कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 812, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७५६ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ८
जाते हैं—एक संहार-प्रणव, दूसरा सृष्टि प्रणव और तीसरा उभयात्मक प्रणव । उभयात्मक प्रणवके आन्तर और बाह्य —दो स्वरूप हैं। इसीलिये उसे उभयात्मक कहते हैं। अन्तः- प्रणवका स्वरूप आगे बतलायेंगे। उपर्युक्त ब्रह्म-प्रणवका एक भेद व्यावहारिक प्रणव है। व्यष्टि प्रणवका ही दूसरा नाम बाह्य-प्रणव है। इन सबके अतिरिक्त एक आर्षप्रणव भी है।
अन्तर-बाह्य—उभयस्वरूप जो ब्रह्म-प्रणव है, वही विराट्प्रणवके नामसे कहा गया है। सहार-प्रणव ब्रह्मादिसे अधिष्ठित होनेके कारण ही ब्रह्म-प्रणव माना गया है। स्थूल आदि भेदसे युक्त अकारादि चार मात्राएँ जिनका स्वरूप हैं, उस मात्रा- चतुष्टयात्मक प्रणवका नाम अर्धमात्रा-प्रणव है ॥ १ ॥ अथ अन्तःप्रणवका स्वरूप बतलाते है। ॐ यह ब्रह्म
१ अद्धमात्रा, अकार और उकार जिसके अङ्ग हैं, ऐसा मकारमात्रा-प्रधान 'सहार-प्रणव' होता है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इसके अधिष्ठाता हैं। अतः यह मात्रात्रयप्रधान माना गया है, जैसा कि कहा गया है— त्रिमात्राकल्पनोपेतसहारप्रणवासना । ब्रह्मविष्ण्वीश्वरा विश्वसर्गस्थित्यन्तहेतव ॥ सवेयुर्यत एवाय सहारप्रणवो भवेत् ॥
२ उकार, मकार और अर्धमात्राको अङ्ग बनाकर अकारमात्रकी प्रधानतासे बोला जानेवाला प्रणव 'सृष्टि-प्रणव' कहलाता है। इसके अधिष्ठाता देवता ब्रह्माजी हैं, अतः यह एकमात्राम्रधान है। जैसा कि वचन है— एकमात्रात्मक तारमुपादाय चतुर्मुखः । यत. ससर्ज सकल सृष्टितारो ह्यतो भवेत् ॥
३ उपर्युक्त सहार और सृष्टि-प्रणवके अतिरिक्त एक अन्तर्बाह्योभयस्वरूप प्रणव और होनेसे 'ब्रह्म-प्रणव' तीन प्रकारका होता है। सहार-प्रणवकी तीन मात्राएँ, सृष्टि-प्रणवकी एक मात्रा, अन्त.प्रणवकी आठ मात्राएँ तथा बाह्यप्रणवकी चार मात्राएँ—ये सब मिलकर सोलह होती हैं। इन सोलह मात्राओसे विशिष्ट प्रणवको 'ब्रह्म-प्रणव' कहा जाता है। यद्यपि यह एक ही है, तथापि दृष्टिभेदसे अनेक भेदवाला हो जाता है।
४ जिसके गर्भमें (वर्णमालाके) पचास अक्षर छिपे हुए हैं, उस 'अकार' की प्रधानताको लेकर व्यवहृत होनेवाला प्रणव व्यावहारिक प्रणव कहलाता है। 'अकारो वै सर्वा वाक सैषा स्पर्शोष्मभि व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति' (अकार ही समस्त वाणी है। यह अकार-मात्रा ही स्पर्श और ऊष्मा आदि वर्णोके रूपमें व्यक्त होकर बहुत-सी होती है, अनेक रूपोंमें दिखायी देती है)—इस श्रुतिके अनुसार अकार ही समस्त वर्णोका मूल है। पचास वर्णोसे विभूषित एकमात्रप्रधान यह प्रणव है। वैखरी वाणीका, जिसके द्वारा मानवमात्र व्यवहार करते हैं, हेतु होनेसे इस प्रणवको 'व्यावहारिक' कहा गया है। दुर्गा आदि तथा इच्छा आदि तीन शक्तियोसे यह युक्त है। वसुगण, रुद्रगण और आदित्यगण इसके अङ्ग हैं। नौ ब्रह्मा एव पाँच ब्रह्मा इसके अधिष्ठाता देवता हैं। जैसा कि कहा गया है— एकमात्रात्मकस्तार पञ्चाशद्वर्णभूषित । वैखरीकल्पनाहेतुर्व्यावहारिक ईरितः ॥ दुर्गादिशक्तित्रितय तथेच्छादित्रिशक्तिकम् । वस्वाहित्यरुद्रजात नवब्रह्माधिदेवतम् ॥ तथा पञ्चब्रह्मदेव तद्वाच्यार्थ इतीरित. ।
५ विराट्-प्रणव समष्टिरूप है, इसमे बाह्य व्यष्टि-प्रणव है, उसकी चार मात्राएँ हैं। उसीको 'बाह्य प्रणव' कहते हैं। विश्व या वैश्वानर ही इसका अधिष्ठाता है। कहा भी है— व्यष्टे. समष्टिभावत्वात्स्थूलाद्यंशयोगत. । बाह्यप्रणव आम्नातो विश्वाद्या वाच्यता गताः ॥
६ अकार, उकार, मकार, बिन्दु, नाद, कला और कलातीतरूपसे ऋषिमण्डलीद्वारा उपास्यमान सप्तमात्रात्मक प्रणवका नाम 'आर्षप्रणव' है। पञ्चब्रह्मा, विराट् और अन्तर्यामी इसके अधिष्ठाता हैं। कहा भी है— सप्तमात्रात्मक पञ्चब्रह्मान्तर्याम्यधिष्ठित. । ऋषिमण्डलसेव्यत्वादार्षप्रणव उच्यते ॥
७ आर्ष-प्रणवके अतिरिक्त एक स्थिति-प्रणव भी होता है, यह अकार-उकार—उभयमात्रारूप है। ब्रह्मा और विष्णु इसके अधिष्ठाता है। समष्टि अकार आदि मात्राचतुष्टयात्मक प्रणवको 'विराट्-प्रणव' कहते हैं। 'विराट्' आदि इसके अधिष्ठाता हैं। जैसा कि कहा है— चतु समष्टिमात्राद्युग् विराप्रणव उच्यते । विराडादिर्भवेद्वाच्य तलक्ष्य परमाक्षरम् ॥
८ स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षी—इन चारकी मात्राओँसे युक्त 'अर्धमात्रा-प्रणव' होता है। ओत, अनुज्ञात, अनुज्ञा और