कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 811, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५५ [बायाँ स्तम्भ] ज्ञान कहा गया है। अर्थात् शरीरमें वायुके स्पर्शमात्रसे ही वह शुद्ध हो जाता है, उसे जलसे स्नान करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ २ ॥ 'कुटीचकके लिये ललाटमें ऊर्ध्वपुण्ड्र तिलक लगानेका विधान है। बहूदकके लिये त्रिपुण्ड्रका तथा हंसके लिये ऊर्ध्वपुण्ड्र, त्रिपुण्ड्र दोनोंकी विधि है। परमहंस केवल विभूति धारण करे। तुरीयातीतके लिये तिलकपुण्ड्र कहा गया है। अवधूतके लिये किसी प्रकारका तिलक आवश्यक नहीं है अथवा तुरीयातीत एवं अवधूत दोनोंके लिये ही तिलक अनावश्यक है ॥ ३ ॥ 'कुटीचक दो महीनेपर बाल बनवाये; बहूदक चार महीने- पर । हंस और परमहंसके लिये बाल बनवानेका विधान नहीं है। यदि है भी तो छः महीनेपर । तुरीयातीत और अवधूतके लिये तो क्षौरका नियम है ही नहीं ॥ ४ ॥ 'कुटीचकके लिये एक स्थानका अन्न खानेकी विधि है। बहूदकको मधुकरीका अन्न खाना चाहिये । हंस और परमहंसके लिये हाथ ही पात्र है, उसपर जो कुछ आ जाय, उतना ही खाकर सन्तोष करे । तुरीयातीतके लिये गो-मुखवृत्ति है अर्थात् उसके मुखमें दूसरा कोई जो कुछ फल फूल देना चाहे, उसे वह गायकी भाँति मुँह फैलाकर ले ले। अवधूतके लिये अजगर-वृत्ति है अर्थात् दैवेच्छा या परेच्छासे कभी जो कुछ भी प्राप्त हो जाय, उसीपर वह संतोष करे ॥ ५ ॥ 'कुटीचकके लिये दो वस्त्र रखनेका विधान है। बहूदकके लिये एक चादर और हंसके लिये वस्त्रका एक टुकड़ा रखनेका नियम है । परमहंस दिगम्बर रहे अथवा एक कौपीनमात्र धारण करे । तुरीयातीत और अवधूतको तो दिगम्बर ही रहना चाहिये । हंस और परमहंसके लिये ही [दायाँ स्तम्भ] मृगचर्म रखनेका विधान है, अन्य संन्यासियोंके लिये नहीं ॥ ६ ॥ 'कुटीचक और बहूदकके लिये प्रत्यक्ष देवपूजनका विधान है। हंस और परमहंस केवल मानसिक पूजन कर सकते हैं । तुरीयातीत और अवधूत केवल 'सोऽहमस्मि' (वह ब्रह्म मैं ही हूँ) यही भावना करें ॥ ७ ॥ 'कुटीचक और बहूदकका मन्त्र-जपमें अधिकार है। हंस और परमहंस केवल ध्यानके अधिकारी हैं। तुरीयातीत और अवधूतका स्वरूपानुसंधानके सिवा और किसी कार्यमें अधिकार नहीं है। तुरीयातीत, अवधूत और परमहंस—इन तीनको ही 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्योंके उपदेशका अधिकार प्राप्त है। कुटीचक, बहूदक और हंस—ये तीनों दूसरोंके लिये उपदेश देनेके अधिकारी नहीं हैं ॥ ८ ॥ 'कुटीचक और बहूदकके लिये मातृप्रणव अर्थात् बाह्य- प्रणवके चिन्तनका विधान है। हंस और परमहंसको अन्तः- प्रणवका तथा तुरीयातीत और अवधूतको ब्रह्मरूप प्रणवका चिन्तन करना चाहिये ॥ ९ ॥ 'कुटीचक और बहूदकका प्रमुख साधन है—श्रवण। हंस और परमहंसका प्रमुख साधन है मनन तथा तुरीयातीत और अवधूतका प्रमुख साधन है निदिध्यासन। आत्मानुसंधानकी इन सभीके लिये विधि है ॥ १० ॥ 'इस प्रकार मुक्तिकी इच्छा रखनेवाला सन्यासी सदा संसार-सागरसे पार उतारनेवाले तारकमन्त्र (प्रणव) का चिन्तन करते हुए जीवन्मुक्त होकर रहे । वह अधिकार- विशेषके अनुसार कैवल्य प्राप्तिके उपायका अन्वेषण करे । यह उपनिषद् है' ॥ ११ ॥ ॥ सप्तम उपदेश समाप्त ॥ ७ ॥ उपदेश प्रणवके स्वरूपका विवेचन [निचला बायाँ स्तम्भ] तत्पश्चात् नारदजीने भगवान् ब्रह्माजीसे पूछा—'भगवन् ! जन्म-मृत्युसे तारनेवाला मन्त्र कौन-सा है ? मैं आपकी शरणमें हूँ, बतानेकी कृपा करें।' ब्रह्माजीने 'तथास्तु' कहकर इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया—'वत्स ! ॐ यही तारक-मन्त्र है। [निचला दायाँ स्तम्भ] यह ब्रह्मस्वरूप है। व्यष्टि और समष्टि दोनों प्रकारसे इसीका चिन्तन करना चाहिये।' नारदजीने पूछा—'भगवन् ! व्यष्टि और समष्टि क्या है ?' ब्रह्माजीने कहा—'व्यष्टि और समष्टि ब्रह्म प्रणवके अङ्ग हैं। एक ही ब्रह्म-प्रणवके तीन भेद माने