मानता हुआ फलोंके रस, छिलके, पत्ते, मूल एवं जलसे प्राण धारण करे और केवल मोक्षकी ही अभिलाषा रखकर पर्वतकी कन्दराओंमें प्रणवका जप एव ब्रह्मका चिन्तन करते हुए सर्वत्र संचरण करनेवाले अपने शरीरका त्याग कर दे॥३८॥
- यह यज्ञसूत्र परम पवित्र है। यह पूर्वकालमें प्रजापतिके साथ ही प्रकट हुआ था। यह सर्वश्रेष्ठ आयुष्य (आयु बढ़ानेका साधन) है। इस यज्ञोपवीतको मेरे कण्ठमें पहना दो। यह शुभ्र यज्ञोपवीत मेरे बल और तेजको बढ़ानेवाला हो। यज्ञोपवीत बाहर न रहे। हे यज्ञमय सूत्र ! तुम मेरे भीतर प्रवेशकर मेरे आत्माके साथ निरन्तर एक होकर रहो। तुम परम पवित्र हो। मुझे सुयश, बल, ज्ञान, वैराग्य तथा धारणाशक्ति प्रदान करो।