भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 793

॥ द्वितीय उपदेश समाप्त ॥ २ ॥ तृतीय उपदेश संन्यासके अधिकारी, स्वरूप, विधि, नियम एवं आचार आदिका निरूपण

तदनन्तर देवर्षि नारदने अपने पिता ब्रह्माजीसे पूछा— 'भगवन् ! किस प्रकार सन्यास लिया जाता है ? तथा सन्यासका अधिकारी कौन है ?' ब्रह्माजीने कहा—'अच्छा, पहले सन्यासका अधिकारी कौन है, इसका निरूपण करके पश्चात् सन्यासकी विधि बतायी जायगी, सावधान होकर सुनो । नपुंसक, पतित, किसी अङ्गसे हीन, स्त्रीके प्रति अधिक आसक्त, बहरा, बालक, गूँगा, पाखण्डी, चक्री ( षड्यन्त्रकारी ), लिङ्गी (वेषधारी), वैखानसदर द्विज, वेतन लेकर अध्यापन करनेवाला, शिपिविष्ट ( गंजा अथवा कोढ़ी ) तथा अग्निहोत्र न करनेवाला—ये वैराग्यवान् होनेपर भी सन्यासके अधिकारी नहीं हैं। यदि सन्यास ले भी लें, तो भी 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्योंका उपदेश प्राप्त करनेके अधिकारी नहीं होत । जो पहलेसे ही सन्यासी है, अर्थात् कर्मफलकी इच्छा न रखते हुए वर्णाश्रमोचित कर्तव्यका पालन करता है, वही सन्यास आश्रममें प्रवेश करनेका अधिकारी है ॥ १ ॥

'जो दूसरोंसे स्वय नहीं डरता तथा दूसरोको अपनेद्वारा भय नहीं पहुँचाता, वही परिव्राजक ( सन्यासी ) है—ऐसा स्मृतियोंका कथन है । नपुसक, किसी अङ्गसे हीन, अंधा, बालक, पापी, पतित, परस्त्रीगामी, वैखानसदर द्विज, चक्री, लिङ्गी, पाखण्डी, शिपिविष्ट, अग्निहोत्र न करनेवाला, दो-तीन बार सन्यास ग्रहण करनेवाला तथा वेतन लेकर अध्यापन करनेवाला—ये आतुर-सन्यासके सिवा क्रम-सन्यासके अधिकारी नहीं होते ॥ २—४ ॥

उ० सं० ९३—