कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 815, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपदेश ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७५९ सार अथवा स्वरूप है, जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है— सर्वप्रकाशक सूर्यकी भाँति वही मुमुक्षुजनोंका जीवनाधार है। ऐसा परम कल्याणमय शान्त, अद्वितीय तत्त्व ही उन पूर्ण स्वयंप्रकाश ब्रह्म परम आकाशरूप है। परब्रह्म होनेके कारण ब्रह्म परमात्माका चतुर्थ पाद है—यह ज्ञानी महात्मा मानते ही वह सदा सर्वत्र विराजमान है। यह उपनिषद्का गूढ हैं। वही ब्रह्म-प्रणव है। वही जानने योग्य है, दूसरा नहीं। रहस्य है' ॥ २१-२३ ॥ ॥ अष्टम उपदेश समाप्त ॥ ८ ॥ नवम उपदेश ब्रह्मके स्वरूपका वर्णन, आत्मवेत्ता संन्यासीके लक्षण तदनन्तर नारदजीने पूछा—'भगवन् ! ब्रह्मका स्वरूप पाँच भँवरोंवाली, पाँच दुःखरूप प्रवाहके वेगसे युक्त, पाँच कैसा है?' तब ब्रह्माजीने उनसे कहा—'वत्स ! ब्रह्म और क्या है, पर्वोंवाली और पचास भेदोंवाली नदीको हमलोग जानते अपना स्वरूप ही तो है— (यह आत्मा ब्रह्म ही है—सब हैं। सबकी जीविकारूप, सबके आश्रयभूत इस विस्तृत ब्रह्मचक्रमें कुछ ब्रह्म ही है, ब्रह्मके सिवा कुछ नहीं है)। ब्रह्म दूसरा जीवात्मा घुमाया जाता है। वह अपने-आपको और सबके है और मैं दूसरा हूँ—इस प्रकार जो लोग जानते हैं, वे पशु हैं, प्रेरक परमात्माको अलग-अलग जानकर उसके बाद उन जो स्वभावसे पशु-योनिमें उत्पन्न हैं, केवल उन्हींका नाम पशु परमात्मासे स्वीकृत होकर अमृतभावको प्राप्त हो जाता है। नहीं है। उन परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार सर्वात्मा और ये वेदवर्णित परब्रह्म ही सर्वश्रेष्ठ आश्रय और अविनाशी सर्वरूपमें जानकर विद्वान् पुरुष मृत्युके मुखसे सदाके लिये हैं। उनमें तीनों लोक स्थित हैं। वेदके तत्त्वको जाननेवाले छूट जाता है। परमात्मज्ञानके सिवा दूसरा कोई मार्ग मोक्ष- महापुरुष यहाँ (हृदयमें) अन्तर्यामीरूपसे स्थित उन ब्रह्म- की प्राप्ति करानेवाला नहीं है' ॥ १ ॥ को जानकर उन्हींके परायण हो उन परब्रह्म परमात्मामें ही ( ब्रह्मविषयक चर्चा करनेवाले कुछ जिज्ञासु आपसमें लीन हो गये। विनाशशील जडवर्ग एवं अविनाशी जीवात्मा— कहते हैं—) 'क्या काल, स्वभाव, निश्चित फल देनेवाला कर्म, इन दोनोंके संयुक्त रूप व्यक्त और अव्यक्तस्वरूप इस विश्व- आकस्मिक घटना, पाँचों महाभूत या जीवात्मा (जगत्का) कारण का परमेश्वर ही धारण और पोषण करते हैं तथा जीवात्मा है? इसपर विचार करना चाहिये। इन काल आदिका समुदाय इस जगत्के विषयोंका भोक्ता बना रहनेके कारण प्रकृतिके भी इस जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वे चेतन अधीन हो इसमे बँध जाता है और उन परमदेव परमेश्वरको आत्माके अधीन हैं (जड होनेके कारण स्वतन्त्र नहीं हैं)। जानकर सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। सर्वज्ञ जीवात्मा भी इस जगत्का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि और अज्ञानी, सर्वसमर्थ और असमर्थ—ये दो अजन्मा आत्मा वह सुख-दुःखोंके हेतुभूत प्रारब्धके अधीन है। इस प्रकार हैं तथा भोगनेवाले जीवात्माके लिये उपयुक्त भोग्यसामग्रीसे विचार करके उन्होंने ध्यानयोगमें स्थित होकर अपने गुणोंसे युक्त अनादि प्रकृति एक तीसरी शक्ति है। (इन तीनों- ढकी हुई उन परमात्मदेवकी स्वरूपभूत अचिन्त्यशक्तिका में जो ईश्वरतत्त्व है, वह शेष दोसे विलक्षण है, क्योंकि) वे साक्षात्कार किया, जो परमात्मदेव अकेले ही उन कालसे परमात्मा अनन्त, सम्पूर्ण रूपोंवाले और कर्तापनके अभिमान- लेकर आत्मातक (पहले बताये हुए) सम्पूर्ण कारणोंपर से रहित हैं। जब मनुष्य इस प्रकार ईश्वर, जीव और प्रकृति— शासन करते हैं। उस एक नेमिवाले, तीन घेरोंवाले, सोलह इन तीनोंको ब्रह्मरूपमें प्राप्त कर लेता है, तब वह सब प्रकार- सिरोंवाले, पचास अरोंवाले, बीस सहायक अरोंसे तथा छः के बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है। प्रकृति तो विनाशशील है और अष्टकोंसे युक्त, अनेक रूपोंवाले एक ही पाशसे युक्त, मार्गके इसको भोगनेवाला जीवात्मा अमृतरूप अविनाशी है। इन तीन भेदोंवाले तथा दो निमित्त और मोहरूपी एक नाभि- विनाशशील जडतत्त्व और चेतन आत्मा दोनोंको एक ईश्वर वाले चक्रको उन्होंने देखा। पाँच स्रोतोंसे आनेवाले विषय- अपने शासनमें रखते हैं; (इस प्रकार जानकर) उनका रूप जलसे युक्त, पाँच स्थानोंसे उत्पन्न होकर भयानक और निरन्तर ध्यान करनेसे, मनको उन्हींमें लगाये रहनेसे तथा टेढी-मेढी चालसे चलनेवाली, पाँच प्राणरूप तरङ्गोंवाली, तन्मय हो जानेसे मनुष्य अन्तमे उन्हें प्राप्त कर लेता है; पाँच प्रकारके ज्ञानके आदिकारण मनरूप मूलवाली, फिर तो समस्त मायाकी निवृत्ति हो जाती है। उन परमदेव