भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 814, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 814

७५८ * नारदपरिव्राजकोपनिषद् * [ उपदेश ८

न्द्रियों, पाँच प्राण तथा चार अन्तःकरण—ये उन्नीस समष्टि- करण ही जिनके मुख हैं, पाताल, भूः, सुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्यम्—ये आठ लोक ही जिनके आठ अङ्ग हैं, जो स्थूल जगत्के उपभोका हैं, स्थूल, सूक्ष्म, कारण और साक्षी—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है, वे स्थूल विश्वमें सर्वत्र व्यापक एवं अखिल विश्वरूप वैश्वानर पुरुष ही विश्वविजेता प्रभुके प्रथम पाद हैं। 'स्वप्नावस्था और उसके द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत्में व्याप्त परमात्मा सूक्ष्मप्रज्ञ हैं—उनका विज्ञान बाह्य जगत्की अपेक्षा आन्तरिक अर्थात् सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है। स्वतः वे पूर्वोक्तरूपसे आठ अङ्गोंवाले हैं। काम क्रोधादि शत्रुओंको तपानेवाले नारद ! वे स्वप्नलोकमें एकमात्र ही हैं, उनके सिवा दूसरा नहीं है। (उनके भी पूर्ववत् उन्नीस ही मुख हैं।) वे सूक्ष्म जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव और पालन करनेवाले हैं। उनके भी पूर्ववत् स्थूल-सूक्ष्म आदि भेदसे चार स्वरूप हैं। उन्हें तैजस पुरुष कहते हैं, क्योंकि वे तेजोमय एवं प्रकाशके स्वामी हैं। वे समस्त भूतोंके स्वामी हिरण्यगर्भ हैं। पूर्वोक्त वैश्वानर तो स्थूल हैं और हिरण्यगर्भ अन्तःप्रदेशमें स्थित होनेके कारण सूक्ष्म बताये गये हैं। इन्हें परमात्माका द्वितीय पाद बताया जाता है ॥ ४-१३ ॥ 'जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह स्पष्ट.ही सुषुप्ति है। ऐसी सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण जगत्- की प्रलयावस्था (जब कि सम्पूर्ण विश्व अपने कारणमें विलीन हो जाता है) जिनका स्थान (शरीर) है, अर्थात् समष्टि कारण-तत्त्वमें जिनकी स्थिति है, जो एकीभूत (अद्वितीय) हैं—जिनकी अभी नाना रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं हुई है, जो घनीभूत प्रज्ञानसे परिपूर्ण हैं, सुखी अर्थात् आनन्दस्वरूप हैं, नित्यानन्दमय हैं, सब जीवोंके भीतर स्थित अन्तर्यामी आत्मा हैं तथा अपने स्वरूपभूत आनन्दमात्रका उपभोग करने- वाले हैं, चिन्मय प्रकाश ही जिनका मुख है, जो सर्वत्र व्यापक एव अविनाशी हैं; ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार स्वरूपोंमें जिनकी अभिव्यक्ति होती है; वे प्राज्ञनामसे प्रसिद्ध ईश्वर ही परब्रह्म परमात्माके तृतीय पाद हैं ॥ १४-१६ ॥ 'इस प्रकार तीनों पादोंके रूपमें वर्णित ये परमात्मा ईश्वर हैं। ये सर्वज्ञ हैं। ये सूक्ष्मरूपसे भावना (ध्यान) के योग्य परमेश्वर ही अन्तर्यामी आत्मा हैं। ये सम्पूर्ण विश्वके कारण हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके स्थान भी ये ही हैं। जाग्रत् आदि तीनों ही अवस्थाओंमें लक्षित होनेवाला यह जगत् भी वास्तवमें सुषुप्तरूप ही है। यह सब प्रकारकी उपरतिमें बाधक बना रहता है। (सुषुप्तरूप इसलिये है कि इससे मोहित हुए मनुष्योंको कभी किसी वस्तुका तात्त्विक ज्ञान नहीं होता।) इसी प्रकार यह त्रिविध जगत् स्वप्नवत् भी है; क्योंकि यहाँ वस्तुका प्रायः विपरीत ही ज्ञान होता है। इतना ही नहीं, कुछ का कुछ प्रतीत होनेके कारण यहाँ सब कुछ मायामात्र ही है। 'उक्त तीनों पादोंके अतिरिक्त जो चौथा तुरीय पाद है, वह ओत, अनुज्ञातृ, अनुज्ञा और अविकल्प—इन चार भेदोंके कारण चार रूपवाला है। तुरीयरूपमें स्थित ये परमात्मा एकमात्र सच्चिदानन्दरूप हैं। ओत आदि चार भेदोंमें स्थित होनेपर भी चतुर्थ पाद 'तुरीय' ही कहलाता है, उसके चारों भेद तुरीय नामसे ही प्रतिपादित होते हैं, क्योंकि प्रत्येक रूपका तुरीयमें ही पर्यवसान—लय होता है। इस तुरीय पादमें भी जो ओत, अनुज्ञातृ और अनुज्ञारूप तीन भेद हैं, वे विकल्प-ज्ञानके साधन हैं; अतः इन तीन विकल्पों (भेदों) को भी यहाँ पूर्ववत् सुषुप्ति एव मनोमय स्वप्नके समान तथा मायामात्र ही समझना चाहिये। यों जानकर यह निश्चय करना चाहिये कि इन विकल्पोंसे परे जो निर्विकल्परूप तुरीय तुरीय परमात्मा हैं, वे एकमात्र सच्चिदानन्दरूप ही हैं* ॥ १७-२० ॥ 'मुने ! इसके अनन्तर श्रुतिका यह स्पष्ट उपदेश है— जो सदा ही न तो स्थूलको जानता है, न सूक्ष्मको ही जानता है और न दोनोंको ही जानता है, जो न तो अधिक जानने- वाला है न नहीं जाननेवाला है, न अन्तःप्रज्ञ है न बहिःप्रज्ञ (न भीतरका ज्ञान रखनेवाला है न बाहरका), तथा जो प्रज्ञानका घनीभूत स्वरूप भी नहीं है, जिसे नेत्रों- द्वारा नहीं देखा गया, जिसका कोई लक्षण नहीं है, जो कभी पकड़में नहीं आ सकता, व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता; जिसका चिन्तन नहीं हो सकता, जिसे किसी परिभाषामें नहीं बाँधा जा सकता, एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति ही जिसका


  • इस प्रसङ्गको स्पष्ट समझनेके लिये नृसिंहोत्तरतापनी- योपनिषद्का प्रथम खण्ड और वहाँ दी हुई टिप्पणियोंको ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये।