भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 813

उपदेश ८] *** महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *** ७५७


[बायाँ स्तम्भ]

है । 'ॐ' इस एकाक्षर मन्त्रको अन्तःप्रणव समझो । यह आठ भागोंमें विभक्त होता है । अकार, उकार, मकार, अर्द्धमात्रा, विन्दु, नाद, कला और शक्ति—ये ही उसके आठ भाग हैं । यह प्रणव केवल चार ही मात्राओंसे युक्त नहीं है, उसकी एक-एक मात्रा भी अनेकानेक भेदोंसे सम्पन्न है। केवल अकार ही दस हजार अवयवोंसे सम्पन्न है । उकारके एक सहस्र और मकारके एक सौ अवयव हैं । इसी प्रकार अर्द्धमात्रा-प्रणवका स्वरूप अनन्त अवयवोंसे युक्त है । विराट्-प्रणव सगुणरूप है, संहार-प्रणव निर्गुणरूप है और सृष्टि-प्रणव उभयात्मक है—वह सगुण-निर्गुण उभयरूप है। जैसे विराट्-प्रणव प्लुत अर्थात् अकार आदि चार मात्राओंकी समष्टिसे युक्त है, उसी प्रकार संहार-प्रणव प्लुत-प्लुत अर्थात् चतुर्थमात्रात्मक अर्द्धमात्रास्वरूप है ॥ २ ॥

विराट्-प्रणव अर्थात् विराट्स्वरूप ब्रह्म-प्रणव सोलह मात्राओंका है। यह छत्तीस तत्त्वोंसे परे है। वह षोडश मात्रारूप कैसे है, यह बताते हैं। अकार पहली मात्रा है, उकार दूसरी, मकार तीसरी, अर्द्धमात्रा चौथी, विन्दु पाँचवीं, नाद छठी, कला सातवीं, कलातीता आठवीं, शान्ति नवीं, शान्त्यतीता दसवीं, उन्मनी ग्यारहवी, मनोन्मनी बारहवीं, पुरी (वैखरी) तेरहवीं, मध्यमा चौदहवीं, पश्यन्ती पंद्रहवीं और परा सोलहवीं मात्रा है। यह सोलह मात्राओंवाला ब्रह्म-प्रणव ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्परूप चतुर्विध तुरीयसे अभिन्न होनेके कारण पुनः चौसठ मात्राओंवाला होता है। यही प्रकृति और पुरुषरूपसे पुनः दो भेदोंको प्राप्त होकर एक सौ अट्ठाइस मात्राओंवाला स्वरूप धारण करता है। इस प्रकार एक होकर भी ब्रह्म-प्रणव दृष्टिभेदसे अनेकविध सगुण और निर्गुण स्वरूपको प्राप्त होता है ॥३॥

(ॐकारको ब्रह्मस्वरूप बताया गया है। वह परब्रह्म परमात्मा कैसा है, यह बताते हैं।) ये ब्रह्म प्रणवरूप परमात्मा सबके आधारभूत तथा परम ज्योति स्वरूप हैं। ये ही सबके ईश्वर और सर्वत्र व्यापक हैं। सम्पूर्ण देवता इन्हींके स्वरूप हैं । समस्त प्रपञ्चका आधार—प्रकृति भी इन्हींके गर्भमें है। ये सर्वाक्षरमय हैं—वर्णमालाके पचास वर्ण और उनके द्वारा बोध्य अर्थ, सब इनके स्वरूप ही हैं। ये कालस्वरूप, समस्त शास्त्रमय तथा कल्याणरूप हैं। समस्त श्रुतियोंमें श्रेष्ठ तत्त्व


[दायाँ स्तम्भ]

पुरुषोत्तमरूपसे इनका ही अनुसन्धान करना चाहिये । समस्त उपनिषदोंके मुख्य अर्थ ये ही हैं। इन्हींमें उपनिषदें गतार्थ होती हैं । भूत, वर्तमान और भविष्य—इन तीनों कालोंमें होनेवाला जो जगत् है तथा इन तीनों लोकोंसे परे जो कोई अविनाशी तत्त्व है, वह सब ॐकारस्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही है—यह जानो । श्रेष्ठ नारद ! ॐकारको ही मोक्षदायक समझो । प्रणवके वाच्यार्थभूत परमात्मा ही यह आत्मा हैं। 'अयमात्मा ब्रह्म' (यह आत्मा ब्रह्म है)—इस श्रुतिद्वारा 'ब्रह्म' शब्दसे उन्हींका वर्णन हुआ है। ब्रह्मकी आत्माके साथ ॐकारके वाच्यार्थरूपसे एकता करके वह एकमात्र (अद्वितीय), जरारहित (मृत्युरहित) एव अमृतरूप चिन्मय तत्त्व ॐ है—इस प्रकार अनुभव करो । इस अनुभवके पश्चात् उस परमात्मस्वरूप ॐकारमें स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों शरीरोंवाले इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपञ्चका आरोप करके—अर्थात् एक परमात्मा ही सत्य हैं, उन्हींमें इस स्थूल, सूक्ष्म और कारण-जगत्‌की कल्पना हुई है—विवेकद्वारा ऐसा अनुभव करके यह निश्चय करे कि यह जगत् ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा) ही है । तथा तन्मय (परमात्ममय) होनेके कारण यह अवश्य तत्स्वरूप (परमात्मारूप) ही है। इस प्रकार जगत्‌को 'ॐ' समझो अर्थात् इसे 'ॐ'के वाच्यार्थभूत परमात्मामें विलीन कर डालो तथा त्रिविध शरीरवाले अपने आत्माको भी 'यह त्रिविध शरीररूप उपाधिसे युक्त ब्रह्म ही है' ऐसी भावना करते हुए ब्रह्मरूप ही निश्चय करो । इस तरह आत्मा और परब्रह्मकी एकताका दृढ निश्चय हो जानेपर आत्मस्वरूप परब्रह्मका निरन्तर चिन्तन करते रहना चाहिये । अब क्रमशः विश्व, तैजस आदिके वाचक प्रणवकी मात्राओंका क्रम बताया जाता है।

'स्थूल (विराट् जगत्स्वरूप) एव स्थूल जगत्‌का भोक्ता होनेसे, सूक्ष्म (सूक्ष्म जगत्स्वरूप) एव सूक्ष्म जगत्‌का भोक्ता होनेके कारण, एकमात्र आनन्दस्वरूप एव आनन्दमात्रका उपभोक्ता होनेसे तथा इन तीनोंकी अपेक्षा भी विलक्षण होनेके कारण वह आत्मा चार भेदोंवाला है। ये चार भेद ही उसके चार पाद हैं, अतः वह चार पादोंवाला है। जाग्रत्-अवस्था तथा इसके द्वारा उपलक्षित होनेवाला यह सम्पूर्ण जगत् ही जिनका स्थान अर्थात् शरीर है—जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो रहे हैं, जिनका ज्ञान इस स्थूल (बाह्य) जगत्में सब ओर फैला हुआ है, जो इस समस्त विश्वके भोक्ता (रक्षक) हैं, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मे-


[पाद-टिप्पणी]

१. पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, पाँच शब्दादि विषय, चार अन्त करण, पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्राएँ, महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृति—ये छत्तीस तत्त्व हैं ।