भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 775

अध्याय ४] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७१९ दिवस-रात्रिका एक दिन होता है। इसी प्रकार दिन, पक्ष, मास, सम्वत्सर आदि भेदसे उनके कालमानके सौ करोड़ (एक अरब) वर्षपर्यन्त उनकी स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमें आदिविराट् पुरुष अपने अशी मायोपाधिक नारायणको प्राप्त होता है, अर्थात् उनमें लीन हो जाता है। उस विराट्- पुरुषका जितना स्थितिकाल हैं, उतना ही प्रलयकाल भी होता है। प्रलयके समय सब शून्य हो जाता है ॥ ६ ॥ 'विराट्की स्थिति एव प्रलय मूल-अविद्याण्ड परिपालक आदि नारायणके दिवस-रात्रि कहे जाते हैं। उन दिवस-रात्रि- का एक दिन होता है। इसी प्रकार दिन, पक्ष, मास, सवत्सर आदि भेदसे उनके कालमानके सौ करोड़ बगके समयतक उनकी स्थिति कही जाती है। स्थितिके अन्तमे त्रिपाद्विभूति- नारायणकी इच्छासे उनका निमेष होता है (उनकी पलकें गिरती हैं)। इस निमेषसे मूल-अविद्याण्डका उसके आवरणके साथ प्रलय हो जाता है। तब मूल-अविद्या, जो सत्-असत्से विलक्षण, अनिर्वचनीय, लक्षणरहित, आविर्भाव- तिरोभावरूप, अनादि अखिलकारणोंकी कारणरूप एवं अनन्त महामायाविशेषणोंसे युक्त है, अपने बिलासके साथ तथा सम्पूर्ण कार्यरूप उपाधिके सहित परमसूक्ष्म मूल कारण—अव्यक्तमें प्रवेश कर जाती है । अव्यक्त फिर ब्रह्ममें प्रवेश कर जाता है, उस समय ईधनके जल जानेपर जैसे अग्नि अपने वास्तविक स्वरूपको प्राप्त कर लेता है, वैसे ही मायोपाधिक आदिनारायण मायारूप उपाधिके नष्ट हो जानेपर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाते हैं। समस्त जीव अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाते हैं। जैसे जपा (जवा) पुष्पके सान्निध्य (समीपता) से स्फटिकमे ललाईकी प्रतीति होती है और उस (पुष्प) के अभावमें शुद्ध स्फटिक प्रतीत होता है, वैसे ही ब्रह्ममे भी मायारूप उपाधिसे ही सगुणत्व, परिच्छिन्नत्व आदिकी प्रतीति होती है। उपाधिका नाश हो जानेपर निर्गुणत्व, निरवयवत्व आदिकी प्रतीति होती है' ॥ ७॥ ॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥ * चतुर्थ अध्याय महामायातीत अखण्ड अद्वैत परमानन्दमय परतत्त्व-स्वरूपका निरूपण ॐ । उपाधिका नाश हो जानेके कारण ब्रह्मका निर्विशेष रूप अत्यन्त निर्मल होता है। वह अविद्यासे परे, अतः अत्यन्त शुद्ध है। शुद्ध बोधानन्दमय कैवल्यस्वरूप है । ब्रह्मके चारो पाद निर्विशेष हैं। वह अखण्डस्वरूप, सर्वत. परिपूर्ण, स्वयंप्रकाश सच्चिदानन्द है । अद्वितीय तथा ईश्वररहित है—अर्थात् उसका कोई स्वामी, नियन्ता नहीं है। वह ब्रह्म समस्त कार्य-कारण- स्वरूप, अखण्ड चिद्घनानन्दरूप, अतिदिव्य मङ्गलाकार, निरतिशय आनन्दरूप तेजोरशिनिशेष, सर्वपरिपूर्ण, अनन्त चिद्विलाससय विभूतिका समष्टिरूप, अद्भुत आनन्दमय आश्चर्य- पूर्ण विभूतिविशेषस्वरूप, अनन्त चिन्मय स्तम्भाकार, शुद्ध ज्ञान-आनन्दविशेषस्वरूप, अनन्त परिपूर्णानन्दमय दिव्य विद्यु- न्मालास्वरूप है। इस प्रकार ब्रह्मका अद्वितीय अखण्डानन्दमय स्वरूप वर्णित हुआ ॥ १ ॥ फिर शिष्य कहता है—'भगवन् ! ब्रह्मके पादभेदादि कैसे सम्भव हैं और यदि हैं तो वह अद्वैतस्वरूप है—यह किस प्रकार कहा गया ?' ॥ २ ॥ गुरु शङ्काका समाधान करते हैं—'इसमें विरोध नहीं है। ब्रह्म अद्वैत है, यही सत्य है। और यही कहा गया है। ब्रह्ममें भेद नहीं बताया गया है, (क्योंकि) ब्रह्मके अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। पादभेदादिका वर्णन तो ब्रह्मके स्वरूपका ही वर्णन है। वही कहा जा रहा है। ब्रह्म चार पादवाला (चतुःपादात्मक) है। इन (चारों पादों) में एक अविद्यापाद है और तीन पाद अमृत (नित्य) है। (दूसरी शाखाओंके) उपनिषदोंमे वर्णित स्वरूपका ही यहाँ वर्णन किया गया है। (गान्तान्तरीय उपनिषदोंमें इस प्रकारके वचन मिलते हैं—) 'त्रिपादस्वरूप ब्रह्म अविद्यारूप अन्धकारसे परे, ज्योतिर्मय, परमानन्दस्वरूप एव सनातन परम कैवल्यरूप है। मैं इस आदित्यके समान प्रकाशमय, तमस्‌के परे स्थित महान् पुरुषको जानता हूँ। उसको इस प्रकार (तमस्‌से परे तेजोमयरूपमें) जाननेवाला यहाँ (ससारमे) अमृतस्वरूप (मुक्त) हो जाता है। मोक्षप्राप्तिके लिये दूसरा कोई मार्ग नहीं है। सम्पूर्ण ज्योतियोंकी ज्योति तमस्‌से परे कही गयी है। सबकी आधार- भूत, अचिन्त्यस्वरूप, आदित्यवर्ण (प्रकाशस्वरूप) परम ज्योति तमस्‌से ऊपर (परे) प्रकाशित है। जो एक, अव्यक्त, अनन्तस्वरूप, विश्वरूप पुरातन तत्त्व तमस्‌से परे अवस्थित है, वही शृत (समस्त काम्य कर्मोंका फल—स्वर्गादि) है। उसीको सत्य (निष्कामभावका प्राप्य) कहा गया है। वही सत्य (नित्यसत्ता) है। वही परम विशुद्ध ब्रह्म है'