कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 776, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७२० * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ ४ तमस् शब्दके द्वारा अविद्या कही जाती है ॥ ३-८॥ भेद भी दिखायी देने लगता है। यह जीव कार्यरूप उपाधिसे 'समस्त भूत इन (ब्रह्म) का एक पाद (भाग) हैं। युक्त है और ईश्वर कारणरूप उपाधिसे युक्त हैं। ईश्वरकी इनके शेष तीन पाद अमृतरूप (नित्य) हैं, जो परम महामाया उन्हींकी आज्ञाके अधीन रहती हैं। वे (महामाया) व्योममें प्रतिष्ठित हैं। तीन पादोंवाला पुरुष सबसे ऊपर प्रकाशित उन (ईश्वर) के सङ्कल्पके अनुसार कार्य करनेवाली, विविध है और इसका अवशिष्ट एक पाद सम्पूर्ण जीवोंके रूपमे प्रकारकी अनन्त महामायाशक्तियोंसे भली प्रकार सेवित, अनन्त इस जगत्में प्रकट हुआ। इसके बाद वह जड-चेतनात्मक महामायाजालकी उत्पत्तिका स्थान, महाविष्णुकी लीला-शरीर- विश्वमें चारों ओर व्याप्त हो गया। विद्या, आनन्द एव तुरीय रूपिणी तथा ब्रह्मादिके लिये भी अगोचर हैं। जो भगवान् नामक तीन पाद शाश्वत हैं। शेष चौथा पाद अविद्याके विष्णुका ही भजन करते हैं, वे इन महामायाको अवश्य पार आश्रित है' ॥ ९-१० ॥ कर जाते हैं। दूसरे लोग (जो भगवान् विष्णुका भजन नहीं [शिष्य पूछता है-] 'आत्माराम श्रीआदिनारायणके करते) अनेक उपायोंका अवलम्बन करके भी कभी नहीं उन्मेष निमेष (नेत्रोन्मीलन-निमीलन) कैसे होते हैं? उनका तरते। अविद्याके कार्यरूप अन्तःकरणोंका आश्रय लेकर वे अनन्तकालतक जन्मते रहते हैं; क्योंकि उन (अन्तःकरणों) स्वरूप क्या है?' ॥ ११ ॥ में ब्रह्मचैतन्य प्रतिबिम्बित होता है। प्रतिबिम्ब ही जीव कहलाते गुरु बतलाते हैं- 'बाह्य-दृष्टि उन्मेष (पलक खोलना) हैं। सभी जीव अन्तःकरणकी उपाधिसे युक्त हैं, यों (कुछ है और आन्तरिक-दृष्टि निमेष (पलक बंद करना) है। लोग) कहते हैं। समस्त जीव महाभूतोंसे उत्पन्न सूक्ष्मशरीररूप अन्तर्दृष्टिसे अपने स्वरूपका चिन्तन करना ही निमेष (पलक उपाधिसे युक्त हैं, इस प्रकार दूसरे लोग कहते हैं। बुद्धिमें बंद करना) है। बाह्य-दृष्टिसे अपने स्वरूपका चिन्तन करना प्रतिबिम्बित चैतन्य ही जीव है, ऐसा दूसरोंका मत है। इन ही उन्मेष (पलक खोलना) है। जितने परिमाणका उन्मेषकाल सब (जीवों) में उपाधिको लेकर ही भेद है, अत्यन्त भेद होता है, उतने ही परिमाणका निमेषकाल भी होता है। उन्मेष- नहीं है। सर्वतः परिपूर्ण श्रीनारायण तो अपनी इस इच्छाशक्तिसे कालमें अविद्याकी स्थिति होती है। निमेषकालमें उस (अविद्या) सदा लीला किया करते हैं। इसी प्रकार सब जीव अज्ञानवश का लय होता है। जैसे उन्मेष होता है, वैसे ही चिरंतन उन तुच्छ विषयोंमे, जिनमें सुख नहीं है, सुखप्राप्तिकी आशासे अत्यन्त सूक्ष्म वासनाके प्रभावसे फिर अविद्याका उदय हो असार संसारचक्रमें दौड़ते रहते हैं। इस प्रकार अनादि सत्तार- जाता है। पहलेकी भाँति ही अविद्याके कार्य उत्पन्न हो जाते हैं। वासनास्वरूप विपरीत-भ्रमके कारण ही जीवोंकी संसार-चक्रमें फिर कार्य तथा कारणरूप उपाधिके भेदसे जीव एव ईश्वरका घूमनेकी अनादि-परम्परा चलती रहती है' ॥ १२-१४ ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥ ॥ पूर्वकाण्ड समाप्त ॥