भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 808

७५२ ⸪ नारदपरिव्राजकोपनिषद् ⸫ [ उपदेश ६ करता है। उत्तर दिशावाले दलमे प्रवेश करनेपर उसे शान्ति का अनुभव होता है। ईशान दलमें जानेपर ज्ञान होता है। उस कमलकी कर्णिकामे स्थित होनेपर उसके भीतर वैराग्य भाव जाग्रत् होता है तथा केशरोंमें स्थित होनेपर उसका मन आत्मचिन्तनमे लगता है। इस प्रकार चैतन्य ही जिसमे मुखकी भाँति प्रधान है, उस आत्मस्वरूपको जानकर विद्वान् पुरुष तुरीयातीत ब्रह्मरूपमे स्थित हो जाता है ॥ ३ ॥ 'जीवकी चार अवस्थाओंमें प्रथम अवस्था जाग्रत् है, दूसरी अवस्था स्वप्न है, तीसरी अवस्था सुषुप्ति है, चौथी अवस्था तुरीय है तथा इन चारोंसे रहित तुरीयातीत है। एक ही आत्मा विश्व, तैजस, प्राज्ञ और तटस्थ भेदसे चार प्रकार- का प्रतीत होता है। अतः 'एक ही परमात्मदेव सबके साक्षी एव सत्त्वादि गुणोंसे रहित हैं और वह ब्रह्म मैं स्वयं हूँ' यो कहे। तुरीयातीत पुरुषको जाग्रत् आदि चारों अवस्थाओंके अनुभवसे परे मानना चाहिये। नही तो जैसे जाग्रत्-अवस्थामे जाग्रत् आदि चार अवस्थाएँ होती है, स्वप्नमें स्वप्नादि चार अवस्थाएँ होती हैं, सुषुप्तिमे सुषुप्ति आदि चार अवस्थाएँ होती है तथा तुरीयमें तुरीयादि चार अवस्थाएँ होती ह, उसी प्रकार तुरीयातीतमें भी इन अवस्थाओंके होनेकी सम्भावना हो सकती है। किंतु वास्तवमे तुरीयातीत-तत्त्व निर्गुण है, अतः उसमे इस प्रकारके अवस्था भेद सम्भव नहीं है। स्थूल, सूक्ष्म एव कारणरूप जो विश्व, तैजस एव प्राज्ञ ईश्वर है, उनके साथ सब अवस्थाओंमें एक ही साक्षी स्थित होता है। अथवा तटस्थ ईश्वर ही द्रष्टा हैं—यदि यो कहेंतो ठीक नहीं, क्योकि तटस्थ पुरुष बीजोपाधिक (मायोपाधिक)ईश्वररूपसे देखे जाते हैं। अतः उनका भी कोई द्रष्टा होनेके कारण तटस्थको द्रष्टा नहीं माना जा सकता। इसलिये वह द्रष्टा नहीं है, ऐसा ही निश्चय करना चाहिये। फिर तो जीवको ही द्रष्टा मान लिया जा सकता है। नहीं, जीव द्रष्टा नहीं हो सकता, क्योकि वह कर्तृत्व, भोक्तृत्व और अहङ्कार आदिसे सयुक्त है। जीवसे इतर जो तुरीयातीत परमात्मा हैं, वे उक्त दोनोंके सम्पर्कसे रहित हैं। यदि कहें जीव भी तो स्वरूपत शुद्ध चैतन्य ही है, अत वह भी कर्तृत्व आदिके ससर्गेसे रहित है, तो यह ठीक नहीं। क्योंकि उसमें जीवत्वका अभिमान होनेसे इस शरीररूपी क्षेत्र- में भी उसका अभिमान है और शरीराभिमानके कारण ही उसमें जीवत्व है। परमात्मासे जीवत्वका व्यवधान वैसा ही है, जैसे महाकाशसे घटाकाशका। व्यवधानके कारण ही यह इस- स्वरूप जीव उच्छ्वास और निःश्वासके बहाने सदा 'सोऽहम्' इस मन्त्रका जप करते हुए अपन स्वरूपका अनुसधान करता है। यो समझकर शरीरमे आत्माभिमान त्याग दे। जो शरीराभिमानी नहीं होता, वही ब्रह्म है, यह कहा जाता है। सन्यासी आसक्तिका त्याग करके क्रोधपर विजय प्राप्त करे, स्वल्पाहारी एव जितेन्द्रिय हो तथा बुद्धिके द्वारा समस्त इन्द्रिय- द्वारोंको बद करके मनको परमात्मचिन्तनमें लगाये। योगी सदा साधनमे सलग्न रहकर कहीं निर्जन स्थानोमे, गुफाओं और वनोंमें बैठ जाय और भलीभाँति ध्यान आरम्भ करे। सिद्धिकी इच्छा रखनेवाला योगवेत्ता पुरुष अतिथि सत्कार, श्राद्ध और यज्ञोंमे तथा देवयात्रा-सम्बन्धी उत्सवोंमे जहाँ अधिक जनसमुदाय एकत्र होता हो, कदापि न जाय। योगी पुरुष योगमे प्रवृत्त होकर ऐसा बर्ताव करे, जिससे दूसरे लोग उसका अनादर और तिरस्कार करें। परतु यह सत्पुरुषोंके मार्गको कलङ्कित न करे। वाग्दण्ड, कर्मदण्ड और मनो- दण्ड—ये तीन दण्ड सदा जिसके नियन्त्रणमें रहते हों, वह महासन्यासी ही यथार्थ त्रिदण्डी है। जो यति धुआँ निकलना बद हो जाने और अग्नि बुझ जानेपर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके घरसे मधुकरी लाकर उसका आहार करता है, वह सर्वश्रेष्ठ माना गया है। जो बिना अनुराग ही सन्यास-धर्ममें स्थित रहकर दण्ड धारणपूर्वक भिक्षासे जीवन-निर्वाह करता है, किंतु जिसे ससारसे वैराग्य नहीं होता, वह सन्यासी नीच श्रेणीका माना गया है। जिस घरमे उसे विशेषरूपसे भिक्षा मिलती है, उसमें वासनावश पुनः भिक्षाके लिये जो नहीं जाता, वही वास्तविक यति माना गया है—इससे विपरीत आचरण करनेवाला नहीं। जो शरीर और इन्द्रिय आदिसे रहित, सर्वसाक्षी, पारमार्थिक विज्ञानस्वरूप, सुखमय, स्वयम्प्रकाश एव परमतत्त्वरूप परमात्माको अपने आत्मरूपसे जानता है, वही वर्ण और आश्रमसे अतीत यथार्थ सन्यासी है। देहमें वर्ण और आश्रम आदिकी कल्पना मायासे ही हुई है। 'मै बोधस्वरूप आत्मा हूँ, मुझसे उन वर्ण और आश्रम आदिका किसी कालमें सम्बन्ध नहीं है'—इस प्रकार जो उपनिषदोंके अनुशीलनद्वारा भली- भाँति समझ लेता है, वही अतिवर्णाश्रमी (यथार्थ सन्यासी) है। अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेनेके कारण जिसके वर्ण और आश्रमसम्बन्धी आचार छूट गये हैं, वह समस्त वर्णों और आश्रमोंसे ऊपर उठकर अपने आत्मामें ही स्थित है। जो पुरुष अपने आश्रमो और वर्णोंसे ऊपर उठकर आत्मामें ही स्थित है, उसीको सम्पूर्ण वेदार्थका ज्ञान रखनेवाले ज्ञानी पुरुषोंने अतिवर्णाश्रमी (यथार्थ सन्यासी) कहा है। इसलिये नारद! सभी वर्ण और आश्रम अन्यगत (शरीरगत) होनेपर भी