कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 777, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२१
उत्तरकाण्ड पञ्चम अध्याय संसारसे तरनेका उपाय और मोक्षमार्गका निरूपण
श्रीगुरुभगवान्को नमस्कार करके फिर शिष्य पूछता है— ‘भगवन् ! सम्पूर्णतः नष्ट हुई अविद्याका फिर उदय कैसे होता है ?’ ॥ १ ॥ ‘यह सत्य है’ यों कहकर गुरु बोले—‘वर्षा ऋतुके प्रारम्भमें जैसे मेढक आदिका फिरसे प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार पूर्णतः नष्ट हुई अविद्याका उन्मेषकालमे (भगवान्के पलक खोलनेपर ) फिर उदय हो जाता है ॥ २ ॥ ( शिष्यने फिर पूछा— ) ‘भगवन् ! जीवोंका अनादि ससाररूप भ्रम किस प्रकार है ? और उसकी निवृत्ति कैसे होती है ? मोक्षके मार्गका स्वरूप कैसा है? मोक्षका साधन कैसा है ? अथवा मोक्षका उपाय क्या है ? मोक्षका स्वरूप कैसा है ? सायुज्य मुक्ति क्या है ? यह सब तत्त्वत. वर्णन करें।’ ॥ ३ ॥ अत्यन्त आदरपूर्वक, बड़े हर्षसे शिष्यकी बहुत प्रशंसा करके गुरु कहते हैं—‘सावधान होकर सुनो ! निन्दनीय, अनन्त जन्मोंमें बार-बार किये हुए अत्यन्त पुष्ट अनेक प्रकारके विचित्र अनन्त दुष्कर्मोंकि वासनासमुहोंके कारण (जीव) को शरीर एव आत्माके पृथक्त्वका ज्ञान नहीं होता । इसीसे ‘देह ही आत्मा है’ ऐसा अत्यन्त दृढ़ भ्रम हुआ रहता है। ‘म अज्ञानी हूँ, मैं अल्पज्ञ हूँ, मैं जीव हूँ, मैं अनन्त दुःखोंका निवास हूँ, मैं अनादि कालसे जन्म-मरणरूप ससारमे पड़ा हुआ हूँ’ इस प्रकारके भ्रममयी वासनाके कारण ससारमें ही प्रवृत्ति (चेष्टा) होती है । इस (प्रवृत्ति) की निवृत्तिका उपाय कदापि नहीं होता । मिथ्यास्वरूप, स्वप्नके समान विषयभोगोंका अनुभव करके, अनेक प्रकारके असख्य अत्यन्त दुर्लभ मनोरथोंकी निरन्तर आझा करता हुआ अतृप्त (जीव) सदा दौड़ा करता है । अनेक प्रकारके विचित्र स्थूल-सूक्ष्म, उत्तम-अधम अनन्त शरीरोंको धारण करके उन-उन शरीरोंमें विहित (प्राप्त होने योग्य ) विविध विचित्र, अनेक शुभ अशुभ प्रारब्धकमोंका भोग करके, उन-उन कर्मोके फलकी वासनासे वासित (लिप्त) अन्तःकरणवालोंकी बार-बार उन-उन कर्मोंके फलरूप विषयोंमें ही प्रवृत्ति होती है । ससारकी निवृत्तिके मार्गमें प्रवृत्ति (रुचि) भी नहीं उत्पन्न होती । इसलिये (उनको) अनिष्ट ही इष्ट (मङ्गलकारी) की भाँति जान पड़ता है । ससार-वासनावश विपरीत भ्रमसे इष्ट (मङ्गलस्वरूप मोक्षमार्ग) अनिष्ट (अमङ्गलकारी) की भाँति जान पड़ता है । इसलिये सभी जीवोंकी दृष्टविषयम सुखबुद्धि है तथा (उसके न मिलनेमें) दुःखबुद्धि है। वास्तवमें अवाञ्छित ब्रह्मसुखके लिये तो प्रवृत्ति ही उत्पन्न नहीं होती, क्योंकि उसके स्वरूपका ज्ञान जीवोंको है नहीं। वह (ब्रह्मसुख) क्या है, यह जीव नहीं जानते, क्योंकि बन्धन कैसे होता है और मोक्ष कैसे होता है, इस विचारका ही (उनमें) अभाव हैं । यह (जीवोंकी अवस्था) कैसे है ? अज्ञानकी प्रबलतासे । अज्ञानकी प्रबलता किस कारणसे है ?—भक्ति, ज्ञान, वैराग्यकी वासना न होनेसे । इस प्रकारकी वासनाका अभाव क्यों है ? —अन्तःकरणकी अत्यन्त मलिनताके कारण ॥ ४ ॥ ‘अतः (ऐसी दशामें) संसारसे पार होनेका उपाय क्या है ?’ गुरु यही बतलाते हैं—‘अनेक जन्मोंके किये हुए, अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्योंके फलोदयसे सम्पूर्ण वेद-शास्त्रके सिद्धान्तोंका रहस्यरूप सत्पुरुषोंका संग प्राप्त होता है । उस (सत्सङ्ग) से विधि तथा निषेधका ज्ञान होता है । तत्र सदाचारमें प्रवृत्ति होती हैं। सदाचारसे सम्पूर्ण पापोंका नाश हो जाता है। पापनाशसे अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल हो जाता है ५-६ ‘तब (निर्मल होनेपर) अन्तःकरण सद्गुरुका कटाक्ष (दयादृष्टि) चाहता है । सद्गुरुके (कृपा-) कटाक्षके लेशमे ही सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं । सब बन्धन पूर्णतः नष्ट हो जाते ह । श्रेयके सभी विघ्न विनष्ट हो जाते हैं । सभी श्रेय (कल्याणकारी गुण) स्वतः आ जाते हैं । जैसे जन्मान्धको रूपका ज्ञान नहीं होता, उसी प्रकार गुरुके उपदेश बिना करोड़ों कल्पोंमे भी तत्त्वज्ञान नहीं होता । इसलिये सद्गुरुके (कृपा-) कटाक्षके लेशसे अविलम्ब ही तत्त्वज्ञान हो जाता है ॥ ७ ॥ ‘जब सद्गुरुका कृपा-कटाक्ष होता है, तब भगवान्की कथा सुनने एव ध्यानादि करनेमें श्रद्धा उत्पन्न होती है । उस (ध्यानादि) से हृदयमें स्थित दुर्वासनाकी अनादि ग्रन्थिका विनाश हो जाता है । तत्र हृदयमे स्थित सम्पूर्ण कामनाएँ विनष्ट हो जाती हैं । इससे हृदय-कमलकी कर्णिकामे परमात्मा आविर्भूत होते हैं । ‘इससे भगवान् विष्णुमें अत्यन्त दृढ भक्ति उत्पन्न होती है । तब (विषयोंके प्रति) वैराग्य उदय होता है । वैराग्यमे बुद्धिमे विज्ञान (तत्त्वज्ञान) का प्राकट्य होता है । अभ्यासके द्वारा वह ज्ञान क्रमशः परिपक्व होता है ॥ ८-९ ॥ ‘परिपक्व विज्ञानसे (पुरुष) जीवन्मुक्त हो जाता है । सभी शुभ एव अशुभ कर्म वासनाओंके साथ नष्ट हो जाते हैं । तब अत्यन्त दृढ शुद्ध सात्त्विक वासनाद्वारा अतिशय भक्ति होती है । अतिशय भक्तिसे सर्वमय नारायण सभी
उ० अ० ९१—