भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 809, कुल 832 में से

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पृष्ठ 809

उपदेश ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५३

भ्रान्तिवश आत्मामें आरोपित कर लिये जाते हैं, परंतु आत्मवेत्ता पुरुष ऐसा नहीं करते । नारद ! ब्रह्मज्ञानी-पुरुषों- के लिये न कोई विधि है न निषेध । उनके लिये अमुक वस्तु त्याज्य है और अमुक वस्तु त्याज्य नहीं है, इस तरहकी कल्पना नहीं होती । और भी नियम उनपर लागू नहीं होते ॥ ४-१९ ॥

'जिज्ञासुको चाहिये कि वह सम्पूर्ण भूतोंसे तथा ब्रह्मा- तकके पदसे भी विरक्त हो, सबमें, पुत्र और धन आदिमे भी प्रेम न रखते हुए मोक्षके साधनोंमे श्रद्धा करे और उपनिषदों- का ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे हाथमे कुछ भेंट लेकर ब्रह्मवेत्ता गुरुकी सेवामें जाय । वहाँ दीर्घकालतक अपनी सेवाओंसे गुरुको संतुष्ट रखते हुए चित्तको भलीभाँति एकाग्र करके ध्यानपूर्वक उपनिषद्-वाक्योंके अर्थका श्रवण करे। ममता और अहङ्कार त्याग दे । सब प्रकारकी आसक्तियोंसे पृथक् रहे तथा शम दम आदि साधनोंसे सम्पन्न होकर अपनेमें ही आत्माका दर्शन करे । संसारमें सदा जन्म, मृत्यु और जरा आदि दोषोंका दर्शन करनेसे ही उसकी ओरसे विरक्ति होती है। और जो संसारसे विरक्त हो गया है, उसीके द्वारा यथार्थ- रूपसे सन्न्यासग्रहण सम्भव होता है । इसमे तनिक भी सन्देहके लिये स्थान नहीं है। मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला परमहंस उपनिषदोंके श्रवण आदिके द्वारा साक्षात् मोक्षके एकमात्र साधन ब्रह्मविज्ञानका अभ्यास करे। परमहंस नामक यति ब्रह्मविज्ञानकी प्राप्तिके लिये शम-दम आदि सम्पूर्ण साधनोंसे सम्पन्न होवे । वेदान्तवेत्ता विद्वान् योगी सदा उपनिषदोंके अभ्यासमे तत्पर रहे। शम-दम आदिसे सम्पन्न हो मन और इन्द्रियोंको अपने वशमें कर ले । भयको त्याग दे । कहीं भी ममता न रक्खे । सदा निर्द्वन्द्व रहे । परिग्रहको सर्वथा त्याग दे । सिरके बालोको मुँड़ा ले। पुराने वस्त्रका कौपीन पहने अथवा दिगम्बर रहे। मनमें ममता और अहङ्कारको कभी स्थान न दे । जो मित्र और शत्रु आदिमें समान भाव रखता है तथा सम्पूर्ण जीवोंके प्रति मैत्रीका भाव रखता है, जिसका अन्तःकरण सर्वथा शान्त है, वह एकमात्र ज्ञानी पुरुष ही संसार-समुद्रसे पार होता है, दूसरा —अज्ञानी नहीं ॥ २०-२९ ॥

'जिज्ञासु पुरुष गुरुके हितमें तत्पर रहकर वहाँ एक वर्ष- तक निवास करे । नियमोके पालनमें कभी प्रमाद न करे तथा ब्रह्मचर्य और अहिंसा आदि यमोके पालनमे भी सतत सावधान रहे । इस प्रकार साधन करते हुए (गुरुकृपासे ) वर्षके अन्तमे सर्वोत्तम ज्ञानयोगकी उपलब्धि करके धर्मानुकूल आचरण करते हुए इस पृथ्वीपर विचरण करे । ऊपर बताये अनुसार वर्षके अन्तमे सर्वोत्तम ज्ञानयोगकी प्राप्तिके अनन्तर ब्रह्मचर्य आदि तीनो आश्रमोंका त्याग करके अन्तिम आश्रम सन्न्यासको ग्रहण करे तथा गुरुकी आज्ञा लेकर इस पृथ्वीपर विचरण करे । वह आसक्तिको त्याग दे । क्रोधको काबूमें रक्खे । आहार स्वल्पमात्र करे और सदा जितेन्द्रिय बना रहे ॥ ३०-३३ ॥

'कर्म न करनेवाला गृहस्थ और कर्मपरायण भिक्षु—ये दोनों अपने आश्रमके विपरीत व्यवहार करनेके कारण कभी शोभा नही पाते । मनुष्य मदिराको तो पीनेपर मतवाला होता है, परंतु तरुणी स्त्रीको देखकर ही उन्मत्त हो उठता है । इसलिये दर्शनमात्रसे विषका सा प्रभाव डालनेवाली नारीको सन्यासी दूरसे ही त्याग दे । स्त्रियोंके साथ बातचीत करना, उनके पास सन्देश भेजना, नाचना, गाना, हास-परिहास करना तथा परायी निन्दा करना—सन्यासी इन सबका त्याग कर दे । नारद ! यतिके लिये (नैमित्तिक) स्नान, जप, पूजा, होम तथा अग्निहोत्र आदि कार्य कर्तव्य नहीं हैं। उसके लिये देव-पूजन, श्राद्ध-तर्पण, तीर्थयात्रा, व्रत, धर्म-अधर्म तथा लोकाचारसम्बन्धी कार्य भी नही हैं। योगयुक्त सन्यासी सम्पूर्ण कर्मोंको त्याग दे, समस्त लोकाचारोंसे भी दूर रहे । विद्वान् यति अपनी बुद्धिको परमार्थमें लगाकर कृमि, कीट, पतङ्ग तथा वनस्पति आदि जीवोंकी कभी हिंसा न करे । वह सदा अन्तर्मुख रहे, बाहर और भीतरसे भी स्वच्छता रक्खे । अपने अन्तःकरणको पूर्णतः शान्त बनाये रहे तथा बुद्धिको आत्मानन्दसे ही परिपूर्ण किये रहे। नारद ! तुम भीतरसे सम्पूर्ण आसक्तियोंका परित्याग करके ससारमें विचरते रहो । सन्यासीको अकेले किसी ऐसे प्रदेशमें नहीं घूमना चाहिये, जहाँ अराजकता फैली हुई हो । सन्यासी स्तुति और नमस्कारसे दूर रहे । श्राद्ध और तर्पणसे भी अलग रहे। किसी शून्य भवनमें अथवा पर्वतकी गुफाओंमे आश्रय ले । सन्यासीको सदा स्वच्छन्दरूपसे विचरना चाहिये । यह उपनिषद् है' ॥ ३४-४२ ॥

॥ षष्ठ उपदेश समाप्त ॥ ६ ॥ --•G•-

उ० अ० ९५—

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