भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 832 में से

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पृष्ठ 794

७३८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ३ 'यदि कहो, आतुर सन्यासका कौन-सा समय विद्वानोंको मान्य है, तो सुनो। जब प्राण निकलनेका समय अत्यन्त निकट हो, वह आतुर-सन्यासका ठीक समय माना गया है । इससे भिन्न समयको ठीक नहीं माना गया है। आतुर सन्यास यदि ठीक समयसे हो तो वह मुक्तिमार्गकी प्राप्ति करानेवाला होता है। आतुर-सन्यासमें भी विद्वान् पुरुष शास्त्रविहित मन्त्रोंका पाठ करते हुए विधिवत् सब आवश्यक कृत्य करके ही मन्त्रोच्चारणपूर्वक सन्यास ग्रहण करे। आतुर सन्यास हो चाहे क्रम-सन्यास, उसके विधि-विधानमे कोई भेद नहीं है, क्योंकि कर्म मन्त्रकी अपेक्षा करता है और कोई भी मन्त्र ऐसा नहीं है, जो किसी न किसी कर्मसे सम्बन्ध न रखता हो । मन्त्रहीन कर्म वास्तवमें कर्म ही नहीं है। अतः मन्त्रका परित्याग न करे। यदि मन्त्रके बिना कर्म करे तो वह राखमें छोड़ी हुई आहुतिके समान व्यर्थ होता है। मुने ! शास्त्रविधिके अनुसार बताये हुए कर्मको संक्षेपमें करनेसे आतुर-सन्यास सम्पन्न होता है। इसलिये आतुर-सन्यासमें मन्त्रोंका बार-बार उच्चारण आवश्यक एव विहित है ॥ ५-९ ॥ 'यदि अग्निहोत्री पुरुष देशान्तरमें गया हुआ हो और उसे वैराग्य हो जाय तो जलमे ही प्राजापत्येष्टि करके तत्काल सन्यास ले ले । यह प्राजापत्य याग केवल मनसे करे अथवा विधिमें बताये अनुसार मन्त्रोंका उच्चारणमात्र करके करे अथवा वेदोक्त अनुष्ठान पद्धतिके अनुसार विधिवत् कर्म अनुष्ठान करे । यह सब करके ही विद्वान् पुरुष सन्यास ग्रहण करे। अन्यथा वह पतित हो जाता है ॥ १०-११ ॥ 'जब मनमे सब पदार्थोंकी ओरसे पूर्ण वैराग्य हो जाय, तभी सन्यासकी इच्छा करनी चाहिये । इसके विपरीत आचरण करनेसे मनुष्य पतित हो जाता है । विरक्त बुद्धिमान् सन्यास ग्रहण करे और रागवान् पुरुष घरपर ही निवास करे । जो मनमे राग (आसक्ति ) होते हुए भी सन्यास ग्रहण करता है, वह द्विजोंमे अधम है तथा उसे नरककी प्राप्ति होती है ॥ १२-१३ ॥ 'जिसकी जिह्वा, शिश्नेन्द्रिय, उदर और हाथ आदि सभी इन्द्रियाँ भलीभाँति वशमें हों तथा जिसने विवाह न किया हो, ऐसा ब्रह्मचारी ब्राह्मण ही सन्यास ले । संसारको सारहीन समझकर सार वस्तुको प्राप्त करनेकी इच्छासे बुद्धिमान् पुरुष पूर्ण वैराग्यका आश्रय लेकर विवाह किये बिना ही सन्यास ले लेते हैं। कर्म ही प्रवृत्ति (संसारमें प्रवृत्त होने) का लक्षण है और ज्ञान ही सन्यासका मुख्य लक्षण है। अतः बुद्धिमान् पुरुष ज्ञानको सामने रखकर ही यहाँ सन्यास ग्रहण करे ॥ १४-१६॥ 'जब परमतत्त्वरूप सनातन ब्रह्मका ज्ञान हो जाय, तब एक दण्ड धारण करके यज्ञोपवीतसहित शिखाको त्याग दे। जो परमात्मामें अनुरक्त और उनसे भिन्न वस्तुओंकी ओरसे विरक्त है, जिसके मनसे लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा—ये सभी एषणाएँ निकल गयी हैं, वही भिक्षान्नभोजन करने (सन्यास लेने) का अधिकारी है। जैसे साधारण मनुष्य अपनी पूजा और वन्दना होनेपर अत्यधिक प्रसन्न होता है, वैसी ही प्रसन्नता जब डंडोंसे पीटे जानेपर भी हो; तभी वह भिक्षु होनेका अधिकारी होता है। मै ही वासुदेव नामसे प्रसिद्ध अद्वितीय अविनाशी ब्रह्म हूँ—ऐसा भाव जिसके मनमे दृढ हो गया है, वही भिक्षान्नभोजनका अधिकारी है। जिस पुरुषमे शान्ति, शम (मनोनिग्रह), दम (इन्द्रियनिग्रह), शौच, सतोष, सत्य, सरलता, कुछ भी सग्रह न करनेका भाव तथा दम्भका अभाव हो, वही सन्यास-आश्रममें प्रवेश करे। जब मनुष्य मन, वाणी और क्रियाद्वारा किसी भी प्राणीके प्रति पापका भाव नहीं रखता, तभी सन्यासका अधिकारी होता है । (मनुप्रोक्त) दस प्रकारके धर्मोंका अनुष्ठान करते हुए एकाग्रचित्त हो विधिपूर्वक उपनिषदोंका श्रवण करे तथा ब्रह्मचर्य पालन एव स्वाध्यायद्वारा ऋषि- ऋणसे, यज्ञानुष्ठानद्वारा देव ऋणसे और पुत्रकी उत्पत्तिद्वारा पितृ-ऋणसे मुक्त होकर (विरक्त) द्विज सन्यास ग्रहण करे। धृति, क्षमा, दम (मनोनिग्रह), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (बाहर-भीतरकी पवित्रता), इन्द्रियनिग्रह, ह्री (निषिद्ध कर्म एव अविनय आदिसे स्वाभाविक सकोच), विद्या, सत्य तथा अक्रोध (क्रोधका अभाव)—ये दस धर्मके स्वरूप हैं। जो भूतकालमे किये हुए भोगोंका चिन्तन, भविष्यमें मिलनेवाले भोगोकी आकाङ्क्षा तथा वर्तमान समयमें प्राप्त हुए भोगोंका अभिनन्दन नहीं करता, वही सन्यास-आश्रममे निवास कर सकता है। जो अन्तःकरणमें स्थित इन्द्रियोंको अपने भीतर और बाहरके विषयोंको बाहर ही रोक रखनेमें सदा समर्थ है, वही सन्यास-आश्रममें निवास करे। जैसे प्राण निकल जानेपर शरीर सुख-दुःखका अनुभव नहीं करता, उसी प्रकार प्राण रहते हुए भी जिसपर सुख-दुःखका प्रभाव नहीं पड़ता, वही सन्यास-आश्रममें निवास करनेका अधिकारी है ॥ १७-२७॥ 'दो कौपीन (लँगोटियाँ), एक कन्था (गुदड़ी) और एक दण्ड—इतनी ही वस्तुओंका परमहंस सन्यासीको सग्रह करनेका अधिकार है, इससे अधिक सग्रहका उसके लिये विधान नहीं